पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

समर्थक

रविवार, 23 अप्रैल 2017

646...भजन और अजान से गूंजता है जो शहर उस लखनपुर को दिल मे बसा के जियो

सादर अभिवादन..
आज रविवार को मै फिर हाजिर हूँ...
इन पंक्तियों को लिखते तक भाई विरम सिंह जी दिखाई नहीं पड़े

एक समाचार है कि बी एस एन एल नें 333 रु. में 270 जी बी डाटा
व फ्री कॉलिंग देने की घोषणा की है..
चलें रचनाओं की ओर कुछ नई और कुछ जूनी.....




लाल बत्ती और वीवीआईपी पर उसके प्रभाव.....ताऊ रामपुरिया
हमारी बात सुनते ही वो नार्थ कोरिया वाले मोटू तानाशाह “किम जोन उंग” की तरह फ़टते हुये बोली – कुछ तो शर्म करो, सारा दिन इधर से उधर नेतागिरी करते फ़िरते हो, आज तक तुम कुछ भी नही बन पाये और एक ये देखो गुप्ता जी को आज सीएम ने खाद निगम का अध्यक्ष बना दिया और उनको लाल बत्ती देकर वीवीआईपी भी बना दिया. गुप्ताईन ऐसे बन ठनकर मेम साहिब की तरह इतराते हुये लाल बत्ती की गाडी में बैठकर गई है जैसे पैदा ही लाल बत्ती में हुई हो….



रेत से खिरने लगे है
आज तिनके भी हमारे
नित पिघलती धूप में,ये
पॉँव जलते है हमारे


अवध के शाम का गवाह बन के जियो
नवाबों के शहर में नवाब बन के जियो
          
भूलभुलैया में  तुम ढूँढ लो ये ज़िन्दगी
या तो 'पहले आप' के रिवाज़ में ही जियो

यह मानव जाति का दुर्भाग्य ही है कि एक ओर जहाँ लगभग आधी शताब्दी पूर्व मानव चरण चाँद पर पड़े थे , मंगल गृह पर यान उतर चुके हैं और अंतरिक्ष में भी मनुष्य तैरकर , चलकर , उड़कर वापस धरती पर सफलतापूर्वक उतर चुका है , वहीँ दूसरी ओर आज भी हमारे देश में विवाहित महिलाओं पर न सिर्फ दहेज़ के नाम पर अत्याचार किये जा रहे हैं , बल्कि उन्हें आग में झोंक दिया जाता है। यह मानवीय व्यवहार किसी भी तरह क्षमा के योग्य नहीं है। इन कुकृत्यों के अपराधियों की  सज़ा कारावास से बढाकर फांसी कर देना चाहिए। शायद तभी ये शैतान रुपी लालची मनुष्य इंसान बन पाएंगे। 

गर्मी आई गर्मी आई 
छुप गया कम्बल 
छुपा दी गयी रजाई 
रसभरी लीची, हरे - काले अंगूर,
और रसभरा तरबूज खाओ 

जी करता है,
फिर से संकरी पगडंडियों पर चलूँ,
लहलहाते धान के खेतों को देखूं,
फूलों पर पड़ी ओस की बूंदों को छूऊँ,
ताज़ी ठंडी हवा जी भर के पीऊँ.

सात फेरों से 
शुरू हुआ 
जीवन का ये सफर , 
सात फेरे 
सात जनम के 
लिए सात वचनों से गढ़े 
सात गांठों मे बंधे , 
हम दोनों ने पूरी की 
ये सारी रस्में , 

इज़ाज़त दे दिग्विजय को
सादर

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

645 The first Earth Day – April 22, 1970





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सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

भाषण देते सुनते मेरी पीढ़ी गुजर रही
सहना ना पड़े पीड़ा नई पीढ़ी सुधर रही






पृथ्वी संरक्षण पर बच्चों ने लिया संकल्प; 
स्वर्ण स्कूल ने मनाया विश्व पृथ्वी दिवस; 
जागरूकता रैली व प्रतियोगिताओं द्वारा किया जागरूक; 
पृथ्वी विषय कविताएं भी सुनाई छात्रों ने






आप कभी यह नहीं सोचते, 
‘इस छोटी उंगली को काटकर फेंक दो’। 
अगर आप वाकई हर चीज को 
खुद में शामिल करना चाहते हैं, तो
 आपको सीखना चाहिए कि सभी चीजों को 
एक नजर से कैसे देखें। आपको इस बात के 
प्रति जागरूक होना चाहिए। यह बहुत अहम है।






महानगरेषु वाहनानां निर्बाध-प्रचलनेन
ध्वनि-प्रसारयन्त्र-विज्ञापनेन नूतनयन्त्राणां 
निनादेन कर्णस्फोटकध्वनिः रात्रिदिवं 
समुत्पद्यते तेन मानवस्य मनःशान्ति-विलुप्ता 
जनाः अनिद्रारोगेण विक्षिप्ताः इव सन्ति ।





हूँ उगा मैं मिट्टी से, फिर भी नभ को चूमता,
वर्षा की झंकार सुन, मदमस्त हो के झूमता,
वन के पृष्ठ पर हरे रत्न-सा मैं हूँ जड़ा,
क्या महान कर रहा तू वहाँ पड़ा-पड़ा?









