पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

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रविवार, 31 जनवरी 2016

198 -कोई वार खाली न जाता घाव गहरे दे जाता

सुप्रभात मित्रो
    पांच लिंक का आनंद मे आप सब का स्वागत है।
मै आपका दोस्त विरम सिंह सुरावा ।
लहरो से डरकर नौका पार नही होती
       कोशिश करने वालो की कभी हार नही होती ।।
संघर्ष का मैदान छोड मत भागो तुम
      कुछ किए बिना ही जय जयकार नही होती।।
कोशिश करने वालो की कभी हार नही होती ।।

अब लिजिए आज की पांच लिंको का आनंद -



अकांक्षा पर.......आशा सक्सेना
दो काकुल मुख मंडल पर
झूमते लहराते
कजरे की धार पैनी कटार से
 वार कई बार किया करते
 स्मित मुस्कान टिक न पाती
मन के भाव बताती
चहरे पर आई तल्खी
भेद सारे  खोल जाती
कोई वार खाली न जाता
घाव गहरे दे जाता


ज्ञान दर्पण पर.......रतन सिंह
गिफ्ट भेजने के नाम पर याद आया, अभी दो दिन पहले ही ऑनलाइन व्यापार करने वाली वेब साइट्स की पड़ताल करते हुए एक गिफ्ट भेजने का व्यवसाय करने वाली एक वेबसाइट मिली| वर्त्तमान आर्थिक युग में आज चाहते हुए भी लोगों के पास अपने किसी खास के जन्मदिन, ख़ुशी के मौके आदि पर जाने के लिए व्यावसायिक व्यस्तता के चलते समय का अभाव है| ऐसे ही व्यस्त लोगों की इसी समस्या का समाधान करती है यह वेबसाइटhttp://www.fnp.com

उच्चारण पर .......रूपचन्द्र शास्त्री
छन्दों में देना मुझे, शब्दों का उपहार।
माता मेरी वन्दना, कर लेना स्वीकार।।
--
गति, यति, सुर, लय-ताल का, नहीं मुझे कुछ ज्ञान।
बिना पंख के उड़ रहा, मन का रोज विमान।।
--
मिला नहीं अब तक मुझे, कोई भी ईनाम।
तुकबन्दी मैं कर रहा, माता का ले नाम।।

यथार्थ पर.......विक्रम सिंह
मेरे शहर में जमीन से जुदा है लोग
कुछ कमजर्फ है कुछ खुदा है लोग।

हम दिल से दिल मिलाने की सोचते रहे
यहाँ मुखौटो की शिल्पकारी पर फ़िदा है लोग।

मौसम की तरह मिजाज बदलते रहते है
कुछ पतझड़ से कटीले है कुछ हवा है लोग।



तीखी कलम से पर .......नवीन जी
मैं  इबादत   हसरतों   के  नाम   ही  करता  रहा ।
वक्त  से   पहले  कोई  सूरज  यहां  ढलता  रहा ।।

जिंदगी  के  हर अंधेरो  से  मैं  बाजी  जीत  कर ।
बन मुहब्बत  का दिया मैं  रात भर  जलता रहा ।।

रात   की   तन्हाइयाँ   ले  कर   गयीं  यादें   तेरी ।
फिर  सहर आई  तो  मैं यूँ  हाथ  को  मलता  रहा।।


अब दीजिए अपने दोस्त 
विरम  सिंह को आज्ञा
धन्यवाद

शनिवार, 30 जनवरी 2016

अहिंसा




30 जनवरी के लिए चित्र परिणाम



सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

दुखद अन्त हिंसा का होता हमेशा
सुखद खूब होती अहिंसा की रोटी
नई इस सदी में, सघन त्रासदी में
नई रोशनी के दिये फिर जलाएँ।
चलो फिर अहिंसा के बिरवे उगाएँ।
:- डॉ जगदीश व्योम



उदय की दुनिया

झूठों की इस बस्ती में
फ़ंस जाने से डरता हूं
'सत्य' न झूठा पड जाये
इसलिये "कलम" दिखाते चलता हूँ




वीनापति

एकतरफ हम अपनी पीठ ठोंककर कहतें हैं
कि     भारतीय फ़ौज   विश्व में सर्व श्रेष्ट है
हम     हर मुकाबले           को तैय्यार हैं
पर          मुकाबले के    समय !अपनी
दुम दबाते  हैं! पता नहीं हम ऐसा क्यों करते हैं




गांधी बन जाओ

जन्मदिन  2 अक्टूबर 1869 काठियावाड़  पोरबंदर गुजरात -
मृत्यु - नाथूराम गोडसे द्वारा गोली मारने से 30.जनवरी 1948 दिल्ली
 (भारत को ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति दिलाने में
हमारे शहीदों के साथ महान योगदान , अहिंसा के मतवाले , छुआ-छूत  
भेद भाव मिटाने वाले , अमन चैन फैलाने वाले  , सत्य और अहिंसा के प्रयोग
और आत्म-शुद्धि के प्रसार कर्ता




काव्य प्रवाह

उन छद्म अहिंसकों से ,
जो अपनी नपुंसकता छुपाते हैं /
हिंसक अच्छे हैं ,
जो मानवता बचाते  हैं /
यह मात्र विद्रोह नहीं
विचारणीय सवाल है ,




विचार

Quote 68: Contradiction is not a sign of falsity,
nor the lack of contradiction a sign of truth.
In Hindi: विरोधाभास का होना झूठ का प्रतीक नहीं है
और ना ही इसका ना होना सत्य का .
Blaise Pascal ब्लेज़ पास्कल

आकाश को छू लो

अँधेरे में जो बैठे हैं, उनकी जीवन में प्रकाश भरो
              "काम देश के आएं हम भी" ऐसी इच्छा मन में करो
              जिसमे देशहित हो सर्वोपरि, सपनो को वो पत्ते खोलो
              अपनी कीर्ति ही न देखो, कमियों को भी कभी टटोलो
              बैठ किसी सुख की नैया में सपनो की लहरों पे न झूलो




नया सवेरा

हारने को तो कोई भी, कहीं भी, किसी से भी हार जाता है
और जीत का भी, लग-भग यही पैमाना होता है !!

