पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

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शुक्रवार, 24 मार्च 2017

616.........बेशरम होता है इसीलिये बेशर्मी से कह भी रहा होता है

सादर अभिवादन..
बस कुछेक दिन बचे हैं काम के
अगले वर्ष से जुलाई की महीना मार्च की तरह होगा
कानून में बदलाव के तहत ..आयकर की विवरणी
अब जुलाई में ही दाखिल करनी होगी
अरे.....ये मैं कौन सा विषय ले लिया  क्षमा..

चलिए चलें..फुरसत के पल में जो पढ़ा वो देखिए....

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अब नहीं मिलते डगर में
फूल वाले दिन 
आज खूँटी पर टंगे हैं 
शूल वाले दिन

प्रश्न अचानक
मन में आया 
राधा ने जानना चाहा 
है यह बांस की बनी
साधारण सी बांसुरी
पर अधिक ही प्यारी क्यूं है 

कितना प्यारा निर्मल जल है 
वर्तमान है ,इससे कल है ॥
घन का देखो मन  उदार  है 
खुद मिट जाता जल अपार  है ॥

22 मार्च पानी बचाने  का संकल्प, उसके महत्व को जानने  और संरक्षण के लिए सचेत होने का दिन है।   अनुसंधानों से पता चला है  कि विश्व के 1.5 अरब लोगों को पीने का शुद्ध पानी नही मिल रहा है। पानी के बिना मानव जीवन की कल्पना अधूरी है। इस विषय पर आज सबको गहन मंथन की आवश्यकता है कि 'जल की एक-एक बूँद कीमती है, 'जल बचाओ' , जंगल बचाओ' , जल ही जीवन है' बिन पानी सब सून' - ये उक्तियाँ अब मात्र नारे नहीं बल्कि जीवन की आवश्यकता बन गई हैं।

जोगीजी वाह .....कौशल लाल
योगी जी धीरे धीरे , ले लिये सी एम के फेरे
योगीजी वाह योगी जी वाह....।।
धनबली, बाहुबली बाले नेता तो सुने थे लेकिन ई योगबली बाले नेतवन सब भी बहुत हो गए है। आखिर कुछ तो बदल रहा है। और ऐसा तो नहीं की हिलाय के चक्कर एक दूँ ठो खूटवा उखड़ जाए।





बेशरम 
बस एक 
‘उलूक’ 
ही 
हो रहा 
होता है 

रात को 
उठ रहा 
होता है 
फटी आँखों 
से देख 
रहा होता है 
....
आज्ञा दें दिग्विजय को


गुरुवार, 23 मार्च 2017

615...ज़िन्दगी तो अपने दम पर ही जी जाती है … दूसरो के कन्धों पर तो सिर्फ जनाजे उठाये जाते हैं।

आज 23 मार्च है यानि शहीद दिवस.
आज ही के दिन वर्ष 1931 की मध्यरात्रि को अंग्रेजी हुकूमत ने भारत के तीन सपूतों भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी पर लटका दिया था.
शहीद दिवस के रुप में जाना जाने वाला यह दिन यूं तो भारतीय इतिहास के लिए काला दिन माना जाता है पर स्वतंत्रता की लड़ाई में खुद को देश की वेदी पर चढ़ाने वाले
यह नायक हमारे आदर्श हैं....
मैं पांच लिंकों का आनंद  परिवार की ओर से  भारत माता के इन  अमर सपूतों को कोटी कोटी नमन करता हूं...

जब मैं पढ़ाई कर रहा था तो अक्‍सर ऐसे टीचर और नेताओं से मुलाकात होती, जो हमें तो भगत सिंह के विचारों से प्रेरित होने और उनके रास्‍ते पर चलने की सलाह देते।
लेकिन अपने बेटे- बेटियों से हमेशा यह राह छिपा कर रखा करते। अगर किसी का बेटा या बेटी भटकता हुआ उधर गुजरने की कोशिश करता तो उसे यह समझाकर वापस लौटा लाते
कि अभी हालात ऐसे नहीं हैं। (भौतिक परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं हुई हैं।) ‘यानी भगत सिंह बहुत महान। बहुत अच्‍छे। लेकिन भगत सिंह मेरे घर में नहीं बल्कि पड़ोसी
के घर पैदा लें।‘  यही आज के मध्‍यवर्ग का मानस भी है। आज इसी मानस का फैलाव दूर-दूर तक है। इसलिए भगत‍ सिंह की वीरता के गान हम भले ही आज जितना गा लें। उनके
विचार से दो चार होने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाते क्‍योंकि विचार बड़े बदलाव की ओर ले जाते हैं। बदलाव की राह कभी आसान नहीं होती।
 ज़िन्दगी तो अपने दम पर ही जी जाती है … दूसरो के कन्धों पर तो सिर्फ जनाजे उठाये जाते हैं।
भगत सिंह जब पांच-सात साल के थे तब वे एक खेल खेला करते थे,  जिसमे अपने सभी दोस्तों को सो टुकड़ियों में बाट देते थे और एक दूसरे पर आक्रमण करते थे।
जब अंग्रेजो द्वारा पंजाब के अमृतसर में 13 अप्रैल, 1919 में जलियावाला बाग हत्याकांड हुआ, उस वक्त भगत सिंह अपनी स्कूल में पढ़ रहे थे और जैसे ही उसे यह पता
चला तब वो स्कूल से 12 किलोमीटर पैदल चलकर जलियावाला बाग आ पहुचे और इस हत्याकांड को देखकर भगत सिंह की सोच पर गहरा असर पड़ा।
समय रहते एक तरफ गांधीजी का असहयोग आंदोलन शुरू हुआ तो दूसरी ओर क्रांतिकारियों के हिंचक आंदोलन शुरू हुए, जिनमे भगत सिंह को अपने लिए रास्ता चुनना था कि वे
किस आंदोलन का हिस्सा बने। कुछ समय बाद गांधीजी का असहयोग आंदोलन को बंध कर दिया गया और भगत सिंह ने देश की आजादी के लिए क्रांति के रास्ते पर चलना ठीक समझा,
उसके बाद वें क्रन्तिकारी दलो के सदस्य बनने लगे।
अब आज की चुनी हुई रचनाएं...
एक बार फिर...ब्लौगों के दबे खजाने से ही...






