पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

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बुधवार, 24 मई 2017

677....संभल जा रे नारी ....फिसलना छोड़ नारी ....


जय मां हाटेशवरी....

अब तक गुजारी जिंदगी, तुम्हारे साथ हंस कर,
बस अब यादे ही रह गयी, जीने का सहारा बनकर....
आप सभी का स्वागत है....
पेश है आज के लिये...कुछ चुनी हुई कड़ियां....

वजह ... बे-वजह जिंदगी की ... -
जिंदगी के अंधेरे कूँवे में फिसलते लोगों के सिवा     
नज़र नहीं आ रही पर ज़मीन मिलेगी पैरों को
अगर इस कशमकश में बचे रहे
फिसलन के इस लंबे सफर में
जानी पहचानी बदहवास शक्लें देख कर
मुस्कुराने को जी चाहता है

माँ को भी जीने का अधिकार दे दो
अन्तिम बात, अब जब हम सारे काम खुद कर सकते हैं तो क्या लड़का और क्या लड़की दोनों को ही पेट भरने के और जीने के सारे ही काम सिखाइये। माँ को अनावश्यक महान मत बनाइये, वह भी जीवित प्राणी है, उसे भी कुछ चाहिये। माँ पर लिखने से पहले यह सोचिये कि क्या किसी माँ ने भी अपने बेटे पर लिखा कि उसने माँ का जीवन धन्य कर दिया हो। जब संतान बड़ी हो जाती है तब माँ का कर्तव्य पूरा हो जाता है, इसलिये परस्पर सम्मान और प्रेम देने की सोचिये ना कि खुद की नाकामी छिपाकर माँ को काम में जोतिए।

दोहे
अधिक मिले पहले मिले, किस्मत वक्त नकार।
इसी लालसा में गये, रविकर के दिन चार।।

हमको सत्ता-धर्म निभाना अच्छा लगता है
आज अदीबों को गरियाना अच्छा लगता है,
कहने को हम कवि की दम हैं बाल्मीकि के वंशज पर
कवि-कुल को गद्दार बताना अच्छा लगता है |

कर्नाटक की काशी – महाकूटा शिव देवालय
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मंदिर परिसर में एक कुआं भी है जिसे लोग पापविनाशन तीर्थ कहते हैं। विष्णु पुष्करिणी के पास ही एक अनूठा शिवलिंगम है जिसमें पांच अलग आकृतियां बनी हुई हैं।
इसे पंचलिंगम कहते हैं।

फिसलना छोड़ नारी ....
मेरी सहपाठी के अनुसार शादी को २० वर्ष हो गए और उसका पति अब उसका व बच्चों का कुछ नहीं करता और साथ ही यह भी कहता है कि यदि मेरे खिलाफ कुछ करोगी तो कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि अगर तुमने मुझे जेल भी भिजवाने की कोशिश की तो देख लेना मैं अगले दिन ही घर आ जाऊंगा .ऐसे में एक अधिवक्ता होने के नाते जो उपाय उसके पति का दिमाग ठीक करने के लिए मैं बता सकती थी मैंने बताये पर देखो इस भारतीय नारी का अपने पति के लिए और वो भी ऐसे पति के लिए जो पति होने का कोई फ़र्ज़ निभाने को तैयार नहीं, उसने वह उपाय मानने से इंकार कर दिया क्योंकि उसे केवल पति से भरण-पोषण चाहिए था और उसके लिए वह कोर्ट के धक्के खाने को भी तैयार नहीं थी

''अभी तक सो रहे हैं जो ,उन्हें आवाज़ तो दे दूँ ,
बिलखते बादलों को मैं कड़कती गाज तो दे दूँ .
जनम भर जो गए जोते, जनम भर जो गए पीसे
उन्हें मैं तख़्त तो दे दूँ ,उन्हें मैं ताज़ तो दे दूँ ''

धन्यवाद।














मंगलवार, 23 मई 2017

676.....खाली पन्ने और मीनोपोज

सादर अभिवादन..
नए नियमों के तहत 
आज-कल काफी उथल-पुथल है
31 जुलाई तक विवरणियाँ दाखिल हो जानी चाहिए..
इसी चक्कर में श्रीमान जी काफी से अधिक व्यस्त हैं
कुछ फाइलें मेरे पास भिजवा दी है उन्होंनें..
ऑडिट करना है..ऑफिस से दो स्टाफ घर आए हैं..
चलिए छोड़िए इस पचड़े को...देखिए आज की पसंद...