पर
वह इंसान, कभी नहीं हारता, जिसकी लड़ाई
सत्य के सांथ, अहिंसा के पथ पर होती है
फिर, भले चाहे, लड़ाई -
सबसे ताकतवर आदमी से ही क्यों न हो !



फिर मिलेंगे ....... तब तक के लिए

आखरी सलाम


विभा रानी श्रीवास्तव



शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

196...ये भी अच्छा है कि पछतावा रहे , सरकार को

सादर अभिवादन स्वीकारें
बस आज से चौथे दिन मंगलवार को
पाँच लिंकों का आनन्द की
200 वीं प्रस्तुति आएगी

चलिए चलते हैं आज की प्रस्तुति की ओर...


मुश्किलें भी रहें फ़ासले भी रहें 
पर कहीं इश्क़ के सिलसिले भी रहें 

जी हमें प्यार है अपनी तन्हाई से 
दोस्तों के कभी क़ाफ़िले भी रहें

गागर में सागर के समान हाइकु क्या है 
हाइकु मूलतः जापान की लोकप्रिय विधा है. 
जापानी संतो द्वारा लिखी जाने वाली लोकप्रिय काव्य विधा, 
जिसे जापानी संत बाशो द्वारा विश्व में प्रतिष्ठित किया गया था. 
हाइकु विश्व की सबसे छोटी लघु कविता कही जाती है. 

ढूँढ रहा हूँ जाने कब से 
धुँध में प्रकाश में 
कि सिरा कोई थाम लूँ 
जो लेकर मुझे उस ओर चले 
जाकर जिधर 
संशय सारे मिट जाते हैं 


लाला लाजपत राय (अंग्रेजी: Lala Lajpat Rai, पंजाबी: ਲਾਲਾ ਲਾਜਪਤ ਰਾਏ, जन्म: 28 जनवरी 1865 - मृत्यु: 17 नवम्बर 1928) भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। इन्हें पंजाब केसरी भी कहा जाता है। इन्होंने पंजाब नैशनल बैंक और लक्ष्मी बीमा कम्पनी की स्थापना भी की थी। ये भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में गरम दल के तीन प्रमुख नेताओं लाल-बाल-पाल में से एक थे। सन् 1928 में इन्होंने साइमन कमीशन के विरुद्ध एक प्रदर्शन में हिस्सा लिया, जिसके दौरान हुए लाठी-चार्ज में ये बुरी तरह से घायल हो गये और अन्तत: १७ नवम्बर सन् १९२८ को इनकी महान आत्मा ने पार्थिव देह त्याग दी।


गलती होने पर करो, दिल से पश्चाताप।
हो हल्ला हरगिज नहीं, हरगिज नहीं प्रलाप।
हरगिज नहीं प्रलाप, हवाला किसका दोगे।
जौ-जौ आगर विश्व, हँसी का पात्र बनोगे।
ऊर्जा-शक्ति सँभाल, नहीं दुनिया यूँ चलती।
तू-तड़ाक बढ़ जाय, जीभ फिर जहर उगलती।।


और ये रही आज की प्रथम व शीर्षक कड़ी

लगता घायल से हुए हो, जख्म गहरे दिख रहे
पागलों के पास जाकर मुंह दिखायी किसलिए ? 

ये भी अच्छा है कि पछतावा रहे , सरकार को
इक दीवाने के लिए भी जग हँसायी किसलिए ?

आज्ञा दीजिए यशोदा को
सादर







गुरुवार, 28 जनवरी 2016

195 तलाशते है फिर.....मेरे शब्द तुम्हे :)

आप सभी को संजय भास्कर का नमस्कार
 पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग में आप सभी का हार्दिक स्वागत है !!
अब पेश है...मेरी पसंद के कुछ लिंक 

छोड़ आया हूँ कुछ नगमे
साहिलों पर तेरे नाम से
शाम छुपा कर रख दिया है
वही रेत की ढेर में
कुछ पत्थर उगा आया हूँ
वहाँ आस पास

सिमटी यादें
सपने हों गर आँखों में तो आंसू भी होते हैं
अपने ही हैं जो दिल में ज़ख्मों को बोते  हैं |

मन के आँगन में बच्चों  का बचपन हँसता है
सूने नयनों से लेकिन बस पानी रिसता  है |

तलाशते है फिर..मेरे शब्द तुम्हे...!!!
तलाशते है फिर..
मेरे शब्द तुम्हे...
तुम नही हो,तो
कुछ लिखते ही नही...
यूँ कि हर बार शब्द पिरोते थे,
सिर्फ तुम्हे....
कि तलाशते फिर..
मेरे शब्द तुम्हे....

भरी आँखें रुलायेंगी तेरी,  ताजिन्दगी मुझको ,
तुम्हारी याद के संग आयेगी शर्मिंदगी मुझको !

हमें अरसा हुआ दुनियां के मेलों में नहीं जाते
सहज रहने नहीं देगी, तेरी मौजूदगी मुझको !