जीवन
तेरा मेरा सबका जीवन पल दो पल का लेखा है
गिन कर सबकी साँसे, चोला पञ्च-तत्त्व का पहना है
सागर की लहरों सा जीवन तट की और है दौड़ रहा
किस को मालुम तट को छू कर लहरों को तो ढहना है
लिंगदोह कौन है ? पता करवाओ
आओ मिल
बाँट कर चाय
समोसे खाओ
बिल थानेदार
के नाम
कटवाओ
शासन के
जासूसों के
आँख में
घोड़ों के
आँख की
पट्टियाँ
दोनो ओर
से लगवाओ
जब तक सांस चल रही है जीवन है। सांस गई जीवन गया। दिल का काम तमाम हुआ। ऑक्सीजन उठानी बंद ,खून का संचरण बंद। यही मृत्यु है चिकित्सा विज्ञान की शब्दावली में
मौत का मतलब है देहांत बोले तो देह का अंत। सब कुछ खत्म नहीं होता है ,देह मरती है। देही नहीं। शरीर
मरता है शरीरी नहीं।
जब तक सांस चल रही है जीवन है। सांस गई जीवन गया। दिल का काम तमाम हुआ। ऑक्सीजन उठानी बंद
,खून का संचरण बंद। यही मृत्यु है चिकित्सा विज्ञान की शब्दावली में इसे नैदानिक मृत्यु (Clinical death )कह
लो। क्या फर्क पड़ता है।दिल धड़कना बंद  हुआ ,दिमाग भी चंद मिंटो बाद ठंडा हो जाता है।ऑक्सीजन दिमाग
को भी चाहिए दिल को भी। दौरा दिल का भी पड़ता है दिमाग का भी दोनों काम करना भी बंद करते हैं पूर्णतया।
साइंसदान दिमागी मृत्यु को आखिरी मृत्यु , मानते बूझते हैं।  
पांच मकान मालिक थे इस देह के वायु -अग्नि -आकाश -पृथ्वी -जल.
 मौत के बाद पाँचों अपना हिस्सा ले लेते
हैं।
विचारों की श्रंखला
 अब कोई बच्ची  नहीं
जो भय मन में पालूँ
कर्तव्य से मुंह मोड़ कर
पलायन करूं  |
चाहती हूँ रखूँ
अस्तित्व अक्षून्य अपना
ना हो बाधित
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
अवाध गति से बढ़ती जाए
विचारों की श्रंखला |
मौत क्यूँ ........ ? जीवन अनमोल है ......! "
जिन्दगी पथ है ,मंजिल की तरफ जाने  का ,
  मौत गीत है , सदा मस्ती में गाने का .
 जिन्दगी नाम है ,तूफान से टकराने का ,
 मौत  नाम  है  आराम  से  सो  जाने  का ."
किसी  शायर  की  ये  चंद  लाइन  कुछ  न  कहते  हुए  भी  बहुत  कुछ  कह  जाती  है . जिन्दगी  के   प्रति हिम्मत  दिलाती  हुई  इन  चंद   पंक्तियो  ने   जिन्दगी 
और  मौत  के  अंतर  को  आसानी  से  व्यक्त  कर  दिया है  .  पर  लगता  है  यह  सिर्फ  किताबो  के  बंद  पन्नो  में  ही  उलझ  कर  रह  गयी  है  और  जिन्दगी
धन्यवाद।















बुधवार, 22 मार्च 2017

614.....सब बिकाउ है जमीर ही बेच डाल

सादर अभिवादन
काफी से अधिक फेर-बदल महसूस कर रही है भारत की जनता
और अच्छा भी लग रहा है...दिन अच्छाइयों के जो आ रहे हैं
हरदम की तरह नकारात्मक सोंच वालों की कलम तेजी से चल रही है
पढ़ रही हूँ जो..यदि वो नकारात्मक है तो...उसमें भी कहीं न कहीं
सकारात्मकता छिपी ही होती है....

आज की पसंद कुछ ऐसी ही है...

रचनी हैं अब साजिशें 
स्वप्न तो बहुत देख दिखा चुके 
ये वक्त का बदला लहजा है 
जिस पर इंसानियत तलवों का उपालम्भ है 
और साजिश एक आदतन शिकारी 


प्रयास....शुभा मेहता
मैंने कुछ सीखा आज
एक मकड़ी से
निरन्तर प्रयास करते रहना
जुट जाना जी जान से
चाहे , कोई कितनी ही बार


विकास की राह चलने से बदलेगी छवि....राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सबका साथ, सबका विकास की नीति और सर्वहितकारी राजनीति के चलते अनुमान लगाना कठिन था कि योगी जैसे कट्टर हिंदुत्व छवि और विवादित बयान देने वाले व्यक्ति को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी जाएगी. ऐसे समय में जबकि ठीक दो वर्ष बाद केंद्र सरकार को या कहें कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सम्पूर्ण देश के सामने लोकसभा चुनाव की परीक्षा से गुजरना है, उत्तर प्रदेश में कट्टर हिंदुत्व छवि का मुख्यमंत्री बनाया जाना अपने आपमें एक चुनौती ही कहा जायेगा


योग, रोग, भोग....सखाजी
ऐसा बना योग
हर योगी को लगा रोग
गद्दियां मल रहे हैं
ख्वाब यूं पल रहे हैं




परीक्षा...साधना वैद
पास या फेल
मेहनत का फल
मिल जाएगा

पास हो जाते
खूब मन लगा के
जो पढ़ लेते

बात पते  की....डॉ. सुशील जोशी

बस एक
मेरी 
परेशानी
का तोड़ 
निकाल

बैचेनी है 
बेचनी
कोई तो 
खरीददार
ढूँढ निकाल।
...

दें इज़ाज़त यशोदा को
सादर









मंगलवार, 21 मार्च 2017

613...बावजूद तकलीफों के लोग कहाँ पहुँच गए 

जय मां हाटेशवरी...

क्या खूब लिखा है...

ऐसे भी लोग थे जो रास्ते पर बैठ के पहुँच गए
वरना सड़कों पर दौड़ते तो रहे बहुत से लोग
तारीख जब भी करवट ले रही थी इतिहास में
इंकलाबियों को कोसते तो रहे बहुत से लोग
बावजूद तकलीफों के लोग कहाँ पहुँच गए
परेशानियों को सोचते तो रहे बहुत से लोग
...आज की प्रस्तुति में...
ब्लॉगों के दबे खजाने से कुछ रचनाएं...