वो पेड़ो पर चढ़ना, गिलहरी पकड़ना,
अमिया की डाली पर झूले लगाना,
वो पेंगें मारके  बेफिकरी से झूलना,
वो मामा और मासी का मनुहार करना,
मेरे रूठ जाने पर मुझको मनाना,
पाने फिर इनको कहाँ जाइये?
मुझे मेरा बचपन पुनः चाहिए!


आइना संगसार करना था.......नीरज गोस्वामी
दिल हमें बेकरार करना था 
आपका इंतिज़ार करना था 

जिस्म को बेचना गुनाह नहीं 
रूह का इफ़्तिख़ार करना था 



बढ रही दरिन्दगी समाज में,
नारी ! तेरे फर्ज और बढ गये .......
माँ ! है तू सृजन है तेरे हाथ में,
"अब तेरे कर्तव्य औऱ बढ गये".......

न जाने क्यूँ
हम खुद की ख्यालात लिए फिरते हैं कि
हर इन्सान में अख्यात खुदा बसता है
तो वो जो इन्सान है, इन्सान में कहाँ रहता है?


विश्वास....शुभा मेहता
अटकूं कहीं तो 
इशारा करता है तू ही 
भटकूं कहीं तो 
साथ देता है तू ही 
आकांक्षाएं , एक के बाद एक
बढ़ती चली जाती 




गर मेरे एहसास कुछ नहीं
तो फिर मेरे पास कुछ नहीं

आँखों में ये आँसू तो हैं
हाँ कहने को खास कुछ नहीं

शीर्षक तो भूल रही हूँ....

बात पते की...डॉ. सुशील जोशी

सफेद पन्ने 
खाली छोड़ना 
भी मीनोपोज 
की निशानी होता है 

तेरा इसे समझना 
सबसे ज्यादा 
जरूरी है
बहुत जरूरी है ।

आज्ञा दें यशोदा को...
सादर




सोमवार, 22 मई 2017

675...‘पिता जी को तो बस परिवार के हालात दिखाई देते थे...


जय मां हाटेशवरी...

आज 22 दिन हो गये....
पिता जी के बिना इस संसार में....
"न रात दिखाई देती थी,
न दिन दिखाई देते थे,
‘पिता जी  को तो बस परिवार के
हालात दिखाई देते थे..."



खाली पन्ने और मीनोपोज
सफेद पन्ने
खाली छोड़ना
भी मीनोपोज
की निशानी होता है
तेरा इसे समझना
सबसे ज्यादा
जरूरी है
बहुत जरूरी है ।

कहानी- ...लेकिन भाभी का क्या? -
शिल्पा को लगा कि उसकी नणंद अपनी माँ को समझाएगी कि ''माँ, आप ऐसा क्यों सोचती है? हरदम तो बनाती है ना भाभी आप दोनों की पसंद का खाना! अभी आपकी तबियत, आने-जाने वाले और भाभी का खुद का पैर...इसलिए शायद बना नहीं पाई होगी।'' लेकिन नणंद ने सास की हां में हां मिलाया। सास को समझाने के बजाय आग में घी डालने का काम किया।
शिल्पा अवाक रह गई! आज उसकी शादी को बीस साल हो रहे है। उसने हमेशा माँ-बाबूजी की पसंद-नापसंद का पूरा-पूरा ख्याल रखा है। सिर्फ़ माँ-बाबूजी ही क्यों उसने तो हमेशा ही कोशिश की है कि परिवार के हर सदस्य का जहां तक संभव हो सके पूरा ख्याल रखे। यहां तक कि इस चक्कर में कभी-कभी उसके अपने बच्चों के तरफ़ अनदेखी हो जाती।