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फिर मिलेंगे

विभा रानी श्रीवास्तव





शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

644.....विश्वविध्यालय बोले तो ? तेरे को क्या पड़ी है रे ‘उलूक’

सादर अभिवादन
नियम और कानून तोड़कर
आज फिर मैं ही आपके समक्ष...
क्या भी करें, आने वाले हर्ष के अतिरेक को रोक भी नहीं सकते...

ये जो दौर है उसके अपने कायदे
अपने कानून हैं,
हवाओं में तैराती हर बात,
शब्दश: सही होगी,
ये मुमकिन भी है, और नामुमकिन भी,

यूँ ही तुम्हारे साथ इक सफर याद आ गया...
मेरी गोद में तुम सर रख सो रहे थे,
और मैं तुम्हे निहार रही थी...
और रेलगाड़ी की खिड़की से चाँद,
हम दोनों के साथ-साथ चल रहा था...

सर्वोच्च स्थान
आदि शक्ति माता का
शाश्वत सत्य

गुज़रेंगे   लम्हात -ए -ज़िन्दगी  
अपनी   रफ़्तार   लिए ,
तराने  गुनगुनायेगी  ज़ुबां  
बजेंगे  धड़कनों  के  साज़   वहाँ। 
मुंतज़िर  है   कोई  
सुनने   को  मेरे  अल्फ़ाज़   वहाँ।


औकात की बात मत करना...ऋतु आसूजा 'ऋिषिकेश'
बूडा फ़क़ीर मुस्कराया और बोला सेठ जी जरूर आपने पिछले जन्म में अच्छे कर्म किये होंगे जो भगवान ने आपको इतना सब कुछ दिया , 
आप बहुत अच्छा करते हैं जो अपने धन के भंडार में से 
कुछ गरीबों की सेवा मे लगा देते हैं।
जहाँ तक बात औकात की है। औकात आपकी भी वही है ,जो मेरी है ,बस आपके बस जीवन जीने के साधनों के लिये धन-दौलत अधिक है ,सारी दौलत यहीं रह जायेगी सेठ जी आपके साथ नही जायेगी । आप को भी एक दिन मिट्टी हो जाना है, और मुझे भी एक दिन मिट्टी हो जाना है, 
फिर किस की क्या औकात।।



अभी एक 
नया आया है 
तीन साल 
के लिये 

उसे भी 
कुछ बनाना है 
वो भी तो 
कुछ बनायेगा 
या कौवे की 
आवाज वाले 
किसी उल्लू 
की तरफ 
देखता 
चला जायेगा? 

आज अब बस...
आज्ञा दें दिग्विजय को
सादर












गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

643.....चुटकी बजा पर्यावरण पढ़ा

सादर अभिवादन
भाई कुलदीप जी अपनी भतीजी की शादी में व्यस्त हैं
सो वे परसों मुखातिब होंगे आपसे..
तब तक आप टाईमपास कीजिए...

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पोहे के कुरकुरे बनाने के लिए न ही पोहे को पिसना पडता है और न हीं इन्हें गैस पर पकाना पडता है। तो आइए...आज हम बनाते है... बिल्कुल कम मेहनत में बनने वाले...पोहे के कुरकुरे..

तुम चाँद तारों की अब कोई,बात नहीं हो करते ,
ये दिन बोरियत भरे अब तो,मुझसे नहीं हैं कटते ,
सो ! आज तो प्रिय मेरा तुमसे,रूठने का मन है ,
बस अपना वजूद ढूंढना है,और नहीं कोई गम है।

तपा अम्बर
झुलस रही क्यारी
प्यासी है दूब।

आसान कहाँ हटा देना
तस्वीर दीवार से
पुराने कैलेंडर की तरह,
टांग देते नयी तस्वीर
पुरानी ज़गह पर,
लेकिन रह जाती
खाली जगह तस्वीर के पीछे
दिलाने याद उम्र भर।


हमेशा की तरह, है किसी दिवास्वप्न सा उभरता,
ख्यालों मे फिर वही, नूर सा इक रुमानी चेहरा,
कुछ रंग हल्का, कुछ वो नूर गहरा-गहरा.......
हमेशा की तरह, फिर दिखते कुछ ख्वाब सुनहरे,

बरसों से जमे हिमखंड
शब्दों की आँच में पिघलकर,
हृदय की सूखी नदी की जलधारा बन
किनारों पर फैलै बंजर धरा पर
बूँद बूँद बिखरकर नवप्राण से भर देती है,

बात हवा-पानी की..........डॉ. सुशील जोशी

एक छोटी सी 
आपदा आने 
से कुछ नहीं 
होता है इतना 
सब कुछ जब 
पर्यावरण पर
पर्यावरणविद
रोज का रोज
कुछ ना कुछ 
चुटकियों में 
कह देता है ।
आज्ञा दें यशोदा को
सादर












बुधवार, 19 अप्रैल 2017

642.....सोच, कपडे़ और खुश्बू नहीं बताते

सादर अभिवादन...
आज मै आपके समक्ष हूँ...
बिना किसी लाग-लपेट के सीधे चलें पसंदीदा रचनाओं की ओर...