माँ का तर्जुबा
रह-रहकर मेरी आँखों में झाँकता रहा,
मेरे चेहरे की उदासियों को पढ़ता
फिक्र की करवटें बदलता कभी,
फिर सवालों की बौछार भी करता
पर मेरी खामोशियों का वाईपर,
जाने कब उन्‍हें एक सिरे से
साफ कर देता

और अंत में मेरी एक प्रस्तुति मैं बस जीना चाहता हूँ :))
उड़ जाना चाहता हूँ मैं
खोल के बाहें अपनी
थामना चाहता हूँ मैं
सारे आसमान को,
मैं बस उड़ना चाहता हूँ


इसके साथ ही मुझे इजाजत दीजिए अलविदा शुभकामनाएं फिर मिलेंगे अगले गुरुवार

-- संजय भास्कर

बुधवार, 27 जनवरी 2016

194...भारत भाग्य विधाता


जय मां हाटेशवरी...

मैं कुलदीप ठाकुर आप सब का...
पांच लिंकों का आनंद पर...
पुनः अभिवादन व स्वागत करता है...
दीदी जी कुछ दिनों से अधिक व्यस्त है...
गणतंत्र दिवस पर उनका संदेश...
"भारतीय गणतत्र अमर रहे
कभी भी राजतंत्र हावी न होने पाए
ऐसी शुभकामना है.."
अब देखिये मेरी पसंद...


फूलों की ख़ुशबुएँ हिमालय की ओर चली गई हैं
कबाड़खाना में...Ashok Pande
s400/jag
फूलों की अंतिम उपयोगिता हमारी ख़ुशहाली और
आनंद में कुचले जाने की है. हमारा जन्म-मरण
और समर्पण, पुष्प श्रृंगार और पुष्प संहार के बिना
अधूरा है हो सकता है दस हज़ार टन से कुछ अधिक भारतीय फूल
इस साल सामाजिक या आर्थिक कारणों से नष्ट या सार्थक
हुए हों. फिर भी भारत के मूल माली फूलों पर नहीं
अपनी माली हालत पर रोए. उनके चारों ओर मक्खियाँ
भिनभिनाती रहीं. मधुमक्खियां दूर कहीं अपना शोक-
गीत गाती रहीं अशोक की तरह

इसीलिए रे मूर्ख, अरे माटी के पुतले
रविकर की कुण्डलियाँमें...रविकर
केवल व्यर्थ-प्रलाप, आग पानी में लागे |
पानी पानी होय, चेतना रविकर जागे।
इसीलिए रे मूर्ख, अरे माटी के पुतले।
नहीं उस समय झाँक, जिस समय पानी उबले ||

गणतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ||
Unlimited Potential (अजेय-असीम)में...ajay yadav
s1600/index
        66 वर्षो से हम गणतंत्रता दिवस मनाते आ रहें हैं|हमारे पूर्वजों के लहूँ से लिखा हुआ सुनहरा अतीत हमारे सामने हैं और यही हमारा सबसे बड़ा गर्व भी हैं।|अपने जीवन की खुशहाली अपनी आजाद जिंदगी; अपने लहलहाते खेतो,अपने शिक्षको और भाई बहनों के बीच, हमे अपने पूर्वजों, अपने शहीदों को याद करने और उन्हें श्रद्धांजली देने का यह उचित समय हैं|



हर दिल लुभा रहा है, यह आशियाँ हमारा
 प्रेमरस में...शाहनवाज़ 'साहिल
हो ताज-क़ुतुब-साँची, गांधी-अशोक-बुद्धा
सारे जहाँ में रौशन हर इक निशाँ हमारा
हिंदू हो या मुसलमाँ, सिख-पारसी-ईसाई
यह रिश्ता-ए-मुहब्बत, है दरमियाँ हमारा
सारे जहाँ में छाया जलवा मेरे वतन का
हर दौर में रहा है, भारत जवाँ हमारा

 गणतन्त्र
Matrooq में..Om Abhay Narayan
बचपन तिरंगे बेचकर
भविष्य रफ़ू करता है
और मुश्ताक़ अली अंसारी ६ दिसम्बर १९९२ से
मुस्लिम मुहल्ले की गलियों से बचकर निकलते हैं
क्या करें वो
पूरे हिन्दू लगते हैं
भूख
ख़ून
इन्सानियत को थर्रा देने वाली
गणतन्त्र की दहलीज़
बिछ जाती है
धर्म के आगे

भारत भाग्य विधाता [आलेख
 साहित्य शिल्पी  में...सुशील क मार शर्मा
गणतंत्र वास्तवमें मानवीय मूल्यों का पोषक है। किन्तु आज गणतंत्र सिर्फ शासक एवं शोषित के बीच दम तोड़ता नजर आता है। संविधान एवं स्वतंत्रता किसी भी राष्ट्र की सर्वोत्कृष्ट धरोहरें होती हैं। अगर देश का कोई भी निवासी इन की सुरक्षा एवं अनुशरण की अवहेलना करता है तो समझना चाहिए की वह देश पतन की ओर बढ़ रहा है। भारत में आज यह खतरा बढ़ रहा है लोग विधि एवं विधान की अवज्ञा में लगे हुए हैं। वैश्विक प्रगति के नाम पर हम अपने मूलभूत आदर्शों की बलि देते जा रहे हैं। हमारे पुराने हो चुके हैं की वर्तमान सन्दर्भों में अपनी प्रासंगिकता खोते जा रहें हैं। अरस्तू ने कहा है
" It is better for a city to be governed by a good man than even by good laws .
"अच्छे कानूनो की अपेक्षा एक अच्छे व्यक्ति द्वारा शासित होना कहीं ज्यादा अच्छा है।

धन्यवाद व शुभ विदा...


मंगलवार, 26 जनवरी 2016

193...गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं...

जय मां हाटेशवरी...