आतंकवादी
धर्म जो भी मिला उन्हें एक क़िताब की तरह मिला-
क़िताब एक कमरे की तरह,
जिसमें टहलते रहे वे आस्था और ऊब के बीच
कमरा-- खिड़कियाँ जिसमें थीं ही नहीं
कि कोई रोशनी आ सके या हवा
कहीं बाहर से
बस, एक दरवाज़ा था,
वह भी जो कुछ हथियारख़ानों की तरफ़ खुलता था

 हृदय विदारक मौत
चीजों से सामान तक
सामान से कबाड़ तक का जीवन
फिर
मौत से पहले ही शव परीक्षण
और
हृदय विदारक मौत
एक रिश्ते की
जिसकी आत्मा
मुक्ति की चाह में
अब भी भटक रही है कहीं,... प्रीति सुराना

‘महाबली’ प्रधानमंत्री के तीन साल -
केंद्र की एनडीए सरकार के काम-काज को कम के कम तीन नजरियों से देख सकते हैं। प्रशासनिक नज़रिए से,  जनता की निगाहों से और नेता के रूप में नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत पहचान के लिहाज से। प्रशासनिक मामलों में यह सरकार यूपीए-1 और 2 के मुकाबले ज्यादा चुस्त और दुरुस्त है। वजह इस सरकार की कार्यकुशलता के मुकाबले पिछले निजाम की लाचारी ज्यादा है। मनमोहन सिंह की बेचारगी की वजह से उनके आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने अमेरिका में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि देश पॉलिसी पैरेलिसिस से गुजर रहा है। अब आर्थिक सुधार 2014 के बाद ही हो पाएंगे।

भाग्यशाली
शायद इसीलिये उनके मन में
अजस्त्र प्रेम की एक निर्मल धारा
सदैव प्रवाहित होती रहती है !
आज इसी बात का अफ़सोस है कि
हम देख सुन क्यों पाते हैं !
जो देख सुन न पाते तो
शायद हम भी उतने ही सुखी होते !
धन्यवाद।







रविवार, 21 मई 2017

674....पाठकों की पसंद.....आज के पाठक हैं श्री ध्रुव सिंह जी

सादर अभिवादन..
पाठकों की पसंद का चौथा अंक....
आज श्री ध्रुव सिंह जी की पसंद की रचनाएँ....

इतिहास के नाज़ुक मोड़ पर 
खड़े  होकर हम 
भूमंडलीकरण को कोस  रहे  हैं, 
देख  भूखे पेट सोतों को 
अपना मन मसोस  रहे  हैं।

रूठे हैं जो क़िस्मत के तारों के बहाने से
वो मान भी जाएँगे थोड़ा सा मनाने से

तन्हाई से घबरा के निकले थे सुकूँ पाने
गम ले के चले आए ख़ुशियों के घराने से

रातरानी की महक से
फिर हवा बौरा गई,
इक गजल महकी हुई सी
लिख गई फिर रात... 

काँटों के संग उगी हुई
तीक्ष्ण धूप में पगी हुई
कलिका हूँ मैं तेरी माँ !
रचना हूँ मैं तेरी माँ ! 

भुलाये भूलते कब हैं वो यादें वो मुलाकातें,
भरे परिवार में अक्सर अकेलापन ही खलता है ।

कभी तारों से बातें कर कभी चंदा को देखें वो,
कभी गुमसुम अंधेरे में खुद ही खुद को समेटें वो ।

:: पाठक परिचय ::
श्री ध्रुव सिंह जी दूसरी बार आए हैं
"सरल संदेशों में लिपटा हूँ, 
मैं अनजाना राही ,
चंद शब्द में, 
बात मैं कहता ,

कालजयी कलम का सिपाही "
.....
सादर







शनिवार, 20 मई 2017

673... जागरण





चित्र में ये शामिल हो सकता है: 16 लोग, लोग खड़े हैं, विवाह और बाहर



सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष


दैनिक जागरण के संगनी क्लब की तरफ से
हमलोग महिलाओं को मतदान के लिए जागरूक कर रहे हैं
हक़ से लेकर दायित्व की परिभाषा समझाना
बातों का क्या


