पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

समर्थक

गुरुवार, 17 अगस्त 2017

762.....बातें हैं बातों का क्या

सादर अभिवादन...
आज अभी तक भाई रवीन्द्र जी दिखे नहीं...
यदि इस प्रस्तुति के बनते-बनते भी 
उनकी प्रस्तुति नज़र आई तो भी
यह प्रस्तुति रुकेगी नहीं...
उनकी पसंदीदा रचनाएँ यहां जुड़ सकती है...

....आज देखिए अब तक की पढ़ी रचनाओं से कुछ चयनित रचनाएँ..

मन की ये उर्वर जमीं, थोड़ी रिक्त है कहीं न कहीं!
सींचता हूँ मैं इसे, आँखों में भरकर नमीं,
फिर चुभोता हूँ इनमें मैं, बीज भावों के कई,
कि कभी तो लहलहाएगी, रिक्त सी मन की ये जमीं!

कोई बेनामी ख़त चाहे 
किसी चौराहे पर क्यों न पढ़ लिया जाए 
ज़िन्दगी का कोई नया 
शब्दकोष ही क्यों न गढ़ लिया जाये 
अंततः 
बातें हैं बातों का क्या ... 

राह में रौशनी की, थे सभी हमराह मेरे
अँधेरे बढ़ गए तो साये लापता मिले

आओ तन्हाई में दो-चार बात तो कर लो
महफ़िल में तुम हमें मिले तो क्या मिले

कुल चालीस साल नौकरी की थी सिस्टर मथाई ने, उस बड़े अस्पताल के ICU में, शुरु में तो सब ठीक था पर तीस साल की नौकरी के बाद वो Psychic (अतींद्रिय क्षमता युक्त) हो गयी थीं, कुछ मरीजों से उनको एक खास तरह की गंध आने लगती थी, और अपवादरहित रूप से वो सब मरीज अगले आठ घण्टे के भीतर मर जाते थे, चाहे रिपोर्ट्स या डॉ कुछ भी कह रहे हों... सिस्टर मथाई इस गंध को मृत्युगंध कहतीं थी।

लगे यहाँ  राजा भी भिक्षुक
नेता मत के पीछे चलता,
सबने गाड़े अपने खेमे
बंदर बाँट खेल है चलता !

गाँव दिन भर  चादर तान के सोया था
सांझ ढले घरों में उठते धुएँ से सुगबुगाहट हुई है ।
भोर होते ही  वह फिर सो जाएगा।

चलते-चलते ये वीडियो देखिए..
महिलाओँ को अपनी रक्षा करना 1947 सो सिखाया जा रहा है..



बुधवार, 16 अगस्त 2017

761..संजिदा सहिफा के ताल्लुकात आजमाने से हैं..

१ ६ /० ८ /२ ० १ ७ 
|| ऊँ भानवे नमः ||
 | मांगल्यम सुप्रभात |

प्रारम्भ इस कथ्य से..

कुछ तो बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़मॉ हमारा
(इकबाल)

स्वतंत्रता  दिवस और जन्माष्टमी पर्व के सूर्य दर्शन के पश्चात् 
आज यानि 16 अगस्त 2017 का प्रारम्भ कर्मयोग संकल्प से करें..

बहुत हुई विचार- विमर्श और बातें
स्वतंत्रता मात्र स्व तक सीमित न रह स्व के विस्तार से हैं..

नेहरू जी ने कहा
 हमने किस्मत से बाजी लगाई थी, एक इकरार किया था,
 प्रतिज्ञा की थी, वक्त आया कि हम इसे पूरा करें, ....

चलिए ये तो हुई समसमायिक विषयों की बातें ..
अब लिंक से समबन्धित मुद्दें की ओर गौर फरमातें हैं..

अच्छा हो...
जो फसाने में दफ्न  होनें से पहले
शिद्दत से हर किरदार निभाए..
संजिदा सहिफा के ताल्लुकात आजमाने से हैंं....

