पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

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बुधवार, 31 मई 2017

684....तंबाकू छोड़ना इस दुनिया का सबसे आसान कार्य है। मैं जानता हूँ क्योंकि मैंने ये हजार बार किया है।...

जय मां हाटेशवरी....

घर की बुनियादें, दीवारें, बमोबर-से थे बाबूजी
सबको बांधे रखने वाला, ख़ास हुनर थे बाबूजी
अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है
अम्मा जी की सारी सजधज, सब ज़ेवर थे बाबूजी
कभी बड़ा सा हाथ ख़र्च थे, कभी हथेली की सूजन
मेरे मन का आधा साहस, आधा डर थे बाबूजी
अभिनंदन है....  आप सभी का....
आज माह मई का अंतिम दिन है....
साथ ही आज....विश्व तंबाकू निषेध दिवस भी है....
इस लिये आज की चर्चा का आरंभ इन सत्य  कथनों से....


list of 7 items
• “तंबाकू छोड़ना इस दुनिया का सबसे आसान कार्य है। मैं जानता हूँ क्योंकि मैंने ये हजार बार किया है।”   - मार्क 'ट्वैन
• “तंबाकू मारता है, अगर आप मर गये, आप अपने जीवन का बहुत महत्वपूर्ण भाग खो देंगे।”- ब्रुक शील्ड
• “तंबाकू का वास्तविक चेहरा बीमारी, मौत और डर है- ना कि चमक और कृत्रिमता जो तंबाकू उद्योग के नशीली दवाएँ बेचने वाले लोग हमें दिखाने की कोशिश करते हैं।” -डेविड बिर्न
• “ज्यादा धुम्रपान करना जीवित इंसान को मारता है और मरे सुअर को बचाता है।”- जार्ज डी प्रेंटिस
• “सिगरेट छोड़ने का सबसे अच्छा तरीका है तुरंत इसको रोकना- कोई अगर, और या लेकिन नहीं।”- एडिथ जिट्लर
• “सिगरेट हत्यारा होता है जो डिब्बे में यात्रा करता है।”- अनजान लेखक
• “तंबाकू एक गंदी आदत है जैसे कथन के लिये मैं समर्पित हूँ।”- कैरोलिन हेलब्रुन




पापा
पापा बहुत दर्द होता है
जब मुझे एक दोस्त चाहिए
होता है समझने
और प्यार करने के लिए ,
पर एक बात की खुशी
हमेशा रहेगी कि भगवान ने
आपको दर्द से सदा के लिए
मुक्त कर दिया ,
इसी आस के साथ मैं भी
ज़िंदा हूँ पापा
कि एक दिन हम फिर मिलेंगे
अनंत से आगे इस दुनिया से दूर
जन्नत में।



सपना
     ऐसे ही काफी समय बातें चलती रही और वहां से आगे बढे और अपने खेत में कदम रखा तो काव्या के सामने वह  सब कुछ किसी फिल्म की तरह दिखने लगा | उसे याद आ रहा था जब वह  इन खेतों में काम करती थी | और जब वह  विद्यालय से घर आती तो बाबा उसे अपने साथ खेत में ले जाते थे और वहां अड़ावे (जहां कोई फसल नहीं बोई जाती हो और ख़ास तौर से पशुओं के चरने के लिए छोड़ी गई भूमि ) में भेड़ें हांका करती थी | पर समय कभी एक सामान नहीं रहता क्योंकि परिवर्तन प्रकृति का नियम है |
हितेश साथ में मौन अवस्था में यात्रा कर रहा था | काव्या ने अपने घर के ओटे पर पैर रखा ही था की सामने उसका छोटा भाई आया और अपनी दीदी से गले लगा और फिर घर में गए | अन्दर भुवन और काव्या की अम्मा भी काव्या के पास आए | हितेश ने भुवन को प्रणाम किया |

जब आँखों ही आँखों में, मिलते जवाब
जब आँखों ही आँखों में, मिलते जवाब,
कह दूँ कैसे नहीं होती उनसे मुलाक़ात |
लोग कहते हैं मुझसे...खफा वो जनाब,
उठता फिर भी नहीं मेरे लब पे सवाल |