नारी हर युद्ध में तुने हाथ बटाया
धर्म युद्ध हो या गृह युद्ध
स्वतंत्रा संग्राम हो या राजपाठ कि हो बात
अच्छे-अच्छो को तुने दिया मात
कहो तो गिना दु मै सैकड़ो नाम
फिर क्यू हो तुम बेकाम


माँ जीवन के इस कठोर संघर्ष में
सिर्फ उसकी परवरिश ही काम आयी थी
आज भी याद है मुझे वो 20 साल पुरानी बातें
जो उसने मेरे ज़हन में बसाई थी



बिटिया स्वयं सहेगी दुःख ताकि अपनों पर आंच ना आन पड़े
बावजूद इसके, उसी के अपने उसके विरुद्ध खड़े!
क्या मिलेगी उसे मुक्ति अपनी इस व्यथा से?
कितनी परिपक्वता से कह जाति सबकुछ अपनी कथा से।


चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोग


बहना तेरे बिना न पता ये मेरा खुशनुमा बचपन,
खट्टा मीठा ये अल्हड रंगीन सा अपनापन,
तूने ही तो चलना सिखलाया था मुझे,
गिर के उठाना कैसे है समझाया था तूने ही



स्त्री घर की हँसी, घर की खुशी
घर की रोशनी, घर की चाँदनी
घर की आभा, घर की प्रभा
घर की सफाई, घर की पुताई
वास्तव मे जो सारा घर समेटी है
वो माँ है , बहू है , बेटी है

स्त्री शक्ति को प्रणाम !

–विवेक जैन



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फिर मिलेंगे

विभा रानी श्रीवास्तव




शुक्रवार, 19 मई 2017

672...और ये हो गयी पाँच सौंवी बकवास

सादर अभिवादन
पढ़ने की आदत अच्छी ही होती है
कुछ तलाशने की कोशिश करो तो...
कुछ अच्छा पढ़ने को भी मिल जाता है
ऐसे ही एक नया ब्लॉग मिला विभा बहन का..
पढ़िए आप भी उनकी एक रचना उनके ही ब्लॉग में

हाँ 
तुम मेरी आदत में शुमार 
तुम्हीं सुबह और तुम्हीं शाम हो 
फिर 
तुमसे हिचकिचाहट कैसी
और कुछ भी बोलने में शर्म कैसी

लाखों दर्द अपने दिल में छिपाये हुए
अपने चेहरे पे खुशियां सजाये हुए
खो गया मैं रिवाजों की इस भीड़ में
और खुद से ही खुद को छिपाने लगा

मेरे अश्क कहते हैं मेरी कहानी
के संगदिल सनम को निभाना न आया
खिलौना समझके मेरे दिल से खेला
भरा जी जो उसका मुझे छोड़ आया


मेरी पहचान बाकी है...... श्वेता सिन्हा  
पिघलता दिल नहीं अब तो पत्थर हो गया सीना
इंसानियत मर रही है  नाम का  इंसान बाकी है

कही पर ख्वाब बिकते है कही ज़ज़्बात के सौदे
तो बोलो क्या पसंद तुमको बहुत सामान बाकी है

एक लड़की है अनजानी सी....रेवा टिबड़ेवाल
एक लड़की है 
अनजानी सी , 
थोड़ी पगली 
थोड़ी दीवानी सी , 
जीवन उसकी है 
एक कहानी सी , 




हिंदी की संवैधानिक स्थिति....बृजेन्द्र कुमार अग्निहोत्री
"हिंदी थोपी जा रही है….."
या 
"हिंदी लादी जा रही है…"
अथवा 
"हिंदी औपनिवेशिक भाषा है…"
यहाँ विचारणीय यह है कि प्रजातंत्र में थोपने-लादने कि स्थिति क्या हो सकती है…? हमें स्वयं इस तथ्य की तह तक पहुँचकर यह विचार करना चाहिए कि जो भाषा संपूर्ण भारत में एकता स्थापित करने के लिए "राजभाषा" घोषित की गयी है। जो भाषा देश की भावात्मक एकता को मज़बूती से बाँधे हुए है; उसके लिए "लादने" और "थोपने" जैसे शब्दों का प्रयोग कितना उचित है?



