पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

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मंगलवार, 31 जनवरी 2017

564...ऐतिहासिक चरित्रों से निकलती चिंगारी

जय मां हाटेशवरी...

आज नव वर्ष के प्रथम मास  का अंतिम दिन...
मुझे तो ऐसा लग रहा है...
समय बीत नहीं भाग रहा है...
कल देश के बजट का दिन है...
...उमीद है...अच्छे दिनों की...
सब से पहले पढ़िये ये कहानी...
उसके बाद आज के लिंक...


किसी गांव में एक सेठ रहता था. उसका एक ही बेटा था, जो व्यापार के काम से परदेस गया हुआ था. सेठ की बहू एक दिन कुएँ पर पानी भरने गई. घड़ा जब भर गया तो उसे
उठाकर कुएँ के मुंडेर पर रख दिया और अपना हाथ-मुँह धोने लगी. तभी कहीं से चार राहगीर वहाँ आ पहुँचे. एक राहगीर बोला, “बहन, मैं बहुत प्यासा हूँ. क्या मुझे पानी
पिला दोगी?”
सेठ की बहू को पानी पिलाने में थोड़ी झिझक महसूस हुई, क्योंकि वह उस समय कम कपड़े पहने हुए थी. उसके पास लोटा या गिलास भी नहीं था जिससे वह पानी पिला देती.
इसी कारण वहाँ उन राहगीरों को पानी पिलाना उसे ठीक नहीं लगा.
बहू ने उससे पूछा, “आप कौन हैं?”
पूरी कहानी यहां पढ़ें...
शाम का सुनहला दामन
खंडहर हो गया वो घर
वीरान है वो गलियाँ
कोई नहीं आता गुलाबी दुप्पटा संभाले
बेचैन होकर छत पर
गली में नज़रें बचाकर कोई नहीं देखता
अब मुँडेर की तरफ़
बस शाम की ख़ूबसूरती अब भी वही है

तब और अब
है यह कैसा स्वभाव उसका
चंचल उसे बना गया
मनमानी वह करता
स्थिर कभी न हो पाता  |
मोहन को धेनु चराते देखा
काली कमली ओढ़ कर
गौ धूलि बेला में
उन्हें धुल धूसरित आते देखा |












अग्नि-परीक्षा [कविता] - डॉ महेन्द्र भटनागर
इन गंदे इरादों से
नये युग की जवानी
तनिक भी होगी नहीं गुमराह।
चाहे रात काली और हो,
चाहे और भीषण हों चक्रवात-प्रहार,
पर, सद्भाव का: सहभाव का
ध्रुव-दीप / मणि-दीप
निष्कंप रह जलता रहेगा।




बीते दिनों तुमसे बिछड़े
आज भी बाक़ी है
इस दिल में
इक विशवास की
जीत की तरह .....





जो दर्द दिए तूने
तूने क़सर न छोड़ी थोड़े भी मारने में,
पर देख बेमुरव्वत हम फिर भी जी रहे हैं !




ऐतिहासिक चरित्रों से निकलती चिंगारी
इतिहासकार प्रो. इरफ़ान हबीब भी मानते है कि यह जायसी का काल्पनिक चरित्र है और इतिहास में इस नाम का कहीं जिक्र नहीं मिलता,फिर भी ऐतिहासिक या लोकमन में बसे
चरित्रों का चित्रण करते समय जनभावना का ख्याल रखा जाना जरूरी है.बेवजह इस तरह के चरित्रों को व्यावसायिकता की आड़ में, दर्शकों की रूचि के अनुसार ढालना या विवादों
में घसीटना सही नहीं है.

अहम् ...
समय की धूल आँधियों के साथ आई तो सही
पर निशान बनाने से पहले हवा के साथ फुर्र हो गई
पर जाने कब कौन से लम्हे पे सवार
अहम् की आंच ने
मन के नाज़ुक एहसास को कोयले सा जला दिया







आज बस इतना ही...
अब चलते-चलते...
इस अधकच्चे से घर के आँगन
में जाने क्यों इतना आश्वासन
पाता है यह मेरा टूटा मन
लगता है इन पिछले वर्षों में
सच्चे झूठे, खट्टे मीठे संघर्षों में
इस घर की छाया थी छूट गई अनजाने
जो अब झुक कर मेरे सिरहाने–
कहती है
“भटको बेबात कहीं!
लौटोगे अपनी हर यात्रा के बाद यहीं !”
धीरे धीरे उतरी शाम !