पीपल , को सनातन संस्कृति में देववृक्ष क्यों माना जाता है
                      जब प्रदूषण नहीं था तब भी प्रदूषण की इतनी चिंता थी और उसका जबरदस्त इंतजाम किया गया था ! उसके बारे में ग्रंथों कथाओं और परम्पराओं के माध्यम से संरक्षित किया गया ! इससे ठीक उलट , आज जब चारों और प्रदूषण ही प्रदूषण पैदा किया जा रहा है इस पर कोई बात नहीं करता ! अब कोई पीपल नहीं लगाता ! इसे लगाने के लिए किसी से कहे तो वो कहेगा की आज के बाजार के युग में इसे लगाने का क्या फायदा, कोई फल भी तो नहीं होता, ना ही इसकी लकड़ी किसी काम की , कोई भला ऐसा कोई काम कैसे कर सकता है जिसमे दो पैसे ना कमाया जा सके ! कितना अज्ञानी है आज का आदमी जिसे पीपल के अनमोल मोल का मूल्य ही नहीं पता ! वो उसकी पूजा क्यों करने लगा ! पीपल के गुणों को वो लोग क्यों पढ़ाना चाहेंगे जो इस देवभूमि को सपेरों का देश और यहां की समृद्ध संस्कृति को जंगली कहते नहीं थकते ! पी से पेप्सी के युग
में पी से पीपल कौन पढ़ायेगा ! और अगर किसी ने अति उत्साह में आकर पढ़ाना चाहा तो उसे साम्प्रदायिक घोषित कर दिया जाएगा ! सेक्युलर देश में वेद ज्ञान पढ़ने से दूसरे धर्म खतरे में पड़ सकते हैं !यह सब बाते कितनी हास्यास्पद लगती है ! जबकि पीपल के पेड़ की ऑक्सीजन का कोई धर्म नहीं, ना ही उसके औषधीय गुण व्यक्ति में भेद कर सकता है ना ही उसकी छांव का कोई मजहब है ! लेकिन इस सांस्कृतिक जीवन दर्शन की महत्ता को ना तो वो लोग समझते हैं जिनका जीवन रेगिस्तान के सूखे में प्यासा भटकता रहा ना ही उनको जो बर्फ की भयंकर ठण्ड में जीवन की तलाश में इधर से उधर भागते रहे ! ये दोनों समूह इस देव् भूमि पर आये ही इसलिए की यहाँ भरपूर जीवन है कोई जमाना था की सड़क किनारे पीपल के पेड़ अक्सर मिल जाते ! इन पेड़ो के पास अमूमन एक कुआ होता और साथ ही छोटा सा मंदिर ! यहां कोई थका हारा राहगीर छांव में दो
पल सुस्ता लेता ! अब सड़क किनारे पेड़ लगाने का चलन नहीं है ! अब तो मॉल और ढाबे का कल्चर है ! इसलिए आज हर शहर प्रदूषित हैं !और जहां वातवरण ही प्रदूषित हो जाए वहा मानव जीवन कितना कष्टमय हो सकता है, किसी भी महानगर को देख ले ! हर शहर ने कैसे कैसे ओड इवन जैसे हास्यास्पद प्रयोग भी देखे मगर कोई हल नहीं निकला !
हमारी सारी समस्या का समाधान हमारी सनातन परम्परा से रचे बसे हमारी संस्कृति में है ! उसी के आधार पर अब एक साम्प्रदायिक सुझाव है ! शहर के चारो तरफ रिंग रोड बना कर सड़क के दोनों तरफ पीपल के पेड़ लगा दो। किसी किले की मजबूत दीवार की तरह ! और शहर वालो को कह दो की इन पेड़ों की पूजा करना ही उनका धर्म है ! और ऐसा करने पर जिसे अपना धर्म खतरे में नजर आये और जो सेक्युलर इस पर आपत्ति करे उसे हिन्दू ऑक्सीजन की जगह हिन्दू विरोधी जहरीली कार्बन डाई ऑक्साइड को निगलने का ऑप्शन दिया जा सकता है ! ऐसा करते ही उनका महान धर्म भी सुरक्षित रहेगा और वे भी दीर्घ आयु को प्राप्त होंगे !

