पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद एक और निवेदन आप सभी से आदरपूर्वक अनुरोध है कि 'पांच लिंकों का आनंद' के अगले विशेषांक हेतु अपनी अथवा अपने पसंद के किसी भी रचनाकार की रचनाओं का लिंक हमें आगामी रविवार तक प्रेषित करें। आप हमें ई -मेल इस पते पर करें dhruvsinghvns@gmail.com तो आइये एक कारवां बनायें। एक मंच,सशक्त मंच ! सादर

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सोमवार, 30 नवंबर 2015

135....”औरत के इंसान बनने की राह में पुरुष की सामंती सोच अब भी सबसे बड़ी दीवार है।”

सादर अभिवादन..
आज देवी जी की तबियत तनिक साथ नहीं दे रही है
मौसम का बदलाव अपने साथ
अपने हिसाब से मानव शरीर को
अभ्यस्त करता है....


बिना किसी लाग-लपेट के चलिए सीधे प्रस्तुति की ओर...


अभिव्यक्ति में....
आज हर तरफ
इक हंगामा सा बरपा है 
इक भीड़  है जो 
बदहवास सी चली जा रही  
कोई कुछ जानता नहीं और 
कोई कुछ  पूछता भी नहीं


प्रतिभा की दुनियां में...
विवाह संस्था पर एक सवालिया निशान
क्यों शादी होते ही दो लोग एक दूसरे पर औंधे मुंह गिर पड़ते हैं। पूरी तरह अपने वजूद समेत ढह जाते हैं। दूसरे के वजूद को निगल जाने को आतुर हो उठते हैं। क्यों स्त्रियां चाहे वो कितनी ही पढ़ी-लिखी या नौकरीपेशा हों एक पारंपरिक सांचे में ढलते हुए देखी जाने लगती हैं और वे स्वयं ढलने भी लगती हैं।


कशिश - मेरी कविताएं में....
तोड़ने को तिलस्म मौन का
देता आवाज़ स्वयं को
अपने नाम से,
गूंजती हंसी मौन की
देखता मुझे निरीहता से
बैठ जाता फ़िर पास मेरे मौन से।


अब छोड़ो भी में
”औरत के इंसान बनने की राह में पुरुष की सामंती सोच अब भी सबसे बड़ी दीवार है।”
विचारों की राजनीति और प्रगतिशील समाज के बीच में अजीब सी रस्साकशी चल रही है। पुरानी सोच अपनी स्थापित ज़मीन छोड़ने को तैयार नहीं और नई उर्वरा शक्तियां उसी ज़मीन को खोद-खोद कर और अधि‍क उर्वरा बनाने को आतुर हैं।


उलूक टाईम्स में
नहीं आया समझ में कहेगा 
फिर से पता है भाई 
पागलों का बैंक अलग 
और खाता अलग 
इसीलिये बनाया जाता है
बहुत अच्छा खूबसूरत 
सा लिखने वाले भी होते हैं 
एक नहीं कई कई होते है 
सोचता क्यों नहीं है 


विचारों का चबूतरा में...
क्यों रख रहा है मुसलमान हिन्दू नाम ?
आमिर खान द्वारा दिया गया ''देश छोड़ने '' वाला  बयान देश में बढ़ रही असहिष्णुता के सन्दर्भ में नया भले ही हो पर आपको  याद  होगा शाहरुख़ खान का वो बयान जिसमे उन्होंने ये कहा था कि भारत में एक मुस्लिम के रूप में उन्हें अलग नज़र से देखा जाता है .इसीलिए उन्होंने अपने बच्चों के नाम भी हिन्दू रखे हैं .बहरहाल   वो ये बताना  भूल गए कि उनकी पत्नी एक हिन्दू है और  शायद बच्चों के नाम उन्होंने ही रखें हो पर ये एक हकीकत है कि आज का भारतीय मुस्लमान अपने बच्चों के नाम या उपनाम हिन्दू रख रहा है .


आहुति में....
याद है तुम्हे वो चाँद की रात, 
दूर तक थी चाँदनी... 
अपने चाँद के साथ... 
चांदनी की स्याह रौशनी में, 
मैं बैठी थी थाम कर, 
अपने हाथो में लेकर तुम्हारा हाथ... 
याद है तुम्हे वो चांदनी रात... 



आज यहीं तक...
मुझसे एक बड़ी गलती हो गई...
देवी जी तबियत को मद्देनजर 

मैंनें आज की प्रस्तुति बनाने का फैसला किया...
जल्द बाजी में ये नज़र नही आया कि 
जिस आई डी मे देवी जी प्रस्तुति बनाती है 
वो खुली है.. सो सारी सूचनाएँ उन्हीं के नाम से चली गई
चरितार्थ हो गई कहावत..दो दिल एक जान वाली
सादर..
दिग्विजय..















रविवार, 29 नवंबर 2015

134...अब यह धर्मनिरपेक्षता क्या है

जय मां हाटेशवरी...

असहिष्णुता.....
असहिष्णुता
सड़क से लेकर संसद तक
गांव से लेकर शहरों तक
साहित्यकार  से लेकर अभिनेता तक
जिधर देखो उधर असहिष्णुता  की चर्चा...
पर मुझे नहीं लगता कि आज देश में किसी प्रकार की असहिष्णुता   है...
जिस सरकार को लक्ष्य कर आज हर तरफ असहिष्णुता   की चर्चा है... 
कहीं न कहीं उसके आदर्शों में श्री राम का आदर्श चरित्र और भारतीय गौरवमयी अतीत  ही बार-बार सामने आता है...
इसलिए राम-राज्य इस सरकार का   आदर्श माडल हो सकता  है...
रामचरितमानस में राम-राज्य के रूप में जिस राजतन्त्र का निरूपण किया गया है, उसमें जनतन्त्र का आदर्श रूप साकार हुआ है...
राम राजा बनते ही जनता को आत्म-निर्णय की खुली छूट देते हैं और उन्हें स्वतन्त्रता का पूर्ण बोध कराते हुए कहते हैं कि...
यहाँ तो कोई अनीति है और न मेरा कोई आधिपत्य या प्रभुत्व है, तुम सब अपने मन के अनुरूप कार्य करो...
यद्यपि यदि मैं कभी कोई अनीति की बात कहूं तो तुम निर्भीक होकर मुझे तत्काल रोक दो....
इस प्रकार प्राचीन भारत में शासन-व्यवस्था धर्मसम्मत थी। उस समय शासक और शासित धर्म-नीति से नियन्त्रित थे एवं उस युग में राजनीति मर्यादित थी। राजा राज-कर्म को ही राज-धर्म समझते
थे। हमारे वैदिक ऋषियों ने समतामूलक लोक- कल्याण-आधारित जीवन-दृष्टि से अभेदमूलक और ममतावादी सर्वोदयी शासन-पद्धति का विकास किया था, जिसे हम प्रजातन्त्र या लोकतन्त्र नाम से पुकारते हैं।
महात्मा गांधीजी ने इसी राम-राज्य को भारत के लिए आदर्श शासन-पद्धति माना था, किन्तु उनका वह सपना सच्चे अर्थों में साकार नहीं हो सका...
लोकतन्त्र में सहभागिता का माध्यम मतदान है, जिसके द्वारा जन स्वविवेक से अपने अधिकार का प्रयोग करता है। जो कि उसका अधिकार है।
जनता   ने सर्वमत से इस सरकार को चुन कर भेजा है...
इस लिये सरकार को स्वतंत्र  कार्य करने दें...
जिस दिन जनता  को लगेगा कि...
यह सरकार भारत की अखंडता के लिये खतरा है...
या किसी धर्म विशेष   की स्वतंत्रता खतरे में हैं...
उस दिन जनता स्वयं इसे बाहर  का रास्ता दिखाएगी...
साहित्य समाज का दर्पण होता है...
और साहित्यकार और अभिनेता युगप्रवर्तक  ...
अगर युगप्रवर्तक ही पक्षपाती हो जाए तो....

देश का माहौल  बेवजह  ही  बिगाड़ना प्रारंभ कर दे तो...
जनता किस पर भरोसा करेगी...


पेश है मेरे द्वारा प्रस्तुत आज की  पांच लिंकों मयी प्रस्तुति...
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मुझे जीने दो
रीता गुप्ता
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शीतल छांव ने उसे अतीत में पहुंचा दिया जब इस सड़क का निर्माण कार्य चल रहा था .
उस दिन घर से विजय बहुत लड़ कर आया था . उसकी पत्नी उम्मीदों से थी और गर्भ में लड़की होने की पुष्टि हो चुकी थी .माँ सहित सभी लोग उसे ख़तम करने की तयारी
कर चुके थे . उसकी नजर पड़ी , उबड़ - खाबड़ बंजर सड़क किनारे एक पीपल की दो नन्ही कोंपले कड़ी धूप में भी अपनी हरियाली दर्ज करा रही थी ,तभी एक बुलडोजर सड़क बनाने


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इतनी असहिष्णुता देश में कभी नहीं रही
हर्षवर्धन त्रिपाठी
कि आंकड़ों को 2014 और 2015 से पीछे ले जाएं, तो तस्वीर ज्यादा साफ होती है। 2010 में 701, 2011 में 580, 2012 में 668 और 2013 में 823 सांप्रदायिक हिंसा के मामले हुए थे। मई 2014 में यूपीए से सत्ता
हासिल करके एनडीए का शासन शुरू हुआ था। 
आंकड़ों इसका सीधा सा मतलब ये है कि नरेंद्र मोदी की सरकार के सत्ता में आने के बाद भारत को असहिष्णु बताने की जो जबर्दस्त कोशिश हो रही है। उसमें पक्षपाती
आंकड़ों का बबड़ा योगदान है। क्योंकि, इन आंकड़ों पर तो बात होती है कि देश में कुल कितनी घटनाएं हुईं। और उस समय केंद्र में किसकी सरकार थी। लेकिन, सच्चाई
ये भी है कि केंद्र में चाहे यूपीए की सरकार रही हो या फिर एनडीए की। कानून व्यवस्था राज्यों का ही मसला है। इसलिए कानून व्यवस्था के साथ सांप्रदायिक हिंसा पर बात करते हुए भी राज्यों की सरकारों पर बात किए बिना बात अधूरी ही रह जाती है। 

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इक ख्याल दिल में समाया है
राजीव कुमार झा
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इनसे दूर इंसान कहाँ मिलते हैं
बड़ी मुश्किल से इनसे निजात पाया है
परिंदों की तरह आसमां में घर बनाया है
साथ चलेंगी दूर तक ये हसरत थी
आंख खुली तो देखा अपना साया है


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वहाँ तुम थाम लेते हो
प्रवीण कुमार श्रीवास्तव
यहाँ जनता तुम्हारी मुश्किलों से ज़ंग लड़ती है,
वहाँ तुम मखमली बिस्तर लगा आराम लेते हो।
किसी ने ज़िन्दगी दे दी इमारत को बनाने में,
वहीं तुम मुफ़्त में तख़्ती लगा ईनाम लेते हो।


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और अब अंत में...
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अब यह धर्मनिरपेक्षता क्या है
संजय ग्रोवर
धर्मनिरपेक्ष शब्द तथाकथित प्रगतिशीलों और वामपंथियों में काफ़ी पसंद और इस्तेमाल किया जाता रहा है। मुझे यह और अजीब लगता है। क्योंकि वामपंथिओं को और उनके द्वारा
दूसरों को बताया जाता रहा है कि मार्क्स ने धर्म को अफ़ीम का नशा कहा है। यानि कि एक ख़तरनाक़ सामाजिक बुराई की तरह चिन्हित किया है। समझा जा सकता है कि मार्क्स
ने ऐसा किसी एक धर्म के बारे में तो कहा नहीं होगा। अगर धर्म की तुलना बुराई से की जा रही है तो वहां निरपेक्षता का क्या काम है !? या फिर ऐसी निरपेक्षता हमें
सभी बुराईयों के साथ बरतनी चाहिए। फिर एक गुंडई-निरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक बलात्कार-निरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक छेड़खानी-निरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक दंगा-निरपेक्षता
भी होनी चाहिए, एक लूटपाट-निरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक चोरी-निरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक शोषण-निरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक वर्णव्यवस्था-निरपेक्षता भी होनी
चाहिए, एक ब्राहमणवाद-निरपेक्षता भी होनी चाहिए.......