धन्यवाद।


सोमवार, 30 जनवरी 2017

563.....बिना झंडे के लोग लावारिस हो रहे हैं

शुभ प्रभात
सादर अभिवादन
आज मौन दिवस है
शत-शत नमन उन्हें
वे न होते तो क्या होता
अश्रुपूरित श्रद्धाँजली

चलिए चलें आज की पसंद देखने....


चौपाई...रेखा जोशी
राम नाम हृदय  में बसाया
कुछ नहीं अब हमे है भाया

राम नाम के गुण सब गायें 
नाम बिना कुछ नहीं सुहाये






याद चंचल हो गई
रात बेकल हो गई

इश्क का चर्चा चला
हवा संदल हो गई


सीख..विभा दीदी
सब्जी वाले से मैं एक का सिक्का ली ,
किराने के दुकान से दो का सिक्का बदली ,
सब्जी वाले को दो का सिक्का देकर चलती बनी


सूरदास जी से क्षमायाचना के साथ..गोपेश जायसवाल
मैया मोरी, मैं नहिं हिरना मारयो
सबके सनमुख करी खुद्कुसी, बिरथा मोहि फसायो
जो गुलेल तक नाहिं चलावत, गोली कैसे दाग्यो
जैसे ही हिरना स्वर्ग सिधार्यो, रपट लिखावन भाग्यो


धीरे धीरे उतरी शाम...... धर्मवीर भारती
आँचल से छू तुलसी की थाली
दीदी ने घर की ढिबरी बाली
जम्हाई ले लेकर उजियाली,
जा बैठी ताखों में

और अंत में एक बात पते की..

इन्सान 
की बात 
इन्सानियत 
की बात 
फजूल की 
बात है 
इन दिनों 
‘उलूक’ 
औकात की 
बात कर 
बिना झंडे 
के लोग 
लावारिस 
हो रहे हैं 

चलती हूँ अब
कल रचनाओं का 

चयन करना भूल गई थी
अभी सुबह के 4.44 हो रहे हैं
सादर













रविवार, 29 जनवरी 2017

562....आखिर क्यों

सुप्रभात दोस्तो 

     हमेशा की तरह  रविवार 
की पाँच लिंको को लेकर  मै हाजिर 
आप के लाए है पाँच बेहतरीन लिंक 


गुठली



चूसकर फेंकी गई जामुन की एक गुठली 
नरम मिट्टी में पनाह पा गई,
नन्ही-सी गुठली से अंकुर फूटा,
बारिश के पानी ने उसे सींचा,
हवा ने उसे दुलराया.


आजकल तो ऑनलाइन सभी चीजें मिल रही है 
लाइनों में खड़े होने का चलन फिर भी वही है 
बैंक,एटीएम में और सिनेमा में है  कतारें 
टिकिट तो है ऑनलाइन ,बैठने में पर कतारे 
और उनके आशिकों की ,लम्बी लाइन लग रही है 
आजकल तो ऑन लाइन सभी चीजे मिल रही है    

चाहिए दूल्हा या दुल्हन,गए पण्डित,गए नाइ 

जब नहीं आए थे तुम...


- अली सरदार जाफरी

जब नहीं आए थे तुम, तब भी तो तुम आए थे
आँख में नूर की और दिल में लहू की सूरत
याद की तरह धड़कते हुए दिल की सूरत

तुम नहीं आए अभी, फिर भी तो तुम आए हो
रात के सीने में महताब के खंज़र की तरह
सुब्‍हो के हाथ में ख़ुर्शीद के सागर की तरह


मेरा होना बड़ा ज़रूरी था .....रहती दुनिया के लिए . मैं दुनिया के होने की सबसे अद्भुत निशानी थी और उसके होने का कारण भी. फिर भी कुछ ज़रूरी नहीं था मेरा होना. अपने होने कीयूँ और यहाँ होने की सफाई देते देते मैंने कई जिंदगियां काट दीं. 

