पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

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शुक्रवार, 31 मार्च 2017

623.....काम तमाम कर ना चल शुरु होजा

सादर अभिवादन
इस माह की मेरी ये अंतिम प्रस्तुति है....
देखती हूँ नव लेखकों की ओर...
हिन्दी में मात्राओं की गलतियां नजर आती है
मैं समझती हूँ..वे ध्यान भी देंगे..उनकी अगली रचना मुझे
सुथरी व सुलझी मिलेगी... 
चलिए चलते हैं आज की रचनाओं की ओर..


शायरी   हो  ना   मेरी  खूब  तो  पानी   लिख  दे 
या तो फिर अहल-ऐ-कलम मुझको ज्ञानी लिख दे 

शेर   उला   मैं   कहे   देती   हूँ  ले   अहले  फ़न 
तू  है  फ़नकार  तो फिर मिसरा-ऐ-सानी लिख दे 

तुमसे बिछड़े तो इक ज़माना हो गया,
जख्म दिल का कुछ   पुराना हो गया।

टीसती है रह रहकर  यादें बेमुरव्वत,
तन्हाई का खंज़र कातिलाना हो गया।




झरता पत्ता-
क़ब्रों के बीच में मैं
निशब्द खड़ी


''सरहुल'' की बधाई......रश्मि शर्मा
'' एला रे सारजम बा 
एला रे हाड़ा गुन में 
एला रे खुडा़ सांगि‍न 
एला रे नसो रेन में '' 




कोई आहट पर भरमाए है ये मन क्यूँ,
बिन कारण के इतराए है ये मन क्यूँ,
कोई समझाए इस मन को, इतना ये इठलाए है क्यूँ,
बिन बांधे पायल अब नाचे है ये पग क्यूँ,
छुन-छुन रुन-झुन की धुन क्यूँ गाए हैं ये घुंघरू.....



My photo
ना जाने कब मुझे समझ आने लगी,
वो कुछ ना कह कर तुम्हारा मुस्करा देना,
ये अंदाज़ तुम्हारे....
ना जाने कब मेरी धड़कनो को बढ़ाने लगे..



बहुत कुछ 
बहुत जगह पर 
बहुत सारे लोग 
अपनी 
अपनी खुजली 
सबको 
खुजलानी 
होती है 
तू भी 
अपनी 
खुजला 
अपना काम
कर ना

आज्ञा दें यशोदा को
अब अप्रेल माह में मुलाकात होगी..
सादर







गुरुवार, 30 मार्च 2017

622...बहती पुरवाई सी चैताली-


जय मां हाटेशवरी...

वर्ष का तीसरा महिना भी....
"जयकारा माता रानी का" की गूंज के साथ...
बीतने ही वाला है...
31 मार्च के बाद...
नया बजट आरंभ होगा...
कुछ दिनों में वो भी पुराना हो जाएगा...
...देखिये आज के लिये मेरी पसंद...

सिर्फ़ कानुन से नहीं... इन तरीकों से लग सकती है शादी की फ़िजुलखर्ची पर रोक!-
हमारे देश में कानून की हालत यह है कि वहां पर संसद में एक कानून पास भी नहीं होता उसके पहले ही उस कानून से बच निकलने के दस रास्ते हमारे होनहार वकील ढूंढ निकालते है। क्या हमारे यहां कन्या-भ्रूण हत्या, बाल विवाह, दहेज़, भ्रष्टाचार इन पर कानून नहीं बने है? क्या कानून बनने से इन पर रोक लग सकी है? नहीं न? आज किसी भी कानून की असलीयत यह हो गई है कि जितना हम कानून को कठोर बनायेंगे, उतना ही उसे तोड़ने के लिए हम लोगों को प्रोत्साहित करेंगे। लेकिन यह बात सच है की कानून बनने से अपराधो पर पूरी तरह रोक नहीं लग सकती, पर अपराधों में कमी जरुर आती है। ठीक उसी प्रकार कानून बनने से शादी की फ़िजूलखर्ची पर भी सिर्फ़ कुछ प्रमाण में रोक लग सकती है।