हजार का आधा .... डॉ. सुशील जोशी
बहुत से 
लोग 
कुछ भी 
नहीं कहते 
ना ही उनका 
लिखा हुआ 
कहीं नजर 
में आता है 
और.. 
एक तू है 
जब भी 
भीड़ के 
सामने 
जाता है... 
बहुत कुछ 
लिखा हुआ 
तेरे चेहरे 
माथे और 
आँखों में 
साफ नजर 
आ जाता है 

इज़ाज़त दें यशोदा को
फिर मिलते हैं 









गुरुवार, 18 मई 2017

671....पाठकों की पसंद....आज के पाठक हैं श्री रवीन्द्र सिंह जी यादव

सादर अभिवादन
अज़हद ख़ुशी हो रही है..
आज पाठकों की पसंद का तीसरा अंक
अब वो दिन दूर नहीं..
जब हमारे सम्माननीय पाठकगण
स्वयं यहां आकर लिंक संयोजित करेंगे...

खलबली मची है
गिरोहों गिरोहों
बात कहीं भी
नहीं हो रही है
किसी के भी
सरदार की

जागना होता है पूरी रात
सपनों के टूटने के डर से नहीं
इस डर से ...
की छीन न लिए जाएँ सपने आँखों

जिद्दी बच्चे सी मचल हवा,
पैरों से धूल उड़ाती है,
तरुओं के तृषित शरीरों से,
लिपटी बेलें अकुलाती हैं,
जब वारिद की विरहाग्नि में,
धरती का तन मन जलता है...
तब गुलमोहर खिलता है !!!

बेटी   ख़ुद   को  कोसती   है,
विद्रोह   का  सोचती    है ,
पुरुष-सत्ता  से  संचालित  संवेदनाविहीन  समाज  की ,
विसंगतियों  के   मकड़जाल  से   हारकर ,
अब  न लिखेगी   बेटी -
"अगले  जनम  मोहे   बिटिया  न  कीजो  ,
मोहे    किसी    कुपात्र     को   न  दीजो  "।

सीमेंट-सरिया   के   जंगल   से   दूर
उस  बस्ती  में   बरसना   चाहता  हूँ    मैं
जहाँ.......
जल  की  आस  में
दीनू   का  खेत  सूखा  है
रोटी   के   इंतज़ार   में
नन्हीं   मुनिया    का  पेट   भूखा   है।

:: पाठक परिचय ::
अपनी-परायी व्यथा हो या सुखद अहसास इन्हें शब्द-चयन की प्रतीक्षा,भाव और विचार व्यापक दृष्टिकोण में ढालते हैं. अनुभूति का आंतरिक स्पर्श लोकदृष्टि का सर्जक है जो मानव मन को प्रभावित करता है और हमें संवेदना के शिखर की ओर ले जाता है. 
ज़माने की रफ़्तार के साथ ताल-सुर मिलाने का एक प्रयास 
अपनी यात्रा आरंभ करता है
रवीन्द्र सिंह यादव 
संपर्क: rsyadav.dilauli@gmail.com
............
अगले पाठक की प्रतीक्षा में
पाँच लिंकों का आनन्द परिवार








बुधवार, 17 मई 2017

670..........तारा टूटे कहीं तो, भगवान करे उसे बस माँ देखे

सादर अभिवादन
कभी जिन्दगी का 
ये हुनर भी 
आजमाना चाहिए,
जब अपनों से 
जंग हो, तो 
हार जाना चाहिए
आज का पसंदीदा रचनाएँ.....