 चलिए  रूबरू होते हैं आदरणीय  दिगम्बर नसवा जी की सुंदर सोच और लेख से ..



पर नहीं स्वीकार अपने वीर यूँ कटते रहेंगे

दक्ष हो कर आज फिर प्रतिशोध तो लेना जी पड़ेगा
सर्प कब तक आस्तीनों में छुपे पलते रहेंगे

एक ही आघात में अब क्यों नहीं कर दें बराबर 

अटूट बंधन  ब्लॉग से 



                  निधि की शादी को चार साल हो गए हैं वह पति के साथ नासिक में रहती है | |उसके पति उसे बहुत प्रेम करतें हैं उसका दो साल का बेटा है निधि के माता – पिता निधि की ख़ुशी देख कर बहुत खुश होते हैं अक्सर बताते नहीं थकते उनके दामाद जी उन्की बेटी से कितना प्रेम करते हैं जब भी निधि मायके आती है साथ 
    आदरणीय विश्व मोहन द्वारा  विचारशील आलेख...

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की कहानी पर गहराई से नज़र डालें तो इस बात का स्पष्ट आभास मिलता है कि यह संघर्ष यात्रा भी पूरी तरह इस देश के सनातन माटी के संस्कार से सिक्त होकर ही निकली है।वैचारिक विभिन्नताओं की अनगिनत धाराओं का अद्भुत समागम है- हमारी आज़ादी की प्राप्ति यात्रा। कोई नरमकोई गरम। कोई उदारकोई उग्र। कोई दामकोई वाम। कोई नेशनलकोई सोशलिस्ट। कोई स्वराजीकोई इम्पेरिअलिस्ट। कोई पूंजीवादीकोई मार्क्सिस्ट। तो कोई गांधियन..

            ब्लॉग उड़न तश्तरी ....से 
हम हिन्दुतानी अति ज्ञानी...जिसकी भद्द न उतार दें बस कम जानिये.
साधारण सा


 आदरणीय रवीन्द्र  सिंह यादव  द्वारा रचित  सवेदनशील रचना.. 


सीवर / गटर में मौत 
सरकारी अस्पताल में मौत 
खेत -खलिहानों में मौत 
जंगलों /अरण्यों में मौत


आज़ की प्रस्तुति यही तक..
हिन्दी ब्लॉगिग में टिप्पणी
 भाषा के  मेयार को उपर  ले जाती है...
  
।।इति शम।।
धन्यवाद।






मंगलवार, 15 अगस्त 2017

760....स्वतंत्रता दिवस और जन्माष्टमी की आप सभी को.... मंगलकामनाएं.....


जय मां हाटेशवरी....

स्वतंत्रता दिवस देशभक्ति का पर्व है और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी हमारे इष्टदेव भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति का पर्व है, जब देशभक्ति और ईश्वर की भक्ति का मिलन होता है तो एक अलग ही समरसता का माहौल होता है।  आज के दिन देशभक्ति का पर्व स्वतंत्रता दिवस और ईश्वर की भक्ति का पर्व श्रीकृष्ण जन्माष्टमी दोनों साथ-साथ पड़े हैं। इसलिए देश में हर घर में एक तरफ देशभक्ति के गीत चल रहे हैं...  और साथ-साथ भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की खुशी में बधाई भजन गाये जा रहे हैं...  यह दृश्य अत्यंत मनमोहक लग रहा है।   जिसका साक्षी सम्पूर्ण देश है.... इस दिन पूरे देश में भारत माता की जय, वन्दे मातरम् के उद्घोष के साथ   नन्द के घर आनंद भयो जय कन्हैया लाल की का उद्घोष हो रहा है...
जिससे स्पष्ट है....आने वाला समय भारत के लिये शुभ होगा....