वो देखो मदारी आया
बच्चों को बहुत भाया
तरह तरह के खेल दिखाता
कभी बन्दर को दुल्हन बनाता
कभी खुद बन्दर बन हँसता


ख़िताबत......राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"
मेरे दर्द को तुम ना समझ पाओगे उम्र भर,
मेरी जगह पर तुम ख़ुद को रखो  तब तो बात हो।

ना देख हिक़ारत की नज़रों से मुझे ऐ “राही”
मुझ में बसे ख़ुदा को देखो तब तो बात हो ।

एक घर तलाशते ग़ैरों की नीड़ में... डॉ. जेन्नी शबनम
रूबरू होने से कतराता है मन  
जंग देख न ले जग मुझमें औ ज़मीर में!  

पहचान भी मिटी सब अपने भी रूठे  
पर ज़िन्दगी रुकी रही कफ़स के नजीर में!  


गुज़रे क़दम-क़दम पे किसी इम्तिहां से हम....हरदीप बिरदी
माँगा जो उसने हमने वो वादा तो कर दिया
सोचा नहीं निभायेंगे इसको कहाँ से हम 

ईमां भी बेच दूँ मैं मगर यह तो सोचिये 
जायेंगे खाली हाथ ही इक दिन जहाँ से हम 

बातें खुशबू की...डॉ. सुशील कुमार जोशी


मेरे काम में दखलंदाजी
लगती है आप को 
हमेशा ही बेमतलब
इसलिये मुझे हमेशा
कोई ना कोई 
पुरुस्कार जरूर
कुछ पाना है 
समय नहीं है 
ज्यादा कुछ 
बताने के लिये
कल की मीटिंग 
के लिये अभी
मुझे नाई की 
दुकान पर 
फेशियल करवाने
के लिये जाना है ।

आज्ञा दें दिग्विजय को..
फिर मिलेंगे










मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

641....ख़ामोशी ... एक एहसास-

जय मां हाटेशवरी...

आज के आनंद के सफऱ का आगाज
ममता का जिसकी नहीं, होता कोई अन्त।
उस माँ के दिल में बसा, करुणा-प्यार अनन्त।।
मतलब का संसार है, मतलब के उपहार।
लेकिन दुनिया में नहीं, माँ के जैसा प्यार।।
लालन-पालन में दिया, ममता और दुलार।
बोली-भाषा को सिखा, माता ने उपकार।।
होता है सन्तान का,  माता से सम्वाद।
माता को करते सभी, दुख आने पर याद।।
अब पेश है...आज के पांच लिंक...

ख़ामोशी ... एक एहसास-
लड़ते रहना होता है अपने आप से निरंतर
दबानी पड़ती है दिल की कशमकश
रोकना होता है आँखों का आइना
बोलता रहता है जो निरंतर
तब कहीं जा कर ख़ामोशी बनाती है अपनी जगह
पाती है नया आकार
बन पाती है खुद अपनी ज़ुबान
हाँ ... तब ही पहुँच पाती है अपने मुकाम पर

क्या है ब्रह्मास्त्र और इसकी वास्तिवक शक्ति
 ब्रह्मास्त्र प्रचीन भारत का सबसे शक्तिशाली अस्त्र था जो बहुत दुर्लभ और बहुत कम ही लोगों के पास था। माना जाता है कि ब्रह्मास्त्र सिर्फ उन्हीं लोगों को दिया जाता था जो कठोर तप करके भगवान को खुश करते थे, और भगवान उन्हें खुश होकर यह शस्त्र दिया करते थे। शास्त्र बताते हैं कि जब भी इसका या इसके समान दूसरे किसी भी अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग हुआ है हमेशा पृथ्वी औऱ अनेक लोकों में जीवन का नाश हुआ है।
ब्रह्मास्त्र का ज्ञान हमारे ही ग्रंथों में आदिकाल से छिपा हुआ है और विड़बना देखिए हम उन्हीं शास्त्रों को मिथिक मानकर रख देते हैं, औऱ इंतजार करते हैं कि कोई पश्चिमी वैज्ञानिक जब कुछ बतायेगा वही सही होगा, भले वही क्यों ना शस्त्रों से सीखी हुआ हो।