शिवम् सुन्दरम् गाती है
मासों में मधुमास अकेला अनुराग मिलन के रंग भरे
भरता मधुर विरह पीड़ा जो सहज ह्रदय उग आती है
शिशिर गयी, पतझड़ बीता, तरु किसलय जब लाते "श्री"
फूली सरसों देख, कृषक जन मन में मस्ती छाती है

दुख
कुछ दुख हमसे बात भी करते हैं
उनकी पनीली आंखें
हमारे कातर चेहरों पर टिकी होती हैं
उनके भुरभुरे हाथ हमारे अनमने कंधों पर पड़े होते हैं।
वे बंधाते हैं धीरज,
भरोसा दिलाते हुए कि वे देर तक नहीं रहेंगे
चले जाएंगे जल्दी।
कुछ दुख हो जाते हैं इतने आत्मीय
कि उनके बिना अपना भी वजूद लगता है आधा-अधूरा।

स्वप्न न बुनूँ ....तो क्या करूँ ....??
गुनगुनी सी धूप और ये कोमल शब्द-
सुरभित अंतर
कल्पना दिगंतर
भाव  झरते निरंतर
स्वप्न न बुनूँ ....तो क्या करूँ ....??

फ़िलवक़्त .......!
जिस दिन ये।
खो जाऊँगी जंगल में …
फ़िलवक़्त
बस, बह रहे हो
नदी में
समंदर से ……… !!

मैं यहाँ तू वहाँ [ गजल ]
सुलगती रोज है, आग दिल में पिया
यादें मिटती नहीं ,चाहे जाओ यहाँ |
अश्कों में रात दिन,बहते जज्बात हैं
ख्यालों में तुम मिले, मिट गई दूरियाँ |
आ गए पास तुम, जी उठी धड़कनें
कन्धे तेरे पे सर,रख करूँ मैं बयाँ |

अहिल्‍या - ना शबरी..
तुम्‍हारी आधी सांस में पूरी आस हूं
आधा तुम्‍हारे मन का पूरा संकल्‍प हूं,
संकल्‍प हूं जीवन का - स्‍व को सहेजने का
तुम्‍हारे कर्तव्‍य पर आधा अधिकार हूं
सपनों का समय नहीं बचा अब,
संग चलकर साथ कुछ बोना है,
बोनी हैं अस्‍तित्‍व की माटी में,
अपनी हकीकतें भी मुझको...

आज बस इतना ही...
चलते-चलते ये रचना भी अवश्य पढ़े...
अज्ञान तिमिर
धन्यवाद।





















सोमवार, 20 मार्च 2017

612....निगल और निकल यही रास्ता सबसे आसान नजर आता है

सादर अभिवादन....
निगल लिया मार्च को भी
2018 ने.... तनिक से थोड़ा जियादा समय
बचा है.....मताधिकार पाने के लिए


आज की पसंदीदा रचनाएं.....


लीक से हटकर
जैसे किसी आत्मा ने पटेल बा पर अपनी सवारी उतार दी हो इस तरह 
पटेल बा ने जोर-जोर से चिल्लाना, आवाजें लगाना शुरु कर दिया - 
‘डरना मत रे! घबराना मत रे! ये डाकू नहीं हैं। ये तो अपने पुलिसवाले हैं।’ छोटा सा गाँव और कवेलू की छतें। पटेल बा की आवाज गाँव के 
हर घर में गूँज उठी। जिनकी अफीम थी वे तो पहले से ही अधजगे थे। वे तो पूरे जागे ही जागे, बाकी गाँव भी जाग गया और पटेल बा का मकान मानो पंचायत घर में बदल गया। जिनका ‘माल’ था, वे चीतों की तरह झपटे। अपना-अपना ‘माल’ कब्जे किया। ठिकाने लगा कर वापस 
पटेल बा के घर पहुँच, भीड़ में शामिल हो गए।


पहली बार
प्रकृति हैरान थी
बहुत कोशिश की गयी
बदलाव को रोकने की
परंपरा -संस्कृति की दुहाई दी गयी
धर्म -ग्रंथों का हवाला दिया गया
पर ..... स्थितियां बदल चुकी थीं

ये निगाहें इक अजीब सा ही गुनाह किये जाती हैं,
इधर-उधर भटकती सी तुम पे ही ठहर जाती हैं।
ये ज़ुबाँ है कि लफ़्ज़ों संग खेलना शौक है इसका,
पर क्यों ये तुम्हारे सामने बेज़ुबान सी बन जाती है।

पथ भ्रष्ट नही कर पाओगे............डॉ. अपर्णा त्रिपाठी
पग डगमग कितने कर लो
पथ भ्रष्ट नही कर पाओगे
भले बिछा लो शूल मार्ग में
पर अनिष्ट नही कर पाओगे


यूँ ही....विभारानी श्रीवास्तव
वय आहुति पकी वंश फसल गांठ में ज्ञान
जीवन संध्या स्नेह की प्रतिमूर्ति चाहे सम्मान
एक जगह रोपी गई दूजे जगह गई उगाई
बिजड़े जैसी बेटियाँ आई छोड़ पल्लू माई

ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर........जां निसार अख्तर
जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में 
शरमाए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो 
संदल से महकती हुई पुर-कैफ़ हवा का 

झोंका कोई टकराए तो लगता है कि तुम हो 


अभी तो बस चलना  सीखा
चढ़ा दिया मेहनत की सीढ़ी
बचपन इनका छीन लिया 
चेहरे से मुस्कान भी छीनी


पचता 
नहीं भी है 
फिर भी 
निगलना 
जरूरी 
हो जाता है 

‘उलूक’ 
चूहों की दौड़ 
देखते देखते 
कब चूहा हो 
लिया जाता है 
.......
आज्ञा दें
यशोदा को
सादर



रविवार, 19 मार्च 2017

मेघ की बेचैनी. .....611

नमस्कार दोस्तो 

सुप्रभात  
उत्तरप्रदेश मे तो योगी राज आ गया  । 
  दोस्तों  जीवन मे सुख -दुख और हानि - लाभ रात-दिन की तरह है जिस प्रकार रात के बाद दिन होता है  उसी प्रकार दुख के बाद सुख जरूर आता है, इसलिए दुख से नही घबराना चाहिए ।

        आइए अब चलते है आज की पाँच लिंको की ओर. . . . . .  