महा-भारत के युद्ध का सबसे बड़ा कारण....देश का विभाजन था....
भारत की आजादी के वक्त भी  हमने जो देश का विभाजन स्विकार किया....
मैं सोचता हूं....वो उचित कदम नहीं था....
विभाजन से कभी अमन नहीं हो सकता....
इस लिये आज हमारे देश की सरहदों पर अमन नहीं है....
भीष्म ने महाभारत में ठीक ही कहा था...
"पितामह भीष्म युधिष्ठिर से : राजीनीति का मूल तत्व है कि देश के हितों से बढ़कर तो राजा का कोई और हित हो ही नहीं सकता । और पुत्र यदि तुम्हे ये दिखाई दे कि तुम्हारा कोई ऐसा कोई हित है तो समझ लो कि तुम भी राजधर्म से भटक गए हो । देश राजा के लिए नहीं होता पुत्र राजा देश के लिए होता है । और वो राजा कभी अपने देश के लिए शुभ नहीं होता जो अपने देश के आर्थिक और सामाजिक दोष के लिए अपने अतीत को उत्तरदायी ठहरा कर संतुष्ट हो जाए । यदि अतीत ने तुम्हे एक निर्बल आर्थिक और सामाजिक ढांचा दिया है तो उसे सुधारो उसे बदलो क्यूंकि अतीत तो यूँ भी वर्तमान की कसौटी पर कभी खरा उतर नहीं सकता । क्यूंकि अतीत यदि स्वस्थ होता और उसमे देश को प्रगति के मार्ग पर ले जाने की शक्ति होती तो फिर परिवर्तन ही क्यों होता ??
किसी समाज की सफलता की सही कसौटी यही है कि वहाँ नारी जाति का मान होता है या उसका अपमान किया जाता है । देश की सीमा माता की वस्त्र की भांति आदरणीय है उसकी सदैव रक्षा करना चाहिए । धर्म विधियों या औपचारिकताओं का अधीन नहीं है । धर्म अपने कर्तव्यों और दूसरों के अधिकारों के संतुलन का नाम है ।

इसलिए धर्म का पालन अवश्य करो । राज धर्म भी यही है किन्तु राजा का दायित्व नागरिक के दायित्व से कहीं अधिक होता है । यदि कोई परिस्थिति देश के विभाजन की मांग कर रही हो तो कुरुक्षेत्र में आ जाओ किन्तु देश का विभाजन कभी ना होने दो ।

क्या तुम पाँचों भाई माता कुंती को काट कर आपस में बाँट सकते हो ??  यदि नहीं तो मातृभूमि का विभाजन कैसे संभव हो सकता है ??"


स्वतंत्रता दिवस और जन्माष्टमी की आप सभी को....
मंगलकामनाएं.....
भारत के जो वीर आजादी के लिये....
और भारत की सरहदों की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए हैं....
...उन्हे भी शत-शत नमन....
अब पेश है....आज के लिये मेरी पसंद...

चल रे हर सिंगार ,तुझे मैं साथ ले चलूँ. .
सौरभमय सुकुमार रँगों में संध्याओं से भोर काल तक
आंगन की श्री-शोभा संग रातों के झिलमिल-से उजास तक
  थोड़ा़ यह आकाश ले चलूँ ,अति प्रिय यह वातास ले चलूँ  .

सब ख़ामोश हो गए....विवेक माधवार
 चिताओं में अब हम तुमको भी सुला देंगे
बहुत बेशर्म हैं हम तुमको भी भुला देंगें
सियासी दाँव पेंचों से वो सब निर्दोष हो गए
बच्चे थे साहेब ............सब ख़ामोश हो गए

हथियार के सौदागरों यूँ खून तुम पीते रहो।
आदेश दे उपदेश दे हर देश का शासक सदा।
जनता भरे सैनिक मरे परिवार भोगे आपदा।
दुल्हन नई नवजात भी करता प्रतीक्षा अनवरत्
करते रहेंगे जिन्दगी भर युद्ध की कीमत अदा।
दस लाख देकर धन्य है इस देश का शासक अहो।
हथियार के सौदागरों यूँ खून तुम पीते रहो।।