आनंद पर मैं कुलदीप ठाकुर एक बार पुनः उपस्थित हूं...आनंद का एक और अंक लेकर...
सर्वप्रथम आप सब को भारत के 67वें  गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं...
लोकतंत्र हैं आ गया, अब छोड़ो निराशा के विचार को
बस अधिकार की बात ना सोचों, समझों कर्तव्य के भार को
भुला न पायेगा काल, प्रचंड एकता की आग को
शान से फैलाकर तिरंगा, बढ़ाएंगे देश की शान को
अब पेश है...मेरी पसंद के कुछ लिंक...

मेरी धरोहर में..yashoda दीदी...
मिले ग़म से अपने फ़ुर्सत तो सुनाऊं वो फ़साना....मुईन अहसन जज़्बी
s1600/moin-ahsan-jazbi
कभी दर्द की तमन्ना कभी कोशिश-ए-मदावा,
कभी बिजलियों की ख़्वाहिश कभी फ़िक़्र-ए-आशियाना।
मेरे कहकहों के ज़द पर कभी गर्दिशें जहाँ की,
मेरे आँसूओं की रौ में कभी तल्ख़ी-ए-ज़माना।
कभी मैं हूँ तुझसे नाला कभी मुझसे तू परेशाँ,
मेरी रिफ़अतों ले लर्जा कभी मेहर -ओ-माह-ओ-अंजुम।

KAVITA RAWAT में..KAVITA RAWAT
हम भाँति-भाँति के पंछी हैं
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कहीं पे रस्ते चंपा के हों कहीं गुलाबी गलियाँ हों
कोई पहेली कहीं नहीं है, सीधा साफ़ इशारा है
हम  हम भाँति-भाँति के पंछी ………………………

मैं , लेखनी और ज़िन्दगी में...Madan Mohan Saxena
गणतन्त्र दिवस , देश और हम
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सोसाइटी ऑफिस के लोग
देश भक्ति से युक्त गानो की सी डी और ऑडियो को खोजने में ब्यस्त हैं
कि पूरे दिन इन गानों के बजाना होगा
बच्चे लोग इस बात से खुश है कि
कल स्कूल में पढ़ाई नहीं होगी
ढेर सारा मजा और  मिठाई अलग से मिलेगी
लेकिन भारत  काका इस बात से खिन्न हैं
कि अपनी पूरी जिंदगी सेना में खपाने के बाद भी
सरकार उनकी सुध लेने को तैयार नहीं है (एक रैंक एक पेंशन)




श्रद्धा सुमन में... अनिता।
कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिए मंगलकामनापूर्वक स्वस्तिवाचन करना
सदा सुखी रह जिस धर्म का, नियमपूर्वक पालन करते
रघुकुल सिंह धर्म वही अब, रक्षा करे सभी ओर से
जिनको तुम करते प्रणाम, देव स्थानों व मन्दिर में
संग महर्षियों, देव सभी, वन में रक्षक बनें तुम्हारे
सद्गुणों से तुम प्रकाशित, दिए मुनि ने जो भी अस्त्र
रक्षा करें सभी ओर से, सदा तुम्हारी प्रियवर पुत्र !
शुश्रूषा पिता की की है, सेवा भी माताओं की
सत्य पालन से रहो सुरक्षित, बने रहो चिरंजीवी
समिधा, कुशा, पवित्री, वेदी, मन्दिर, पर्वत, वृक्ष सभी
पक्षी, पोखर, सर्प और सिंह, रक्षक बनें तुम्हारे सब ही
साध्य, विश्वेदेव तथा, संग महर्षि मरुद्गण सारे



Akanksha में...Asha Saxena
हताशा
सभी  जानते हैं
खाली हाथ जाना है
पर एक इंच जमीन के लिए
बरसों बरस न्याय के लिए
चप्पलें घिसते रहते
हाथ कुछ भी न आता
रह जाती केवल हताशा |
कुछ कहना है"में...रविकर
 




हम श्रधा से नमन करते हैं उन शहीदों का...
जिन्होंने अपना सर्वस्व इस मात्रभूमि के लिये अर्पण कर दिया...
धन्यवाद।

सोमवार, 25 जनवरी 2016

192...है बंद इसमें बाबा के हाथों का दुलार

सादर अभिवादनम्
 मैं दिग्विजय फिर से एक बार
आप ये ब्लॉग मोबाईल पर पढ़ रहे हैे तो
इस लिंक को अवश्य छुएँ....पाँच लिंकों का आनन्द
रोज सुबह आपके मोबाईल पर दिखाई देगा




सबसे पहले हैं इसमें सुगंध माँ के प्यार की
वोह माँ जिसकी लाडली, हूँ मैं छाया जिसकी
पारिजात के फूलो जैसी महक उनकी ऐसी
है बंद इसमें बाबा के हाथों का दुलार
झोली भर भर के हैं आशीष इस मुट्ठी मैं
उनके, जो रहे मार्गदर्शक मेरे बारम्बार


बहुत उजाला है यहाँ,
दिए यहाँ बेबस लगते हैं,
पता ही नहीं चलता 
कि वे जल रहे हैं.


हरक्यूल पाईरो,शरलक होम्स,जेम्स बांड और हैरी पॉटर में क्या कोई समानता है?बिलकुल समानता है.ये सभी अगाथा क्रिस्टी,ऑर्थर कानन डायल,इयान फ्लेमिंग और जे.के.रोलिंग द्वारा गढ़े गए वे किरदार हैं जो अपार लोकप्रियता प्राप्त कर लोकप्रियता में इसके सृजक से भी आगे निकल गए हैं.
क्या कभी इन लेखकों ने कल्पना की होगी कि ये किरदार सर्वकालिक महान किरदार बन जाएंगे? 