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आज इस माह की मेरी  अंतिम प्रस्तुति
बस यहीं तक...
मिलते रहेंगे...
ईश्वर से कामना है...
 मेरे देश  में कभी...
असहिष्णुता न हो...
धन्यवाद।



शनिवार, 28 नवंबर 2015

भूख



सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

जाड़े का मौसम हो तो खाने की चर्चा स्वाभाविक है
गर्मियों में भूख कम लगती है
कुछ की भूख कभी नहीं मिटती


रजाई

कम हुई गरमाहट बोलो कब कहाँ
रिश्तों की रजाई में
अब ठण्ड का बसेरा है
खोजती है वो भी
इक ताप गरम सेंक की !

कंदूरी

कंदूरी की बेल का रोपण किसी भी मोषम मे किया जा सकता है ।
इसकी कलम लगती है । जो दो तीन महिने बाद फलने लगती है ।
और दो वर्ष तक हमेशा लगातार फलती रहती है ।
पर कंदूरी की बेल तराई बाली जगह होना चाहिए ।
~मुझे पसंद है इसकी भुजिया ..... आपलोगों को ?


अदरक

रोज भोजन  से पहले अदरक को बारीक़ टुकड़े टुकड़े करके
सेंधा नमक के साथ लेने से पाचक रस बढ़कर अरुचि मिटती है।
वायु भी नहीं बनती व् भूख भी खुलकर लगती है।
 जिससे स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है।

शहद

शहद को आयुर्वेद में अमृत माना गया है।
रोजाना सही ढंग से शहद लेना सेहत के लिए अच्छा होता है।
लेकिन गलत तरीके से शहद का सेवन करने से
फायदे की जगह नुकसान भी हो सकता है।


सोआ

सोआ का साग (Soa Ka Saag) करीब करीब वैसे ही बनता है
जैसे मेथी या बथुआ का साग बनाया जाता है।
यानी सबसे पहले आपको सोआ को अच्छी तरह से धुलना है।
 फिर पानी को निथर जाने दें। सोआ का पानी निथर जाए
तो इसे चॉपिंग ट्रे पर रखकर काट लें।


गन्ना


रक्त की कमी, अम्लपित्त, रोगों में
गन्ने का ताजा रस काफी फायदेमंद है।
गन्ना शीतल पेय पदार्थ है
 यह एनीमिया, जौण्डिस, हिचकी आदि में परम उपयोगी है।


चुस्की ..... चाय

....राम  राज  में  दूध  मलाई , किशन  राज  में  घी ,
कलयुग में मिलती है चाय... फूंक फूंक कर पी...।

हमारे मुहल्ले के एक चाय दुकानदार ने अपनी दुकान के आगे बड़े बड़े अछरों में ये लाइनें लिखवा रखी हैं। चाय हमारे लोकाचार का अंग बन चुकी है। अब आप किसी के घर जाते हैं तो वह चाय आफर करता है। कई जगह तो बिना पूछे ही चाय आ जाती है। शायद ही कोई आदमी हो जो चाय न पीता है। अगर आप चाय भी नहीं पीते तो क्या पीएंगे

बड़ा कठिन सवाल है
मैं नहीं न पीती


फिर मिलेंगे ....... तब तक के लिए आखरी सलाम



विभा रानी श्रीवास्तव



शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

132....जब 'मुर्दा' बोला? ..एक बीड़ी म्हारी भी लगा दो!

सादर आभिवादन
कल संजय भाई का नेट
काम नहीं कर रहा था
सो भाई कुलदीप जी ने
अपने कार्यालय हेतु

बनाई गई प्रस्तुति
यहां प्रकाशित कर दी
जन-जागरण के लिए ये
आवश्यक भी है....


चलिए चलें आज की पसंदीदा रचनाओं की कड़ियों की ओर...


जाने कहाँ ? 
गुम जाने की उसकी बुरी आदत थी, 
या फिर 
मेरे रखने का सलीका ही सही न था, 
चश्‍मा दूर का 
अक्‍सर पास की चीजें पढ़ते वक्‍़त 
नज़र से हटा देती थी 


अपनों के किये कराये 
पर लिखा गया 
ना नजर आता है 
ना पढ़ा जाता है 
ना समझ आता है 
भाई ‘उलूक’ 
लिखना लिखाना है 
ठीक है लिखा करो 


जब 'मुर्दा' बोला? 
वे अंधेरे में ही शव के नजदीक एक पुलिया पर बैठ गये। एक ने बीड़ी निकाली और जलाने लगा।
दूसरा बोला-एक बीड़ी मेरी भी लगा लेना!
तभी आवाज आयी- भाई! एक बीड़ी म्हारी भी लगाय दो!
तीनों ने एक दूसरे के मुंह को देखा, मानों एक दूसरे से पूछ रहे हों कि कौंन बोला? क्योकि तीसरा सिपाई बीड़ी नहीं पीता था।
तभी उन्होने देखा कि मुर्दे ने अपना हाथ ऊपर कर रखा है, और वह फिर बोला- भाई! एक बीड़ी म्हारी भी लगा दो! 


शहीद हूँ मैं .....
मेरे देशवाशियों
जब कभी आप खुलकर हंसोंगे ,
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
जो अब कभी नही हँसेंगे...


अभी तारे नहीं चमके 
जवां ये शाम होने दो 
लबों से जाम हटा लूँगा 
बहक कर नाम होने दो 














हाल ही में रश्मि रविजा जी का उपन्यास ‘काँच के शामियाने’ पढ़ कर समाप्त किया है! कुछ उनके प्रखर लेखन के ताप से और कुछ काँच के शामियानों के नीचे खड़ी मौसमों की बेरहम मार झेलती उपन्यास की नायिका जया की व्यथा कथा की आँच से मैं स्वयं को भी झुलसा हुआ ही पा रही हूँ ! 

आज्ञा दें यशोदा को
फिर मिलते हैं
















गुरुवार, 26 नवंबर 2015

131......पर हर कोई मौन है...

जय मांहाटेशवरी...

हमारे देश में कुछ चीजे गैरकानूनी है...
फिर भी जीवित है।...
जिस का पता...
हर सामाजिक संगठन, हर अधिकारी तथा हर नेता को है...
पर हर कोई मौन है...
जैसे कुछ जानते  ही नहीं...
 इन सब में सबसे बड़ा अपराध वेश्यावृति...
 जो हमारे समाज में गैरकानूनी है....
 परन्तु आज भी कई स्थान प्रसिद्ध हैं, जहा ये गंदा व्यापार बड़े स्तर पर होता है...
आज की प्रस्तुति...पेश है...
इसी विषय को उजागर करते पांच लिंक...

इस कविता के साथ...
जिस्म की कब्र में
रोज नया मुर्दा दफनाते हुए
बेजान हो गया है तन
सड़क सी जिंदगी
रोंदते है जिसे
अनगिनत वाहन
धुआं छोड़ते हुए
और थूककर
गन्दा बनाते लोग
कुचलते हैं आत्मा को
जिसे आती है
ख़ुद पर घिन्न
फ़िर भी पीने के लिए
समाज का जहर
नीलकंठ की तरह
तैयार हैं
तंग गली के
मटमैले परदों के पीछे
जितेन्द्र सोनी

देशभर में करीब 1100 बदनाम बस्तियां हैं।
जिन्हें रेड लाईट एरिया कहा जाता है।इन बदनाम बस्तियों में 54 लाख बच्चे रहते हैं। इन 54 लाख बच्चों में कोई 60 फीसदी लड़कियां हैं।बदनाम बस्तियों की ये बेटियां होनहार तो हैं लेकिन लाचार हैं।वे पढ़ना तो चाहती हैं और मुख्यधारा का जीवन भी जीना चाहती हैं। लेकिन परिस्थियां उनके लिए सबसे बड़ी बेड़ी नजर आती है।यहां पैदा होने वाली बेटियों की मां भी अपनी बेटियों को सम्मान की जिंदगी देना चाहती हैं लेकिन एक सीमा के बाद उनके हाथ भी बंधे नजर आते हैं।इन इलाकों में वेश्यावृत्ति में शामिल महिलाएं न केवल अपने बच्चों को पालना चाहती हैं बल्कि उनको एक बेहतर भविष्य देना चाहती हैं।अपवाद स्वरूप ऐसे उदाहरण भी नजर आते हैं जब बदनाम बस्तियों की बेटियों ने नाम कमाया है।लेकिन यह महज अपवाद ही है।
 मंटो साहब लिखते हैं “वेश्या का मकान खुद एक ज़नाज़ा है जो समाज अपने कंधों पर उठाये हुए है। वह उसे जब तक दफ़न नहीं करेगा उससे मुताल्लिक बातें होती रहेंगी।  भ्रूण हत्या का दंश झेल रहे हमारे समाज में कम से कम एक जगह ऐसी भी है जहां बेटी पैदा होने पर खुशियां मनाई जाती है और बेटा पैदा होने पर मुंह सिकुड़ जाता है।ये बदनाम गलियों की दास्तां है। दिल्ली के जी बी रोड की अंधेरी गलियों को ही लें,जहां कि जर्जर खिड़कियों में पीली रोशनी से इशारा करती लड़कियों के विषय में जानने की फुर्सत शायद ही आज किसी के पास हो।गाड़ियों का शोर,भीड़भाड़ भरा इलाका और भारी व्यावसायिक गतिविधियों में इस बाजार  के व्यापारियों के लिए यह कुछ भी नया नहीं है।आलम ये है कि इस इलाके के दुकानदार शर्म-ओ-हया से अपना पता बताने में भी गुरेज करते हैं।खुद को शरीफ कहने वाले लोग यहां मुंह ऊपर उठाकर भी नहीं देखते और महिलाएं तो शायद ही ऐसा करती हों। अंतत: सवाल ये है कि आखीर कब रुकेगा ये सिलसिला...क्या यूं ही बदनाम होती रहेंगी ये बेबस जिंदगियां...कब होगी एक ऐसी पहल जिसका सार्थक परिणाम हमारे सामने आयेगा...और कोठों की ये बदनाम तबायफ सम्मान से हमारे समाज में सिर ऊंचा कर जी सकेंगी...या यूं ही गुमनामी के अंधेरे में कहीं खो जाएंगी...कब मिलेगा उन्हें उनका हक...आखिर कब इनके दामन से छूटेगी गरीबी की कालिख....आखिर कब लगेगी इसपर बंदिश......अगर वेश्या का ज़िक्र हमारे समाज में निषिद्ध है तो उसका पेशा भी निषिद्ध होना चाहिए... यकिन मानिए वेश्यावृत्ती को मिटाइए उसका ज़िक्र खुद ब खुद मिट जायेगा...।।।