मेघ की बेचैनी

          इस यक्ष को अब मेघ से ईर्ष्या हो गई थी । मेघ को अब दूत बनाने के ख्याल से वह शंदेह के बादलो से घिर गया था।
              वह प्रेयसी का सौंदर्य वर्णन नहीं करना चाहता था।उसे डर था उन तालों में कितनी नवयौवना के झांघो पर दृष्टि से नजर फिसले कही वो उसी से मोहित न हो  जाए। आखिर कुछ भी है ,है तो इंद्र का दास ही। उसकी लोलुपता और गौतम के श्राप को कौन नहीं जानता।

छड़ी कबूतर



कबूतर तो वही कर रहे थे जो वे न जाने कब से करते आ रहे हैं. लेकिन अनुज और अजय क्यों उलझ गए! इस उलझन से निकलना आसान नहीं था.और फिर ऐसा क्या हुआ. ..
             
अनुज दोपहर में दो बजे स्कूल से लौटता है. आते ही माँ गरम भोजन परोस कर कहती हैं –खाकर कुछ देर आराम कर ले,फिर..’ फिर उसे ट्यूशन पर जाना होता है- ठीक चार बजे. इस दिनचर्या से रविवार को ही छुटकारा मिलता है. भोजन के बाद अनुज जैसे जबरदस्ती लेट जाता है. कभी नींद लग जाती है तो कभी इसी सोच में समय बीत जाता है कि रविवार के दिन दोस्तों के साथ कैसे मस्ती करेगा.       

दर्द ...

अपना अपना अनुभव है जीवन ... कभी कठोर कभी कोमल, कभी ख़ुशी तो कभी दर्द ... हालांकि हर पहलू अपना निशान छोड़ता है जीवन में ... पर कई लम्हे गहरा घाव दे जाते हैं ... बातें करना आसान होता है बस ...

लोग झूठ कहते हैं दर्द ताकत देता है
आंसू निकल आएं तो मन हल्का होता है
पत्थर सा जमा
कुछ टूट कर पिघल जाता है

उलझन

आजकल मैं उलझन में हूँ.


देख नहीं पाता खुद को

आईने में,
सुन नहीं पाता
अपनी ही आवाज़,
रोक नहीं पाता खुद को 
चलने से.

फेस बुकिया कैसे कैसे


कई लोग फेस बुक पर इस तरह लाईक करते नजर आते हैं मानो कोई नेता रोड़ शो में सबका हाथ हिला हिला कर अभिवादन कर रहा होदेखा पहचाना किसी को नहींहाथ हिलाया सबको.इनका संघर्ष मात्र इतना सा है कि आप देख लो कि यह सक्रिय हैं और आपको पसंद करते हैं.

   अब दीजिए आज्ञा 
विरम सिंह 

शनिवार, 18 मार्च 2017

610 .... बधाई



सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

चलिए होली का हो हो समाप्त हुआ
समय निकलेगा पढ़ने के लिए






यह  है  हमारी   नाज़ुक  कली,
संभालना  होगा बड़ी नजाकत से.
लग न जाए इसे किसी की नज़र ,
बचाकर  रखना  होगा नफासत से. 
हमारे प्यार व्  ममता ने हमसे कहा 






माँ भारती की सेवा और रक्षा हेतु आपको और अधिक साहस,सामर्थ, 
इच्छाशक्ति प्रदान करें, आप प्रगति पथ पर निरंतर उन्नति प्राप्त करें, 
आपकी यश कीर्ति इस संसार के समस्त कोनों में सूर्य के प्रकाश की तरह ऊर्जा 
और चन्द्रमा के प्रकाश की भांति शीतलता प्रदान करें, दुःख,
 शोक, भय आपको छूकर भी ना निकले.उस सर्वशक्तिमान परमपिता परमेश्वर से 
यह प्रार्थना है कि मेरी हर प्रार्थना को जो मैंने आपके लिए की है,वो पूर्ण हो."






यह बहुत ही महत्वपूर्ण उम्र होती है
जहाँ सबसे ज़रूरी होता है एक अनुभवी प्रेमी का अनुभव
पर अफ़सोस अपने अनुभव को सबसे श्रेष्ठ और सबसे पवित्र बताते हुए
हम ठगे जाते हैं
कभी-कभी हम जीत जाते हैं और जश्न मनाते हुए
रंगे हाथों पकड़ लिए जाते हैं अपने अन्दर ही









जो हारकर , छोड़ जाने की बात करते हैं.
हम तो बस उन्हें होश में आने की दुआ करते हैं.

वो खुद के घर को रोशनी से भर रहे बेशक,
मगर, औरों के घरों में तो धुंआ भरते हैं.








जीने दो मुझे मिट्टी बन कर,
नहीं चाहती मैं ऊँचे आसन.
उड़ने दो अब पाखी बनकर,
रहने दो अब झूठे चंदन.


<><>


फिर मिलेंगे

विभा रानी श्रीवास्तव




शुक्रवार, 17 मार्च 2017

609...फूलों में खुशबू कहाँ से आती है?


जय मां हाटेशवरी...

रामायण का एक छोटा सा प्रसंग है जब भगवान श्रीराम को वनवास हो गया, वे लक्ष्मण और सीता के साथ चित्रकूट में रहने लगे। उधर अयोध्या में राजा दशरथ की मौत हो गई, भरत उनके अंतिम संस्कार और क्रियाकर्म के बाद श्रीराम को अयोध्या वापस लाने के लिए चित्रकूट पहुंचते हैं। भरत जब श्रीराम के आश्रम में पहुंचते हैं तो देखते हैं कि वहां कई संत जुटे हैं। तीन बातों पर चर्चा चल रही है ज्ञान, गुण और धर्म। संतों के साथ बैठकर श्रीराम इन्हीं विषयों पर गहन चर्चा कर रहे थे। लक्ष्मण और सीता भी गंभीरता से सुन रहे हैं।
थोड़ी देर तो भरत भी देखते ही रह गए। जिस श्रीराम को अपने नगर से निकालकर वन में भेज दिया गया हो। जिसके राजतिलक की घोषणा करने के बाद उसे सन्यासी बना दिया गया हो, वो कितने शांत मन से संतों के साथ बैठे हैं। फिर भरत आश्रम में पहुंचे और फिर श्रीराम-भरत के मिलन की घटना घटी।
श्रीराम-भरत के मिलन का दृश्य देखने, पढ़ने या सुनने में साधारण लगता है, लेकिन इसके पीछे एक बहुत ही गंभीर और उपयोगी संदेश छिपा है। हम परिवार के साथ बैठते हैं तो बातों का विषय क्या होता है। इस दृश्य में देखिए, एक परिवार के सदस्यों में क्या और कैसी बातें होनी चाहिए। अक्सर परिवारों में ऐसा नहीं होता, घर के सदस्य साथ बैठते हैं तो या तो झगड़े शुरू हो जाते हैं, पैसों पर विवाद होता है या फिर किसी तीसरे की बुराई की जाती है। इससे परिवार में अंशाति और असंतुलन आता है। हम जब भी परिवार के साथ बैठें तो चर्चा के विषय ज्ञान, गुण, धर्म और भक्ति होना चाहिए। इससे आपसी प्रेम तो बढ़ेगा ही, विवाद की स्थिति भी नहीं होगी। परिवार में हमारा बैठना सार्थक होगा।
...जो पढ़ा....पेश है आप के लिये उसके कुछ अंश...