आखिर क्यों ...

...................................
......................................

आखिर क्या और कितना
चाह सकती है
बंद हथेली से कब का छूट चुकी उँगली सी देह वाली 
किसी पुरानी किताब की गंध में
दबी पड़ी रह गई एक सिल्वर-फिश ...




अब दीजिए इजाजत 

शनिवार, 28 जनवरी 2017

561 .... यक्ष प्रश्न



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यथायोग्य सभी को
प्रणामाशीष


राष्ट्रिय बालिका दिवस और गणतंत्र दिवस आयोजन आस-पास था
संविधान सशक्त है .... तो .... बालिका अशक्त क्यों है



यक्ष प्रश्न है



जो है, उसका होना सत्य है,
जो नहीं है, उसका न होना सत्य है ।
मुझे लगता है कि
होना-न-होना एक ही सत्य के
दो आयाम हैं,
शेष सब समझ का फेर,
बुद्धि के व्यायाम हैं ।



यक्ष प्रश्न है



जूझती बैसाखियों पर मौत लादे प्रश्नहीन

मूर्त्त जीवट स्वयं, निस्पृह लोग ये कायर नहीं

प्रश्न-उत्तर, लाभ की संभावनाओं से परे

अर्थवेत्ता-प्रबन्धक कोई अत: तत्पर नहीं




यक्ष प्रश्न है



उत्तर की अभिलाषा
सुदूर पूर्व से उगने वाले सूरज के साथ
उगती और सुदूर पश्चिम में नष्ट हो जाती
रोज दर रोज
मन की विकलता
अधीरता
और आक्रोश




यक्ष प्रश्न है




यदि दे भी पाओ ये,
तो क्या किसी याचक को
दे दोगे अपनी साधना सम्पूर्ण ?
क्या पाल पाओगे प्रण अपना
मूल्य पे अपने प्राणों के
कर्ण की भाँति ??




यक्ष प्रश्न है




बस, अब एक ही बात कहता हूँ कि मेरा भारत जैसा भी है,
वैसा ही बढ़िया. कौन जरुरत है इन सब नौटंकियों की.
सायरन तो कोई सड़क पर से निकलता हुआ ट्र्क भी बजा देगा
मगर पड़ोसी, वो अब कहाँ निकलते हैं सायरन सुन कर.
बल्कि वो तो यह सुनिश्चित करने में जुट जायेंगे कि
उनका घर ठीक से बंद है कि नहीं...
बाकी खिड़की से झांक कर मजा
तो पूरा ले लेंगे आपको लुटता देखने का

<><>


परेशान होने की जरूरत नहीं
आदत भी होती है कोई चीज
कुछ सवाल समय बीतने के साथ खत्म हो जाते हैं बिना उत्तर

फिर मिलेंगे ....... तब तक के लिए

आखरी सलाम


विभा रानी श्रीवास्तव






शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

560....बधाई है बधाई है बधाई है बधाई है

बधाई है, बधाई है, बधाई है, बधाई है
आप सभी को गणतंत्र दिवस की बधाई है
सादर अभिवादन स्वीकारें

आइए चलें मिली-जुली रचनाओं की ओर...

आया है गणतंत्र का, शुभ दिन देखो आज
दुल्हन सी दिल्ली सजी, हर्षित सकल समाज !

इतिहास के अध्याय में
क्रांति वीर से ही शान है
स्वार्थ लोलुप सभ्यता से
रो उठा अभिमान है.

आज़ादी की सांस सुखद
बसंत सा एहसास निराला ,
कैसे दीवाने आज़ादी के अपने 
जीये बस वे हमारे सपने
खुद विषपान किये ,
थमा गए हमें अमृत  प्याला……

पहचान कर भी, मुझसे वे अनजान बनते हैं,
मतलब निकल पड़े तो, मुझे भाईजान कहते हैं,
जानता हूँ इस तरह के लोगों को बहुत ख़ूब
रंग बदलने ये गिरगिट को भी शर्मसार करते हैं। 

जमाने में शराफ़त की शिकायत भी लगी होने
जलालत की इसी हरकत से नफ़रत और बढ़ती है

फ़िजा महफ़ूज़ होगी तब कटे ना जब शज़र कोई
हवा में ताज़गी रहती तो सेहत और बढ़ती है

मज़दूर औरत की पीठ पर
बंधा बच्चा, होती है
ज़िन्दगी
अधपर ही झूलना
है जिसकी नियति
संदिग्ध मगर बेख़ौफ़ !