श्री कृष्ण और साम्यवाद ------ विजय राजबली माथुर
योगीराज श्री कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन शोषण-उत्पीड़न और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करते हुये ही बीता किन्तु ढ़ोंगी-पोंगापंथी-पुरोहितवाद ने आज श्री कृष्ण के संघर्ष को 'विस्मृत' करने हेतु उनको अवतार घोषित करके उनकी पूजा शुरू करा दी। कितनी बड़ी विडम्बना है कि 'कर्म' पर ज़ोर देने वाले श्री कृष्ण के 'कर्मवाद' को
भोथरा करने के लिए उनको अलौकिक बता कर उनकी शिक्षाओं को भुला दिया गया और यह सब किया गया है शासकों के शोषण-उत्पीड़न को मजबूत करने हेतु। अनपढ़ तो अनपढ़ ,पढे-लिखे मूर्ख ज़्यादा ढोंग-पाखंड मे उलझे हुये हैं। तथा कथित प्रगतिशील साम्यवादी बुद्धिजीवी जिंनका नेतृत्व विदेश मे बैठे पंडित अरुण प्रकाश मिश्रा और देश मे उनके बड़े भाई पंडित ईश मिश्रा जी  करते हैं सांप्रदायिक तत्वों द्वारा निरूपित सिद्धांतों को धर्म मान कर धर्म को त्याज्य बताते हैं। जबकि धर्म=जो शरीर को धारण करने के लिए आवश्यक है वही 'धर्म' है;जैसे-सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य । अब यदि ढ़ोंगी प्रगतिशीलों की बात को सही मान कर धर्म का विरोध किया जाये तो हम लोगों से इन सद्गुणों को न अपनाने की बात करते हैं और यही कारण है कि सोवियत रूस मे साम्यवाद का पतन हो गया(सोवियत भ्रष्ट नेता ही आज वहाँ पूंजीपति-उद्योगपति हैं जो धन जनता और कार्यकर्ता का शोषण करके जमा किया गया था उसी के बल पर) एवं चीन मे जो है वह वस्तुतः पूंजीवाद ही है।दूसरी ओर थोड़े से  पोंगापंथी केवल 'गीता' को ही महत्व देते हैं उनके
लिए भी 'वेदों' का कोई महत्व नहीं है। 'पदम्श्री 'डॉ कपिलदेव द्विवेदी जी कहते हैं कि,'भगवद  गीता' का मूल आधार है-'निष्काम कर्म योग' "कर्मण्ये वाधिकारस्ते ....................... कर्मणि। । " (गीता-2-47)
इस श्लोक का आधार है यजुर्वेद का यह मंत्र- "कुर्वन्नवेह कर्मा................... न कर्म लिपयाते नरो" (यजु.40-2 )

दोहे
पढ़ना लिखना आगया ,कहते हो विद्वान ,
राग द्वेष मन में बसा .कैसा है ये ज्ञान |
तितली बोली फूल से ,दिन मेरे दो चार ,
जी भर के जी लूँ ज़रा बाँटू,रंग हजार |
श्वेत वस्त्र धारण किया .अन्दर काला मन ,
उजाला कर मन भी ज़रा ,फिर जग तेरे संग |
समझ न पाय  भावना ,खूब छला बन नेक ,
होश में आय जब ज़रा, बचा न कुछ भी शेष |

क्या बेटियों को भी याद रहता है ? .
और थपकियाँ अनवरत चालू हैं
धीरे धीरे उसके जवाब मन्द होते हैं
आखिर आ जाती है वह स्थिति भी
नहीं उत्तर आता उस मासूम की ओर से
नींद के आगोश में चली गयी है बिटिया
अपने आप से बेहद संतुष्ट हूँ मैं
मेरा सबसे अहम काम जो है ये
मुझे तो इतना अच्छा लगता है यह
कि आपको तक बतला रहा हूँ यहाँ
अपनी स्मृतियों के खजाने में यह पिता
सहेजे रखेगा इन पलों को जीवन भर
पर क्या बेटियों को भी याद रहता है
कि किस तरह सुलाते थे उनको पिता ?