फूलों में खुशबू कहाँ से आती है?
करीब दो हजार साल पहले यह माना जाने लगा था कि कोई बड़ा इलाका दुनिया के दक्षिण में है। एक मान्यता यह भी थी कि ऑस्ट्रेलिया का दक्षिणी इलाका दक्षिण अमेरिका से जुड़ा है। पर 1773 में ब्रिटिश अन्वेषक कैप्टेन जेम्स कुक ने अपने दो जहाजों के साथ अंटार्कटिक सर्किल को पार करके उस सम्भावना को खारिज कर दिया। जबर्दस्त ठंड के कारण कैप्टेन कुक को अंटार्कटिक के सागर तट के 121 किलोमीटर दूर से वापस लौटना पड़ा। इसके बाद सन 1820 रूसी नाविकों फेबियन गॉतिलेब वॉन बेलिंगशॉसेन और मिखाइल लजारोव ने अंटार्कटिक को पहली बार देखा। उसके बाद कई नाविकों को इस बर्फानी ज़मीन को देखने का मौका मिला।

हाहाकार वहां है, जहां खबर नहीं है
अब सवाल यही उठता है कि नक्सलियों के रोमांटिसिज्म में या फिर हिंसक विचारधारा के प्रभाव में भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने का जुर्म साबित होने पर उम्रकैद होने से नक्सलियों या उनके बौद्धिक समर्थकों के बीच कड़ा संदेश जाएगा । दरअसल नक्सलियों के जो बौद्धिक समर्थक हैं वो उनके स्लीपर सेल के तौर पर काम करते हैं । रहा होगा किसी जमाने में नक्सलबाड़ी आंदोलन की नैतिक आभा लेकिन पिछले एक दो दशक से तो नक्सली खालिस अपराधी हो गए हैं जो ठेकेदारों से रंगदारी वसूलते हैं, लूटपाट करते हैं, बलात्कार करते हैं, अपने संगठन की महिलाओं पर जमकर यौन अत्याचार करते हैं । यह कौन सी विचारधारा है जो गांधी के इस देश में हिंसा का प्रचार प्रसार करती है । अब इसपर नक्सलियों को बौद्धिक आधार देनेवालों को भी गंभीरता से विचार करना चाहिए कि वो हिंसा के साथ हैं या अहिंसा के साथ ।  

पुराना शौंक
सोहन लाल की यह खुशी सिर्फ शाम तक थी। रात को उसके पिता और ताऊ दुकान से वापस आये। सोहन लाल ने बहुत प्रसन्नता से ट्रॉफी दिखाईं। पिता और ताऊ को जब यह पता चला कि ट्रॉफी संगीत के लिए मिली है तब दोनों बुरी तरह छोटे से सोहन लाल पर बिगड़ पड़े और सारा गुस्सा सोहन लाल की मां और ताई पर उतार दिया।
"तुम औरतों के लाड प्यार में लड़का सर पर बैठ गया है। हम सारा दिन दुकान पर होते है और व्यापार को बढ़ाने में रात दिन एक कर रहे हैं और तुम औरतों ने इसको भांड बना दिया है। हम व्यापारी लोग हैं। हमारे खानदान का नाम है, इज़्ज़त है। बच्चों को पढ़ने भेजते हैं स्कूल में कि कुछ पढ़ लिख कर हमारे व्यापार में चार चांद लगाएगा और तुम इसे भांड बनाने में लगी हो। शादी विवाह में नाच गा कर पेट भरेगा। हमारे व्यापार की इज़्ज़त है मान मर्यादा है। सब सेठ जी कह कर बुलाते है। छाती चौड़ी हो जाती है सुन कर और तुम इसे भांड मिरासी बनाना चाहती हो। मिट्टी में मिला दी सारी मान मर्यादा तुम औरतों ने। गाना सुनने का इतना शौंक है बुलवा लेते हैं भांड को। खबरदार आज के बाद इसने या किसी और बच्चे ने गाने गाए। हमने भांड नही बनाना बच्चों को।"
घर की औरतों की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई। कोई चूं नही कर सका। अगले दिन स्कूल पहुंच कर संगीत मास्टर की क्लास ले ली और सख्त हिदायत दी कि सोहन लाल को संगीत नही सिखाना।

बाप का साया
“क्यों तुम्हारा घरवाला कुछ भी नहीं कमाता क्या ? सारी जिम्मेदारी तुम्हारी ही है ? वह भी तो कारखाने में काम करता है ना ?” मुझे गुस्सा आ रहा था !
“कमाते क्यों नहीं हैं ! खूब अच्छे पैसे मिलते हैं उन्हें ! लेकिन घर खर्च के लिए कभी सौ रुपये भी नहीं दिए ! सारे पैसे दारू और जूए में कहाँ खर्च हो जाते हैं
ये तो वो ही जाने ! उलटे मुझसे ही माँग कर ले जाते हैं ! मना कर दूँ तो रोज़ कलेस हो घर में !”
“अरे तो क्यों उसका पल्लू थामे बैठी हो ! पीछा छुडाओ उससे अपना !” मैं उत्तेजित होकर बोली !
“कैसी बातें कर रही हो दीदी ?” कमला का चेहरा बेरंग हो उठा था ! “वो जैसे भी हैं मेरे सारे तीज त्यौहार चूड़ी, बिंदी, सिन्दूर, बिछुआ सब उन्हीं से तो हैं दीदी ! घर में पैसे नहीं देते तो न सही पर बच्चों के सर पर बाप का साया तो है !”
अब अवाक होने की बारी मेरी थी !

