पाँच लिंकों का आनन्द

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शुक्रवार, 17 मार्च 2017

609...फूलों में खुशबू कहाँ से आती है?


जय मां हाटेशवरी...

रामायण का एक छोटा सा प्रसंग है जब भगवान श्रीराम को वनवास हो गया, वे लक्ष्मण और सीता के साथ चित्रकूट में रहने लगे। उधर अयोध्या में राजा दशरथ की मौत हो गई, भरत उनके अंतिम संस्कार और क्रियाकर्म के बाद श्रीराम को अयोध्या वापस लाने के लिए चित्रकूट पहुंचते हैं। भरत जब श्रीराम के आश्रम में पहुंचते हैं तो देखते हैं कि वहां कई संत जुटे हैं। तीन बातों पर चर्चा चल रही है ज्ञान, गुण और धर्म। संतों के साथ बैठकर श्रीराम इन्हीं विषयों पर गहन चर्चा कर रहे थे। लक्ष्मण और सीता भी गंभीरता से सुन रहे हैं।
थोड़ी देर तो भरत भी देखते ही रह गए। जिस श्रीराम को अपने नगर से निकालकर वन में भेज दिया गया हो। जिसके राजतिलक की घोषणा करने के बाद उसे सन्यासी बना दिया गया हो, वो कितने शांत मन से संतों के साथ बैठे हैं। फिर भरत आश्रम में पहुंचे और फिर श्रीराम-भरत के मिलन की घटना घटी।
श्रीराम-भरत के मिलन का दृश्य देखने, पढ़ने या सुनने में साधारण लगता है, लेकिन इसके पीछे एक बहुत ही गंभीर और उपयोगी संदेश छिपा है। हम परिवार के साथ बैठते हैं तो बातों का विषय क्या होता है। इस दृश्य में देखिए, एक परिवार के सदस्यों में क्या और कैसी बातें होनी चाहिए। अक्सर परिवारों में ऐसा नहीं होता, घर के सदस्य साथ बैठते हैं तो या तो झगड़े शुरू हो जाते हैं, पैसों पर विवाद होता है या फिर किसी तीसरे की बुराई की जाती है। इससे परिवार में अंशाति और असंतुलन आता है। हम जब भी परिवार के साथ बैठें तो चर्चा के विषय ज्ञान, गुण, धर्म और भक्ति होना चाहिए। इससे आपसी प्रेम तो बढ़ेगा ही, विवाद की स्थिति भी नहीं होगी। परिवार में हमारा बैठना सार्थक होगा।
...जो पढ़ा....पेश है आप के लिये उसके कुछ अंश...



फूलों में खुशबू कहाँ से आती है?
करीब दो हजार साल पहले यह माना जाने लगा था कि कोई बड़ा इलाका दुनिया के दक्षिण में है। एक मान्यता यह भी थी कि ऑस्ट्रेलिया का दक्षिणी इलाका दक्षिण अमेरिका से जुड़ा है। पर 1773 में ब्रिटिश अन्वेषक कैप्टेन जेम्स कुक ने अपने दो जहाजों के साथ अंटार्कटिक सर्किल को पार करके उस सम्भावना को खारिज कर दिया। जबर्दस्त ठंड के कारण कैप्टेन कुक को अंटार्कटिक के सागर तट के 121 किलोमीटर दूर से वापस लौटना पड़ा। इसके बाद सन 1820 रूसी नाविकों फेबियन गॉतिलेब वॉन बेलिंगशॉसेन और मिखाइल लजारोव ने अंटार्कटिक को पहली बार देखा। उसके बाद कई नाविकों को इस बर्फानी ज़मीन को देखने का मौका मिला।

हाहाकार वहां है, जहां खबर नहीं है
अब सवाल यही उठता है कि नक्सलियों के रोमांटिसिज्म में या फिर हिंसक विचारधारा के प्रभाव में भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने का जुर्म साबित होने पर उम्रकैद होने से नक्सलियों या उनके बौद्धिक समर्थकों के बीच कड़ा संदेश जाएगा । दरअसल नक्सलियों के जो बौद्धिक समर्थक हैं वो उनके स्लीपर सेल के तौर पर काम करते हैं । रहा होगा किसी जमाने में नक्सलबाड़ी आंदोलन की नैतिक आभा लेकिन पिछले एक दो दशक से तो नक्सली खालिस अपराधी हो गए हैं जो ठेकेदारों से रंगदारी वसूलते हैं, लूटपाट करते हैं, बलात्कार करते हैं, अपने संगठन की महिलाओं पर जमकर यौन अत्याचार करते हैं । यह कौन सी विचारधारा है जो गांधी के इस देश में हिंसा का प्रचार प्रसार करती है । अब इसपर नक्सलियों को बौद्धिक आधार देनेवालों को भी गंभीरता से विचार करना चाहिए कि वो हिंसा के साथ हैं या अहिंसा के साथ ।  