हम हमारे आस पास कई क्षेत्रों में ड्रेस कोड लागू होते देखते है। जैसे कि हर स्कूल का अपना ड्रेस कोड होता है, तो सेना का अपना और पुलिस की अपनी वर्दी! हर क्षेत्र में ड्रेस कोड का अपना महत्व है। जैसे, स्कूलों-कॉलेजों में ड्रेस कोड होना अच्छी बात है क्योंकि इससे बच्चों में अमीर-गरीब का भेदभाव नहीं होता, सभी बच्चों में समानता का भाव विकसित होता है। और बच्चे कौन से स्कूल के है, यह पहचान भी हो जाती है। 
हाल ही में वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर में प्रवेश के लिए महिला श्रद्धालुओं को, विशषकर विदेशी महिलाओं को साड़ी पहनना अनिवार्य कर दिया गया है। महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर में कई सालों से यह नियम लागू है कि पुरुष श्रद्धालु धोती पहन कर ही पूजा- अर्चना कर सकते है।


ध्येय में क्या आज, अपने भी पराये हो चुके हैं,
ध्येय ही जीवन है, क्या और अब कुछ भी नहीं है ।।
ध्येय की वीरानियों में, एक स्वर देता सुनाई ।
आज फिर क्यों याद आयी ।।


वो जो राह-ए-हक़ चला है उम्र भर 
साँस ले ले कर मरा है उम्र भर 
जुर्म इतना है ख़रा सच बोलता 
कठघरे में जो खड़ा है उम्र भर 


ये है आज की अंतिम कड़ी

देखो बसंत - बहार में 
अवनि ने धरा रूप नया 
बन गई हरा समन्दर 
इठलाती , बलखाती 
ओढ़ छतरी गगन की 

इज़ाज़त की प्रत्याशा में
दिग्विजय

प्रथम रचना वर्ड प्रेस से है..
माँ के दुलार पर
एक गीत तो बनता है
सुनेिए आप भी निदा फ़ज़ली की एक नज़्म















रविवार, 24 जनवरी 2016

191..जो झूठ की चादर आदमी ने दिल में चढ़ाई नहीं होती

सुप्रभात दोस्तो
  पांच लिंको का आनंद पर आपका स्वागत है।
     पहली बार पांच लिंको का आनंद पर आपका दोस्त विरम सिंह सुरावा ।
    किसी कवि की कविता जो मन मे जोश भर देती है।
  मेने पढी सोचा आपको भो सुना दूँ.....

☆ जीवन मे कुछ करना है तो ,  मन को मारे मत बैठो ।
    आगे आगे बढना है तो , हिम्मत हारे मत बैठो ।।

चलने वाला मंजिल पाता , बैठा पीछे रहता है।
ठहरा पानी सड़ने लगता ,बहता निर्मल होता है ।
चलो कदम से कदम मिला कर , दूर किनारे मत बैठो ।।

और अब प्रस्तुत है पहली बार मेरे पंसद की लिंक ...      
          यथार्थ पर ..........विक्रम प्रताप सिंह
फिर दुनिया में तनिक भी बुराई नहीं होती।
जो झूठ की चादर आदमी ने दिल में चढ़ाई नहीं होती ।।

ना होता अपने, बेगाने होते जाने का किस्सा
आसमान में परिन्दों की भी लड़ाई नहीं होती।।



दुनिया के इतिहास में, दिवस आज का खास।

अपने भारत देश में, जन्मा वीर सुभास।।

--

जीवित मृत घोषित किया, सबको हुआ मलाल।

सत्ता पाने के लिए, चली गयी थी चाल।।

--

क्यों इतने भयभीत हैं, शासन में अधिराज।

नहीं उजागर हो सका, नेता जी का राज।।



नेताजी के भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु अमूल्य योगदान के लिए हम

 सभी सदैव ऋणी रहेंगे। उनके जैसे ओजस्वी वाणी, दृढ़ता, स्पष्टवादिता

 और चमत्कारी व्यक्तित्व वाले लोकप्रिय नेता की आज सर्वथा कमी 

महसूस होती है। स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु उनका भारतवासियों का उद्बोधन

 भला कौन भुला सकता है-“ अब आपका जीवन और आपकी सम्पत्ति 

आपकी नहीं है, वह भारत की है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यदि आप इस 

सरल सत्य को समझते हैं कि हमें किसी भी उपाय से स्वतंत्रता प्राप्त 

करनी है और अब हम एक ऐसे स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में हैं जो युद्ध की 

स्थिति में है तब आप सहज ही समझ जायेंगे कि कुछ भी आपका नहीं है।




कविता मंच पर .....विवेक रतन सिंह


हँसी में घुल जाती है 

ख़ुशी में मिल जाती है 

है  अनीता एक  सुगंध मधुर 

हर पुस्तक  में मुस्काती है 

लिखकर वो भाव अपने 

जीवन  को जगमगाती   है 

और झिलमिल-झिलमिल तारों को  भी 

चाँद बन  वो  पढ़ाती है 

****



प्रतिभा किसी चीज की मोहताज नहीं होती और न ही किसी भी तरह का 

रोड़ा उसकी तरक्की के रास्ते को रोक सकता है. 

ऐसा ही कुछ कर दिखाया है बाबा भीमराव आंबेडकर यूनिवर्सिटी 

(बीबीएयू), लखनऊ  की छात्र रत्ना रावत ने. एमसीए स्टूडेंट रत्ना रावत

 के पिता बीबीएयू में ही चपरासी हैं और अब रत्ना ने एमसीए में टॉप कर 

अपने पिता का सिर गर्व से उंचाकर दिया है.  