पर्व खुशियों के मनाने का बहाना है 
डोर उमंगो की बढाओ गीत गाना है  

घुल रही है फिर हवा में गंध सौंधी सी 
मौज मस्ती स्वाद का उत्सव मनाना है

शरम की 
बात नहीं 
बेशर्मी नहीं 
बेहयाई नहीं 
‘उलूक’ की 
चमड़ी 
खुजली 
वाली है 
खुजलाई है 

आज्ञा दें दिग्विजय को फिर मिलेंगे
सादर













गुरुवार, 26 जनवरी 2017

559...कुछ भी हो हर हाल तिरंगा लहराए।


जय मां हाटेशवरी...

आज हम 68वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं...
गणतंत्र का अर्थ है... गण का तंत्र, यानि आम आदमी का शासन... अर्थात
 जहां  वंशवाद के आधार पर कोई राजा शासन नहीं कर सकता। जनता अपने लिए शासक और सरकार का चुनाव लोकतांत्रिक तरीके
से करती है। ये शासक संविधान और संसद के प्रति जवाबदेह होकर राष्ट्रहित में नीतियां और कानून बनाते हैं।
पर   आम आदमी को तो वोट तक ही सीमित कर दिया...
हर तरफ भ्रष्टाचार है...
महिलाएं   आज भी गुलामों सा जीवन जी रही हैं...
आतंकवाद का भय...हर आदमी को भयभीत कर रहा है...
आज यहां पश्चिमी संस्कृति का बोल-बाला है...
न भाषा अपनी...न संस्कृति सभ्यता...
मैकाले की शिक्षा-प्रनाली ही चल रही है...
वोही 100 साल पूराने कानून...
फिर कैसा गण-तंत्र...
 एक जयचंद के कारण हम कई हजार वर्ष गुलाम रहे...
आज तो देश में...कई जय चंद हैं...
जो जिस डाली पर बैठे हैं...उसे ही काट रहे हैं...
पर अब भारत की जंता जाग रही हैं...
ये मैं नहीं...68वां गणतंत्र-दिवस कह रहा है...
आप सभी को...68वें गणतंत्र-दिवस की शुभकामनाएं...
...मैंने आज जो पढ़ा...उसके कुछ अंश...


 
देश रहे खुशहाल, तिरंगा लहराए
चमके माँ का भाल,तिरंगा लहराए।
आजादी का पर्व मनायें हम हँसकर
कुछ भी हो हर हाल तिरंगा लहराए।
व्यर्थ न जाए बलिवीरों की कुर्बानी
ऐसे ही हर साल तिरंगा लहराए।
इसकी खातिर चढ़े भगत सिंह फाँसी पर
मिटें हजारों लाल, तिरंगा लहराए।
कर देना नाकाम सुनो मेरे वीरो
दुश्मन की हर चाल, तिरंगा लहराए।


तिरंगे के तीन रंग
अपने आप में पूर्ण
भगुआ रंग जोश भरता
सारे कार्य सफल करता |
श्वेत रंग शान्ति का द्योतक 
समृद्धि का हरा रंग परिचायक
चक्र बताता विविधता में एकता
देख देख मन न भरता |

जब भी देखा
अपनी आखों से
संसार में मात्र
ममत्व  सुन्दर है
और कुछ भी नहीं


 
"मेरी परवरिश अच्छी हुई .... मैं पढ़ी लिखी हूँ ... शिक्षिका हूँ .... मेरे पिता मेरे संग रहने आये मगर रह ना सकें | हमारा संस्कार , हमारी परवरिश ऐसी है कि
हम ससुर से वैसा व्यवहार नहीं कर सकते हैं , जैसा हमारे घर आये हमारे पिता के साथ होता है , हम घर छोड़ भी नहीं सकते  " बताते बताते रो पड़ी महिला ...