 ‘तुम्हारी कविताएं मुझे पसंद आईं, क्योंकि तुमने मर्द और ईश्वर को उसकी औकात बताने की कोशिश की। और जिस दिन मैं तुम्हें ये बताने का साहस इकट्ठा कर रही थी कि मैं स्वार्थी हो गई हूं, ठीक उसी दिन मुझे बताया गया कि मुझे एड्स है। मैं एक गुनाह से बच गई और तुम एक अग्निपरीक्षा से। तुम्हारी कविताएं वेश्याओं की जिस मुक्ति की बात करती हैं, यह उसी के सन्दर्भ में होता। हालांकि मुझे विश्वास था कि तुम मेरी आस्था की लाज रख लेते, लेकिन मैं ज़ोखिमों के लिए भी तैयार थी। खैर.... जो भी हो, एक विश्वास लेकर मरना, एक अविश्वासी मौत से कहीं बेहतर है।’ और अन्त में परिच्छेद बदलते हुए उसने संक्षेप में लिखा।
‘मैं बड़ी उम्मीदों के साथ तुम्हें एक पता दे रही हूं। इस पते पर मेरी छोटी बहन रहती है, उम्मीद करती हूं कि उसे भी तुम्हारी कविताएं बहुत पसंद आएंगी। और न केवल पसंद आएंगी बल्कि इस समय उसे तुम्हारी कविताओं की सख्त ज़रूरत भी है।’ -तुम्हारी शबो।

..मैं मानती हूं समय के साथ-साथ हमारी सोच में भी काफी बदलाव आया है..
लेकिन आज भी ज्यादातर जगह स्त्री को सिर्फ भोग और वंश बेल को आगे बढ़ाने वाली चीज ही समझा
जाता है( ध्यान दीजिए , मैंने यहां औरत के लिए इंसान की जगह चीज शब्द का इस्तेमाल किया है)
स्त्री को उसकी सीमित बातचीत, सीमित राह, सीमित खान- पान, सीमित इच्छाओं और सीमित सपनों के बारे में पूरा ज्ञान दिया जाता है, ताकि गलती से भी उसे उस सीमा को लांघने की गलती ना हो..

दरवाजे पर ठकठक हुई। बाहर से किसी स्त्री ने पुकारा था - ओये! फारिग हो गई के? एक मोटा असामी आया है।
वेश्या ने दरवाजा खोला और फुफकारते हुये बोली - यह मेरी इबादत का वक़्त है। जबरी की तो ....
'गाहक तो अन्दर बैठ्ठा है!'
'गाहक नहीं, वह मेरा बापवाला है...अपने भँड़ुओं से कह दो आज का टैम खत्तम, कल आयें।'
कुटनी हैरान सी चली गई।   

जिन भिक्षुओं को ईषा थी, वह झांक-झांक कर देखते। और भगवान को आकर शिकायत करते की देखा आपने, विचित्र सेन को, वह नाच गाने सुनता है। सुस्‍वाद भोजन करता है, कभी वो वेश्‍या उसकी गोद में लेटी हमने देखी। वह अपने हाथों से उसे तेल लगती है,नहलाती है। और कभी-कभी तो हमने उन्‍हें एक ही बिस्तरे पर संग साथ सोते भी देखा है। भगवान आप ने भी कमाल कर दिया। उस बेचारे का सारा जीवन बर्बाद हो गया। सारी तपस्‍या मिट्टी में मिल गई। भगवान केवल हंस भर देते।
      चार माह बाद वह भिक्षु विचित्र सेन आया। वेश्‍या भी उसके साथ चली आ रही थी। उसने भगवान के चरणों में सर रख कर कहां आपके भिक्षु को क्‍या मिल गया। मैं नहीं जानती बस मैने चार माह उसका संग किया है। आपका भिक्षु हर क्रियाकलाप से सतत अप्रभावित रहा। किसी भी चीज का उसने कभी विरोध नहीं किया। जो खाने को देती खा लेता। जो मैं कर सकती थी एक पुरूष को रिझाने के लिए वो सब उपाय मैंने किये। नाच, गाना, साथ सोना, छूना पर वह सदा अप्रभावित रहा। मैं हार गई भगवान ऐसा पुरूष मैंने जीवन में नहीं देखा। हजारों पुरूषों का संग किया है। पुरूष की हर गति विधि से में परिचित हूं। पर आपके भिक्षु ने जरूर कुछ ऐसा रस जाना है। जो इस भोग के रस से कहीं उत्‍तम है। मुझ अभागी को भी मार्ग दो। मैं भी वहीं रस चाहती हूं। जो क्षण में न छिन जाये शाश्वत रहे। मैं भी पूर्ण होना चाहती हूँ। सच ही आपका भिक्षु पूर्ण पुरूष है। और उसने दीक्षा ले ली। विचित्र सेन ने भगवान के चरणों में अपना सर रखा। भगवान ने उसे उठा कर अपने गले से लगया। मेरा बेटा विचित्र सेन सच में ही विचित्र हो गया। अर्हत हो गया है। और वेश्‍या के साथ पूरे भिक्षु संध की आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे।
      भगवान न उस भिक्षु को देख कर कहा, देखा भिक्षु तुमने, मेरा बेटा वेश्‍या के यहां चार मास रहा तो एक और भिक्षु को अपने साथ लाया। तू भी सिख अपने अंदर झांककर देख, उस मन की चालबाजी को जो तुझे छल रहा है। वह जो कह रहा है..क्‍या वह सत्‍य है या मात्र एक छलावा। आंखें खोल जाग, देख चारों और कितना प्रकाश फैल रहा है।
और ये अपने ही दिल पर हाथ रख कर खुद ही उत्‍तर ढुंड़ कि क्‍या तु अगर जाता तो तेरी दबी वासना तुझे डुबो नहीं देती क्‍या तू  वापिस आता......शायद कभी नहीं, हां इस संध में एक भिक्षु और कम हो जाता संध में। और सब भिक्षु पल भर के लिए खिल खिला कर हंस दिये।
अब अंत में....

इसी विषय पर लीलाधर जगूड़ी  जी द्वारा रचित  एक और कविता...

कल-पुर्जों की तरह थकी टांगें, थके हाथ
उसके साथ
जब जीवित थी
लग्गियों की तरह लंबी टांगें
जूतों की तरह घिसे पैर
लटके होठों के आस-पास
टट्टुओं की तरह दिखती थी उदास
तलवों में कीलों की तरह ठुके सारे दुख
जैसे जोड़-जोड़ को टूटने से बचा रहे हों
उखड़े दाँतों के बिना ठुकी पोपली हँसी
ठक-ठकाया एक-एक तन्तु
जन्तु के सिर पर जैसे
बिन बाए झौव्वा भर बाल
दूसरे का काम बनाने के काम में
जितनी बार भी गिरी
खड़ी हो जा पड़ी किसी दूसरे के लिए
अपना आराम कभी नहीं किया अपने शरीर में
दाम भी जो आया कई हिस्सों में बँटा
बहुतों को वह दूर से
दुर्भाग्य की तरह मज़बूत दिखती थी
ख़ुशी कोई दूर-दूर तक नहीं थी
सौभाग्य की तरह
कोई कुछ कहे, सब कर दे
कोई कुछ दे-दे, बस ले-ले
चेहरे किसी के उसे याद न थे
दीवार पर सोती थी
बारिश में खड़े खच्चर की तरह
ऐसी थकी पगली औरत की भी कमाई
ठग-जवांई ले जाते थे
धूपबत्तियों से घिरे
चबूतरे वाले भगवान को देखकर
किसी मुर्दे की याद आती थी
सदी बदल रही थी
सड़क किनारे उसे लिटा दिया गया था
अकड़ी पड़ी थी
जैसे लेटे में भी खड़ी हो
उस पर कुछ रुपए फिंके हुए थे अंत में
कुछ जवान वेश्याओं ने चढाए थे
कुछ कोठा चढते-उतरते लोगों ने
एक बूढा कहीं से आकर
उसे अपनी बीवी की लाश बता रहा था
एक लावारिस की मौत से
दूसरा कुछ कमाना चाहता था
मेहनत की मौत की तरह
एक स्त्री मरी पड़ी थी
कल-पुर्जों की तरह
थकी टांगें, थके हाथ
उसके साथ अब भी दिखते थे
बीच ट्रैफ़िक
भावुकता का धंधा करने वाला
अथक पुरुष विलाप जीवित था
लगता है दो दिन लाश यहाँ से हटेगी नहीं।---


आज की प्रस्तुति तो यहीं तक...
जिसमें मैंने इन पीड़ित महिलाओं का दर्द बयान करने का प्रयास किया है...
अगर हम महिलाओं के उत्थान की बात करें...
हमे सब से पहले इन महिलाओं का...
पुनर्वास करना होगा...
धन्यवाद।

बुधवार, 25 नवंबर 2015

130-सतगुरुनानक परगटया मिटी धुंध जग चानण होआ


जय मां हाटेशवरी...


            आज गुरु नानक देव  जी का प्रकाश उत्सव हैं। हर साल की भांति सिख समाज गुरु नानक के प्रकाश उत्सव पर गुरुद्वारा जाते हैं, शब्द कीर्तन करते हैं, लंगर छकते हैं, नगर
कीर्तन निकालते हैं। चारों तरफ हर्ष और उल्लास का माहौल होता हैं।
एक जिज्ञासु के मन में प्रश्न आया की हम सिख गुरु नानक जी का प्रकाश उत्सव क्यूँ बनाते हैं?
उत्तर के लिये यहां क्लिक करें...
आप सभी को गुरु नानक देव  जी के प्रकाश उत्सव पर पांच लिंकों का आनंद परिवार की ओर से ढेरों शुभकामनाएं...
ये पर्व आप के जीवन में भी प्रकाश फैलाएगा...
इस आशा के साथ पेश है आज की हलचल गुरु  नानक देव  जी     द्वारा रचित चंद दोहों के साथ...
* एक ओंकार सतिनाम, करता पुरखु निरभऊ।
निरबैर, अकाल मूरति, अजूनी, सैभं गुर प्रसादि ।।
मेरो मेरो सभी कहत हैं, हित सों बाध्यौ चीत।
अंतकाल संगी नहिं कोऊ, यह अचरज की रीत॥
दीन दयाल सदा दु:ख-भंजन, ता सिउ रुचि न बढाई।
नानक कहत जगत सभ मिथिआ, ज्यों सुपना रैनाई॥
सोचा भी नहीं कभी कभी ये सब भी यहीं पर होना है
उलूक टाइम्स
परसुशील कुमार जोशी
अपनी बातों को
अपनी सोच के
साथ बस चाँद
तारों की दुनियाँ के
लिये छोड़ देना है
मत कर ‘उलूक’
इतनी हिम्मत
सब कुछ कह देने
की अपनी अपनी
अपनी कह देने वाले
को सुना है अब
यहाँ नहीं कहीं
और जा कर रहना है ।