केवल राष्ट्र के लिए था यह सृजन.....
“सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढे़ भारत में भी आई, फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आजादी की, कीमत सबने पहिचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
चमक उठी सन् सत्तावन में वह तनवार पुरानी थी,
बुन्देले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी की रानी थी।“



आज बस इतना ही....
माननीय मोदी जी की मन की बात....
की तरह ही....सुनिये....
हमारे जवानों की मन की बात भी



धन्यवाद।




 





सोमवार, 14 अगस्त 2017

759....... ''संविधान की अनिवार्य शिक्षा''

आज एक महत्वपूर्ण विषय आपके सामने रखता हूँ जिसका सम्बन्ध हमारे कर्तव्यों एवं अधिकारों से है। 
हमारा पवित्र 
''संविधान''
हमारे देश की अधिकांश आबादी जिसके नाम से परिचित तो अवश्य है परन्तु पूर्णतः नहीं और न ही इसके तथ्यों को जानने की आवश्यकता समझती है। 
मैं जब ''काशी हिन्दू विश्वविद्यालय'' का छात्र था ,मैंने यह महसूस  किया कि हमारी सरकार स्वच्छता अभियान व पर्यावरण बचाओ अभियान पर पूरे जोर -शोर से जागरूकता फैला रही थी ,यही नहीं पर्यावरण एक वैकल्पिक विषय अनिवार्य कर दिया। और हो भी क्यूँ न, इससे हमारे सरकार को कोई नुकसान नहीं परन्तु फ़ायदा जरूर है देश की नज़र में एक ज़िम्मेदार सरकार !
तो क्या 
संविधान एक अनिवार्य विषय नहीं हो सकता ?
हमारा संविधान हमारे हितों की सुरक्षा हेतु बनाया गया,हम ही नहीं जानते इसमें क्या लिखा है ? यह तो वही बात हुई कि कोई कंपनी खाने की वस्तु बेच रही हो और हमें यही नहीं पता हो कि हम क्या खा रहें हैं। वस्तु हमारे स्वास्थ्य को हानि पहुँचायेगा अथवा फ़ायदा ये तो वक़्त बताएगा। 
आज बड़े -बड़े प्रतिष्ठित पद पर आसीन व्यक्ति ही संविधान में क्या लिखा है जानता है न कि लोकतंत्र का मिथ्या दम भरने वाली जनता। और हमारी सरकारें कभी नहीं चाहेंगी कि ऐसा हो ! जनसामान्य यदि संविधान में लिखी बातें समझने लगा ! विरोध के स्वर उठने लगेंगे, सामंतवादी हमारे जनप्रतिनिधि  घुटनों पर आ जायेंगे।   
अपने पैरों पर कुल्हाड़ी कौन मारना चाहेगा ?परन्तु हमें आगे आना होगा 'संविधान की अनिवार्य शिक्षा' की बात करनी होगी केवल क़ानूनविद बनने हेतु नहीं बल्कि एक ज़िम्मेदार भारतीय नागरिक बनने के लिए जिसे लोकतंत्र का असली मक़सद ज्ञात हो। 
बिना ''संविधान की अनिवार्य शिक्षा'' लोकतंत्र की कल्पना बेमानी सी प्रतीत होती है। प्रस्तुत विचार मेरे निजी अनुभव पर आधारित हैं। 
आपके विचारों का स्वागत है क्योंकि आपसभी भारत के एक जिम्मेदार नागरिक हैं और आपकी आवाज़ देश की आवाज़ बने !
"पाँच लिंकों का आनंद" 
परिवार आपका अभिवादन करता 
है। 