ज्‍यादा चर्चा रही सुप्रीम कोर्ट के आदेश की, कि‍ राष्‍ट्रीय राजमार्ग और स्‍टेट हाईवे से 500 मीटर दूर तक नहीं होगी शराब की दुकान। 
जाहि‍र है इस आदेश से देश में हडकंप है। कुछ लोग वि‍रोध में हैं 
तो कुछ समर्थन में। अनुमान है कि‍ इससे करीब 50 हजार करोड़ का नुकसान होगा राज्‍यों को। होटल इंडस्‍ट्री को दस-पंद्रह हजार 
करोड़ का झटका लगेगा तो उधर करीब दस लाख लोगों की नौकरी खतरे में पड़ सकती है।

सुब्ह-सुब्ह को उसका ख़्वाब इस क़दर आया
केतली से उट्ठी हो ख़ुश्बू चाय की जैसे

राख़ है, धुआँ है, इक स्वाद है कसैला सा
इश्क़ ये तेरा है सिगरेट अधफुकी जैसे


गुज़र गया है वक्त,.....कालीपद "प्रसाद"
मीना–ए-मय में’ मस्त सहारा शराब है 
गुज़र गया है’ वक्त, नहीं अब शबाब है | 

संसार में नहीं मिला दामन किसी का’ साफ 
प्रत्येक चेहरा ढका, काला नकाब है | 


मुद्दा तीन तलाक का,.....डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
मुसलमान सारे नहीं, करते कहाँ विरोध।
मगर डालते हैं यहाँ, कठमुल्ला अवरोध।।

सबके लिए बने यहाँ, अब समान कानून।
मज़हब के दो पाट में, पिसे नहीं खातून।।

समाज ..... संगतकार
मुझे यह निर्मम समाज नहीं चाहिए
मुझे ले चलो जहाँ निर्जन हो
मै अम्बर के साथ रो लूँगा
धरती पर निखहरा सो लूँगा
पर इस क्रूर और शुष्क समाज में नहीं !




क्या बात है...डॉ. सुशील जोशी
आज भी माँ 
जब भी कोई 
तारा टूटता है
मुझे कोई इच्छा 
नहीं याद आती है 

उस समय 
बस और बस 
मुझे तुम्हारी बहुत 
याद आती है ।

आज्ञा दें यशोदा को..









मंगलवार, 16 मई 2017

669....ओ मेरे आकाश पिता... टूट गए हम.

जय मां हाटेशवरी...

30 अप्रैल 2017 को मेरे पूजनीय पिता जी श्री ईश्वर  सिंह ठाकुर निजी कार से शिमला जा रहे थे। मां हाटेशवरी के पावन स्थल हाटकोटी से 2 किलो मीटर की दूरी पर प्रातः पांच बजे कार अनयंत्रित हो कर 100 फुट नीचे गिर गयी। जिस में मेरे पिता जी को काफी चोटें आयी। उसके बाद तुरंत उन्हे EGMC शिमला ले जाया गया। जहां 3 बजकर 10 मिनट पर वे हमे हमेशा के लिये छोड़कर स्वर्ग सिधार गये।
उन्हे भूल पाना तो मेरे लिये बिलकुल असंभव है।
"मुझे ईश्वर   ने  बिना दृष्टि के ही....
 असीम अंधकार के साथ धरती पर भेजा था...
मेरे जन्म पर सब कहते थे....
ये बेचारा क्या करेगा....
पर मेरे लिये धरती पर.....
पहले ही ईश्वर  आ चुके थे....
मेरे पिता के रूप में....
जिन्होंने ईश्वर  की चनौती को स्वीकारा....
सब से पहले  मुझे अंधकार में चलना सिखाया...
कभी ऐहसास न होने दिया कि मैं दृष्टिहीन हूं....
सामान्य बच्चों की तरह व्यवहार किया....
मुझे उच्च कोटी की शिक्षा दी...
जिससे मैं रोजगार पा सका....
वे अक्सर कहते थे....
संपूर्ण इस संसार में कोई नहीं है....
न कोई  इतना अपूर्ण जो कुछ न कर सके....
वे कर्म को प्रधान मानते थे...
कहते थे...जो भी कार्य  करो....
उसे दिल लगा कर करो....
सफलता अवश्य मिलेगी....
वे विश्वास को हर सफलता की पूंजी मानते थे....
उन्होंने जीवन भर कठिन प्रिश्रम किया....
उन्होंने हमे वो सब कुछ दिया...
जो विरले ही पिता अपने बच्चों को दे सकते हैं...."
मायावी सरोवर की तरह
अदृश्‍य हो गए पिता
रह गए हम
पानी की खोज में भटकते पक्षी
ओ मेरे आकाश पिता
टूट गए हम
तुम्‍हारी नीलिमा में टँके
झिलमिल तारे