त्रिवेनियाँ
कागज मेरा मीत है, कलम मेरी सहेली......
परVandana Singh
अगर  जिंदगी  फिर  कभी ऐसे दोराहे पर लाये
जहाँ तुम्हे कोई लाख चाहकर न पुकार पाये
तो समझना तुम अपने ही सन्नाटें में खो चुके हो !
***जब रात चांदनी की आगोश में दम तोड़ चुकी होगी
जब चाँद को गहराते हुए सन्नाटें फाँक चुके होगे
तुम अपनी खिड़की पर मुझे जागता पाओगे !
***
बेतरतीब उलझन
खामोशियाँ...!!!
परMisra Raahul
फ़लक नें रोक रखे बहुत टूटे सितारे,
ऊपर झांकों तो गिराने को भी कहे।
शाम की जुल्फें कान के पार लगाए,
वादे किए है जो निभाने को भी कहे।

अंतर कल व आज में
Akanksha
परAsha Saxena
बिना दबाव चलती नहीं
यदि धन का लालच हो साथ
कुछ भी लिखने से
हिचकती नहीं
अंजाम कोई भी हो
इसकी तनिक चिंता नहीं
यही तो है अंतर
कल व आज के सोचा का
कल था सत्य प्रधान
आज सब कुछ चलता है
कार्यकुशलता के तीन गुण ---
अंतर्मंथन
परडॉ टी एस दराल
सूखे से प्रभावित किसान क़र्ज़ में डूबे आत्महत्या कर रहे हैं। कुपोषण के शिकार बच्चे मिटटी के ढेले खाकर पेट भर रहे हैं। देखा जाये तो समय के साथ साथ हम दोनों
दिशाओं में बढ़ रहे हैं।  एक ओर अमीरों की संख्या बढ़ रही है , वहीँ दूसरी ओर गरीबों की भी संख्या बढ़ रही है।  लेकिन गरीबों की संख्या अमीरों की संख्या से कहीं
ज्यादा बढ़ रही है।
आज की हलचल यहीं तक...
मिलते हैं...
मिलते रहेंगे...
जब तक ये सफर चलेगा...
धन्यवाद...





 

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

129.......घर तेरा हो या मेरा छूट जाना है एक दिन

घर तेरा हो 
या मेरा 
छूट जाना है एक दिन 
हम गुम हो जायेंगे 
या तुम 
गुम हो ही जाना है !
-रश्मि दीदी

सादर अभिवादन....

चलिए चलते हैं सीधे रचनाओं की ओर...

















किताबों की दुनियां में
दिल में एक तन्हाई घर करने लगी 
बस गयी जब घर-गृहस्थी जिस्म की 

रूह की महफ़िल तभी सज पाती है 
जब उजड़ जाती है बस्ती जिस्म की 



सुधिनामा में
जनम दिया पालन किया, की खुशियाँ कुर्बान
बोझ वही माता पिता, कैसी यह संतान !

झुकी कमर धुँधली नज़र, है जीवन की शाम
जीवन के संघर्ष में, मिला कहाँ विश्राम !


अनकही बातें में
क्या हुआ जो 
कुछ मिला तो 
कुछ नहीं मिला, 
क्या हुआ जो 
कुछ खो गया तो 
कुछ छिन गया... 


उल्लूक टाईम्स में
कौन कहता है 
कुत्ता सोचना 
और कुत्ता हो जाने में 
कुछ अजीब होता है 
हर कुत्ते का 
अपना नसीब होता है
भौंकना सीखना 
चाहता हूँ इसलिये 
कुत्तों के बीच रहता हूँ 



ऑसन ऑफ ब्लिस में
कहीं मिले ज़िंदगी कहीं ज़िंदगी तले मौत जीतना है 
मिली किसी को हजार खुशियाँ कहीं मिली आज वेदना है 

नही मिली ज़िंदगी मुकम्मल यहाँ इसे ढूँढ़ते सभी जन 
मिले हमे ज़िंदगी जहाँ में कभी यही आज कामना है खिले 


अहसासों के सागर में....  
जीवन के विविध पड़ावों का धुंधलका मस्तिष्क में छाया हुआ है | 
कभी मेरे भीतर बसी दुनिया के बचपन में पंहुच जाती हूँ, 
कभी ‘टीनएज’ में, कभी २५ पार तो कभी ३५ के बाद की दुनिया 
भी दिखाई देने लगती है | हर बार कोई एक पड़ाव हावी होने लगता है.. 


कविता मंच में
थी  जो  गुलामी  की  अब  टूट  चुकी  हैं  वो  जंजीरें 
चंद  के  हाथों  से  लिखी  जाती  हैं  सरे  देश  की  तकदीरें 
और  पूरा  भारत  अब  इन्हिकी  मुठी  में  सिकुड़  रहा  है 
और  इसी  तरह  अपना  भारत  आगे  बढ़  रहा  है II


ये रही आज के अंक की अंतिम कड़ी..

भारतीय साहित्य एवं संस्कृति में
सात नदियों के मन्त्र का जप आप स्नान करते समय कर सकते हैं, 
इससे मनुष्य को पुण्य प्राप्ति के साथ-साथ मानसिक शांति का भी अनुव होगा।
गंगे    च    यमुने    चैव    गोदावरि     सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेSस्मिन् सन्निधिं कुरू।।

आज्ञा दें यशोदा को
फिर मिलेंगे....











सोमवार, 23 नवंबर 2015

128...नकाब पर नकाब पर नकाब डाल जी लेते हैं जो

सादर अभिवादन
देव दिवाली भी बीत गई कल

और आँग्ल नव वर्ष भी
दस्तक दे रहा है
कि मैं भी आ रहा हूँ

कुंवारे-कुंवारियों की छटपटाहट भी 

धीमी हो गई...वे सब...ढूँढ रहे है....जूँ "
"जूँमिले तो माता-पिता के कान के पास छोड़ दें
ताकि वो रेंगने लगे......:)

चलिए चलते हां लिंक्स की ओर....


बर्ग वार्ता में आतंकियों का मजहब
सवाल पुराना है। पहले भी पूछा जाता था लेकिन आज का विश्व जिस तरह सिकुड़ गया है, पुराना प्रश्न अधिक सामयिक हो गया है। आतंकवाद जिस प्रकार संसार को अपने दानवी अत्याचार के शिकंजे में कसने लगा है, लोग न चाहते हुए भी बार-बार पूछते हैं कि अधिकांश नृशंस आतंकवादी किसी विशेष मजहब या राजनीतिक विचारधारा से ही सम्बद्ध क्यों हैं?


जख्म जो फूलों ने दिए में
जाने कैसी दुनिया कैसे लोग 
नकाब पर नकाब पर नकाब डाल 
जी लेते हैं जो 
और वो छद्मों को 
उँगलियों पर गिनते गिनते बुढा जाते हैं 
फिर भी न फितरत समझ पाते हैं 


सरोकार में....
वह दौड़ता है 
तेज आती गाड़ियों के पीछे 
वह रिरियता है 
बेचने को मूर्तियां, किताबें , मोबाइल चार्जर और 
सर्दियों में दस्ताने 


अनुशील में
त्याग कैसे दे कोई
जीवन रहते
जीवन को...
आंसू बहते हैं
और समझा लेते हैं
मन को...


जिन्दगी की राहें में
कुछ छोटे छोटे बच्चे
ढूंढ रहे थे कूड़े में
तभी इस उदास सुबह में दिखा मुझे
एक चंचल प्यारी सी मुस्कराहट
चहक कर चिल्लाया, अपने साथ वाले को उसने बुलाया
देख भाई - बम !
नहीं है इसमें पलीता, पर फूटने से बचा रह गया न !


साझा आसमान में वक़ार की ख़ातिर
सर  उठाओ   बहार  की  ख़ातिर
ख़्वाब  पर  एतबार  की  ख़ातिर

मुल्क  के    नौजवां    परेशां  हैं
मुस्तक़िल  रोज़गार  की  ख़ातिर

और ये रही आज के अंक की अंतिम कड़ी...

पॉइट में
क्या कहूँ मेरे ख़्वाब, 
तूं कितना हँसी हैं ?
हाँ, सच है की 
तूं ज़रूरत ही हैं, मेरी 
पर कोई जुर्ररत नहीं है |

अब आज्ञा दें यशोदा को















रविवार, 22 नवंबर 2015

127 में, नुकसान, जो अच्छे आदमी पहुँचाते हैं

जय मां हाटेशवरी...
आज की  हलचल के आरंभ में...
जब ह्र्दय अहोभाव से अभिभूत है
तो राजनीति और विशेषकर भारत की राजनीति पर ओशो का एक करीब तीस वर्ष पुराना प्रवचन खयाल में आ गया, जो आज के दौर में और भी सामयिक प्रतीत हो रहा है आज की राजनीति पर कुछ भी कहने के पहले दो बातें समझ लेनी जरूरी हैं। एक तो यह कि आज जो दिखाई पड़ता है, वह आज का ही नहीं होता, हजारों-हजारों वर्ष बीते हुए कल, आज में सम्मिलित होते हैं। जो आज का है उसमें कल भी जुड़ा है, बीते सब कल जुड़े हैं।
 और आज की स्थिति को समझना हो तो कल की इस पूरी श्रृंखला को समझे बिना नहीं समझा जा सकता। मनुष्य की प्रत्येक आज की घड़ी पूरे अतीत से जुड़ी है—एक बात ! और दूसरी बात राजनीति कोई जीवन का ऐसा अलग हिस्सा नहीं है, जो धर्म से भिन्न हो, साहित्य से भिन्न हो, कला से भिन्न हो। हमने जीवन को खंडों में तोड़ा है सिर्फ सुविधा के लिए। जीवन इकट्ठा है। तो राजनीति अकेली राजनीति ही नहीं है, उसमें जीवन के सब पहलू और सब धाराएँ जुड़ी हैं। और जो आज का है, वह भी सिर्फ आज का नहीं है, सारे कल उसमें समाविष्ट हैं। यह प्राथमिक रूप से खयाल में हो तो मेरी बातें समझने में सुविधा पड़ेगी।
 यह मैं क्यों बीते कलों पर इसलिए जोर देना चाहता हूं कि भारत की आज की राजनीति में जो उलझाव है, उसका गहरा संबंध हमारी अतीत की समस्त राजनीतिक दृष्टि से जुड़ा है।