तुम नद्दी पर जा कर देखो चाँद - अफ़सर मेरठी
अब पानी में चुप बैठा है
क्या क्या रूप दिखाए
जब तुम उसे पकड़ने जाओ
पानी में छुप जाए चाँद

तानाशाह का काम किसी भी बहाने से चल सकता है
कायर अपने आप को सावधान कहता है।
कंजूस अपने आप को मितव्ययी बताता है।।
बहानेबाजों के पास कभी बहानों की कमी नहीं रहती है।
गुनाहगार को बहाना बनाने में दिक्कत पेश नहीं आती है।।




अब चलते-चलते....
अरे अब तो हटाओ पश्चिमी रंगों की बदरंगी
नयी पीढ़ी के बच्चों को यही लोफर बनाते हैं ।
यहाँ बस लूट के मंजर हैं, कैसी लोकशाही है
ये खुदगर्जी के आलम देश को बदतर बनाते हैं ।
हमारे इस घरौंदे में अभावों का सुशासन है
बड़ी शिद्दत से हम चादर को ही बिस्तर बनाते हैं ।
धन्यवाद।














मंगलवार, 30 मई 2017

683.....चल मुँह धो कर के आते हैं

सादर अभिवादन
प्रफुल्लित हूँ आज....
पाँच लिकों का आनन्द में एक
नए चर्चाकार का प्रवेश
स्वागत ..अभिनन्दन है
माननीय श्री ध्रुव सिंह जी का...
प्रत्येक सोमवार को हमें उनकी पसन्दीदा रचनाएँ
आनन्दित करेगी....

आज मेरी पसंद की रचनाएँ.....


नारी.... क्यूं पापन हुई?... शालिनी कौशिक
है वर्जित मोहतरमा
मस्जिदों में सुना ,
मगर मंदिरों ने
न रोकी है नारी कभी।
वजह क्या है
सिमटी है सोच यहाँ ?
भला आके इसमें
क्यूँ पापन हुई ?
क्या जीना न उसका ज़रूरी यहाँ ?


किराएदार....वीर विनोद छाबड़ा
मैंने कहा - इस बार आपके मन मुताबिक किरायेदार है। खांटी वेजीटेरियन। समस्त प्रकार के दुर्व्यसन से दूर, बहुत दूर। 
सौ फीसदी टिकाऊ।
वो उछल पड़े - अच्छा। क्या करता है?
मैंने कहा - अच्छी जगह पर है। वेतन भी अच्छा है। पत्रकार हैं। वर्किंग जर्नलिस्ट। स्थाई नौकरी है। वो बात अलबत्ता दूसरी है कि अख़बार बंद हो जाए। लेकिन पत्रकार है, बेकार नहीं बैठता, 
कहीं न कहीं से खाने का जुगाड़ बैठा लेगा।
वो एकदम से बिदक गए - न भैया। हमें खखेड़ नहीं चाहिए। देखो, अब मुसलमान नहीं होने के साथ-साथ 
यह भी जोड़ लो कि वो पत्रकार न हो और वकील भी नहीं।


कोरी सी कल्पना....पुरुषोत्तम सिन्हा
कविताओं में मैने उसको हरपल विस्तार दिया,
मन की भावों से इक रूप साकार किया,
हृदय की तारों से मैने उसको स्वीकार किया,
अभिलाषा इक अपूर्ण सा मैने अंगीकार किया...


नसीब की बात....साधना वैद
उम्मीद तो कम थी लेकिन 
एक दिन मुझे हैरान करतीं 
मेरे दिल की क्यारी में 
कुछ बेहद मुलायम बेहद खूबसूरत 
नर्मों नाज़ुक सी कोंपलें फूट आईं 
जिनमें चन्द नज़्में, चंद गज़लें, 
चंद कवितायें और चंद गीत 
खिल उठे थे । 




कोई और नहीं बस मैं!.... लव तोमर
लड़ता हूँ 
झगड़ता हूँ 
उलझता हूँ 
बस यूँ ही ख़ुद के साथ
कोई और नहीं बस मैं


पहले तो मानहानि करवाओ फिर मुकदमा ठोको.....ताऊ रामपुरिया
ये एहसास है कि सास है....
या जरूरी धर्म है? 
यानी पहले तो मानहानि करवाओ 
फिर मुकदमा ठोको, 
पर ये बात जब समझ आ जाये तभी बनती है।
मान और मान हानि 
किस चिड़िया का नाम है 
ये हमको हमारे बापू ने कम उम्र में ही समझा दिया था।
........
आज तनिक भूल हो गई....
धोखे से आज की प्रस्तुति भाई कुलदीप जी ने भी बना दी और रचनाकारों को सूचना भी चली गई..सो भूल सुधार..
भाई कुलदीप जी  की पसंदीदा रचनाएँ भी यहीं पर..
आज की प्रस्तुति तनिक अझेल सी हो गई है..