गायो को बचाइए न, प्लीज।
ठीक है। यह सियासत की भाषा है। यह ऐसी ही रहेगी। गाय हिन्दुओं के लिए पवित्र पशु और माता समान है। लेकिन खेतिहर भारत के लिए गाय उससे भी ज्यादा ज़रूरी है और इसीलिए गोवंश को बचाना बेहद ज़रूरी है। यह भी बेहद जरूरी है कि जब दुनिया ऑर्गेनिक खेती की तरफ बढ़ रही है तो गो-आधारित खेती, यानी खेती में गोबर और गोमूत्र का प्रयोग करके ही उपज को बढ़ाया जा सकता है।

दिन बैसाख के
धूपीली दोपहरिया में
आँखे लगी देहरिया में
खबर आज भी कोई नहीं
दग्ध तप्त बैसाख में
मन सूना है आकाश का ।

डोर, कब कच्ची हुई,
कब धागे अलग-अलग हो गये,
खिसक गई हमारे
पाँव के नीचे की ज़मीन,
चूर-चूर हो गया हमारा
अस्तित्व और मिल गये
हम मिट्टी में।

आज बस इतना ही...
धन्यवाद.







सोमवार, 17 अप्रैल 2017

640....बिना डोर की पतंग होता है सच हर कोई लपेटता है अपनी डोर अपने हिसाब से

सादर अभिवादन
मेरी डायरी के पन्ने से दो पंक्तियाँ....
झूझती रही बिखरती रही टूटती रही 
कुछ इसी तरह ये ज़िन्दगी निखरती रही !

प्रस्तुत है मेरी पसंद की ये रचनाएँ...

सही में औरतें 
बहुत ही बेवकूफ होती है 
हजारों ताने उल्हाने, 
मार पीट सहकर भी 
उम्मीद का दामन 
जो नहीं छोड़ पाती 
यह औरतें न जाने 
कितनी बार टूट -टूटकर 
बिखर जाने के बाद भी 
खुद को समेट जो लेती हैं

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तारे...श्वेता सिन्हा
भोर की किरणों में बिखर गये तारे
जाने किस झील में उतर गये तारे

रातभर मेरे दामन में चमकते रहे
आँख लगी कहीं निकल गये तारे



इसमें तुम्हारा क़सूर नहीं,
मेरी ही ग़लती थी 
कि मुझे ऐसा लगा,
पर जब लग ही गया,
तो मुसाफ़िर,
बस इतना कर देना 
कि जब मेरी गली से गुज़रो,
तो मेरी ओर देख लेना.

द्रौपदी का दर्द......साधना वैद
कब तक तुम उसे 
इसी तरह छलते रहोगे !
कभी प्यार जता के, 
कभी अधिकार जता के,
कभी कातर होकर याचना करके,


दही को एक कपड़े में बाँध कर 3-4 घंटे के लिए टांग दें 
जिससे कि उसका सारा पानी निकल जाए.
अब थोड़े से ब्रेड क्रम्बस निकाल कर बाकी सारी चीजें मिला लें.
अब इसे कबाब के आकार का बनाकर, ब्रेड क्रंब्स में लपेटें और गर्म तेल में शैलो फ्राई कर लें.

वक़्त... ऐसा लगता है कि दुनिया में बस यही एक चीज है जिसका चलते रहना निश्चित है... देखो न वक़्त के पहिये ने देखते ही देखते 5 साल का सफ़र तय भी कर लिया और हमें खबर तक नहीं हुयी... वैसे हम जिस जन्मों-जन्मों के सफ़र पर निकल चुके हैं, 


सच पर 
शक करना 
ठीक नहीं 
होता है 

‘उलूक’ 

कोई कुछ 
नहीं कर 
सकता है 
तेरी फटी 
हुई 
छलनी का 

सादर



रविवार, 16 अप्रैल 2017

639......दोस्ती

नमस्कार दोस्तो सुप्रभात 

जीवन मे यदि सफल होना चाहते है तो असफलता और अपमान से भयभीत होकर बैठने की बजाय उसे एक चुनौती समझे और अपने लक्ष्य पर अटल रहे।
  
    आइए अब चलते है आज की पाँच लिंको की ओर. . . . . . . 

दोस्ती

एक बुरे दौर में
मैंने दोस्तों की तरफ
मदद की उम्मीद भरी निगाह से देखा
कभी ये मदद आर्थिक थी
तो कभी मानसिकš
कुछ दोस्तों को मेरी उम्मीद नही दिखी
बस केवल मैं दिखा
मजबूरी की एक कमजोर
प्रस्तुति थी शायद मेरे पास
कुछ दिन ऐसे दोस्तो से मैं रहा बेहद नाराज़
फिर मैंने पाया


भाई पर अनमोल सुविचार – Brother Quotes in Hindi

१. प्रेम से जो देती है वो बहन है, लड़ झगड़ के जो देता है वो भाई है।
२. हमें भाईयों की तरह मिलकर रहना अवश्य सीखना होगा अन्यथा मूर्खों की तरह सभी बरबाद हो जाएंगे।
३. बरा भाई बाप जेसा होता है, छोटा भाई दोस्त जेसा होता है।
४. बहन भाई की यारी, सब से प्यारी।


शगल

जिंदगी का अजीब फ़लसफ़ा है,
हर एक आदमी दूसरे से खफा है!
गैरों के गुनाहों का बही-खाता है सबके पास,
बस अपने गुनाहों का हिसाब रफा-दफा है!