जैसे, भारत का पूरा अतीत इतिहास और भारत का पूरा चिंतन राजनीति के प्रति वैराग सिखाता है। अच्छे आदमी को राजनीति में नहीं जाना है, यह भारत की शिक्षा रही है।
और जिस देश का यह खयाल हो कि अच्छे आदमी को राजनीति में नहीं जाना है, अगर उसकी राजधानियों में सब बुरे आदमी इकट्ठे हो जायें, तो आश्चर्य नहीं है। जब हम ऐसा मानते हैं कि अच्छे आदमी का
राजनीति में जाना बुरा है, तो बुरे आदमी का राजनीति में जाना अच्छा हो जाता है। वह उसका दूसरा पहलू है।
हिंदुस्तान की सारी राजनीति धीरे-धीरे बुरे आदमी के हाथ में चली गयी है; जा रही है, चली जा रही। आज जिनके बीच संघर्ष नहीं है, वह अच्छे और बुरे आदमी के बीच संघर्ष है। इसे ठीक से समझ लेना ज़रूरी है।
उस संघर्ष में कोई भी जीते, उससे हिंदुस्तान का बहुत भला नहीं होनेवाला है। कौन जीतता है, यह बिलकुल गौण बात है। दिल्ली में कौन ताकत में आ जाता है, यह बिलकुल दो कौड़ी की बात है;
क्योंकि संघर्ष बुरे आदमियों के गिरोह के बीच है।हिंदुस्तान का अच्छा आदमी राजनीति से
दूर खड़े होने की पुरानी आदत से मजबूर है। वह दूर ही खड़ा हुआ है। लेकिन इसके पीछे हमारे पूरे अतीत की धारणा है। हमारी मान्यता यह रही है कि अच्छे आदमी को राजनीति से कोई संबंध नहीं होना चाहिए। बर्ट्रेड रसल ने कहीं लिखा है, एक छोटा-सा लेख लिखा है। उस लेख का शीर्षक—उसका हैडिंग

मुझे पसंद पड़ा। हैडिंग है, ‘दी हार्म, दैट गुड मैन डू’—नुकसान, जो अच्छे आदमी पहुँचाते हैं।
अच्छे आदमी सबसे बड़ा नुकसान यह पहुँचाते हैं कि बुरे आदमी के लिए जगह खाली कर देते हैं।
इससे बड़ा नुकसान अच्छा आदमी और कोई पहुंचा भी नहीं सकता। हिंदुस्तान में सब अच्छे आदमी भगोड़े रहे हैं। ‘एस्केपिस्ट’ रहे हैं। भागनेवाले रहे हैं. हिंदुस्तान ने उनको ही आदर दिया है, जो भाग जायें। हिंदुस्तान उनको आदर नहीं देता, जो जीवन की सघनता में खड़े हैं, जो संघर्ष करें, जीवन को बदलने की कोशिश करें।
कोई भी नहीं जानता कि अगर बुद्ध ने राज्य न छोड़ा होता, तो दुनिया का ज्यादा हित होता या छोड़ देने से ज्यादा हित हुआ है। आज तय करना भी मुश्किल है। लेकिन यह परंपरा है हमारी, कि अच्छा आदमी हट जाये। लेकिन हम कभी नहीं सोचते, कि अच्छा आदमी हटेगा, तो जगह खाली तो नहीं रहती, ‘वैक्यूम’ तो रहता नहीं।
अच्छा हटता है, बुरा उसकी जगह भर देता है। बुरे आदमी भारत की राजनीति में तीव्र संलग्नता से उत्सुक हैं। कुछ अच्छे आदमी भारत की आजादी के आंदोलन में उत्सुक हुए थे। वे राजनीति में उत्सुक नहीं थे। वे आजादी में उत्सुक थे। आजादी आ गयी। कुछ अच्छे आदमी अलग हो गये, कुछ अच्छे आदमी समाप्त हो गये, कुछ अच्छे आदमियों को अलग हो जाना पड़ा, कुछ अच्छे आदमियों ने सोचा, कि अब बात खत्म हो गयी।
खुद गांधी जैसे भले आदमी ने सोचा कि अब क्रांग्रेस का काम पूरा हो गया है, अब कांग्रेस को विदा हो जाना चाहिए। अगर गांधीजी की बात मान ली गई होती, तो मुल्क इतने बड़े गड्ढे में पहुंचता, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। बात नहीं मानी गयी, तो भी मु्ल्क गढ्ढे में पहुँचा है, लेकिन उतने बड़े गड्ढे में नहीं,
जितना मानकर पहुंच जाता। फिर भी गांधीजी के पीछे अच्छे लोगों की जो जमात थी, विनोबा और लोगों की, सब दूर हट गये। वह पुरानी भारतीय धारा फिर उनके मन को पकड़ गयी, कि अच्छे आदमी को राजनीति में नहीं होना चाहिए। खुद गांधीजी ने जीवन भर बड़ी हिम्मत से, बड़ी कुशलता से भारत की आजादी का संघर्ष किया। उसे सफलता तक पहुंचाया। लेकिन जैसे ही सत्ता हाथ में आयी, गांधीजी हट गये। वह भारत का पुराना अच्छा आदमी फिर मजबूत हो गया। गांधी ने अपने हाथ में सत्ता नहीं ली, यह भारत के इतिहास का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। जिसे हम हजारों साल तक, जिसका नुकसान हमें भुगतना पड़ेगा। गांधी सत्ता आते ही हट गये। सत्ता दूसरे लोगों के हाथ में गयी। जिनके हाथ में सत्ता गयी, वे गांधी जैसे लोग नहीं थे। गांधी
से कुछ संभावना हो सकती थी कि भारत की राजनीति में अच्छा आदमी उत्सुक होता। गांधी के हट जाने से वह संभावना भी समाप्त हो गयी।
फिर सत्ता के आते ही एक दौड़ शुरू हुई। बुरे आदमी की सबसे बड़ी दौड़ क्या है ? बुरा आदमी चाहता क्या है ? बुरे आदमी की गहरी से गहरी आकांक्षा अहंकार की तृप्ति है ‘इगो’ की तृप्ति है। बुरा आदमी चाहता है, उसका अहंकार तृप्त हो और क्यों बुरा आदमी चाहता है कि उसका अहंकार तृप्त हो ? क्योंकि बुरे आदमी के पीछे एक ‘इनफीरियारिटी काम्प्लेक्स’, एक हीनता की ग्रंथि काम करती रहती है। जितना आदमी बुरा होता है, उतनी ही हीनता की ग्रंथि ज्यादा होती है। और ध्यान रहे, हीनता की ग्रंथि जिसके भीतर हो, वह पदों के प्रति बहुत लोलुप हो जाता है। सत्ता के प्रति, ‘पावर’ के प्रति बहुत लोलुप हो जाता है। भीतर की हीनता को वह बाहर के पद से पूरा करना चाहता है।
बुरे आदमी को मैं, शराब पीता हो, इसलिए बुरा नहीं कहता। शराब पीने वाले अच्छे लोग भी हो सकते हैं। शराब न पीने वाले बुरे लोग भी हो सकते हैं। बुरा आदमी इसलिए नहीं कहता, कि उसने किसी को तलाक देकर दूसरी शादी कर ली हो। दस शादी करने वाला, अच्छा आदमी हो सकता है। एक ही शादी पर जन्मों से टिका रहनेवाला भी बुरा हो सकता है। मैं बुरा आदमी उसको कहता हूं, जिसकी मनोग्रंथि हीनता की है, जिसके भीतर ‘इनफीरियारिटी’ का कोई बहुत गहरा भाव है। ऐसा आदमी खतरनाक है, क्योंकि ऐसा आदमी पद
को पकड़ेगा, जोर से पकड़ेगा, किसी भी कोशिश से पकड़ेगा, और किसी भी कीमत, किसी भी साधन का उपयोग करेगा। और किसी को भी हटा देने के लिए, कोई भी साधन उसे सही मालूम पड़ेंगे।
हिंदुस्तान में अच्छा आदमी—अच्छा आदमी वही है, जो न ‘इनफीरियारिटी’ से पीड़ित है और न ‘सुपीरियरिटी’ से पीड़ित है। अच्छे आदमी की मेरी परिभाषा है, ऐसा आदमी, जो खुद होने से तृप्त है। आनंदित है। जो किसी के आगे खड़े होने के लिए पागल नहीं है, और किसी के पीछे खड़े होने में जिसे कोई अड़चन, कोई तकलीफ नहीं है। जहां भी खड़ा हो जाए वहीं आनंदित है। ऐसा अच्छा आदमी राजनीति में जाये तो राजनीति शोषण न होकर सेवा बन जाती है। ऐसा अच्छा आदमी राजनीति में न जाये, तो राजनीति केवल ‘पावर पालिटिक्स’, सत्ता और शक्ति की अंधी दौड हो जाती है। और शराब से कोई आदमी इतना बेहोश कभी नहीं हुआ, जितना आदमी सत्ता से और ‘पावर’ से बेहोश हो सकता है। और जब बेहोश लोग इकट्ठे हो जायें सब तरफ से, तो सारे मुल्क की नैया डगमगा जाये इसमें कुछ हैरानी नहीं है ?
यह ऐसे ही है—जैसे किसी जहाज के सभी मल्लाह शराब पी लें, और आपस में लड़ने लगें प्रधान होने को ! और जहाज उपेक्षित हो जाये, डूबे या मरे, इससे कोई संबंध न रह जाये, वैसी हालत भारत की है।
राजधानी भारत के सारे के सारे मदांध, जिन्हें सत्ता के सिवाय कुछ भी दिखायी नहीं पड़ रहा है, वे सारे अंधे लोग इकट्ठे हो गये हैं। और उनकी जो शतरंज चल रही ही, उस पर पूरा मुल्क दांव पर लगा हुआ है। पूरे मुल्क से उनको कोई प्रयोजन नहीं है, कोई संबंध नहीं है। भाषण में वे बातें करते हैं, क्योंकि बातें करनी जरूरी हैं।
प्रयोजन बताना पड़ता है। लेकिन पीछे कोई प्रयोजन नहीं है। पीछे एक ही प्रयोजन है भारत के राजनीतिज्ञ के मन में, कि मैं सत्ता में कैसे पहुंच जाऊं ? मैं कैसे
मालिक हो जाऊं ? मैं कैसे नंबर एक हो जाऊं ? यह दौड़ इतनी भारी है, और यह दौड़ इतनी अंधी है कि इस दौड़ के अंधे और भारी और खतरनाक होने का बुनियादी कारण यह
है कि भारत की पूरी परंपरा अच्छे आदमी को राजनीति से दूर करती रही है।


हिंदुस्तान में अच्छा आदमी—अच्छा आदमी वही है, जो न ‘इनफीरियारिटी’ से पीड़ित है और न ‘सुपीरियरिटी’ से पीड़ित है। अच्छे आदमी की मेरी परिभाषा है, ऐसा आदमी,
जो खुद होने से तृप्त है। आनंदित है। जो किसी के आगे खड़े होने के लिए पागल नहीं है, और किसी के पीछे खड़े होने में जिसे कोई अड़चन, कोई तकलीफ नहीं है। जहां
भी खड़ा हो जाए वहीं आनंदित है। ऐसा अच्छा आदमी राजनीति में जाये तो राजनीति शोषण न होकर सेवा बन जाती है। ऐसा अच्छा आदमी राजनीति में न जाये, तो राजनीति केवल
‘पावर पालिटिक्स’, सत्ता और शक्ति की अंधी दौड हो जाती है। और शराब से कोई आदमी इतना बेहोश कभी नहीं हुआ, जितना आदमी सत्ता से और ‘पावर’ से बेहोश हो सकता है। और
 जब बेहोश लोग इकट्ठे हो जायें सब तरफ से, तो सारे मुल्क की नैया डगमगा जाये इसमें कुछ हैरानी नहीं है ?
यह ऐसे ही है—जैसे किसी जहाज के सभी मल्लाह शराब पी लें, और आपस में लड़ने लगें प्रधान होने को ! और जहाज उपेक्षित हो जाये, डूबे या मरे, इससे कोई संबंध न रह जाये, वैसी हालत भारत की है।