अनुक्त जानाति अपि पंडिता.....वीरेन्द्र शर्मा
आज हमने शौर्य को भी सेकुलर बनाके छोड़ दिया है,  महाराणा प्रताप मेवाड़ (चित्तोड़ )के शिवाजी महाराष्ट्र के हैं - कुछ लोग बतलाने लगें हैं,जबकि शौर्य की हमारी परम्परा श्रुति परम्परा की तरह शाश्वत है। 


तीन सगे भाई अपने देश की आजादी के लिए 12 सालों से जेल में रहे...विवेक सुरंगे
विश्व के एकमात्र तीन सगे भाई जो अपने देश की आजादी के लिए 12 सालों से ज्यादा समय तक जेल में रहे ....उस मां को नमन जिसने ऐसे 3 महान सपूतों को जन्म दिया नारायण राव सावरकर ...गणेश राव सावरकर... विनायक दामोदर सावरकर

विदाई का प्लास्टिकरण.....राहुल मिश्र
ट्रेडिशन क्या होता है? 
रिवाज़ क्या होता है? 
विदाई में रोना रिवाज़ है। 
नही रोया तो 
नए जमाने की लड़कियां।
हद है अजीब भी है, 
पर हो रहा है।

s400/audience-828584__340
भगवान से....ओंकार केडिया
तुमने अरबों-खरबों लोग बनाए,
हर एक दूसरों से अलग,
हर एक का अलग चेहरा-मोहरा,
हर एक की अलग कद-काठी,
हर एक का अलग रंग-रूप.



उलूक उवाच....डॉ. सुशील कुमार जोशी

किसी के कंधे 
की सीढ़ी
एक बनाते हैं
ऊपर जाकर 
लात मारकर
उसे नीचे 
गिराते हैं
सांत्वना देने 
उसके घर
कुछ केले ले 
कर जाते हैं

आज्ञा दें यशोदा को
सादर
जाते-जाते एक नज़र इस वीडियो पर भी
कितना बड़ा बुलबुला.... समय एक मिनट चौबीस सेकण्ड








सोमवार, 29 मई 2017

682....ओ ! 'राही' तूं ,सुन ले !

ओ ! 'राही'
तूं सुन ले ! रे 
'एहसास' हृदय के 
चुन ले ! रे 
'नज़दीक' ही हैं 
वे स्वप्न तुम्हारे 
व्यर्थ 'माज़रा' 
'आत्मभ्रमण'  का 
देख ! तनिक 
अंतर्मन में, 

सादर अभिवादन 
आपसभी आदरणीय, पाठकों का 
 शब्दों की दुनियां भी अजीब है
हमारे कोमल हृदय को अपने शब्दों की जालिका में उलझाती ! 
सुख-दुःख रुपी पोत पर ब्रह्माण्ड की सैर कराती !
ख़ैर हम आज की रचनाओं की ओर 
अपने आवारा  मन को ले चलतें हैं  

 "नज़दीकियाँ" ........ 
आदरणीय 'रवींद्र सिंह यादव जी' जिनकी लेखनी कौशल का मैं मुरीद हूँ 


ये     घड़ी     रुकी     रहे
रात    जाए   अब   ठहर,
दीवानगी  का ये  ख़याल
बेताबियों  को  भा  गया।
देखने   चकोर  चाँद  को
  नदी  के  तीर   आ  गया।

"खामोशियाँ"..... 
आदरणीय,राकेश जी "राही" जो लेखक होने से बेहतर एक 'अच्छा पाठक' होने में विश्ववास रखते हैं ,
जो इनकी साहित्य के प्रति समर्पण की भावना को दर्शाती है। हम इनका सम्मान करते हैं
  

बड़ी उम्मीद ले कर तेरे दर पर आया हूँ,
नाउम्मीद का ख्याल भी, बेचैन करती है।   


"एहसास"....... 
आदरणीय, "ऋतु आसूजा" जी जिनकी रचना बताती है जीवन के सच्चे 'एहसास'


    एहसास की रूह से आह निकली
बस करो एहसासों से खेलने का
     शौंक ना पालों ।

   "आत्म भ्रमण"...... 
आदरणीय, "शुभा जी" भ्रमर रूपी मन की व्याख्या करतीं हैं 


 कब से खोज रही थी 
जिस निर्मल प्रेम को
देखा तो दुबका बैठा था 
इक कोने में 
जगाया , झकझोर के उठाया 