दूर चले गए
रंग बिरंगी एकता


मेरा नाम जपते-जपते,
वो मुझसे दूर चले गए,
मुझे ढाल लिया अपनी पसंद में,
और मेरे वजूद से दूर चले गए...

मुझे बेचते-बेचते,
वो कहाँ से कहाँ चले गए,
मैं यहाँ इंतज़ार में हूँ उनके,
जो घर से मेरे दूर चले गए...


कहा था न ?
मेरी भावनायें..




कहा था मैंने
शिकारी आएगा
जाल बिछाएगा ...
भ्रमित होकर
फँसना नहीं !

लेकिन शिकारी ने
तुम्हारी आदतों को परखा
पारदर्शी जाल बिछाया
दाने की जगह
 खुद जाल के पास बैठ गया
संजीदगी से बोला,
आओ ...
कुछ बातें करें !

अब दीजिए आज्ञा
  विरम  सिंह



शनिवार, 15 अप्रैल 2017

638.... लेखन



सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष


अपनों गैरों के ताने सुन सुन जी माना जीतना
कुरीतियों के विरोध में जब से है ठाना लिखना


लेखनकौशल का अभ्यास शुरू करने की उलझन और उहापोह से 
निकलने का सबसे बढ़िया तरीका उपर्युक्त उक्ति में ही छिपा है।
 यह बात अपने दिमाग से एकदम निकाल दें कि आप खराब लिखेंगे 
या फिर अच्छा लिखेंगे। बस आप लिखना शुरू कीजिए और फिर
 देखिए कि किस तेजी से आपके लेखन कौशल में सुधार आना शुरू होता है।



लेखनीइक पहेली जिंदगी, मुझसे सुलझती ही नहीं थी,
आग थी मुझमें छिपी, पर वह सुलगती ही नहीं थी,
और यह दुनियां भी मेरा साथ अब तो छोड़ती है,
मंद गति मेरी हुई पर लेखनी अब दौड़ती है।



लेखनीसुस्ता लूं
किसी संगीत का आनंद ले लूं
किसी कोमल धुन को याद कर लूं
किसी मनोरम दृश्य को याद कर लूं
इस एकांत में,
कोई सीन खेल लूं


मेरा हाल सोडियम-सा हैआज आस्था पर हमला है
मूल्य धर्म का गिरा लेखनी अब सुन ले । 84 
देव-देव सहमा-सहमा है
असुर लूटते मजा लेखनी अब सुन ले । 85 
अब रामों सँग सूपनखा है
त्यागी इनने सिया लेखनी अब सुन ले । 86 
आज कायरों कर गीता है



आज मेरे पति महोदय का जन्मदिन है
थोड़े घर के काम कर लूँ

विभा रानी श्रीवास्तव




शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

637...झपट ले लपक ले पकड़ ले

सादर अभिवादन..
आज चौदह अप्रैल
आज बाबा साहेब भीमराव जी अम्बेडकर  का जन्म दिवस
साथ ही एक अच्छा शुक्रवार (गुड फ्राईडे) भी है
दोनों की शुभकामनाएँ....

आज की शुरुआत बाबा साहेब से 

14 अप्रैल अम्‍बेडकर को याद करने का दिन है। जाति विषमता के विरूद्ध अम्‍बेडकर ने जो लड़ाई लड़ी है, उसे याद करने और आगे बढ़ाने का दिन है। इस मौके पर मार्टिन लूथर किंग की याद किसी भी तरह के विभेद के विरूद्ध जारी मुहिम को ही वैश्विक स्‍तर पर देखने की ही कोशिश है। 

खूबसूरत शब्दों का 
आकर्षक जाल बुने 
भावनाओं के आटे से 
बनी गोलियां 
सुनहरी मछलियों को 
खिलायें !

लेखन के राजा/रानी को लक्ष्मी का साथ नहीं मिलता ना ही 
सगे रिश्तेदार क़रीब आना चाहते हैं
दिन क़रीब आता जा रहा था और चिंता बढ़ती जा रही थी। .... एक दिन वो अपने कमरे में बैठा था कि नंदनी उससे मिलने आई उदासी में घिरे मित्र को देख। .... चिंता का कारण जान गई । ... बिना रक़म भरे हस्ताक्षर कर चेक थमाते हुए बोली कि बैंक में रखा रक़म मिट्टी ही है। जब दोस्त के काम ना आए जितना है, सब निकाल लेना और बिटिया की शादी धूम-धाम से कर , अपनी मुस्कुराहट वापस ले आना। 

देती दुहाई सूखी धरा
करती रही पुकार
आसमाँ पर  सूरज फिर भी
रहा बरसता अँगार
सूख गया अब रोम रोम
खिच  गई लकीरें तन  पर
तरसे जल को प्यासी धरती