ओ मेरे जंगल पिता
सूख गए हम
तुम्‍हारी हरियाली में बहते
कलकल झरने

ओ मेरे काल पिता
बीत गए तुम
रह गए हम
तुम्‍हारे कैलेण्‍डर की
उदास तारीखें

हम झेलेंगे दुःख
पोंछेंगे आँसू
और तुम्‍हारे रास्‍ते पर चलकर
बनेंगे सरोवर, आकाश, जंगल और काल
ताकि हरी हो घर की एक-एक डाल।-----एकांत श्रीवास्तव

"हे ईश्वर...मेरे पूजनीय पिता जी को... परम गति प्रदान करके अपने चरणों में स्थान देना...."

आज चर्चा करने का मन तो नहीं है....
बहुत दिन हो गये चर्चा न किये हुए....
आप कहते थे न....
"पूजा करना भले ही भूल जाओ....कर्तव्य को कभी न भूलना...."

सारा मकां सोया पड़ा है.....आबिद आलमी
अजनबी बन कर वो मिलता है उन्हीं से
जिन को वो अच्छी तरह पहचानता है
चीखती थी ईंट एक इक जिसकी कल तक
आज वो सारा मकां सोया पड़ा है

बेटी-माँ.
पढ़ लेती सबके मन .
माँ, तुम्हारा मन कहाँ रहा था लेकिन ?
जानने लगी हूँ तुम्हें, सचमुच ,
बेटी जब माँ बनती है,
समझ जाती है.
एक आँख से सोती है माँ,
पहरेदार,हमेशा तत्पर.
कुछ नहीं से कितना कुछ बनाती
सारे रिश्ते ओढ़े चकरी सी नाचती ,
निश्चिन्त कहाँ थी माँ .
जब बेटी माँ बनती है
समझ जाती है -
कैसी होती है माँ .

नार मनोहर
अब कौन मिले तुझसा रि जवाबी।~~~~~~~~

जन्म दिया हमें जगत में लाया माँ ने
मत करना कभी भी  अपमान उसका तुम
गोद  में  अपनी    हमको   खिलाया माँ ने

अनशन वार - सामयिक दोहे
संग थे जब तक कर रहे थे बढ़ चढ़ गुणगान
उठा रहे हैं आज वे प्याले में तूफान
धन्यवाद।














सोमवार, 15 मई 2017

668....क़दमों को मां के इश्क़ ने सर पे उठा लिया

सादर अभिवादन
कल मातृ-दिवस मनाया गया धूम-धाम से
आज प्रस्तुत है कल माँ पर लिखी रचनाएँ..

बेटी तो जननी सृष्टि की, 
बेटी पर टिका है जगतसार । 
बेटी तो माँ बहन बनी है, 
क्यों न समझे इनके अधिकार ।। 

वो खूबसूरत से दो हाथ, वो कोमल से दो पाँव,
वो ऊँगलियों पर बसा मेंहदी का इक छोटा सा गाँव,
है वो इक धूप की सुनहरी सी झिलमिल झलक,
या है वो लताओं से लिपटी, बरगद की घनेरी सी छाँव...

माँ…माँ संवेदना है, भावना है अहसास है
माँ…माँ-माँ संवेदना है, भावना है अहसास है
माँ…माँ जीवन के फूलों में खुशबू का वास है,
माँ…माँ रोते हुए बच्चे का खुशनुमा पलना है,
माँ…माँ मरूथल में नदी या मीठा सा झरना है,

जब मैं  तेरी कोख में आई
तूने स्पर्श से बताया था
ममता का कोई मोल नहीं
तूने ही सिखलाया था ।
माँ तुझे प्रणाम ।

जब-जब मुझको हिंचकी आती
तब याद माँ तेरी थपकी आती
जब तपती धूप सिर पर छाई
तेरे आँचल की ठंडक याद आई
ठोकर से कदम लड़खड़ाने लगे
तेरी बाँहों के घेरे याद आने लगे

बहुत ख़ुशनसीब होते हैं वो लोग, जिनकी मां उनके पास होती है...बहुत ख़ुशनसीब होते हैं वो लोग, जिनके साथ उनकी मां की दुआएं होती हैं...बहुत ख़ुशनसीब होते हैं वो लोग, जो दूसरों की मां की भी इज़्ज़त करते हैं, और उनसे दुआएं पाते हैं...
क़दमों को मां के इश्क़ ने सर पे उठा लिया
साअत सईद दोश पे फ़िरदौस आ गई...