   "ये क्या है माज़रा"..... 
आदरणीय, "मीना गुलयानी" द्वारा रचित ये रचना जीवन से हजारों प्रश्न करती है



   जिंदगी तो मेरी इक लम्बी सुरंग है
जहाँ पे खड़ा हूँ मै वहीँ कोई सिरा



"पाँच लिंकों का आनंद'' परिवार के नवीन सदस्य के रूप में यह मेरी पहली प्रस्तुति है,
समस्त आदरणीय पाठक एवं लेखकगणों के सहयोग का आकांक्षी 
आज्ञा दीजिए 
धन्यवाद।  

"एकलव्य" 




  


रविवार, 28 मई 2017

681...''कारवां तो हम बनाते हैं''

                                                       

 ''कारवां तो हम बनाते हैं''
आओ ! साथी, हम
मिल करके
दूर देश को
साथ चलें
कोमल सा
एक हृदयस्पर्शी
एक दूजे की
आवाज़ बनें।
सादर अभिवादन आप सभी गणमान्य पाठकों का
आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर
कदम बढ़ाते हैं


 'भावों की गरिमा'.... 'सुधा सिंह जी' 


                                              


भावों की क्या बात करें
भावों की अपनी हस्ती है
भावो के  रंग भी अगणित हैं
इससे ही दुनिया सजती है
                              


                                                                       
                                              
बुजुर्गों के लिये थोड़ी मुहब्बत द़िल मे रख लेना
मुसलसल उम्र ढ़लती है शज़र गिर जायेगा एक दिन।    
                                                                           
                       
'अंतर्मन' ...... आदरणीय 'विभा ठाकुर जी' की रचना मन को छूती हुई 


                                                        

कही कोई देख न ले कि
बेटी के जन्म पर माँ खुश हैं
कही कोई सास को ताने न मार दे
तेरी बहु कैसी है आई!

अपनी रचना के माध्यम से सपनों के महत्व  पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि 
प्रत्येक मानव के जीवन में स्वप्न अहम् भूमिका निभाते हैं  

                                                     

गूँजती हैं कहीं जब ठिठकते से कदमों की आहट,
 बज उठती है यूँहीं तभी टूटी सी वीणा यकायक,



                                                   

मृदुल-स्नेह की विह्वलता सी
ईश की अनुपम सुन्दरता सी.
दायित्व निभाती हर पल सारे
बहाती ममता साँझ-सकारे

'श्वेता सिन्हा जी' की अनूठी रचना जो 'भावनाओं' को 'प्रकृति' से जोड़ती है

                                                           


हवा के नाव पर सवार

बादल सैर को निकलते है
असंख्य ख्वाहिशों की कुमुदनी
में खिले सितारों की झालर
झील के पानी में जगमगाते है


                       
    अंत में, मैं "एकलव्य" आदरणीय 'यशोदा दीदी' एवं 'पाँच लिंको का आनंद' परिवार के सभी सदस्यों का हृदय से आभार प्रकट करता हूँ जिन्होंने मुझे आज की प्रस्तुति बनाने योग्य समझा।    
आज्ञा दें 
धन्यवाद। 








शनिवार, 27 मई 2017

680... अहम




सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

खुद को तीसमारखां समझने लगी हूँ



अहम





फलसफा


मंदिर में मूरत  की पूजा लगता महज दिखावा है
मन में जिनके पाप भरा वे कहते क्या पहनावा है
बातों की बतकही बनाने मीडिया में कितने आ बैठे
चुप चुप अब तक मनमोहन जी इसका एक पछतावा है ।।
बेशक अपना या हो पराया करना होगा अब प्रतिकार




साररूप



‘गुलेरी’ का वर्णन इसलिए किया है कि ‘उसने कहा था’
कहानी में उनकी कल्‍पना का चमत्‍कारिक प्रभाव आज भी
कथाकारों के लिए अनुकरणीय है। ऐसी कल्‍पना, कथा में ही देखी जा सकती है।
कथायें पौराणिक, ऐतिहासिक और कल्‍पनात्‍मक प्रस्‍तुति का मिश्रण होती हैं।
कहानी में कल्‍पना को यथार्थ नहीं बनाया जाता अपतिु
यथार्थ को कहानी का स्‍वरूप दिया जाता है।



अहंकार



"जिनकी विद्या विवाद के लिए, धन अभिमान के लिए,
बुद्धि का प्रकर्ष ठगने के लिए तथा उन्नति संसार के तिरस्कार के लिए है,
 उनके लिए प्रकाश भी निश्चय ही अंधकार है।" -क्षेमेन्द्र



जाने किस वक्त



वो आकाशगंगायें जब
हथेलियों में बन्द होतीं,
मेहँदी ख़ुशबू बिखरती..