कहना है,
कि जब मैं हुआ 
और तुम मुझे अपनी गोद में लेकर 
इधर उधर घूमते थे 
तो दुनिया अपनी मुट्ठी में लगती थी !
सबकी उपस्थिति में 
मुझ अबोले को 
रहता था इंतज़ार 
तुम्हारे आने का। 

आज्ञा लेने से पहले ये
मूँछ मे 
ताव देता
एक प्रोफेसर
टेढ़े टेढ़े मुंह से
हंसता हुवा
यू जी सी की
संस्तुति हेतु
एक करोड़ 
की परियोजना 
बना रहा है।
.....
यशोदा
सादर










गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

636....वैसाखी की शुभकामनाएं...

जय मां हाटेशवरी...

आज 13 अप्रैल है...
आज के दिन ही...
जलियांवाला बाग में...
जनरल डायर ने  1800...
 भारतीयों को अपनी गोलियों से...
मौत के घाट उतार दिया...
आज के दिन ही...
1699 में...
गुरु गोविंद सिंह ने...
खालसा पंथ की स्थापना की थी...
गुरु गोविंद सिंह जी के  पथ पर चलते हुए...
1940 में...
शहीद-ए-आज़म सरदार ऊधम सिंह ने...
जलिया वाला बाग के नरसंहारक...
जनरल डायर को...
21  वर्ष बाद...
उसे उस की करनी का दंड दिया...
नमन है...इस देशभक्ती को...
नमन है...इनके जोश को...
अब पेश है...आज के लिये मेरी पसंद...
पत्थर फेंकनेवालों से निपटने का तरीका केवल कठोर हो-
प्रश्‍न यह उभर रहा है कि आखिर इतने बड़े राष्ट्र को अपने सैन्‍य बलों की तुलना में भाड़े के अतिवादियों के बारे में इतना सोचने-विचारने की क्‍या आवश्‍यकता है।
कश्‍मीर समस्‍या का सच अब किसी भी रूप में गुप्‍त नहीं रहा। केंद्र सहित स्‍थानीय विपक्ष, मुसलिम राजनीतिक दल और पाक-प्रशासित आतंकी समूह सभी भलीभांति अवगत
हैं कि कश्‍मीर में पत्‍थर फेंकने का कार्यक्रम कोई रीतिगत कार्यक्रम नहीं है। इस काम के लिए किसी भारतीय हित अथवा राष्‍ट्रीय उत्‍पादन की दिशा निर्धारित नहीं
होती। आधिकारिक रूप से भारत के हिस्‍से कश्‍मीर में भारतीय रक्षा बलों पर पत्‍थर फेंकना हर कोण से अवैध है। तब भी इस समस्‍या को देखने का दृष्टिकोण भारत में
ही दो तरह का है। एक वे राजनेता, बुद्धिजीवी, पत्रकार तथा इनके समर्थक लोग हैं जो किसी भी प्रत्‍यक्ष भारत विरोधी गतिविधि में शामिल मुसलिमों को कभी भी दोषी
या आरोपी नहीं समझते। यह वर्ग उलटा ऐसे राष्‍ट्र विराधियों की हरकतों को हास्‍यास्‍पद तथ्‍यों व तर्कों के आधार पर सही ठहराने को जुटा रहता है। दुर्भाग्‍य से

ओ माय गॉड...तुमने निचली जाती की महिला को काम पर रखा!!!
मैंने पूछा,“क्यों, क्या हुआ? मुझे कामवाली बाई की जरुरत थी। इस महिला का स्वभाव बहुत अच्छा है, ये काम बहुत साफ़-सफ़ाई से और अच्छा करती है। ऐसे में इसे काम
पर रखने में क्या अड़चन है?”
“अरे...वो सब तो ठीक है। लेकिन जात-पात भी कोई मायने रखती है कि नहीं? हम तो चाहे कुछ भी हो जाएं...गंदे बर्तन और कपड़ों का ढ़ेर पड़ा रहे तो रहे...घर गंदा रहे
तो रहे...लेकिन हम भुल कर भी निचली जाती वाली को काम पर नहीं रखते!”
“आखिर निचली जाती के लोगों में ऐसी क्या खराबी है, जो आप लोग उन्हें काम पर नहीं लगाते?”
"ख़राबी निचली जाती के लोगों में नहीं है। ख़राबी उनकी जात में है। निचली जाती के लोग अच्छे नहीं होते। हमारे खानदान में आजतक किसी ने उन्हें काम पर नहीं रखा।
इसलिए हमें भी हमारे बुजुर्गों के पदचिन्हों पर चलते हुए इन लोगों को काम पर नहीं रखना चाहिए।"