रत्ना के पिता बृज मोहन बीबीएयू में ही 

चपरासी के पद पर कार्यरत हैं 

अब दीजिए आज्ञा 
धन्यवाद

शनिवार, 23 जनवरी 2016

जयंती



सुभाष चंद्र बोस जीवनी के लिए चित्र परिणाम


आज मृत्यु से शायद पर्दा उठ जाए
दस्तावेज से रहस्य बेपर्दा होने को है



सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष








गुड मॉर्निंग

युवती उठी, अपना जैकेट कंधे पर डाला और उनके निकट आकर बोली,
 “खुल्ली हवा और हँसी हेल्थ विच गुड होंदीये, होर आप तो इन्ने हेण्डसम हो,
 बुड्ढों जैसे कपड़े क्यों पेने ओ?”
युवती ने उत्तर की प्रतीक्षा नहीं की
और खिलखिलाती हुई पार्क से निकल गई।


रचनात्मकता को बढ़ाएं

अनुकूल परिस्थितियोँ के होने का
इन्तजार करने के बजाय
स्वयं को बदलकर परिस्थितियोँ को
अपने अनुकूल बनाएं।


ज्ञ से ज्ञानी

वर्णमाला का अंतिम वर्ण,
और संयुक्ताक्षर कहलाया।
कुछ लोग मेरा उच्चारण,
'ग्य' करते जैसे विग्यान,
तो कुछ लोग मेरा उच्चारण,
'ज्न' करते जैसे विज्नान।


तुम और मैं

मैं जीवन पथ पर संघर्ष कर लौटता ,
निराशा की एक ठंडी सी सांस छोड़ता,
तुम आशा का झट से निर्मल जल ले आती,
और सांत्वना भरे हाथों से स्वयं पिलाती,
फिर साडी के पल्लू से श्रम स्वेद पोंछती,



कहानी के पीछे

मैं, सबसे बाहर, सिर्फ़ अपने पैरों की उंगलियों के
अगोर के मुहाने कांपता खुद को ख़बरदार करता कि
जिस बिंदु सब हेरा जाये, तुम लम्‍बी सांस खींचकर वहां से
 कहानी शुरु करना. हेराये की लम्‍बी दूरी खींच निकालो
फिर तब कहीं उनींदे में आंख खोलकर खुद से
पूछना, उपन्‍यास कहां शुरु होगा.



छुपाता फिरता हूँ

सारे दोस्त शहर खाली कर चले
गैरों से ये बात छुपाता फिरता हूँ
सबके पीने की वजह अलग
अपनी सबसे छुपाता फिरता हूँ



एक खास तरह का प्यार

खुश करने के लिये बस मैं ही हूँ,
अब खुद की तकलीफ से मजे से लड़ सकती हूँ।
मुझे किसी को जवाब नहीं देना
क्योंकि मैं किसी की अमानत नहीं।
अपनी उलझनें सुलझाने में मुझे अब कम वक्त लगता है
क्योंकि मुझे किसी का इन्तज़ार नहीं रहता।
 मैं बिल्कुल मैं हूँ और बहुत आसान है ये प्यार।



सुभाष चंद्र बोस जीवनी के लिए चित्र परिणाम

खून से मिली आजदी मिट्टी में ना मिल जाए

हम फिर मिलेंगे ..... तब तक के लिए ..... आखरी सलाम

विभा रानी श्रीवास्तव

शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

189...नाप - तोल सही होने पर मुख खोलो

शुभ प्रभात 
आज मैं मुखातिब हूँ
आपके समक्ष..
सहन कर लीजिएगा मुझे
व मेरी पसंदीदा रचनाओं को..

काश उजालों की चाहत ना होती,
काश अन्धेरा उदास ना होता!
इतना शोर सीने में  क्यों  हे,
काश सन्नाटा बाहर  ना होता !

प्रत्येक  माँ - बाप चाहते है कि उनके बेटे/ बेटी पढ कर नाम रोशन करे । 
लेकिन कुछ ऐसे  कारण होते है छिपे कि विद्यार्थी  चाहते हुए भी  पढाई नही कर पाते है । 
उनका दिल तो पढने को  करता है , लेकिन  उनका मन पढाई मे नही लगता है।
 मन ना लगे तो क्या करे।

व्याकरण पढ़ो भाषा शुद्ध करो ,
मौखिक लिखित से विचार व्यक्त करो |
मौखिक में अशुद्धता है कम बोलो ,
बोलने से पहले बार -बार तोलो |
नाप - तोल सही होने पर मुख खोलो ,

श्रम लिखते
माँ, भू-लाल के भाल
स्वेद क्षणिका
और
वंश उऋणी
बीजती माता जाई
बीज संस्कारी

मृत पति संग
चिता पर जलाई गई
पांच पतियों समुख
निर्वस्त्र की गई
श्राप देकर पाषाण बनाई गई 
वो नारी थी।

जुदा हो करके के तुमसे अब ,तुम्हारी याद आती है
मेरे दिलबर तेरी सूरत ही मुझको रास आती है
कहूं कैसे मैं ये तुमसे बहुत मुश्किल गुजारा है
भरी दुनियां में बिन तेरे नहीं कोई सहारा है


अंतिम पसंदीदा रचना है मेरी आज की

अब राखें चिंघाड़ेंगी क्या पस्त हो
ख़त्म कर सब कहानी पवन खेलकर
मातम पर हँसता हुआ चल दिया
क्रूर विध्वंस कर नाद से बेखबर


कुलदीप भाई  की एक उपलब्धि
पांच लिंकों का आनंद के लिये एक android App. बनाने का प्रयास किया है।  
जिस का लिंक है। 
https://dl.dropboxusercontent.com/u/22664705/_bloghalchal.apk 

आप इसे भी install करके देखें। बताएं कि ये कितना उपयोगी हो सकता है।

दें इज़ाजत
वक्त मिला तो
फिर मिलेंगे
सादर
दिग्विजय







गुरुवार, 21 जनवरी 2016

188 ...... फिर तुम्हारा साथ मिले न मिले :)

आप सभी को संजय भास्कर का नमस्कार
 पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग में आप सभी का हार्दिक स्वागत है !!