बहती पुरवाई सी चैताली-
इसलिए इस दिन को बहुत खास मानती हूँ मैं....इस लंबे रास्ते को देखकर दुःख नहीं होता, खुश होती हूँ.... कि तुम साथ हो....पलाश से दग्ध जंगल और जीवन में भी। यूं भी तुम मुझे चैताली ही कहते हो....बहती पुरवाई सी चैताली .....और तुम .....मेरे पसंद के वो जंगली फूल हो जि‍सका नाम नहीं पता मुझको .....बस सुवासि‍त हूं


खतरनाक होता है प्यार-
ये तोड़ देता है ये समाज की वर्जनाओं को
मिटा देता है जात-पात की लकीरों को
लोगों के मन में भरी दिखावटी शान के दंभ को
चकनाचूर कर देता है आपका प्यार
वाकई बहुत खतरनाक होता है प्यार


ऐसा राजा जिसे इतिहास ने भूला दिया,
महाराज विक्रमदित्य ने केवल धर्म ही नही बचाया उन्होंने देश को आर्थिक तौर पर सोने की चिड़िया बनाई, उनके राज को ही भारत का स्वर्णिम राज कहा जाता है। विक्रमदित्य के काल में भारत का कपडा, विदेशी व्यपारी सोने के वजन से खरीदते थे भारत में इतना सोना आ गया था की, विक्रमदित्य काल में सोने की सिक्के चलते थे ,आप गूगल इमेज कर विक्रमदित्य के सोने के सिक्के देख सकते हैं।
विक्रमदित्य का काल राम राज के बाद सर्वश्रेष्ठ माना गया है, जहाँ प्रजा धनि और धर्म पर चलने वाली थी
पर बड़े दुःख की बात है की भारत के सबसे महानतम राजा के बारे में इतिहास भारत की जनता को शून्य ज्ञान देता है,

झूठ या सच राम जानें...-
कौन हो-हल्ला करे किसको पुकारे साथ को
अब मुझे तनहाइयों से घर सजाना आ गया
इसमें रत्ती भर हमारे यार की गलती नहीं
अपनी उम्मीदें ही बैरी थीं, मिटाना आ गया

रोटियों से भी लड़ी गयी आज़ादी की जंग
    भारत छोड़ो आन्दोलन का यह क्रान्तिकारी स्वरूप गांधी जी की अहिंसा और उनकी ‘स्व पीड़न’ की नीति पर एक तमाचा था। इस तमाचे और अहिंसावादियों के तमाशे के बीच सिर उठाती कटु सच्चाई केवल यही बयान करती है कि भारतवर्ष गांधी जी की अहिंसा से नहीं, क्रान्ति की फैलती ज्वाला के कारण आजाद हुआ। इस तथ्य को ‘चर्चिल’ इग्लैंड की लोकसभा में इस प्रकार रखते हैं-‘‘कांग्रेस ने अब अहिंसा की उस नीति को, जिसे गांधी जी एक सिद्धांत के रूप में अपनाने पर जोर देते आ रहे थे, त्याग दिया है और क्रान्तिकारी आन्दोलन का रास्ता अपना लिया है।’’

क्या है ज़िन्दगी ?
सब चीज़ों से परिपूर्ण नहीं, सब चीज़ों में परिपूर्ण है ज़िन्दगी
आत्मसुख नहीं, आत्मअनुभव है ज़िन्दगी |
फूलो की खुसबू , पंछी की आवाज़, पत्तो की सरसराहट, नदी का बहाव,
ज़िन्दगी वो नहीं जो तुम बनाओ, ज़िन्दगी वो है जो तुम्हे बनाये |

तलाक़ का ग्राउंड
जज साहब ने चश्मे के पीछे से महिला को भरपूर नज़रों से निहारा - हां, तो मोहतरमा, यह बताएं कि तलाक़ की ग्राउंड क्या है? महिला ने फुर्ती से जवाब दिया - जनाब, दो एकड़ में फैला एक आलिशान बंगला और...
जज साहब ने मुस्कुराते हुए बात काटी - आप समझीं नहीं। ग्राउंड से मेरी मुराद यह है कि ज़मीन क्या है?
महिला - वही तो मैं अर्ज़ कर रही थी कि आपने टोक दिया। हां, तो मैं बता रही थी कि दो एकड़ ज़मीन पर आलिशान बंगला और साथ में आम और अमरूद का बगीचा भी है।
जज साहब समझ गए किसी बेवकूफ़ पाला पड़ा है। आधा दिमाग रोज़ घरवाली खाली करती ही है। आज बाकी दिमाग यहां पहले ही केस में हो जाना है। उन्होंने महिला को समझाने की