एक कहानी : शोक-
कहानी
अभी महिलायें अपने लिए चावल और झोर परोस ही रही थी कि गुमानी काकी की ननद पार्वती उधर से दौड़ती हुई आयी और हांफते हुए कहा “कलावंती भौजी मर गयी”.
“चुप चुप चुप” गुमानी काकी ने हाथों से इशारा करते हुए कहा एवं निरपेक्ष भाव से तेजी से खाना परोसने लगी. थोड़ी देर बाद गुमानी काकी के विलाप से वातावरण गूँज उठा. महिलाएं खाकर उठ चुकी थी, वे भी संग में जोर जोर से कलावंती का नाम लेकर रोने लगी. ज्यादा खा लेने के
कारण अलसाये हुए मर्द जो दांतों में फँसे मांस को नीम के खेर से निकालने में व्यस्त थे, भागे हुए आये ... सिधेश्वर जी ने पान की पीक फेंक कर गला साफ़ करते हुएकहा “चलो कम से कम सबके खाना खाने के बाद मरी, पहले मर जाती तो .........”. जूठे बर्तन में मुँह लगायी हुई बिल्ली इतना शोर गुल सुनकर भाग खड़ी हुई. घर में शोक का एलान हो चुका था.
बेहद तकलीफ के साथ लिखना पड़ रहा है रोटी को पत्थर में बदलने से विकास नहीं हो सकता | गाय को गुड़ खिलाकर सूबे के लगभग २.५ करोड़ कुपोषित बच्चों और हर दूसरी एनीमिया ग्रस्त किशोरी को स्वस्थ नहीं किया जा सकता न ही हंगरइंडेक्स में दर्ज आंकड़ों को झुठलाया जा सकता है | भाजपा के नेता ही हल्ला मचाया करते थे कि देश में लाखों टन अनाज सड़ रहा है सरकार गरीबों में इसे बाँट क्यों नहीं देती , अब खुद पहल क्यों नहीं करती ? वह भी तब जब देश व प्रदेश में भाजपा की ही सरकारें हैं | इसके आलावा ‘मन की बात’ में प्रधानमन्त्री जूठन पर चिंता जताते हैं लेकिन सड़ रहे अनाज पर कोई बात क्यों नहीं करते ? और तो और अपवंचित बच्चों के लिए कहीं भी शेल्टर होम हैं न ही स्ट्रीट चिल्ड्रेन की चिंता , बल श्रम व प्राथमिक शिक्षा पर कोई पहल नहीं ? पीने के शुद्ध पानी के इंतजाम , संक्रामक रोगों के रोकथाम पर कोई बयान
नहीं ? राजधानी को साफ सुथरा रखने और गली-कूचों से कचरा उठाने में गजब का भ्रष्टाचार चीन तक की कंपनी को कचरा उठाने की दावत ऐसे में पूरे सूबे की हालत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है | बिजली २४ घंटे देने का बयान हर दूसरे दिन  अख़बारों में छपता है मगर भीषण गर्मी में सूबे के ६५ जिलों में औसतन १२-१६ घंटे बिजली फरार रहती है ? महंगाई , रोजगार,किसान की बात पर मंथन के बाद काम होगा, लेकिन डराने धमकाने के पहले यह अच्छी तरह जान लें कि आदमी के घर में चूल्हा आज जलेगा ?
टीवी चैनल से लेकर हर अख़बार में , भाजपा के कद्दावर नेताओं की जुबान पर सिर्फ मिशन २०१९ और राम मंदिर सुर्खरू  हो रहे हैं ? हर कोई राम मंदिर बनाने की जल्दी
में है कोई कानून बनाने की धमकी दे रहा है तो कोई अदालत की बात दोहरा रहा है | संत से लेकर नेता तक भूल गये की इसी लखनऊ में केन्द्रीय मंत्री मुख़्तार अब्बास
नकवी ८ महिने पहले कह गये थे कि भाजपा के लिए राम मंदिर न कभी चुनावी मुद्दा था न है और न कभी रहेगा | फिर पहले चुनावों में बनाये गये मुद्दों और वायदों की
जल्दी क्यों नहीं ? उससे भी बड़ी बात ‘सरकार बनती है बहुमत से और चलती आम सहमती से है’ जुम्ला याद  रखना होगा | बहरहाल प्रजातंत्र की परिभाषा वन्देमातरम् या
भारत माता की जयघोष से बदलने का प्रयास बंद करके विकास की ओर मजबूत कदम बढ़ाने ही होंगे |

               
दलाई लामा कुछ वर्ष अरुणाचल क्यों नहीं रहते?
 चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने 6 अप्रैल को नुमाया संपादकीय ‘इंडिया यूज दलाई लामा कार्ड’ को बड़े ही नकारात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। उसकी टिप्पणी थी, ‘एनएसजी का सदस्य नहीं बन पाने, और यूएन में मसूद अजहर को आतंकी लिस्ट में शामिल न करा पाने का हिसाब भारत दलाई लामा के जरिये चुकता कर रहा है।’ संपादकीय लिखने वाला जैसे सीमा पर खड़ा ललकार रहा हो, ‘अगर नई दिल्ली ‘साइनो-इंडिया’ संबंध को खराब करता है, और दोनों देश प्रतिद्वंद्वी के रूप में आमने-सामने होते हैं, तो क्या भारत उसके दुष्परिणामों को झेल पायेगा? इसलिए राष्ट्रवादी मित्रों, इस देश में सिर्फ एक बार चीनी माल की बिक्री संपूर्ण रूप से बंद करा दीजिए। चीन इस आर्थिक झटके को झेल नहीं पायेगा!