खो चुका है अपने सारे रंग लोकतंत्र
वोटर को उंगलियों  पर नचाने का खेल है लोकतंत्र
झूठ की चाशनी चटाने का नाम है लोकतंत्र
सुनो, सम्भल के इसे छूना, इसकी है बडी तेज़ धार
देश ही नहीं रिश्तों पर भी इसने किया है खूब प्रहार।

जीवन रोशनी - मनोरंजन कुमार तिवारी
तुम अक्सर कहा करती थी ना की,
बोलने से पहले सोचा करो,
सिर्फ यही एक इच्छा पूरी की है मैने, तुम्हारी,
अब जबकि तुम साथ नहीं हो,
आँखों की चमक और रोशनी गुम होने लगी है,
अनजाने डर व आशंकाओं की परछाइयों में उलझ कर,
अब उड़ने को पंख नहीं, पैरों से चलता हूँ,
आज बस इतना ही...
धन्यवाद।















गुरुवार, 16 मार्च 2017

608......खुजली ‘उलूक’ की

सादर अभिवादन
हिन्दी वर्ष का अंतिम उत्सव के साथ
समापन हो रहा है...
बेसब्री से प्रतीक्षा है 
मातेश्वरी का
हिन्दू नव-वर्ष की अग्रिम शुभ कामनाएँ

आज की पसंदीदा रचनाएँ.........

आज पहली बार प्रवेश कर रहे हैे
श्री ध्रुव सिंह जी "एकलव्य"



डर लगता है फिर वही,
आँखें मूंदने से 
सपनें देखने से  
उनके टूटने से 
अश्क गिरने से
अरमान बहने से
दरिया बनने से

ओ हसीन तन्हा चाँद
ओ झिलमिल सितारों
उतर आओ जमीं पर
रात के खामोश दामन पर
महफिल हम जमायेगे
चंदा तुम फूलों को चूमकर
अपनी दिल की बात कहना


चतुर एकलव्य..........शोध छात्रा हेमलता यादव
निषाद-पुत्र
एकलव्य का
दाहिना अंगूठा आज
तक नहीं उग पाया।
गुरु द्रोण
जो उच्चवर्ण के
एकाधिकार संरक्षण हेतु
मांगा था आपने।

इस शहर के लोग..........डॉ.टी.एस.दराल  
लोग पैट पालने का शौक तो पाल लिया करते हैं ,
लेकिन पैट का पेट फुटपाथ पर साफ़ कराते हैं जिस पर खुद चला करते हैं।
फिर कहीं पैर में पैट का पेट त्याग न लग जाये ,
इस डर से इस शहर में लोग सर उठाकर नहीं , सर झुकाकर चला करते हैं।


किस लिए............आशा सक्सेना
आपने क्रोध जताया
किस लिए
डाटने में मजा आया
इसलिए
या हमने कुछ
गलत लिया इसलिए

post-feature-image
मेरा 'अंश' आगे बढ़ा !!!....... ज्योति देहलीवाल
हां दोस्तो, 11 मार्च 2017 का दिन मेरे लिए एक विशेष खुशी का पैगाम लेकर आया। इस दिन मैं एक नन्हीं सी परी की नानी बन गई, नानी...! कितना अच्छा लगता है न यह संबोधन! विश्वास ही नहीं होता...कल तक जो खुद एक बच्ची थी, वो आज इतनी बड़ी हो गई कि एक बच्ची की माँ बन गई! कभी-कभी मन में विचार आता है कि जिस लड़की से यदा-कदा बुखार आने पर क्रोसिन की एक गोली गिटक के नहीं होती थी...वो लड़की डिलीवरी में इतनी गोलियां कैसे गिटकती होगी? कैसे सहन किया होगा उसने इतना दर्द? उसकी नॉर्मल डिलीवरी हुई है। उस वक्त तो बहुत दर्द होता है...कैसे सहा होगा ये दर्द मेरी बच्ची ने?

अब और नहीं...........ऋता शेखर 'मधु'
भोजन का वक्त हो चुका था| देवरानी अन्दर देखने आई तबतक उर्मिला जी माँड पसा रही थीं| उत्सुकतावश देवरानी ने वह कागज उठा लिया| पढ़ते ही स्याह हो गई| फिर खुद को संयत करते हुए बोली, ‘’जिज्जी, अब इस उम्र में नौकरी....’’ ‘’छोटी, देख , इस काठ की हाँडी में मैने चावल पकाया है| आगे यह हाँडी नहीं चढ़ेगी|’’ ‘’जी, जिज्जी’’ समझदार देवरानी, जेठानी के स्वाभिमान से दीप्त चेहरे को पढ़कर चुप रह गई|


बात पते  की....डॉ सुशील जोशी

इस बार
वो भी
देशभक्तों
के साथ
आ रहे हैं
समझा रहे हैं

समझिये
देश भक्त
देशभक्ति
चुनाव और
लोगों की
सक्रियता

....
इजाजत मांगती है यशोदा
सादर












बुधवार, 15 मार्च 2017

607...जो सड़कों पर भी सोते हैं ,सिरहाने ख्वाब रखते हैं


जय मां हाटेशवरी...

पांच राज्यों के चुनाव में...
भारत की जनता ने...
न नोट बंदी का बदला लिया...
न ही मंदिर बनाने को कहा...
मैं इसे मोदी जी का जादू भी नहीं कहूंगा...
मुझे तो इस चुनाव-परिणाम में...
अभी भी जनता के मन में...
अच्छे दिन  आएंगे......
ये आशा कि किरण ही नजर आई...
यहाँ रोटी नही “उम्मीद” सबको जिंदा रखती है

जो सड़कों पर भी सोते हैं ,सिरहाने ख्वाब रखते हैं

कल नहीं आ सका था...
...इस लिये पांच लिंक मेरी पसंद के...