राजधानी भारत के सारे के सारे मदांध, जिन्हें सत्ता के सिवाय कुछ भी दिखायी नहीं पड़ रहा है, वे सारे अंधे लोग इकट्ठे हो गये हैं। और उनकी जो शतरंज चल रही ही, उस पर पूरा मुल्क दांव पर लगा हुआ है।
 पूरे मुल्क से उनको कोई प्रयोजन नहीं है, कोई संबंध नहीं है। भाषण में वे बातें करते हैं, क्योंकि बातें करनी जरूरी हैं। प्रयोजन बताना पड़ता है। लेकिन पीछे कोई प्रयोजन नहीं है।  पीछे एक ही प्रयोजन है
 भारत के राजनीतिज्ञ के मन में, कि मैं सत्ता में कैसे पहुंच जाऊं ? मैं कैसे मालिक हो जाऊं ?
 मैं कैसे नंबर एक हो जाऊं ? यह दौड़ इतनी भारी है, और यह दौड़ इतनी अंधी है कि इस दौड़ के अंधे और भारी और खतरनाक होने का बुनियादी कारण यह है कि भारत की पूरी परंपरा अच्छे आदमी को राजनीति से दूर करती रही है।

अब देखिये...
मेरे द्वारा प्रस्तुत पांच लिंकों...
से सजी  आज की प्रस्तुति


चिंगारी है तो फिर आग क्यूँ नहीं बनती
 पथिक  पर पंकज कुमार
           
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आसमान धुयें  का है या धुआँ आसमान
ऊपर की और निगाह क्यूँ नहीं ठहरती !!
कब तलक देखते रहेंगे यूं तमाशा
जनता खुद ही किरदार क्यूँ नहीं बनती !!

 लोकतन्त्र के कुछ दोहे
 काव्य सुधा पर नीरज कुमार नीर
लोकतन्त्र की दुर्दशा, …. भारत माता रोय ।
कृष्ण त्यागे वृन्दावन, कालिया पूजित होय॥ 2

लोकतंत्र को है लगा, कैसा कहिए रोग ।
झूठ, कुटिल, पाखंड को, बना बहुत सुयोग॥ 3  

झूठ सारे सोने से मढ़ कर सच की किताबों पर लिख दिये जायें
उलूक टाइम्स पर सुशाल कुमार जोशी

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देखने  वालों के आँखों
के बहुत नजदीक से
फुलझड़ियाँ झूठ की
जला जला कर कई
आधा अंधा कर दिया जाये
जमाने से सड़ गल गये
बदबू मारते कुछ
कूड़े कबाड़ पर अपने
इत्र विदेशी महंगी
खरीद कर छिड़की जाये

 शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (५)
बावरा मन पर सु-मन
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जिंदगी के आशियाने में प्रवेश करते हैं तो दुख सुख के कमरे मिलते हैं जिनकी चार दीवारी को हम अपनी इच्छाओं के रंग पोत देते हैं | उन दीवारों पर होती हैं हमारे दिल की ओर झाँकती खिड़कियाँ
 जो वक़्त के साथ साथ कभी खुली और बंद दिखती हैं |दरअसल , खिड़कियाँ अनवरत आती जाती हमारी साँसें हैं
 ...थक जाने वाली जिन्दगी की अनथक साँसें ..बेहिसाब साँसें !!



कविता संग्रह इक कली थी [पुस्तक समीक्षा 
 साहित्य शिल्पी पर नीरज वर्मा "नीर"

http://www.sahityashilpi.com/2015/11/ek-kali-the-book-reivew-neeraj-verma-neer.html?showComment=1448097559291#c3916674036286137779

विचारवस्तु का कविता में खून की तरह दौड़ते रहना कविता को जीवन और शक्ति देता हैं और यह तभी संभव है जब कविता की जड़ें यथार्थ में हों , और "इक कली थी" काव्य संग्रह इसका जीता - जागता प्रमाण हैं ।
 इस भरे -पूरे 120 पृष्ठों के काव्य - संग्रह की साज -सज्जा सुन्दर है -प्रकाशन संस्थान की प्रतिष्ठा के अनुरूप।विजेंद्र एस विज का कला - निर्देशन सार्थक , आकर्षक और प्रभावशाली है ।
 आवरण चित्र विलक्षण ढंग से औरत के मन के सुषुप्त -जाग्रत संसार की कितनी ही परतों को एक़ साथ खोल
पाने में सक्षम है I कुल मिलाकर संग्रह स्वागत योग्य और पठनीय है I ...
आदरणीय  कंचन पाठक जी
की एक रचना...  अंत में...मेरी ओर से...

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 ईश्वर ने यह सृष्टि बनाई 
तेरा यहाँ न निज कुछ अपना,
ऐ ! मानवता के छुपे शिकारी
यह याद सदा तुम रखना |
कर्मों का बड़ा गणित है पक्का
जो जस करे सो पाए,
बोये पेड़ बबूल जो जिसने
आम कहाँ से खाए |

कर नैतिक जीवन का मूल्यांकन
जोड़ घटा जो आए,
गिन धर पग तब जीवन पथ पर
अमी हर्ष निधि तुम पाए |

पोत ना कालिख स्वयं के मुख पर
मन दर्पण उज्जवल रखना ,
ईश्वर ने यह सृष्टि बनाई
तेरा यहाँ न निज कुछ अपना ||
क्यूँ कार्य - कलापों से अपने
मानवता को लज्जित करते,
पल-पल बढ़ती सुरसा मुख-सी
धिक् अघ की न वदन पकड़ते |

क्यूँ निज समाज और देश के
आँचल पर हो दाग लगाते,
अरे क्या ले जाओगे अपने संग
जग से जाते - जाते |
बैठ कभी चित्त शांत बना
मन शीशे में मुख तकना ,
ईश्वर ने यह सृष्टि बनाई
तेरा यहाँ न निज कुछ अपना ||

धन्यवाद...



शनिवार, 21 नवंबर 2015

दरिया





सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

पुकारते हैं दूर से वो फासले बहार के
बिखर गयें थे रंग से जो किसी के इन्तेजार से
लहर-लहर में खो  चुकी
बहा चुकी कहानियां
सुना रहा है ये शमां सुनी सुनी सी दास्ताँ

जहाँ दरिया समंदर से मिला , दरिया नहीं रहता


एहसास की लहरों पर

पानी के तेज़ बहाव के माध्यम से ही
हम अपना हाल
इक दूसरे से साँझा कर पाते हैं!
ये कश्तियाँ सन्देश वाहक हैं
जो तुम तक मेरे प्रेम का संचार करती हैं!


दर्द का दरिया बहने लगा

मै सीमा जी के उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए
आशावान हूँ की उनकी लेखनी अनवरत साहित्य जगत की सेवा में सृजन करती रहेगी .
विरह के रंग घुल कर बहे तो दर्द का दरिया बहने लगा
यही प्रेम का रूप शास्वत, हर लफ्ज़ इसका कहने लगा


शब्द ढलें तो ढाल बनाओ

शब्दों के सांचे में उसको ढाल रहे हैं वह तो 'सच' को सचमुच मार रहे हैं
वेदना के सांचे में शब्दों को ढालो
चीख उठोगे जिस भाषा में कविता उसमें बन जायेगी
इस शब्दों को पीटो अपनी पीड़ा से तुम ...पैने थोड़े बन जायेंगे
उनसे तुम तलवार बनाओ


दरिया में कई क़तरे होते हैं

न कोई हकीक़त, न ही वज़ूद
फिर भी तेवर लिए हुए,
ये क़तरे होते हैं,
मिटने का ग़ुरूर कहें
या कहें किस्मत इनकी,
बस ज़ज्ब-दरिया में
फ़ना क़तरे होते है,

दरिया से न समंदर छीन


 फिर मिलेंगे
तब तक के लिए
आखरी सलाम



विभा रानी श्रीवास्व





शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

125....दर्पण वही है आपका चेहरा बदल गया

सादर अभिवादन
आज इस अंक में
चुनी कड़ियों में आप  को...

गूगल ब्लाग स्पॉट के अलावा
हिन्दी काव्य संकलन एवं वर्ड प्रेस
में प्रकाशित रचनाओं की कड़ियां
भी मिलेगी....ताकि
तनिक विविधता तो मिले....


देखिए और पढ़िए आज की चुनिन्दा रचनाएँ...


गूगल ब्लॉग से..
साँझ-चिरैया उतरती अपने पंख पसार, 
जल-थल-नभ में एक सा कर अबाध संचार. 

मुट्ठी भर-भर कर गगन दाने रहा बिखेर, 
उड़ जायेगी देखना चुन कर बड़ी सबेर. 


हिन्दी काव्य संकलन से..
जिंदगी के मुस्कराने को,
हर साथ जरुरी होता है

अपनी मंजिल तक पहुचाने को ,
हर हालात जरूरी होता है।


हिन्दी काव्य संकलन से....
इस इंकलाबी दौर में क्या क्या बदल गया
मंज़र बदल गया कहीं जलवा बदल गया।।

दिखलाता है वो दोष तो उसको न दोष दो
दर्पण वही है आपका चेहरा बदल गया।।


गूगल ब्लाग से.....
सच्‍चाई पसंद नहीं आती है
अप्रिय लगती है
लगता है झूठ लिख रहा हूं
सच न जाने क्‍यों
सबको झूठ लगता है।


वर्ड प्रेस से....
दीवानगी में अपना पता पूछता हूँ मैं
ऐ इश्क़ इस मुक़ाम पे तो आ गया हूँ मैं

डर है कि दम न तोड़ दूँ घुट-घुट के एक दिन
बरसों से अपने जिस्म के अंदर पड़ा हूँ मैं


गूगल ब्लॉग से....
हरेक पैर में एक ही जूता नहीं पहनाया जा सकता है। 
हरेक पैर के लिए अपना ही जूता ठीक रहता है।। 

सभी लकड़ी तीर बनाने के लिए उपयुक्त नहीं रहती है। 
सब चीजें सब लोगों पर नहीं जँचती है।। 

और ये रही आज की अंतिम कड़ी....

गूगल ब्लॉग से...
हर जिंदगी

भी शायद
किसी लेखक की
लिखी हुई
किताब होती है...
पर हम
नहीं जान पाते
अपनी किताब के
लेखक को

आज्ञा दें यशोदा को..
फिर तो मिलते ही रहेंगे

एक गीत सुना जाए आज..
















गुरुवार, 19 नवंबर 2015

124......बिन बेटी के घर में उजाला कहा होता है !!

आप सभी को संजय भास्कर का नमस्कार
एक बार फिर हाजिर हूँ
आज के अंक में सिर्फ और सिर्फ
बेटियाँ
प्रस्तुत है
प्यार भरी रचनाओं की कड़ियाँ
लुत्फ उठाइए  मेरे साथ:))


लाख जलाओ घी के दीपक
रोशनी के लिए
बिन बेटी के घर में
उजाला कहा होता है !!