आदरणीय ''दिग्विजय अग्रवाल'' द्वारा संकलित एवं  ''मनोहर वासवानी'' द्वारा लिखित 

 कहने लगी, 'न तो मैं अब कोई क़ीमती साड़ियाँ पहनती हूँ,  
न कोई सिंगार-पटार कर सकती हूँ, 
ये लाख रुपये पहले मिल गए होते तो भाई को चिकित्सा और 
दवा के अभाव में यूँ न जाने देती, 
कहते-कहते उनका दिल भर आया।  कौन था उनका वो 'भाई'?  हिंदी के युग-प्रवर्तक औघड़-फक्कड़-महाकवि पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', 
महादेवी के मुंहबोले भाई थे। 

आदरणीय ''ओंकार'' जी द्वारा कृत 

अभी देखा तो ख़ुशी से पागल था वो,
अभी आँखों में है नमी उसकी,
पल-भर में सब बदल गया ऐसे,
एक पल में छिपे हों जैसे बरस कई.

आदरणीय ''वीर विनोद छाबड़ा'' द्वारा लिखित एक 
'कथा'
  
बिमल रॉय 'दो बीघा ज़मीन' (१९५३) बनाने की योजना बना रहे थे।
कहानी कुछ यों थी। 
लगातार दो साल सूखा पड़ा। 
एक किसान शंभू महतो को दो बीघे का खेत ज़मीदार के पास गिरवी रखने को मजबूर होना पड़ा।

आदरणीय ''पुरुषोत्तम'' जी द्वारा रचित एक 
'कृति'

विरुद्ध उग्रवाद के है यह इक विगुल,
विरुद्ध उपनिवेशवाद के है इक प्रचंड शंखनाद ये,
देश के दुश्मनों के विरुद्ध है हुंकार ये,
यह 15 अगस्त है राष्ट्रगर्व का।


आदरणीय ''ऋतु आसूजा'' की एक 
'कृति' 

फ़कीर ने मुझे एक बीज दिया,
मैंने उस बीज की पौध लगायी
दिन -रात पौध को सींचने लगा
अब तो बेल फैल गयी ।
  
आदरणीय ''सुशील जोशी'' जी की एक 
'रचना'


कोढ़ 
समझ में 
नहीं आया तेरे 
मौत फैला आया 

आक्सीजन से 
कोढ़ भी हो 
सकता था 
तुझे पता 
नहीं था

आदरणीय ''अनुपमा पाठक'' जी की एक 
'कृति' 

हम उन निराश क्षणों में 
एक नन्हे से श्वेत पुष्प में
आशा की किरण देख लेते हैं 
इस त्रासद समय में हम
यूँ अपने सांस लेते रहने की
गुंजाईश
बचा लेते हैं... !!



आदरणीय ''रेणु बाला'' जी की एक 
'कृति'  

 सुना है हिमालय हो तुम !
सुदृढ़ , अटल और अविचल -
जीवन का विद्यालय हो तुम ! ! 
शिव के तुम्ही कैलाश हो - 
माँ जगदम्बा का वास हो , 
निर्वाण हो महावीर का -- 



अंत में आदरणीय राकेश जी ''राही'' का पंक्षी  विहार  

रूफस ट्रीपेई एक वृक्षीय पक्षी है, जो भारतीय उपमहाद्वीप के मूल और दक्षिणपूर्व एशिया के आस-पास के हिस्सों में स्थित है। यह कौवा परिवार का एक सदस्य है, कोर्विदे। इसकी लंबी पूंछ एवं तीव्र संगीतमय आवाज़ विशिष्ट है। यह आमतौर पर खुली झाड़ियों, कृषि क्षेत्रों, जंगलों और शहरी उद्यानों में पाया जाता है। अन्य कोर्विड्स की तरह यह बहुत अनुकूलनीय, सर्व-भक्षी एवं अवसरवादी है।
वैज्ञानिक नाम: डेंड्रोकिता वांबुन्डा