धारा 375-भारतीय दंड संहिता
यौन उत्पीड़न एक ऐसा अपराध जिसमे पुरुष हमेशा शोषक व् नारी हमेशा पीड़ित की भूमिका में रहे हैं और इसी कारण कानून ने यहाँ भी इन्हें यही भूमिका दी है किन्तु विज्ञान के नए नए प्रयोग जोड़कर वर्त्तमान में कानून ने नारी की स्थिति को जो मजबूती दी है वह सुरक्षा पुरुष के व्यक्तित्व को नहीं दी या यूँ कहें कि नारी को
जो सुरक्षा दी गयी है उसके कारण पुरुष की सुरक्षा आज खतरे में पड़ गयी है और कानून का काम न्याय है सभी के साथ न कि किसी एक के साथ . नारी की प्राकृतिक दुर्बलता के कारण वह इस अपराध का शिकार बनती रही है किन्तु इसम भी दो राय नहीं कि वह इस धारा को पुरुष के खिलाफ हथियार रूप में इस्तेमाल करती
भी आ रही है और इसका अवसर स्वयं कानून उसे दे रहा है इस तरह-




धन्यवाद।



बुधवार, 29 मार्च 2017

621...अंत:विषय दृष्टिकोण क्या तुमको नहीं आता है

सादर अभिवादन
नव वर्ष की शुभकामनाएँ
हम शहर से बाहर हैं आज भी
सोचा, भाई कुलदीप जी को फोन कर दिया जाए
पर देवी जी लैपटॉप हाथ में देकर यह इशारा कर चली गई
मुझे तीन घण्टे लग जाएँगे..तब तक आप टॉईम पास कीजिए

सो...टॉईम पास की उपलब्धियाँ.....
अब नहीं होती उसकी आँखे नम जब मिलते हैं अपने
अब नहीं भीगतीं उसकी पलके देखकर टूटते सपने।

अब नहीं छूटती उसकी रुलाई किसी से उल्हानों से
अब नहीं मरती उसकी भूख किसी के भी तानो से।

उभरती हैं कुछ डूबती यादें, 
संग ए साहिल की तरह, 
कुछ उजले - उजले से हैं, 
भूले - बिसरे चेहरे, 
कुछ मद्धम - मद्धम , 
मीठे दर्द ए दिल की तरह। 

आदित्यनाथ ने सचमुच ‘योगी’ की तरह सरकार चला दी तो ???
आखिर एक योगी भ्रष्ट राजनीति और राजनेताओं की कतार में बैठना क्यूँ पसंद करेगा? राजनीति को रामनीति बनाकर योगी ही प्रदेश, देश की दिशा बदल सकता है. योगी आदित्यनाथ ऐसा कर पाएँगे, ये उम्मीद रखी जा सकती है, क्योंकि सत्ता में आने के दिन से ही योगी आदित्यनाथ ने अपनी सकारात्मक सोच को क्रियान्वित करना शुरू कर दिया है !

बहुत ही करीब से गुजर रही थी जिंदगी,
कितना कोलाहल था उस पल में,
मगर बेखबर हर कोलाहल से था वो पथिक,
धुन बस एक ही ! अपने मंजिल तक पहुचने की!


आज खुद को गले
लगा कर सोने को
जी करता है ,
अपने कंधे पर
सर रख कर
रोने को
जी करता  है ,

बस थोड़ी देर और ये नज़ारा रहेगा
कुछ पल और धूप का किनारा रहेगा

हो जाएँगे आकाश के कोर सुनहरे लाल
परिंदों की खामोशी शाम का इशारा रहेगा

सबसे विकराल प्रश्न जो उसके नन्हे से मस्तिष्क को विचलित कर रहा था वह यही था कि इतने बड़े संसार में अपनी अबोध बहन के साथ वह जीवित कैसे रहेगा !


इसमें वो 
बिल्कुल भी 
नहीं किया 
जाता है
तुमको अच्छी 
तरह से 
जो आता है 
और दूसरा 
उसको 
अच्छी तरह 
से समझ 
जाता है 
...
चलिए दोनों का काम हो गया...
करें वापसी सफर की तैय्यारी
आज्ञा है न दिग्विजय को
सादर





मंगलवार, 28 मार्च 2017

620...हिन्दू नव वर्ष विक्रम संवत 2074... और नवरात्र की हार्दिक शुभकामनायें...