पलकों में पली साँसों में बसी माँ की आस है बेटी
हर पल मुस्काती गाती एक सुखद अहसास है बेटी


वो नन्हे कदमों से ठुमक ठुम चलना, 
    वो हँसना किलक कर गलेबाँह धरना,
    वो सोना लिपटकर सुनकर नन्ही परी,


बाबुल की सोन चिरैया 
अब बिदा हो चली
महकाएगी किसी और का आँगन
वो नाजुक सी कली
माँ की दुलारी
बिटिया वो प्यारी
मेरा मन पंछी सा.......रीना मौर्या :)

सो जा री  बिटिया ,
प्यारी प्यारी बिटिया
सुंदर सुंदर बिटिया, तू न्यारी न्यारी
बिटिया
सो जा री बिटिया
प्यारी प्यारी बिटिया..........नवीन कुमार :)

इसी के साथ आप सभी से इज़ाज़त चाहता हूँ

-- संजय भास्कर

बुधवार, 18 नवंबर 2015

123---अकादमी पुरस्कार वापस करना कितना प्रासंगिक

जय मां हाटेशवरी...
गौरतलब है कि साहित्यकारों द्वारा पुरस्कार लौटाने के घटना क्रम पर
हिंदी ब्लॉगों पर भी खूब हलचल हुई...
आज के पांच लिंक भी...इसी हलचल से...
पर पहले जाने  दोनों पक्षों की राय...
इन 2 रिपोर्टों में...

स्वयं को स्वायत्त घोषित करने वाली अकादमी, जिसके देश भर से बीसियों अलग-अलग क़ाबिलियत और विचारधाराओं के सदस्य हैं, जिनमें से कुछ केंद्रीय मंत्रालयों द्वारा नामज़द वरिष्ठ आईएएस स्तर के सरकारी अफ़सर भी होते हैं, जिसका एक-एक पैसा संस्कृति मंत्रालय से आता और नियंत्रित होता है, अब भी साहित्य को एक जीवंत, संघर्षमय रणक्षेत्र और लेखकों को प्रतिबद्ध, जुझारू, आपदाग्रस्त मानव मानने से इनकार करती है.
आज जिस पतित अवस्था में वह है उसके लिए स्वयं लेखक ज़िम्मेदार हैं जो अकादमी पुरस्कार और अन्य फ़ायदों के लिए कभी चुप्पी, कभी मिलीभगत की रणनीति अख़्तियार किए रहते हैं.
विष्णु खरे वरिष्ठ पत्रकार और कवि की विस्तृत रिपोर्ट पढ़ने के लिये...
यहाँ क्लिक

ये विरोध अभूतपूर्व है. आज़ाद भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है जब इतने बड़े पैमाने पर लेखकों ने अपने सम्मान लौटाए हैं या अपने पदों से इस्तीफ़े दिए हैं. इसका संदेश पूरी दुनिया में गया है. कश्मीर से लेकर केरल तक जो अभूतपूर्व एकजुटता लेखकों ने बर्बरता के ख़िलाफ़ दिखाई है, वो इस बात की तसल्ली भी है कि मुखौटों और बुतों के बाहर भी जीवन धड़क रहा है और बेचैनियों का ताप बना हुआ है. शिव प्रसाद जोशी वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए की विस्तृत रिपोर्ट पढ़ने के लिये...
यहाँ क्लिक


लेखक का विद्रोह बनाम सत्ता का अहंकार
ललित सुरजन
दो बातें पते की कहीं। एक तो उन्होंने कहा कि पुरस्कार कोई उधार नहीं था, जिसे लौटाया जाता। मैं कहना चाहता हूं कि पुरस्कार वाकई आप पर समाज का उधार है। उसके साथ कुछ अपेक्षाएं जुड़ी होती हैं उन्हें पूरा करने पर ही आप उऋण होते हैं। एक लेखक को गाढ़े वक्त में समाज को राह दिखाना चाहिए। यह उससे सबसे बड़ी अपेक्षा है। शायद शुक्लजी की दृष्टि में वह गाढ़ा वक्त नहीं आया। उन्होंने दूसरी बात कही कि जीवन भर पुरस्कार को सलीब की तरह ढोते रहेंगे। आमीन। लेकिन क्या यह तुलना तर्कसंगत है। कोई भी अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि दंडाधिकारी के आदेश से सलीब ढोता है। तुलसीदास के मुताबिक यह देह धरने का दंड भी हो सकता है। जो बात विनोद भाई कह रहे हैं उसका यह मतलब निकाला जा सकता है कि पुरस्कार वापिस न करने पर उनसे प्रश्न किया जाएगा कि आप क्यों पीछे रह गए। हां, सवाल शायद पूछा जा सकता है, लेकिन उसकी परवाह
करने की आवश्यकता नहीं है। हर व्यक्ति को अधिकार है कि वह अपने मनोनुकूल निर्णय ले। मैं पुरस्कार वापिस न करने वाले सभी मित्रों से कहना चाहूंगा कि यह सलीब नहीं है। अगर आपके मन पर इसका बोझ नहीं है तो मत उतारिए।
 

अकादमी पुरस्कार वापस करना कितना प्रासंगिक 
संजय त्रिपाठी
          मृदुला गर्ग आशंका व्यक्त करती हैं कि सरकार के स्थान पर साहित्यकारों की अपनी विधिवत निर्वाचित स्वायत्त संस्था को प्रहार का केन्द्र बनाकर उसे कमजोर किया जा रहा है। साहित्यकार स्वयं आपस में झगड़ कर सरकार के लिए स्वायत्त संस्था को अधिकृत कर लेने का रास्ता साफ कर रहे हैं।


विचारधारा की असहिष्णुता
संजय कुमार
अन्य अकादमियों में सरकार अध्यक्ष नियुक्त करती है और इसमें निर्वाचित होता है। साहित्य अकादमी के पहले अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे और वो इसके लिए चुने गए थे ना कि नियुक्त हुए थे। उन्होंने लेखकों से कहा था कि आप लोगो ने मुझे चुना है क्योंकि मुझे आप लेखक मानते है। हलांकि उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा नही किया और उपाध्यक्ष को बाद में अध्यक्ष बनवाया। इस तरह यह देश की सबसे बड़ी स्वायत्त और लोकतांत्रिक संस्था है। अब सोंचिए जिस अकादमी की ऐसी परंपरा रही हो उसके द्वारा दिए गए पुरस्कार को लौटाना क्या उसका अपमान नही है क्या? अगर किसी साहित्यकार को किसी तरह की समस्या थी तो इसको साहित्य अकादमी के सामने उठा सकता था। जिन विषयों पर पुरस्कार वापस किया गया उस पर साहित्य अकादमी की क्या प्रतिक्रिया आ रही है इसका इंतजार तक नही किया गया। उन लोगों ने अकादमी से ये पूछने का कष्ट तक नही किया कि अकादमी इस विषय पर क्या सोंचती है। साहित्य अकादमी ने उन साहित्यकारों का सम्मान किया था, उन्हें भी अकादमी का सम्मान करना चाहिए था, लेकिन ऐसा नही हुआ। बात घूम फिर कर विचारधारा पर आ जाती है कि देश में परस्पर विरोधी विचारधारा के लिए भी जगह होनी चाहिए और ये बात सिर्फ एक पक्ष पर लागू नही होती है।



सम्मान मत त्यागें, अनफ्रेंड या अनफालो करते रहें
चेतन चावला
पर संवेदनशील होने के लिए कैसे किसी को बाध्य किया जा सकता है?
घर वापसी हो या सम्मान वापसी, सभी बुद्धिजीवी अपना निर्णय स्वयं करें।  मुझे तो कोई सम्मान मिला नहीं, लेकिन भविष्य में सम्मान मिलने की संभावना को जीवित रखते
हुए सोचता हूँ कि घोषणा कर दूँ कि अगर मुझे कोई सम्मान दिया जाएगा तो मैं उसे पूरे आदर और सम्मान के साथ सहेज कर रखूँगा, कभी वापिस नहीं करूंगा, अपनी वसीयत में भी निश्चित कर जाऊंगा कि कोई भी उस सम्मान को विरोधस्वरूप वापिस न करे।  जरा सोचिए, सरकार या अकादमी इन सम्मान प्रतीकों को कहाँ रखेगी ? वैसे भी जो सम्मान आपको दिया गया था, वह दीर्घ अवधि में आपके द्वारा किए गए साहित्यिक-सामाजिक कार्यों के लिए था, न कि किसी घटना पर भूतकाल में आपकी प्रतिक्रिया के लिए।
विरोध के नए तरीके की मार्केटिंग भी कर ली जाये, सम्मान मत त्यागें, अनफ्रेंड या अनफॉलो करते रहें।


मझधार
चन्दर मोहन
देश के बुद्धिजीवियों तथा साहित्यकारों द्वारा इस्तीफों का सिलसिला जारी है। एक भेड़चाल शुरू हो गई है। बहुत लोगों की अंतरात्मा जाग उठी है। उनकी शिकायत है कि देश के अंदर असहिष्णुता बढ़ रही है। बुद्धिजीवी तथा साहित्यकार होने के नाते उनसे और बर्दाश्त नहीं किया जा रहा है इसलिए विरोध जताने के लिए वह अपना इस्तीफा दे रहे हैं। एमएम कालबुर्गी जैसे तर्कवादी लेखक की हत्या निंदनीय है। हमारी विभिन्नता ही हमारी ताकत है। भारत का अभिप्राय ही यह है। सवाल उठने चाहिए। अगर किसी का तर्क पसंद न हो तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी हत्या कर रास्ते से हटा दिया जाए। दादरी की घटना और भी भयानक है जहां 100 लोगों की भीड़ ने एक व्यक्ति को केवल इसलिए मार दिया क्योंकि अफवाह थी कि उसके घर में गौ मांस है। लेकिन सवाल उठता है कि इससे पहले भी तो ऐसी घटनाएं इस देश में होती रही हैं तब यह सज्जन क्यों खामोश
रहे? नयनतारा सहगल ने यह सिलसिला शुरू किया उनसे दो सवाल किए जा सकते हैं। (1) उन्हें 1986 में यह सम्मान मिला था जिससे दो साल पहले अर्थात् 1984 में सिख विरोधी दंगे हुए थे। उस वक्त उन्होंने विरोध प्रकट क्यों नहीं किया? (2) उनका परिवार इस बात पर गर्व करता है कि वह कश्मीरी हैं फिर जब कश्मीरी पंडितों को जबरदस्ती कश्मीर से निकाला गया उस वक्त उन्होंने विरोध में साहित्य अकादमी से इस्तीफा क्यों नहीं दिया? 14 सितम्बर 1989 को पंडित टिका लाल टपलू की हत्या से वहां हत्याओं, बलात्कार तथा लूटपाट का सिलसिला शुरू हुआ। मस्जिदों से घोषणा की गई कि वह निकल जाएं नहीं तो उन्हें खत्म कर दिया जाएगा।




हलचल तो बहुत हो रही है...
हो भी  क्यों न...
ब्लॉगर भी तो साहित्यकार ही हैं न...
इस सारे प्रकरण पर...
मैंने भी साहित्यकारों से कुछ कहने का प्रयास किया है...
अपने टूटे-फूटे शब्दों में...
ओ लिखने वालो
तुम्हारे पास
वो शब्द हैं
जो बदल सकते हैं
पवन की दिशा
जिन के बल पर
तुम
क्रांति ला सकते हो...
तुम्हारे पास
कलम की ताकत है
वो कलम
जिसका लिखा
रामायण का
एक एक शब्द
भविष्य में
सत्य हुआ...
आद तुम ही
और शस्त्र
हाथ में लिये
कलम के बिना भी
बदलना चाहते हो
आज के हालातों को
कैसे लिखने वाले हो
जो कलम को ही  भूल गये...
साक्षी है समय
कलम के  सिपाहियों ने
विश्व में आज तक
असंख्य क्रांतियां लाई है
कौन कहता है
शस्त्रों से जीती जाती है जंग
जानो, पढ़ो इतिहास
हर जंग कलम ने ही जीती है...