जाने कौन सा वक़्त होता
जो क़यामत लगता था,
खुलते जूड़े के
भँवर से फिसलकर..

फिर मिलेंगे

विभा रानी श्रीवास्तव





शुक्रवार, 26 मई 2017

679..कोशिश करें लिखें, भेड़िये अपने अपने अन्दर के थोड़े थोड़े लिखना आता है सब को सब आता है

सादर अभिवादन
नौतपा लग चुका है कल से..
नौ दिन..नौ नक्षत्र...
कहा जाता है कि इन नौ दिनों में
जिस भी नक्षत्र में बारिश हो गई तो
पूरे वर्षा-काल में उस नक्षत्र में बारिश नही होगी
चलिए चलते हैं पसंदीदा रचनाओं की ओर...

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कल वट सावित्री का पर्व था.....ज्योति देहलीवाल
एक मान्यता के अनुसार वटसावित्री व्रत के दिन महिलाएं शिव-पार्वती जी से प्रार्थना करती है कि “हे प्रभु, सात जन्मों तक हमें यहीं पति मिलें!” लेकिन अपने पति की खुशी को सर्वोपरी मानने वाली हम महिलाएं इस बात कि ओर ध्यान क्यों नहीं देती कि हमारे पति महोदय क्या चाहते है? पति महोदय की खुशी किस बात में है? ईश्वर से सात जन्मों तक वहीं पति मांग कर, क्या हम महिलाएं उन पर जुर्म नहीं करती? क्योंकि ज्यादातर (सभी नहीं) पुरुषों की इच्छा यहीं रहती है कि उन्हें हर जन्म में अलग-अलग पत्नियाँ मिले! 




स्किपिंग रोप
कूदते समय रस्सी
ऊपर से उछल कर
पैरों के नीचे से
जाती है निकल 
जगाती है
अजब सनसनाती सिहरन

घर शब्द छ: घणो छोटो
अर्थ इको साँथरों मोटो।

इम रैव एक परिवार
बिना बिक सूनो संसार।

जठै सारा साँकला रैव
बठै सदा खुशहाली रैव। 



हिमालय दर्शन 


अंजनी महादेव
सोलांग वैली.....हर्षिता विनय जोशी
एक बहुत ही सुन्दर जगह रास्ते में पड़ी , जगह क्या थी  हरी घास का एक मैदान। जिसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने हरे रंग का मखमली कालीन बिछा दिया हो और पार्श्व में एक  ओर देवदार के पेड़ थे और दूसरी ओर विशाल हिमालय। इस जगह को देखते ही मुंह से निकला गाड़ी रोको और हम निकल गए बाहर। कुछ देर यहाँ पर बैठे और जगह का आनंद लिया। एक और उदाहरण यहाँ देखने को मिला वो ये था कि लोग जगह का चुनाव एक दूसरे को देखकर भी करते हैं। जिस समय हम आये तो हमारी गाड़ी के अतिरिक्त और कोई गाड़ी यहाँ नही थी पर हमारे जाने से पहले गाड़ियों का जमावड़ा सा ही  लग गया था इधर। इसी को कहा जाता  है भेड़चाल ,खैर जो भी हो जगह बहुत सुन्दर थी।



पापा...रेवा टिबड़ेवाल
पापा मुझे दर्द बहुत होता है 
जब आपकी तस्वीरों 
पर माला देखती हूँ 
मुझे दर्द बहुत होता है 
जब माँ को तन्हाइयों से 
लड़ते देखती हूँ 




मन की बात 
जैसा कुछ 
हो जाता है 

ऐसा हो जाना 
कुछ अजूबा
नहीं होता है 

नंगा हो जाना 
हर किसी को 
आसानी से 
कहाँ आ 
पाता है 

आज्ञा दें यशोदा को
फिर मिलेंगे






गुरुवार, 25 मई 2017

678.....पाठकों की पसंद .. आज की पाठिका बहन पम्मी सिंह

सादर अभिवादन
पाठको की पसंद का एक नया अंक
एक नई पाठिका...