एक ख़वाब देखा था मैंने......!!!
कुछ दर्द ख़ास रहने दो
इक तड़प साथ रहने दो 
बुझ न सके जो वो प्यास 
अमिट रहने दे.
एक ख़वाब देखा था मैंने 
संग तेरे मुस्कुराने का 

फिर तुम्हारा साथ मिले न मिले
सालों पहले मुझे हो गई थी तुमसे मोहब्बत
जिसे अपने दिल में छुपाकर
काटा मैंने हर एक दिन
मेरे पास भले ही नहीं थे तुम
लेकिन तुमसे दूर नहीं थी मैं
आज जब मिले हो तुम मुझे

माँ तेरे लिए वो ख़ुशी कहाँ से लाऊँ 
माँ तेरे लिए वो ख़ुशी
कहाँ से लाऊँ
कहाँ से वो तेरा
सुकून लाऊँ
हाँ मैंने वादा किया था
बाबा से..
कि  तुझे हर ख़ुशी दूँगी

तुम कहते हो 
"तुम्हें प्यार करता हूं..
बेवजह,
प्यार करने के लिए 
क्या वजह होना ज़रूरी है?''
पर जानते हो...
एक भी वजह
जो तुम मुझे बताओगे
मैं सच कहती हूं..

गर्माहट लफ्जों की
उन लम्हों को कैसे भूल जाए 
जब एक एक फंदा 
सलाई पर बुनती थी 
तुम्हारा नाम लेकर 
ऊनी दुशाले 
और तुम उसे लपेटे रहते थे 
अपने चारो तरफ
दिसम्बर की धूप / कोहरे में भी

इसके साथ ही मुझे इजाजत दीजिए अलविदा शुभकामनाएं फिर मिलेंगे अगले गुरुवार

-- संजय भास्कर


बुधवार, 20 जनवरी 2016

187...{[<बेटियां शीतल हवा होती है।।

जय मां हाटेशवरी...

कल मेरे मित्र ने whatsapp पर  एक कविता पोस्ट की...
 पर कवि का नाम नहीं था...
कविता मन को भा गयी...
आप भी  आनंद लें इस कविता का...

पहला दृश्य --
एक कवि नदी के किनारे खड़ा था !
तभी वहाँ से एक लड़की का शव नदी में तैरता हुआ जा रहा था
   कवि ने उस शव से पूछा ----

"कौन हो तुम ओ सुकुमारी,
बह रही नदियां के जल में ?
कोई तो होगा तेरा अपना,
मानव निर्मित इस भू-तल मे !
किस घर की तुम बेटी हो,
किस क्यारी की कली हो तुम ?
किसने तुमको छला है बोलो,
क्यों दुनिया छोड़ चली हो तुम ?
किसके नाम की मेंहदी बोलो,
हांथो पर रची है तेरे ?
बोलो किसके नाम की बिंदिया,
मांथे पर लगी है तेरे ?
लगती हो तुम राजकुमारी,
या देव लोक से आई हो ?
उपमा रहित ये रूप तुम्हारा,
ये रूप कहाँ से लायी हो?
.........."

दूसरा दृश्य----
कवि की बाते सुनकर लड़की की आत्मा बोलती है.....

"कवी राज मुझ को क्षमा करो,
गरीब पिता की बेटी हुँ !
इसलिये मृत मीन की भांती,
जल धारा पर लेटी हुँ !
रूप रंग और सुन्दरता ही,
मेरी पहचान बताते है !
कंगन,चूड़ी,बिंदी,मेंहदी,
सुहागन मुझे बनाते है !
पति  के सुख को सुख समझा,
पति  के दुख में दुखी थी मैं !
जीवन के इस तन्हा पथ पर,
पति के संग चली थी मैं !
पति को मेने दीपक समझा,
उसकी लौ में जली थी मैं !
माता-पिता का साथ छोड
उसके रंग में ढली थी मैं !
पर वो निकला सौदागर ,
लगा दिया मेरा भी मोल !
दौलत और दहेज़ की खातिर
पिला दिया जल में विष घोल !
दुनिया रुपी इस उपवन में,
छोटी सी एक कली थी मैं !
जिस को माली समझा ,
उसी के द्वारा छली थी मैं !
इश्वर से अब न्याय मांगने,
शव शैय्या पर पड़ी हूँ मैं !
दहेज़ की लोभी इस संसार में,
दहेज़ की भेंट छड़ी हूँ मैं, !
दहेज़ की भेंट चडी हूँ मैं,"

{[<बेटियां शीतल हवा होती है।। इन्हें बचा कर रखे>]}
अब देखते हैं आज के सूत्र...



काव्य प्रेरणा
  राम लखारा 'विपुल' का कविता संसार
 परहित Hindi Poem

s320/Beautifull-Sunrise-HD-Wallpapers-Free-Download-4
ऐसे  में   इन  सबका  अब  तो
सबक  सीखना     निश्चित  है
परहित   पाठ    पढा़ने        को
 सूरज   निकलना   निश्चित है।



खिल गई बगिया बहारें जो चमन में आई
Ocean of Bliss
परRekha Joshi

देखते ही आपको यह क्या हुआ साजन अब
खुद इधर दिल ने बहकने की तमन्ना की है

लो शर्म से अब सनम आँखे झुका ली हमने
दिल में तेरे बस जाने  की तमन्ना की है

प्रेम ">प्रेम से  झपकती पलकें
जिंदगी की राहें
परMukesh Kumar Sinha

s640/prem
 पता नहीं, कितने तरह की तस्वीरें
ब्लैक एन वाइट से लेकर
पासपोर्ट/पोस्टकार्ड पोस्टर
हर साइज़ की वाइब्रेंट
कलर तस्वीरें,
सहेजते चला गया मन !!