अंत में मेरी ''भावनायें'' 
मैं निराला नहीं 
प्रतिबिम्ब ज़रूर हूँ 
दुष्यन्त की लेखनी का 
गुरूर ज़रूर हूँ 
क़तरा बचेगा रक़्त का 
गला फाड़ चिल्लाऊँगा 
सावधान !
वक़्त की आवाज़ 
ज़रूर हूँ 
मैं निराला नहीं 
प्रतिबिम्ब ज़रूर हूँ ..... 
( प्रस्तुत अंश मेरी नवीन 'कृति' के हैं। )

"एकलव्य" 

आपका मात्र पैंतीस सेकेण्ड और जाया करता हूँ....
कौन कहता है कि महिलाएँ कार पार्क नहीं कर सकती..
देखिए....





रविवार, 13 अगस्त 2017

758....विवाद नहीं है कहीं...बस सोच का अंतर है


सादर अभिवादन...

मौसम काफी खऱाब है

कहीं अतिवृष्टि..और कहीं अल्पवृष्टि
पर बीमारी जो है सो..उसे फर्क नहीं पड़ता 
दोनों जगह..उसे बदस्तूर मौजूद
पाते हैं हम..

.........

अभी परसों 
निवृतमान उपराष्ट्रपति
ज़नाब हामिद अंसारी नें कहा कि
भारत में मुसलमान असुरक्षित ...?


........

अब चलें आज की पसंद की ओर...


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी के रिटायरमेंट पर क्या कहा: हरेश कुमार
आपके कार्यकाल का बहुत सारा हिस्सा वेस्ट एशिया से जुड़ा रहा है। उसी दायरे में बहुत वर्ष आपके गये। उसी माहौल में, उसी सोच में, उसी डिबेट में, वैसे ही लोगों के बीच रहे। वहां से रिटायर होने के बाद भी ज्यादातर काम वही रहा आपका, चाहे माइनोरेटी कमीशन हो या फिर अलीगढ़ यूनिवर्सिटी। आपका दायरा वही रहा। लेकिन ये दस साल पूरी तरह से एक अलग जिम्मा आपके पास आया। और पूरी तरह संविधान… संविधान… संविधान… के दायरे में ही चलाना, और आपने बखूबी उसे चलाने का प्रयास किया। हो सकता है कि कुछ छटपटाहट रही होगी आपके भीतर भी, लेकिन आज के बाद वह संकट भी आपको नहीं रहेगा। मुक्ति का आनंद रहेगा। 
और आपकी मूलभूत जो सोच रही है उसके अनुरूप कार्य करने का, 
सोचने का, बात बताने का अवसर भी रहेगा।





लेकिन हमे गर्व है के हमारे इसी देश में अच्छे और बहुत अच्छे लोग भी है....जिन्होंने इस तरह की शैतानी हरकतों का डट कर मुक़ाबला किया है...एक अच्छे हिन्दू..एक आदर्श हिन्दू का फ़र्ज़ निभाया है...संकट में हमारे मददगार...हमारे पैरोकार भी बने है, हमारे हिन्दू भाइयों पर हमे फख्र है.....




जूही , चमेली,कचनार
चंपा,बेला और हरसिंगार के फूल
महक उठे फिर
दिवस मास नहीं
ऐसा लगा कि सदियों बाद
तेरी वापसी हुई,

स्वतंत्र है अब ये आत्मा, आजाद है मेरा वतन,
ना ही कोई जोर है, न बेवशी का कहीं पे चलन,

मन में इक आश है,आँखों में बस पलते सपन,

भले टाट के हों पैबंद, झूमता है आज मेरा मन।

प्रभु श्री राम के रीछ-वानर हों या,
श्री कृष्ण जी के ग्वाल - बाल...