खुद को भारतीय कहने वालो गर्व करो-
हमारे प्राचीन ग्रंथों में वर्णित ब्रह्मास्त्र, आग्नेयास्त्र जैसे अस्त्र अवश्य ही परमाणु शक्ति से सम्पन्न थे, किन्तु हम स्वयं ही अपने प्राचीन ग्रंथों में वर्णित विवरणों को मिथक मानते हैं और उनके आख्यान तथा उपाख्यानों को कपोल कल्पना, हमारा ऐसा मानना केवल हमें मिली दूषित शिक्षा का परिणाम है जो कि, अपने धर्मग्रंथों
के प्रति आस्था रखने वाले पूर्वाग्रह से युक्त, पाश्चात्य विद्वानों की देन है, पता नहीं हम कभी इस दूषित शिक्षा से मुक्त होकर अपनी शिक्षानीति के अनुरूप शिक्षा प्राप्त कर भी पाएँगे या नहीं।

डाल झुकीं तरुणी के तन सी
जीवन के दो पंथ निराले,कृष्ण की भक्ति अरु प्रिय को पाना
दौनों ही मस्ती के  पथ हैं  , नित होवे है आना जाना--..!!
चैत की लम्बी दोपहरिया में– जीवन भी पलपल अनुमाना
छोर मिले न ओर मिले, चिंतित मन किस पथ पे जाना ?

समाज बदलने को तत्पर ये साहसी महिलाएं
सऊदी में कार चलाने तो फ्रांस में समान वेतन के अधिकार के लिए। पाकिस्तान में घरेलू हिंसा तो अमेरिका में राजनेताओं की भद्दी टिप्पणियों से बचने को। दुनिया के कई देशों में आधी आबादी बड़ी-बड़ी लड़ाइयां लड़ रही हैं। बीते साल मई में पाकिस्तान के काउंसिल ऑफ इस्लामिक आइडियोलॉजी ने एक प्रस्ताव पेश कर पत्नियों की पिटाई को जायज ठहराया। इसके बाद ट्विटर पर ट्राईबीटिंगमीलाइटली अभियान शुरू हो गया। हजारों महिलाओं ने फोटो के साथ संदेश पोस्ट कर लिखे कि जैसे पति ने पीटा तो उसके हाथ तोड़ दूंगी। अमेरिका में इस साल 21 जनवरी की तारीख सबसे बड़े महिला आंदोलन की गवाह बनी। वाशिंगटन शहर में लाखों महिलाएं गुलाबी टोपी पहने सड़कों पर उतरीं।

BJP चक्रवर्ती सम्राट, समाजवादी घर को लगी आग़ घर के चराग़ से : खुशदीप
अमित शाह ने जब टिकटों का बंटवारा किया था तो उन्हें जरूर कुछ आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था लेकिन जिस तरह उन्होंने जातिगत समीकरणों को साधा उससे साबित हो गया है कि उनसे बड़ा चुनावी रणनीतिकार इस वक्त देश में और कोई नहीं हो. पिछले कुछ विधानसभा चुनावों को देखें तो बीजेपी की नीति रही है कि किसी राज्य में जो जाति भी सबसे प्रभावी है, उसके सामने बाकी सभी जातियों को जोड़ा जाए. बीजेपी ने ये कार्ड हरियाणा में गैर जाटों, गुजरात में गैर पटेलों और महाराष्ट्र में गैर मराठाओं को साथ जोड़कर चला. अब यही दांव उसने यूपी में गैर यादव ओबीसी और गैर जाटवों को लुभा कर अपने खेमे में लाने से चला. नतीजों से साबित है कि ये दांव बीजेपी को यूपी में खूब फला भी. नोटबंदी से बड़ा मुद्दा यूपी में कानून और व्यवस्था की बदहाली का साबित हुआ.

तुम आदमी नहीं...
ये तुम्हारा घर इंसानियत की कब्र है
ये तुम्हारा स्पन्दन करता यकृत
खोपड़ी की गुथम्म-गुत्था
साजिशो का साज है

धन्यवाद।

















मंगलवार, 14 मार्च 2017

606...होली ठैरी होला ठैरा ठैरा तो ठैरा ठैरा ठैरा ठैरी छोड़ ठर्रा ठर्री क्यों कहना ठैरा

सादर अभिवादन
आज भाई दूज है
सभी को गुलाल का टीका...
सोच रही थी आज का अवकाश घोषित कर दूँ
पर करूँ तो करूँ क्या
होली खेल कर वापस आए और खा-पी कर खर्राटे भर रहे हैं..
भाई कुलदीप भी चण्डीगढ़ में है..
चलिए आज की पढ़ी -सुनी रचनाओं का आस्वादन करें...

उस दिन अगर उसके पापा ने उसे ठीक से समझाने के बजाय डाँटा या मारा होता तो क्या वो आज वो बन पाया होता, जो वो आज बन पाया है। शायद वो कहीं भटक कर अपनी राह खो चुका होता। पुरानी बातें याद करके उसके चेहरे पर फिर से एक मुस्कान आ गयी। जाती हुई ठण्ड का मौसम उसे सबसे ज़्यादा पसंद था। और इस साल तो ये मौसम उसके लिए एक अच्छी सौग़ात लेकर आया था। 

चिमटा चला के मारा, बेलन घुमा के मारा 
फिर भी बचे रहे तो, भूखा सुला के मारा 

बरसों से चल रहा है, दहशत का सिलसिला ये 
बीवी ने जिंदगी को, दोजख बना के मारा

जागा फागुन  
एक साल के बाद,  
खिलखिलाता!  

सब हैं रँगे  
फूल तितली भौंरे  
होली के रंग!  