साम्यवाद (Communism)
 स्त्रियों की आधी आबादी की जागृति और लामबन्दी के बिना कोई भी सामाजिक परिवर्तन सम्भव नहीं
 M.s. Rana
विजय राज बली माथुर

आज़ादी और बराबरी के इन मतवालों को आज याद करने का मतलब यही हो सकता है कि हम धर्म और जाति के भेदभाव भूलकर इस देश के लुटेरों के ख़िलाफ़ एकजुट हो जायें. अशपफ़ाक-बिस्मिल-आज़ाद
और भगतसिंह की विरासत को मानने का मतलब आज यही है कि हम हर क़ि‍स्म के मज़हबी कट्टरपंथ पर हल्ला बोल दें। आज हम सभी नौजवानों और आम मेहनतकशों को यह समझ लेना
चाहिये कि हमें धर्म और जाति के नाम पर बाँटने और हमारी लाशों पर रोटियाँ सेंकने का काम आज हर चुनावी पार्टी कर रही है! हमें इनका जवाब अपनी फ़ौलादी एकजुटता
से देना होगा। परिवर्तनकामी छात्रों-युवाओं को नये सिरे से मेहनतकशों के संघर्षों से जोड़ना होगा। उन्हें शहीदेआज़म भगतसिंह के सन्देश को याद करते हुए क्रान्ति
का सन्देश कल-कारखानों और खेतों-खलिहानों तक लेकर जाना होगा। स्त्रियों की आधी आबादी की जागृति और लामबन्दी के बिना कोई भी सामाजिक परिवर्तन सम्भव नहीं। मेहनतकशों,
छात्रों-युवाओं, बुद्धिजीवियों सभी मोर्चों पर स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाना सफलता की बुनियादी शर्त्त है। हमें हर तरह के जातीय-धार्मिक-लैंगिक उत्पीड़न और दमन
के ख़िलाफ़ खड़ा होना होगा इस संघर्ष को व्यापक सामाजिक बदलाव की लड़ाई का एक ज़रूरी हिससा बनाना होगा।
हम जानते हैं कि यह रास्ता लम्बा होगा, कठिन होगा और प्रयोगों से और चढ़ावों-उतारों से भरा होगा। पर यही एकमात्र विकल्प है। यही जन-मुक्ति-मार्ग है। यही इतिहास
का रास्ता है। और हर लम्बे रास्ते की शुरुआत एक छोटे से क़दम से ही होती है।

हम बहुत कुछ है
WORLD's WOMAN BLOGGERS ASSOCIATION
परShanti Purohit

गर्व से पापा का सीना चौड़ा हो गया ।
" देखो आज मेरी सभी बेटियां प्रशासनिक सेवा में चयनित हो गयी ! गदगद होते गए पत्नी सुरेखा से कहा।
परिवार में सब लोग कितना सुनाते थे, मेरी बेटियो को हीन भावना से देखते थे। बेटा नही बन सकती बेटियां सास तो हमेशा सर पर ही सवार रहती थी।
मम्मी ! मुहँ खोलो कहाँ खो गयी आप ! बिसरी बाते भूल जाओ , सेलिब्रेशन की तैयारी करो।


 मेरा नया बचपन / सुभद्राकुमारी चौहान
गाँव
परगिरधारी खंकरियाल

मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी।
नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी॥
'माँ ओ' कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आयी थी।
कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लायी थी॥
पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा।
मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा॥


धन्यवाद।

मंगलवार, 19 जनवरी 2016

186.........जिन्दगी गुलाब सी बनाओ साथियो

सादर अभिवादन स्वीकारें
कल तो पूरी कविता ही लिख डालती
कुछ मन कह रहा था
तो कुछ मौसम खुशनुमा था

चलिए आज की रचनाओं की ओर ले चलूँ..

हर बात गवारा कर लोगे,
मन्नत भी उतारा कर लोगे
तावीज़ें भी बंधवाओगे
जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा


अच्छा महसूस होता है 
दवाई भी इसीलिये 
नहीं कोई कभी खाई है 
बैचेनी सी महसूस 
होने लगती है हमेशा 
पता चलता है जब 
कई दिनों से उनकी 
कोई खबर शहर के 
पन्ने में अखबार 
के नहीं आई है 

अनुत्तरित ही रह जाते हैं
तुम्हारे कुछ प्रश्न
अनदिए ही रह जाते हैं
मेरे कुछ उत्तर |
“”अच्छा! चलती हूँ !””’’
और ...
“फिर कब आओगे ?’’के बीच ,
छूट जाता है, कितना कुछ !
आने वाले कल के लिए

रूह के रिश्ते
होते हैं अजीब
न समझो तो हैं दूर.
जो समझो तो हैं बहुत करीब


और ये रही प्रथम व शीर्षक कड़ी
किसी ने गुलाब के बारे में खूब कहा है- 
“गीत प्रेम-प्यार के ही गाओ साथियो, 
जिन्दगी गुलाब सी बनाओ साथियो।" 
फूलों के बारे में अनेक कवियों, गीतकारो और शायरो ने 
अपने मन के विचारों को व्यक्त किया है, जैसे-  
“फूल-फूल से फूला उपवन, 
फूल गया मेरा नन्दन वन“। 

आज्ञा दें यशोदा को
और सुनें ये गीत







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