पुराना शौंक
सोहन लाल की यह खुशी सिर्फ शाम तक थी। रात को उसके पिता और ताऊ दुकान से वापस आये। सोहन लाल ने बहुत प्रसन्नता से ट्रॉफी दिखाईं। पिता और ताऊ को जब यह पता चला कि ट्रॉफी संगीत के लिए मिली है तब दोनों बुरी तरह छोटे से सोहन लाल पर बिगड़ पड़े और सारा गुस्सा सोहन लाल की मां और ताई पर उतार दिया।
"तुम औरतों के लाड प्यार में लड़का सर पर बैठ गया है। हम सारा दिन दुकान पर होते है और व्यापार को बढ़ाने में रात दिन एक कर रहे हैं और तुम औरतों ने इसको भांड बना दिया है। हम व्यापारी लोग हैं। हमारे खानदान का नाम है, इज़्ज़त है। बच्चों को पढ़ने भेजते हैं स्कूल में कि कुछ पढ़ लिख कर हमारे व्यापार में चार चांद लगाएगा और तुम इसे भांड बनाने में लगी हो। शादी विवाह में नाच गा कर पेट भरेगा। हमारे व्यापार की इज़्ज़त है मान मर्यादा है। सब सेठ जी कह कर बुलाते है। छाती चौड़ी हो जाती है सुन कर और तुम इसे भांड मिरासी बनाना चाहती हो। मिट्टी में मिला दी सारी मान मर्यादा तुम औरतों ने। गाना सुनने का इतना शौंक है बुलवा लेते हैं भांड को। खबरदार आज के बाद इसने या किसी और बच्चे ने गाने गाए। हमने भांड नही बनाना बच्चों को।"
घर की औरतों की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई। कोई चूं नही कर सका। अगले दिन स्कूल पहुंच कर संगीत मास्टर की क्लास ले ली और सख्त हिदायत दी कि सोहन लाल को संगीत नही सिखाना।

बाप का साया
“क्यों तुम्हारा घरवाला कुछ भी नहीं कमाता क्या ? सारी जिम्मेदारी तुम्हारी ही है ? वह भी तो कारखाने में काम करता है ना ?” मुझे गुस्सा आ रहा था !
“कमाते क्यों नहीं हैं ! खूब अच्छे पैसे मिलते हैं उन्हें ! लेकिन घर खर्च के लिए कभी सौ रुपये भी नहीं दिए ! सारे पैसे दारू और जूए में कहाँ खर्च हो जाते हैं
ये तो वो ही जाने ! उलटे मुझसे ही माँग कर ले जाते हैं ! मना कर दूँ तो रोज़ कलेस हो घर में !”
“अरे तो क्यों उसका पल्लू थामे बैठी हो ! पीछा छुडाओ उससे अपना !” मैं उत्तेजित होकर बोली !
“कैसी बातें कर रही हो दीदी ?” कमला का चेहरा बेरंग हो उठा था ! “वो जैसे भी हैं मेरे सारे तीज त्यौहार चूड़ी, बिंदी, सिन्दूर, बिछुआ सब उन्हीं से तो हैं दीदी ! घर में पैसे नहीं देते तो न सही पर बच्चों के सर पर बाप का साया तो है !”
अब अवाक होने की बारी मेरी थी !

खो चुका है अपने सारे रंग लोकतंत्र
वोटर को उंगलियों  पर नचाने का खेल है लोकतंत्र
झूठ की चाशनी चटाने का नाम है लोकतंत्र
सुनो, सम्भल के इसे छूना, इसकी है बडी तेज़ धार
देश ही नहीं रिश्तों पर भी इसने किया है खूब प्रहार।

जीवन रोशनी - मनोरंजन कुमार तिवारी
तुम अक्सर कहा करती थी ना की,
बोलने से पहले सोचा करो,
सिर्फ यही एक इच्छा पूरी की है मैने, तुम्हारी,
अब जबकि तुम साथ नहीं हो,
आँखों की चमक और रोशनी गुम होने लगी है,
अनजाने डर व आशंकाओं की परछाइयों में उलझ कर,
अब उड़ने को पंख नहीं, पैरों से चलता हूँ,
आज बस इतना ही...
धन्यवाद।















5 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया प्रस्तुति
    नवीनतम जानकारियों सहित
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुप्रभात
    बहुत सुन्दर लिंको का चयन
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर सूत्रों का संकलन ! मेरी लघु कथा 'बाप का साया' को सम्मिलित करने के लिए आपका हृदय से धन्यवाद कुलदीप जी !

    उत्तर देंहटाएं

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