मायावती , मुलायम और अखिलेश के लखनऊ में रोड शो की तैयारी पूरी हो गई है । पारिवारिक एकता की मिसाल के तौर पर डिंपल यादव , अपर्णा यादव और साधना गुप्ता भी साथ रहेंगी , प्रतीक यादव की फरारी में जिसे गायत्री प्रजापति चलाएंगे। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इस नए गठबंधन को तहे दिल से अग्रिम बधाई भेजी है । कहा है कि इस गठबंधन से भारत में सेक्यूलरिज्म की रवायत और मज़बूत होगी ।



क्या कहना ठैरा 
नमन करो 
शीश नवाओ 

ठैरा ठैरी की 
होली ठैरी 
आने जाने 
वाली ठैरी 
मौज मनाओ 
ही कहना ठैरा।

आज्ञा दें यशोदा को
सादर


एक सीढ़ी ऐसी भी जिसके हर पायदान मे सुर है





सोमवार, 13 मार्च 2017

605....गीता में कही गयी हैं बातें वही तो हो रही हैं नजर आ रहा है मत कहना ‘उलूक’ पगला रहा है

सादर अभिवादन
कल रात भस्म हो गई होलिका
आज मनाया जा रहा है रंगोत्सव
एक उत्सव तो शनिवार को भी मनाया गया था
रंगोत्सव के साथ-साथ दीपावली का भी माहोल था
उत्तर प्रदेश व देवभूमि उत्तराखण्ड में

आज की पढ़ी रचनाएँ...
चल री सखी हम ब्रज को जाएं
अब की होली कुछ ऐसी मनाएं 
रंग लें खुद को कान्हा के रंग में
और सारे दुख भूल जायें

आया रंगीला फागुन, लेकर फाग दुबारा 
दिल के धड़कने देख, दिलवर को पुकारा | 
जहां राधा वहीँ कृष्ण, वहीँ आनन्द वहीँ प्रेम 
मथुरा वहीँ, बृज वहीँ, बरसाने वहीँ क्षेम | 

मन में उमंग लिये,
सखियन को संग लिये।
आई मदमाती नारि,
विरज की खोरी में।
पुकारती फिरे नाम,
छोड़ूँगी नहीं आज श्याम।
चटक रंग घोरि लाई,
बौरी कमोरी मे....


स्नेह रंग.....शशि पुरवार
गली गली में घूम रही है 
मस्तानों की टोली 
नीले, पीले, रंग हठीले 
आओ खेलें होली 


लालसा की होलिका में....रश्मि शर्मा
प्रह्रलाद की तरह
आज
हर इंसान जल रहा है
माया-मोह-लालसा
की होलिका में...
इन्‍हें कि‍सी
हि‍रणकश्‍यप ने
अपने अंहकार के वशीभूत हो
आग में
जलने को वि‍वश
नहीं कि‍या है....




मेरे लिये शब्द एक औजार है.
भीतर की टूट फूट/
उधेड़बुन अव्यवस्था और
अस्वस्थता की शल्यक्रिया के लिये.



पढाई की स्कॉलरशिप का सपना देख रही थी। उस छात्रवृत्ति के लिए सुलोचना को फैशन डिप्लोमा की आवश्यकता थी जिसकी फीस लाखो में थी। सूर्य को जब यह बात पता चली तो उसने अपने सभी संसाधन सुलोचना के डिप्लोमा की तरफ केंद्रित किये। अपनी दूकान बेचकर उसने किसी तरह सुलोचना की फीस भरी। 

क्षमा समुद्र क्षमिय अब जननी कयलहुँ चुक हजारा हे। 
जननी उदर जखन हम अयलहुँ - कयलहुँ धर्म विचारा हे।। 
अबितहिँ एतय सकल हम बिसरल राखल किछु ने विचारा हे। 
धर्म सनातन मर्म न जानल नव - नव सिखल अचारा हे।।

आज नया  दिन 
अग्नि समेटे निज दामन में 
उगा गगन में अरुणिम सूरज 
भर उर में सुर की कोमलता 

‘उलूक’ 
तूने पेड़ 
पर ही 
रहना है 
रात गये ही 
सुबह की 
बात को 
कहना है

तुझे 
किस बात 
का मजा 
आ रहा है 
.........
कल जो हुआ सो अच्छा हुआ
 आज भी अच्छा ही हुआ
कल क्या होगा
इसकी चिन्ता क्यूँ

रंगोत्सव की शुभ कामनाएँ
आज्ञा दें सादर
यशोदा









रविवार, 12 मार्च 2017

604...होली

  सुप्रभात दोस्तो 
नमस्कार 
सभी को पांच लिंको का आनंद और gyandrashta.com की तरफ से होली की हार्दिक बधाई और शुभकामनाये ।

आज होली है रंगो का और उल्लास का त्योहार है । आज उत्तरप्रदेश केशरिया रंग मे रंगा हुआ है । तो पुरा भारत रंग बिरंगे फूलो के बगीचे के समान दिख रहा  है । आप का जीवन  भी उल्लास से  और रंगो से भरा हो यह ही हमारी  कामना है ।

आइए अब चलते है आज की पाँच लिंको की ओर. . . . 



       
       रंग
रंग-रंग गुलज़ार हुआ है 
जब रंगों से प्यार हुआ है।

ए गुलफाम! बदन को देख 
रंगों का गुलदार हुआ है।

मेरे हाथों की लाली से 
सनम मेरा गुलइज़ार हुआ है।


होली खेलते समय रखें ये सावधानियां 

रंगों का त्यौहार होली हमारे जीवन में ढेर सारी खुशियों के रंग भर देता है. लेकिन कभी कभी हमारी लापरवाही या दूसरों की असावधानी के कारण इस रंग में भंग पड़ जाता है. इसीलिए आज हम आपको होली खेलने के दौरान कुछ ऐसी सावधानियों के बारे में बता रहे हैं जो आपकी
  1. त्वचा
  2. बाल और
  3. आँखों
की सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण है.

देश की होली

माटी का चन्दन गुलाल
हर भाल लगायेंगे
देश में होली हम ऐसे मनायेंगे

बन्दूकों की पिचकारी 
से दुश्मन मार भगायेंगे
तोपों में भर बारूद
हर आतंक को मिटायेंगे
अब के बरस होली 
हम ऐसे मनायेंगे

          होली

होली में तुम्हें 
जो ख़त लिखने बैठा,
तो अचानक स्याही फ़िसल गई,
नीला हो गया सब कुछ- 
कुरता -पाजामा, उँगलियाँ -
और अपनी ही उंगलियों ने 
चेहरा भी रंग डाला थोड़ा-सा.

       यूपी के बौराल होली

यूपी के बौराल होली
(अरुण साथी)
यूपी वाला पे फगुआ के
चढ़लो ऐसन उमंग,
दबा दबा के ईवीएम के
कैलक खूब हुड़दंग
जोगीरा सारा रा रा...
मोदी जी भी पी
लेलका जैसे भंग,
बोल-कुबोल से छोड़ा
देलका यूपी के जंग
जोगीरा सारा रा रा...
   

    अब दीजिए आज्ञा 
धन्यवाद  
विरम सिंह

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