जय मां हाटेशवरी...


पांच लिंकों का आनंद की ओर से...
समस्त पाठकों व चर्चाकारों को...
हिन्दू नव वर्ष विक्रम संवत 2074...
और नवरात्र की हार्दिक शुभकामनायें...
और शुभ नवरात्री...
भारतीय कालगणना के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही नव संवत्सर का आरम्भ होता है । वर्ष प्रतिपदा का मुहूर्त सभी शुभ कार्यो को प्रारंभ करने के लिए उचित माना गया है । भारत वर्ष में अत्यंत प्राचीनकाल से चली आ रही कालगणना युधिष्ठिर विक्रम संवत्, शालिवाहन, शक आदि का नव वर्ष प्रतिपदा से ही आरम्भ होता है ।
इस प्रकार हिन्दू राष्ट्र में वर्ष प्रतिपदा का अनन्य महत्व है । भगवान रामचन्द्र जी का राज्याभिषेक उत्सव वर्ष प्रतिपदा के दिन ही हुआ था । अत्यंत निग्रह पूर्वक अपने जीवन कार्य को करने वाले मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम के जन्मोत्सव चैत्र नवरात्रि का आरम्भ भी इसी दिन होता है ।

भारतीय समाज में चेतना व संगठन का निर्माण कर विदेशियों को निकाल देने का ऐतिहासिक कार्य भी इसी दिन हुआ था । विक्रमादित्य द्वारा शकों पर प्राप्त विजय तथा शालिवाहन द्वारा उन्हें भारत से बाहर निकालने पर इसी दिन आनंदोत्सव मनाया गया । इसी विजय के कारण प्रतिपदा को घर-घर पर ‘ध्वज पताकाएं’ तथा ‘गुढि़यां’ लगाई जाती है ।

विक्रम संवत हिन्दू पंचांग में समय गणना की प्रणाली का नाम है। यह संवत ५७ ई.पू। आरम्भ हुआ। सम्राट विक्रमादित्य ने इसे बनाया था। कालिदास इस महाराजा के एक रत्न माने जाते हैं।
बारह महीने का एक वर्ष और सात दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से ही शुरू हुआ।
दुनिया का लगभग प्रत्येक कैलेण्डर सर्दी के बाद बसंत ऋतू से ही प्रारम्भ होता है , यहाँ तक की ईस्वी सन बाला कैलेण्डर ( जो आजकल प्रचलन में है ) वो भी मार्च से प्रारम्भ होना था . इस कलेंडर को बनाने में कोई नयी खगोलीये गणना करने के बजाये सीधे से भारतीय कैलेण्डर ( विक्रम संवत ) में से ही उठा लिया गया था . आइये
जाने क्या है इस कैलेण्डर का इतिहास। भारतवर्ष में इस समय देशी विदेशी मूल के अनेक संवतों का प्रचलन है, किंतु भारत के सांस्कृतिक इतिहास की दृष्टि से सर्वाधिक लोकप्रिय राष्ट्रीय संवत यदि कोई है तो वह 'विक्रम संवत' ही है। आज से लगभग 2,068 वर्ष यानी 57 ईसा पूर्व में भारतवर्ष के प्रतापी राजा विक्रमादित्य ने देशवासियों को शकों के अत्याचारी शासन से मुक्त किया था। उसी विजय की स्मृति में चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से विक्रम संवत का भी आरम्भ हुआ था। नये संवत की शुरुआत प्राचीन काल में नया संवत चलाने से पहले विजयी राजा को अपने राज्य में रहने वाले सभी लोगों को ऋण-मुक्त करना आवश्यक होता था। राजा विक्रमादित्य ने भी इसी परम्परा का पालन करते हुए अपने राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों का राज्यकोष से कर्ज़ चुकाया और उसके बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से मालवगण के नाम से नया संवत चलाया। भारतीय कालगणना दुनिया में सबसे पहले तारो, ग्रहों, नक्षत्रो आदि को समझने का सफल प्रयास भारत में ही हुआ था, तारो , ग्रहों , नक्षत्रो , चाँद , सूरज ,...... आदि की गति को समझने के बाद भारत के महान खगोल शास्त्रीयो ने भारतीय कलेंडर ( विक्रम संवत ) तैयार किया , इसके महत्त्व को उस समय सारी दुनिया ने समझा .
भारतीय महीनों के नाम जिस महीने की पूर्णिया जिस नक्षत्र में पड़ती है उसी के नाम पर पड़ा। जैसे इस महीने की पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र में हैं इस लिए इसे चैत्र महीनें का नाम हुआ।