धन्यवाद...

मंगलवार, 17 नवंबर 2015

122......मन की कई परतें होती हैं

कल तक की 
उपलब्धियों से 
प्रफ्फुलित हूँ मैं
कई सौ प्रतिशत 
की वृद्धि
कुल पेज व्यू 27,170, 
फॉलोव्हर 53
और क्या...
बच्चे की जान लेगी 
क्या यशोदा तू 
121 दिन में....

चलिए चलते हैं आज की चुनिन्दा रचनाओं की कड़ियों का ओर...


आकांक्षा में आशा मौसी
तुम स्नेह भूले तो क्या 
एक दीप जलाया मैंने 
प्यार भारी सौगात का 
झाड़ा पोंछा कलुष मन का 
कोई भ्रम न पलने दिया 
मान का मनुहार का 



रश्मि प्रभा...मेरी भावनायें में
मेरे बच्चों,
मुझे जाना तो नहीं है अभी
जाना चाहती भी नहीं अभी
अभी तो कई मेहरबानियाँ
उपरवाले की शेष हैं
कई खिलखिलाती लहरें
मन के समंदर में प्रतीक्षित हैं


डॉ. ज्योत्सना शर्मा काव्ययुग में
निशा ने कहा 
भोर द्वारे सजाए 
निराशा नहीं 
तारक आशा के हैं 
चाँद आये न आए । 


मौन के दुर्दिन....वन्दना गुप्ता

चुप्पियों को घोंटकर पीने का वक्त है ये . मौन के दुर्दिन हैं ये जहाँ संवाद की हत्या हो गयी है ऐसे में जीत और हार बराबरी से विवश हैं सिर्फ शोक मनाने को .... 



कालीपद "प्रसाद".... मेरे विचार मेरी अनुभूति में
मौन हूँ, इसीलिए नहीं 
कि मेरे पास शब्द नहीं... 
मौन हूँ, क्योंकि जीवन में मेरे 
हर शब्द का अर्थ बदल गया है



रश्मि प्रभा...मेरी नज़र से में
मन की कई परतें होती हैं 
चेहरे की शुष्कता में 
नमी हाहाकार करती है 
खुदाई करो, अवशेषों से पहचान होगी 
कुछ कथा ये लिखेंगे 
कुछ कथा वे लिखेंगे 
कुछ अनकहे,अनपढ़े रह जायेंगे  .... 


नयी उड़ान में... उपासना दीदी
जीवन में
क्या पाया
या
खोया अधिक !
सोचती,
विश्लेषण करती।

आज अब अधिक नहीं...
इज़ाज़त दें...यशोदा को
















सोमवार, 16 नवंबर 2015

121...पेरिस में भी पसारा पैर आतंकवाद ने

आज से दो दिन पहले फ्रांस के शहर पेरिस में
आतंकवादों ने 153 निर्दोष लोगों की हत्या की...
तो पूरा विश्व उस घटना की भर्त्सना करने लगा
और इस तरह के हमले तो भारत में होते ही रहते हैं
और शेष विश्व कानों मे तेल डाल कर बैठा रहता है
लोग ये समझते हैं कि.... 
भारत तो देवभूमि है....सहनशील है और दयालु भी है...

सभी राजनीतिज्ञों को पता है.....??
ये आतंकवाद आया कहां से..??
कौन है सूत्राधार..??.....पर वे चुप हैं..??
टूटेगी चुप्पी भी!..तब तक आतंकवाद
विशाल बरगद का रूप ले लेगा



चलिए चलते हैं आज की चुनिन्दा रचनाओ की कड़ियां देखने..


ग्रेविटॉन में...
अभिनेता ही नायक है अब
और वही खलनायक
जनता के सारे सेवक हैं
पूँजी के अभिभावक


रचना रवीन्द्र में..
खुश हूँ अच्छे दिन आए हैं 
सदियों से झुग्गी बस्तियों में बसने वाले 
सडान बदबू में रहने वाले 
नाले नालिओं में पनपने वाले
अब नहीं रहते हैं वहां.
बदल गया है बसेरा 
आयें है अच्छे दिन 


सपने में...
फेसबुकी दीवाली..फेक का अंग्रेजी अर्थ है धोखा व फेस याने चेहरा, दुनिया में आभाषी दुनिया का चमकता यह चेहरा एक मृगतृष्णा के समान है जो आज सभी को प्यारा मोहित कर चुका है. नित्य समाचार की तरह सुपरफास्ट खबरे यहाँ मिलती रहती है.कहीं हँसी के ठहाके


मधुर गुंजन में....
सच्ची भक्ति...
''आंटी, आप मंदिर जा रही हैं|" नेहा के हाथों में पूजा की थाल देखकर रहमान ने पूछा|
वह अभी अभी उसके बेटे प्रबोध के साथ आया था|
''हाँ बेटे, पूजा करके आती हूँ|"
जब वह मंदिर से लौटी तो उसने देखा कि रहमान अपने बैग के पास बैठा था और बैग के खुले मुँह से पिस्तौल झाँक रही थी| एकबारगी सिहर गई नेहा| बेटे का मित्र था इसलिए कुछ कह नहीं सकती थी


उच्चारण में...
हो गये उलट-पलट, वायदे समाज के,
दीमकों ने चाट लिए, कायदे रिवाज़ के,
प्रीत के विमान पर, सम्पदा सवार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।


प्रतिभा की दुनियां में..
लौटकर आने पर ताला खोलते वक्त ऐसा नहीं लगता कि यहां किसी को मेरा इंतजार नहीं था। मानो इस घर के कोने-कोने को मेरा इंतजार रहता है। घर के पर्दे, दीवारें, खिड़कियां, सोफे पर आधी पढ़कर छूटी हुई किताब, दरवाजे के बाहर लगा अखबारों का ढेर...पानी के लिए पड़ोसी की छत पर पहुंचाये गये पौधे...सुबह दाना खाने आने वाली चिड़िया, कबूतर, तोते...सब तो बाहें पसारे इंतजार करते मिलते हैं।


सुधिनामा में
बिल्कुल सम गति सम लय में
समानांतर उड़ रहे थे दोनों,
मधुर स्वर में चहचहाते हुए
कुछ जग की कुछ अपनी
एक दूजे को सुनाते हुए
बड़े आश्वस्त से पुलकित हो   
उड़ रहे थे दोनों !

चलती हूँ..आज्ञा दें....

कुछ नेता
कुछ मीडिया वाले
कुछ सभ्रांत लोग
निन्दा कर रहे हैं
भर्त्सना कर रहे हैं
कोस रहे हैं
आतंक वाद को....
और सलाखों के
अन्दर उनके साथी
सरकार के 
खर्चे पर..
शराब और बिरियानी
के साथ...ज़श्न मना रहे हैं
मन की उपज
-यशोदा


















रविवार, 15 नवंबर 2015

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, समाज को प्रगति के रास्ते ले जाओ ..120

जय मां हाटेशवरी...

कल हमने बाल दिवस पर...
बेटियों पर बहुत कुछ सुना...
बहुत कुछ कहा...
हर वर्ष ही सुनते हैं...
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, समाज को प्रगति के रास्ते ले जाओ ...
विकसित राष्ट्र की हो कल्पना, बेटियों को होगा पढ़ना ...
इस प्रकार के संदेशों ने...
बेटियों के बारे में...
समाज की सोच में अवश्य ही परिवर्तन  लाया है...
आज समाज का हर वर्ग कह रहा है...
बेटी नहीं है किसी से कम, बेटी से देश को मिल रहा है  दम ...
बेटियों को बराबरी का दर्जा दीजिये, समाज में जागरूकता फैलाइये ।
इस आवाहन के साथ...
पेश है मेरे द्वारा प्रस्तुत आज की हलचल....


कविता मंच पर..
आँगन" - डॉ. धर्मवीर भारती
कोने से फिर उन्हीं सिसकियों का उठना
फिर आकर बाँहों में खो जाना
अकस्मात् मण्डप के गीतों की लहरी
फिर गहरा सन्नाटा हो जाना
दो गाढ़ी मेंहदीवाले हाथों का जुड़ना,
कँपना, बेबस हो गिर जाना
प्रस्तुत कर्ता: संजय भास्‍कर

माही....पर
जाने क्यों
जाने तुझमे क्या बात थी
जो तुम मुझे
अपने पास
वापस ले आये।
मैं फिर आई
तुम्हारी ज़िन्दगी में।
बस तुमको सुनने के लिये
मैं तुमसे बात करने लगी
बस तुमको देखने के लिए
तुम्हारी फोटो तुमसे मांगने लगी।
प्रस्तुतकर्ताः महेश बरमटे


कविताएँ...पर
बहस के बीच में

पुत गई थी उसके चेहरे पर स्याही,
मनाही के बाद भी जो बोलना चाहता था,
क़त्ल हो गया था किसी का अपने ही घर में,
खा लिया था उसने वह जो वर्जित था,
फेंक दी थी आग किसी ने खिड़की से,
ज़िन्दा जला दिया था सोते बच्चों को,
किसी भाई ने दबा दिया था बहन का गला,
ज़िद थी उसकी कि शादी मर्ज़ी से करेगी,
एक छोटी-सी बच्ची का अपनों ने ही
कर दिया था बलात्कार.
प्रस्तुतकर्ताः ओंकार


मेरी धरोहर
फिर से बचपन दे दे जरा.............. पुष्पा परजिया
निस्तब्ध निशा कह रही मानो मुझसे ,
तू शांति के दीप जला, इंसा जूझ रहा
जीवन से हर पल उसको
तू ढांढस  बंधवा निर्मल कर्मी बनकर
इंसा के जीवन को
फिर से बचपन दे दे जरा
प्रस्तुतकर्ताः यशोदा अग्रवाल



समाधान पर
आइए जानते है एक ऐसे महान क्रांतिकारी के बारें में जिनका नाम इतिहास के पन्नों से मिटा दिया गया
वीर सावरकर ने दस साल आजादी के लिए काला पानी में कोल्हू चलाया था जबकि गाँधी ने कालापानी की उस जेल में कभी दस मिनट चरखा नही चलाया..
#24. वीर सावरकर माँ भारती के पहले सपूत थे जिन्हें जीते जी और मरने के बाद भी आगे बढ़ने से रोका गया...
पर आश्चर्य की बात यह है कि इन सभी विरोधियों के घोर अँधेरे को चीरकर आज वीर सावरकर के राष्ट्रवादी विचारों का सूर्य उदय हो रहा है।
प्रस्तुतकर्ताः विवेक सुरंगे


बेटी है अनमोल...
बेटी है स्वर्ग की सीढ़ी,
वह पढ़ेगी ,
तो बढ़ेगी अगली पीढ़ी ...
धन्यवाद...











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