आवारा कुत्ता और देशद्रोही
      यही हाल देशद्रोहियों की भी है । देशद्रोही बनने से पहले वे काफी उच्च किस्म में देशभक्त थे । हो भी क्यों न, हमारा देश सदा से ही उच्च आदर्शों पर देशभक्तों
से भरा रहा है । लेकिन जब से विदेशी आक्रमण शुरु हुए । विदेशी विचारधारा का आगमन हुआ । देशभक्त व्यक्ति जो कर तक भारत माता के सच्चा सुपुत्र था, अव विदेशी विचारधारा अपनाकर देशद्रोही के श्रेणी में आ गया । हालात आवारा कुत्ते जैसे हो गए । पुरे दुनिया से जब देशद्रोहियों का सफाया हो गया तो अब भारत माता के सच्चे सुपुत्र होकर भारत माता को डायन कहते हैं । वे आवारा कुत्ते की भाँति रोज भाषण देते है, मिडिया में अपने मलिन विचार परोसते है फिर भी कहते हैं कि हमारी बोलने की आजादी का गला घोटा जा रहा है, जिस तरह आवारा कुत्ते भौक-भौक कर अपने मालिक से ज्यादा सुख की मांग करते, उसी तरह देशद्रोही भी । अब ज्यादा समय नहीं रह गया है, जब किसी साईकिल, मोटरसाईकिल सवार को दर्घटना ग्रस्त करता आवारा कुत्ता और अपने दुषित विचार से समाज को लकवाग्रस्त करता देशद्रोही अंत में खुद कुत्ते की भाँति बीच सड़क पर कुत्ते की मौत मरेंगे, जबकि दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति ईलाज करवाकर और लकवाग्रस्त व्यक्ति लकवा ठीक करवाकर खुद को ज्यादा सशक्त बनेगा ।


धन्यवाद.









बुधवार, 12 अप्रैल 2017

635....फैसले के ऊपर चढ़ गई अधिसूचना, एक पैग जरा और खींच ना

सादर अभिवादन स्वीकार करें,
वैशाख मास चालू हो गया है.....
कमाल है..खाते क्या हैं ये बैशाख नन्दन
दिन-पर-दिन मोटे होते जा रहे हैं ..
ये तो राम जी ही जाने....
देखिए आज  की पढ़ी रचनाओं की एक झलक...

साहित्‍य ढूढतें पन्‍नों में
जबकि साहित्‍य नेटमय हुआ
साहित्‍यकारों की कलम छूट गयी
कलम विहीन साहित्‍यकार हुआ
कवियत्री के मुख में अब कलम नहीं
कलम और पन्‍ना नेट हुआ

गुज़र रही है ज़िंदगी 
कुछ इस तरह कि 
जैसे इसे किसी की 
कोई चाहत ही नहीं 
कभी दिल है तो 
कभी दिमाग है ज़िंदगी 

ओ मेरे परदेसी बेटे
बतलाओ कब घर आओगे
दिन- रात नहीं कटते तुम
कब तक यूँ ही तरसाओगे
जब से तुम परदेस गए हो 
घर लगता है वीराना 

केवल संस्कार दो...कुलदीप सिंह ठाकुर
अपनी खुशियाँ ही मांग रही है...
वो माएं सब से
यही कह रही है
बच्चों  के लिये
न मांगो लंबी आयु की दुआ
न धन दौलत
...केवल संस्कार दो...




ज़िन्दगी में ये कैसा मोड़ आया,
जो सबसे प्यारा था उसे छोड़ आया.

वो प्यारा था, ये तब मैंने जाना,
जब उसे उस मोड़ पर छोड़ आया.

सुनाये सिर्फ मोहब्बत के गीत दुनिया को
हम अपने सीने में ऐसा सितार रखते हैं !

तुम्हारा प्यार न ले जाए कहीं जान मेरी
तुम्हीं से मिलने का बस इंतज़ार रखते हैं !



भीगी आँखों से सुधा सोच रही थी 
लड़की बधाई की जननी हो सकती है 
पर उसका अपना जन्म? 



जीभ से अपने ही 
होंठों को खुद ही 
तर करता 

शराफत की मेज 
में खुली विदेशी 
सोचता ‘उलूक’ 

चार स्तम्भों को 
एक दूसरे को 
नोचता हुआ 
आजकल सपने 
में देखता ‘उलूक’ 

फिर मिलेंगे यहीं इसी दिन
सादर






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