जिंदगी सवाल करती है,
कभी सीधे, कभी आड़े-तिरछे,
जिंदगी मचलती बड़ी है,
कभी फिसलकर, कभी इठलाकर,

आर्यभटट् प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान एरीज के वरिष्ठ खगोल वैज्ञानिक डॉ. शशिभूषण पांडे ने बताया कि साल में एक बार ही सभी ग्रहों को एक रात में देखने का संयोग
बनता है। सूर्य हमारे सौर परिवार का मुखिया है। सभी ग्रह अपने कक्षा में उसका चक्कर लगाते हैं। अक्सर कोई न कोई ग्रह सूर्य के पीछे आ जाता है। जिस कारण सभी
को
एक रात में नहीं देखा जा सकता है। इस बार यह संयोग जनवरी के उत्तरार्ध में बन रहा है।

26 जनवरी की रात को इन्हें बखूबी देखा जा सकता है। इन ग्रहों में प्रेम की देवी कहे जाने वाली वीनस, गुरु, शनि व मंगल को कोरी आंखों से देखा जा सकता है। बुध
को भी देखा जा सकता है, लेकिन सूरज के काफी नजदीक होने के कारण थोड़ा मुश्किल होता है। नेपच्यून व यूरेनस को दूरबीन से देखा जा सकेगा। छोटी दूरबीन से सभी ग्रहों
को बेहतर ढंग़ से निहारा जा सकता है। बुध को सूर्यास्त व सूर्योदय के समय सूर्य के निकट देखा जा सकता है। इसके अलावा सांझ ढलने के बाद वीनस को आसानी से देखा
जा सकता है।


धन्यवाद।





बुधवार, 25 जनवरी 2017

558.........सब कुछ जायज है अखबार के समाचार के लिये जैसे होता है प्यार के लिये

भारतीय गणतंत्र दिवस के एक दिन पहले ही
ऐसा लगता है कि साल अब शुरू होगा नया
घोषणाएँ होंगी कुछ नयी, होगी वादा खिलाफी भी
सुनिए भी, देखिये भी, और आलोचना भी कीजिए

आइए चलें आज की पसंदीदा रचनाएं देखें....


अजनबी आवाज़.....रेवा
इतने सालों के साथ 
और प्यार के बाद , 
आज एक अजीब सी 
हिचकिचाहट 
महसूस हो रही है , 



बहस से
मन नहीं उबरता  ...
बहस
दूसरे लोग करते हैं
पक्ष-विपक्ष से बिल्कुल अलग-थलग
हादसे से गुजरी मनःस्थिति
जुड़कर भी
नहीं जुड़ती !

जाड़ा! तू जा न -  
करती है मिन्नतें, 
काँपती हवा!  

रवि से डरा  
दुम दबा के भागा  
अबकी जाड़ा

कैसे जियें हम तुम्हारे बिन देखे हमे ज़माना
है करते इंतज़ार तेरा पिया घर चले आना
,
सूना सूना अँगना साजन रस्ता  निहारे नैना 
आँखों से अब  बरसे सावन दिल हुआ दिवाना


बेगैरत सूरज भी साम्प्रदायिकता फैलाता है ,,
इसे भी उगते .. डूबते हुए केसरिया रंग भाता है ||

चाँद को समझाया कितना सुनता ही नहीं है 
कौन धर्म में त्यौहार पर कभी पूर्णिमा मनाता है ||

"पानी पी लूँ?" उसने विनम्रता से पूछा।
"पानी के लिए पूछते हैं! पीने के लिए ही तो रखा है। जरूर पीजिए!" कहते हुए वे थोड़ा गर्व से भर गये।

आज का आनन्द...

समाचार देने वाला भी 
कभी कभी खुद एक 
समाचार हो जाता है 
उसका ही अखबार 
उसकी खबर एक लेकर 
जब चला आता है 
पढ़ने वाले ने तो 
बस पढ़ना होता है 
उसके बाद बहस का 
एक मुद्दा हो जाता है 

आभा दें यशोदा को


भारतीय गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ

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