My Photo
गिर के तू उठे वही
जब हार की भी हार हो।
नभ तलक पुकार हो
जब तेरी सिंह दहाड़ हो।
अश्रु बन भीगा दे लब
बहा तू अशांत नीर को

ज़िस्म इंसान का है  कुछ तो   ख़ताएँ होंगी  
ज़िंदगी का है   सफ़र कुछ तो  बलाएँ होंगी

उसके लहज़े में महकती है वतन की खुशबू 
कुछ मिट्टी  का असर, माँ की   दुआएँ होंगी

बता  कौन  तेरी  ख़ुशी  ले  गया
कि  कासा  थमा  कर  ख़ुदी  ले  गया

समझते  रहे  सब  जिसे  बाग़बां
गुलों  के  लबों  से  हंसी  ले  गया

पता नही क्यों भावुक बनकर,
सपनो में, मैं खो जाता हूँ।
स्वप्न लोक में, स्वप्न सखा संग,
बीज प्यार के बो जाता हूँ।
यूँ तो कुछ नहीं बताने को..चंद खामोशियाँ बचा रखे हैं
जिनमें असीर है कई बातें जो नक़्श से उभरते हैं

खामोशियों की क्या ? कोई कहानी नहीं...
ये सुब्ह से शाम तलक आज़माए जाते हैं
कुछ टूटे सितारों की आस में
हर रात छत से गुज़र जाती हूँ
आधे -अधूरे बेतरतीब इखरे-बिखरे
पलों,संयोग को समेटते हुए न जाने
कई संयोग वियोग में बदल ..
रह जाती है बस वही इक ...कसक


:: पाठक परिचय ::
पम्मी सिंह के ही शब्दों में....
मैं इन्हीं हर्फों और सप्हों में रची बसी हूँ,क्योंकि
हमारे होने और बनने में कई लोगों के साथ-साथ 
भावों और अहसासों का सहयोग होता हैं। जी, 
धन्यवाद।
pammisingh70ps@gmail.com

अगली बार फिर उपस्थित होंगे हम
एक नए पाठक के साथ
सादर..






बुधवार, 24 मई 2017

677....संभल जा रे नारी ....फिसलना छोड़ नारी ....


जय मां हाटेशवरी....

अब तक गुजारी जिंदगी, तुम्हारे साथ हंस कर,
बस अब यादे ही रह गयी, जीने का सहारा बनकर....
आप सभी का स्वागत है....
पेश है आज के लिये...कुछ चुनी हुई कड़ियां....

वजह ... बे-वजह जिंदगी की ... -
जिंदगी के अंधेरे कूँवे में फिसलते लोगों के सिवा     
नज़र नहीं आ रही पर ज़मीन मिलेगी पैरों को
अगर इस कशमकश में बचे रहे
फिसलन के इस लंबे सफर में
जानी पहचानी बदहवास शक्लें देख कर
मुस्कुराने को जी चाहता है

माँ को भी जीने का अधिकार दे दो
अन्तिम बात, अब जब हम सारे काम खुद कर सकते हैं तो क्या लड़का और क्या लड़की दोनों को ही पेट भरने के और जीने के सारे ही काम सिखाइये। माँ को अनावश्यक महान मत बनाइये, वह भी जीवित प्राणी है, उसे भी कुछ चाहिये। माँ पर लिखने से पहले यह सोचिये कि क्या किसी माँ ने भी अपने बेटे पर लिखा कि उसने माँ का जीवन धन्य कर दिया हो। जब संतान बड़ी हो जाती है तब माँ का कर्तव्य पूरा हो जाता है, इसलिये परस्पर सम्मान और प्रेम देने की सोचिये ना कि खुद की नाकामी छिपाकर माँ को काम में जोतिए।

दोहे
अधिक मिले पहले मिले, किस्मत वक्त नकार।
इसी लालसा में गये, रविकर के दिन चार।।

हमको सत्ता-धर्म निभाना अच्छा लगता है
आज अदीबों को गरियाना अच्छा लगता है,
कहने को हम कवि की दम हैं बाल्मीकि के वंशज पर
कवि-कुल को गद्दार बताना अच्छा लगता है |