कुछ मुसलमान भी , सीने से लगाने होंगे -सतीश सक्सेना
धन कमाना हो खूब,मीडिया में आ जाएँ
एक राजा के ही बस, ढोल बजाने होंगे !
सोंच में हो मेरे सरकार,तो कह ही डालो
आज भी विषबुझे कुछ वाण चलाने होंगे !

जी करता है
अपने आंसुओं से
शिवालय धोने को
जी करता  है ,
समुन्द्र के रेत से
बनाया था जो आशियाना
उसे समुन्द्र को
सौंपने का
जी करता है ,

कहानी प्रेम की? हाँ ... नहीं ...
समाजवाद की गलियों से गुज़रता
गुलज़ार की नज्मों में उतर आया था
खादी के सफ़ेद कुर्ते ओर नीली जीन के अलावा  
तुम कुछ पहनने भी नहीं देतीं थीं उन दिनों
मेरी बढ़ी हुई दाड़ी ओर मोटे फ्रेम वाले चश्में में
पता नहीं किसको ढूँढती थीं
पढ़ते पढ़ते जब कभी तुम्हें देखता  
दांतों में पेन दबाए मासूम चेहरे को देखता रहता
     
कातर नजरें-
धूल धुआँ भी खुली हवा में
शामिल लगता है
कोलाहल की इस बस्ती में
झूठी हैं  कसमें
अस्त व्यस्त जीवन जीने की
निभा रहे  रसमें 
सपनों की अंधी नगरी में  
धूमिल लगता है

पेड़ों के नीचे "पवित्र कूड़े" का ढेर
देश के चाहे किसी भी हिस्से में निकल जाइए, शहर हो या क़स्बा, आपको किसी न किसी पेड़ के नीचे हमारे भगवानों की भग्न, बदरंग या पुरानी मुर्तिया, टूटे कांच या फ्रेम में जड़ी देवी-देवताओं की कटी-फटी तस्वीरें,
पूजा,  हवन इत्यादि से संबंधित वस्तुएं जरूर दिख जाएंगी। कभी बड़े सम्मान के साथ घर ला कर इनकी पूजा-
अर्चना की गयी होगी। इनमें अपने प्रभू या इष्ट की कल्पना की गयी होगी। पर आज गंदगी के माहौल में जानवरों-कीड़े-मकौड़ों के रहमो-करम पर लावारिस पड़ी, धूल फांक रही हैं। क्यों ऐसा होता है या किया जाता है ? धार्मिक प्रवित्ति के होते हुए भी हम क्यों ऐसा करते हैं ?


आज बस इतना ही...

धन्यवाद।














सोमवार, 27 मार्च 2017

619....चेहरे दर चेहरे कुछ लाल होते हैं कुछ होते हैं हरे

सादर अभिवादन
सफर की तैय्यारी कर रही हूँ..
सो सीधे चलिए रचनाओं की ओर....



प्राकृतिक अभियंता....आशा सक्सेना
तिनके चुन चुन
घरोंदा बनाया 
आने जाने के लिए
एक द्वार लगाया 
मनोयोग से
घर को सजाया
दरवाजे पर खड़े खड़े 
अपना घर निहार रही 



अपने नज़रिये से
जो "प्रेम" लगता है
वह "प्रेम"
हमेशा "प्रेम" नहीं होता
एकांत लम्हों का
सहयात्री होता है !
सहयात्री सुपात्र हो
ज़रूरी नहीं
कुपात्र भी हो सकता है



खामोशियों में भी
दूरियों में भी
कुछ तड़पता है
कुछ कसकता है
वो न हो कही भी
फिर भी
हर साँस के साथ उनको
महसूस करते है

मेरे मसीहा...
मेरे अज़ीज़, मेरे मसीहा
सोचती हूं
तुम्हें किस किस तरह पुकारूं



कितनी प्यारी थीं वो बचपन की बात पुरानी
जब दादी सुनाया करती हमको एक कहानी
बारिश के पानी में हम थे नाव चलाया करते
गुड्डे-गुड़िया की शादी में खूब मजे करते