बरतन-बासन मलती माँ
चूल्‍हा-चौका- करती माँ
सांझ ढले फूंक-फूंक कर 
लकड़ी के चूल्‍हे सुलगाती माँ

कुछ दिल में अरमान हैं ।
मैं भी कुछ करूँ ...।
यूँ ही न मरुँ ...।
दुनियां अपनी करूँ ।।
चंद सांसें मुझे भी ,
जी लेने दे ...मेरी माँ !

आज्ञा दें दिग्विजय को..
सादर












रविवार, 14 मई 2017

667...कुत्ते की पूँछ..क्या कभी सीधी हुई है..

सादर अभिवादन
आज मातृ-दिवस है
धूम-धाम से मनाया जा रहा है
हर वर्ष की तरह..
चन्द पंक्तियाँ....
एक माँ ही है जिसके प्यार में ना मिलावट काेई। 
दुनिया देखी लाेग देखे।
राक्षस देखे फ़रिश्ते देखे।

रिश्ते देखे दोस्त देखे।
हर कहीं पर मिलावट ही दिखी।

अलग अलग रंगो के फूल देखे।
एक माँ ही है जो देती है सब सुख -
उसके प्यार में ना मिलावट।

ना कभी चेहरे पे शिकन देखी।
बाकि तो सबके साथ अच्छा करने -
पर भी हर बार शिकायत देखी।
-विमल गांधी

पाठकों की पसंद...
इस बार किसी पाठक ने अपना रुचि नहीं दिखाई
सो इस बार मेरी ही पसंद की रचनाओं का आनन्द लीजिए

बोल, किस बात का डर है तुझे,
जो तेरे पास है, उसे खोने का
या उसे, जो तेरा हो सकता है?

अनज़ान रास्तों पे निकलना न परिन्दों 
मंजिल को हँसी-खेल समझना न परिन्दों 

आगे कदम बढ़ाना ज़रा देख-भाल कर 
काँटों से तुम कभी भी उलझना न परिन्दों 

खुद ब खुद 
होने लगती हैं अचानक 
कई क्रियाएँ। 
पता नहीं क्यों 
पर खुद ही बाँध लिए जाते हैं 
बंधन पाँव में। 

मन के 
आँगन की 
दीवारों पर... 
न जाने कहाँ कहाँ 
कौन कौन सी दरार ढूंढ कर 
उग आती हैं यादें 
और धीरे धीरे 
पीपल सी जड़ें जमा लेती हैं 

कुत्ते सारे 
मोहल्ले के 

आज सुबह
देखा हमने 
जा रहे थे 

सब अपनी 
अपनी पूँछ 
सीधी करके

पूछने पर 
पता चला 
नाराज हैं

हड़ताल 
पर जा 
रहे हैं
.......

सब पाठक इस सोच में हैं कि हिस्सा कैसे लें...
साधी सी बात..अपने द्वारा फॉलो किए ब्लॉग से पाँच लिंक चुनिए
और भेज दीजिए सम्पर्क फार्म के माध्यम से..
हर रविवार व गुरुवार को प्रकाशित हो जाएगी...
साथ ही साथ आप अपना संक्षिप्त परिचय भी दें
समय का ध्यान रखिएगा... कम से कम दो दिन पहले ही
प्रेषित कर दें...
आज्ञा दें यशोदा को
सादर

मातृ-दिवस की शुभकामनाएँ
एक 
माँ ऐसी भी...
हर माँ को अपना बच्चा प्यारा होता है
देखिए 2 मिनट चालीस सेकण्ड




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