कर्नाटक की काशी – महाकूटा शिव देवालय
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मंदिर परिसर में एक कुआं भी है जिसे लोग पापविनाशन तीर्थ कहते हैं। विष्णु पुष्करिणी के पास ही एक अनूठा शिवलिंगम है जिसमें पांच अलग आकृतियां बनी हुई हैं।
इसे पंचलिंगम कहते हैं।

फिसलना छोड़ नारी ....
मेरी सहपाठी के अनुसार शादी को २० वर्ष हो गए और उसका पति अब उसका व बच्चों का कुछ नहीं करता और साथ ही यह भी कहता है कि यदि मेरे खिलाफ कुछ करोगी तो कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि अगर तुमने मुझे जेल भी भिजवाने की कोशिश की तो देख लेना मैं अगले दिन ही घर आ जाऊंगा .ऐसे में एक अधिवक्ता होने के नाते जो उपाय उसके पति का दिमाग ठीक करने के लिए मैं बता सकती थी मैंने बताये पर देखो इस भारतीय नारी का अपने पति के लिए और वो भी ऐसे पति के लिए जो पति होने का कोई फ़र्ज़ निभाने को तैयार नहीं, उसने वह उपाय मानने से इंकार कर दिया क्योंकि उसे केवल पति से भरण-पोषण चाहिए था और उसके लिए वह कोर्ट के धक्के खाने को भी तैयार नहीं थी

''अभी तक सो रहे हैं जो ,उन्हें आवाज़ तो दे दूँ ,
बिलखते बादलों को मैं कड़कती गाज तो दे दूँ .
जनम भर जो गए जोते, जनम भर जो गए पीसे
उन्हें मैं तख़्त तो दे दूँ ,उन्हें मैं ताज़ तो दे दूँ ''

धन्यवाद।














मंगलवार, 23 मई 2017

676.....खाली पन्ने और मीनोपोज

सादर अभिवादन..
नए नियमों के तहत 
आज-कल काफी उथल-पुथल है
31 जुलाई तक विवरणियाँ दाखिल हो जानी चाहिए..
इसी चक्कर में श्रीमान जी काफी से अधिक व्यस्त हैं
कुछ फाइलें मेरे पास भिजवा दी है उन्होंनें..
ऑडिट करना है..ऑफिस से दो स्टाफ घर आए हैं..
चलिए छोड़िए इस पचड़े को...देखिए आज की पसंद...

वो पेड़ो पर चढ़ना, गिलहरी पकड़ना,
अमिया की डाली पर झूले लगाना,
वो पेंगें मारके  बेफिकरी से झूलना,
वो मामा और मासी का मनुहार करना,
मेरे रूठ जाने पर मुझको मनाना,
पाने फिर इनको कहाँ जाइये?
मुझे मेरा बचपन पुनः चाहिए!


आइना संगसार करना था.......नीरज गोस्वामी
दिल हमें बेकरार करना था 
आपका इंतिज़ार करना था 

जिस्म को बेचना गुनाह नहीं 
रूह का इफ़्तिख़ार करना था 



बढ रही दरिन्दगी समाज में,
नारी ! तेरे फर्ज और बढ गये .......
माँ ! है तू सृजन है तेरे हाथ में,
"अब तेरे कर्तव्य औऱ बढ गये".......

न जाने क्यूँ
हम खुद की ख्यालात लिए फिरते हैं कि
हर इन्सान में अख्यात खुदा बसता है
तो वो जो इन्सान है, इन्सान में कहाँ रहता है?


विश्वास....शुभा मेहता
अटकूं कहीं तो 
इशारा करता है तू ही 
भटकूं कहीं तो 
साथ देता है तू ही 
आकांक्षाएं , एक के बाद एक
बढ़ती चली जाती 




गर मेरे एहसास कुछ नहीं
तो फिर मेरे पास कुछ नहीं

आँखों में ये आँसू तो हैं
हाँ कहने को खास कुछ नहीं

शीर्षक तो भूल रही हूँ....

बात पते की...डॉ. सुशील जोशी

सफेद पन्ने 
खाली छोड़ना 
भी मीनोपोज 
की निशानी होता है 

तेरा इसे समझना 
सबसे ज्यादा 
जरूरी है
बहुत जरूरी है ।

आज्ञा दें यशोदा को...
सादर




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