तब माँ ने किया तकनीकी इस्तेमाल
फेसबुक पर स्टेटस ठेला और मंगवाया लिंकित ज्ञान
अब दोनों बैठे टकटकी लगाए 
टिपण्णी ताकते,कि कोई कविता-
कविता में  हास्य लेकर आए 
तभी मिला ये अद्भुत ज्ञान कि


बात पते  की....डॉ. सुशील जोशी
चेहरा चेहरे को 
देखता तो है
चेहरे में चेहरा 
दिखाई दे जाता है
चेहरे को चेहरा 
नजर नहीं आता है
चेहरा अपना 
चेहरा देख कर ही
मुस्कुराता है 
खुश हो जाता है

दें इज़ाज़त यशोदा को..







रविवार, 26 मार्च 2017

मै और वो.......618


नमस्कार 
सुप्रभात दोस्तो 
आज आप सब जानते ही है कि अपने तो अपने होते है, बाकी सब सपने होते है ।
  इसलिए "आप हमेशा आपके अपनो को अपना होने का अहसास दिलाए अन्यथा वक्त आपके अपनो को आपके बिना जीना सीखा देगा ।"

आइए अब चलते है आज की पाँच लिंको की ओर. . . . . 

मैं और वो

शहर की सुंदर लड़की,
तेज़-तर्रार,
नाज़-नखरेवाली,
साफ़-सुथरी,
सजी-धजी,
शताब्दी ट्रेन की तरह 
सरपट दौड़ती.
image
  मुकदमा एक साल तक चला।
आखिरकार करुण और समता में तलाक हो गया। तलाक के कारण बहुत मामूली थे। पर मामूली बातों को बड़ी घटना में रिश्तेदारों ने बदल डाला।झगड़ा पति और पत्नी में हुआ, हुआ यूं कि ऑफिस में करुण का झगड़ा किसी .....


न जाने कौन सी तकलीफ लेकर दौड़ता होगा -सतीश सक्सेना


न जाने दर्द कितना दिल में लेकर दौड़ता होगा
कहीं छूटी हुई उंगली पिता की , ढूंढता होगा !


कभी तो याद आएगी उन्हें भी, उस अभागे की
कहीं दिख जाएँ वीरानों में,बेटा खोजता होगा !


कोई सपने में आकर, नींद में लोरी सुना जाए !
हर इक ममतामयी चेहरे में,अम्मा ढूंढता होगा !

मन के पंछी कहीं दूर चल

तुम आशा विश्वास हमारे
तुम धरती आकाश हमारे...गीत बजने लगा है विविध भारती पर ....
है तो प्रार्थना ही पर मैं चली गई अतीत में ,मन भारी हो गया,सूरज की लाली दिखाई देने लगी है अब ..अरे!ये क्या सूरज से पहले तुम उग आए आसमान में!
-मैं जानता था,इस गीत के बजते ही तुम्हारे हृदय की सितार के तार झनझना उठेंगे और मैं चल पड़ा  उन्हें सुनने ...ये क्या? तुम्हारी आँखों में नमी तो नहीं ,मन का बोझ महसूस हो गया था मुझे ...


फ़ेसबुक की जगह अब ताऊ की दिमाग बुक का जमाना आने वाला है।



जब ब्लागिंग अपने चरम पर थी उस वक्त फेसबुक के लिएऐसी कल्पना भी मुश्किल थी की पृथ्वी वासी जंतुओं की शुभप्रभात से शुभ रात्रि तक का जुगाड़ यहीं बन जाएगा.  ब्लागिंगमें किसी ने नित्य एक पोस्ट लगा दी तो बहुत होगया वरना तोसाप्ताहिक पोस्ट तक मामला चल जाता थावैसे कुछ मठाधीषअपवाद भी थे जो एक दिन में कई कई पोस्ट ठेलने में उस्तादथे.
  
वाह रे जकुर बर्गवा तूने भी क्या धोबीपाट मारा है कि आदमीफोन लिए लिए ही किसी की पोस्ट पर हंसता है और किसी कीपर रोता हैगुस्सा होता है और ये सच में अनुभव किया होगाआपने की ये एक्शन होता ही है. 



दोस्त अब दीजिए 
इजाजत 
धन्यवाद 
विरम सिंह


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