महात्मा बुद्ध के परिव्राजक हों या,
महात्मा गाँधी जी के  सत्याग्रही.....

दूरदर्शी थे समय के पारखी थे,
समय की गरिमा को पहचाने थे.....

तूफ़ान में   कश्ती  को उतारा नहीं होता
उल्फ़त का अगर तेरी किनारा नहीं होता

ये सोचता हूँ, कैसे गुजरती ये ज़िन्दगी
दर्दों का जो है, गर वो सहारा नहीं होता

कभी हमें भी यकीन था..,पर कभी-कभी
जिंदगी न जाने क्यूँ पेश आती है
अजनबियों की तरह
इन आँखों में बसी  ख्वाबों के, मंजर 
अभी बाकी है


''बेग़ैरत''....''एकलव्य'' 
सरेआम किया नंगा
ख़्याल नहीं था
इंसानियत का हमें
ख़ुद पे बन आई आज़
धर्म इंसानियत
बताता हूँ
बस लिखता चला जाता हूँ.......


आज का यह अंक सामान्य से कुछ अलग हटकर है..
विवाद नहीं है कहीं...बस सोच का अंतर है
बस ज़रा आप समानान्तर सोच से अलग हटकर सोचें....
दें आज्ञा दिग्विजय को..









शनिवार, 12 अगस्त 2017

757.... दीवारें


सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

चौथे पड़ाव
चिहुँकता मौन
झेलते अकेलेपन का दंश
कल जो दिया
आज वही तो पाया
उदाहरण में कहाँ चूके वंश




हमारी दुनिया के लोगों से 
भरी पड़ी है दूसरी दुनिया पर 
सामंजस्य स्थापित करना 
बहुत ही कठिन है 
दूसरों के दुःख सुन कर 
समझ कर अपना दुःख 
तिनका सा लगता है


भारतीय दीवारें


धान की क्यारियों में
भीगी-भीगी नरमाहट- सी
काली मिट्टी में निपजती
गौरांग नवजात -सी रूई की मखमली गुड़िया !
बरगद के पेड़ की
छाया को समेटती
पीपल की बांह पर
नीड़ों को सोने देती


तस्वीरों से भरी दीवारें



लटका दिया था
प्लास्टिक का हार,
धूल भी तो साफ नही करता कोई,
कि अब फ्रेम में दम भी घुटता है।

अब यहाँ कोने में पड़े हैं,
इंतजार है किसी दिन,
पोता आकर तोड़ देगा फ्रेम को,
आजाद हो जायेंगे,
खुली हवा में लौट जायेंगे।



कच्ची दीवार



 दिल मुझपे लुटाया है तो कुछ खास नहीं
आज या कल में तो उनको भी समझना ही था

 कितनी मुद्दत से जलाता रहा दिल को अपने
ऐसे गुलज़ार को दिलदार तो बनना ही था



अभी देर है



सजा लो लाख दरवाजे,दीवारें, महल या कोठी
बहुमूल्य इमारत से घर को बनाने में अभी देर है।

क्यों समझाते हो उन्हें, कद्र क्या है रिश्तों की
जिन्हें रिश्ता  ही समझने में अभी देर है।

जिसकी तस्वीर आब - ऐ - चश्म से धुलता रहा,
उसे तुझ तक तो पहुंचने में  अभी देर है।



><><

फिर मिलेंगे




शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

756...गेम खेलकर लोग क्यों कर रहे हैं सुसाइड

सादर अभिवादन...
बदल रहे हैं सबको...
हमारे तीन भाई बहन
हमें क्या किसी को भी...
आदत नहीं थी कि.... 

अपनी पसंदीदा रचनाओं 
पर अपने विचार रखना...
भाई कुलदीप जी की इसी सप्ताह की 
प्रस्तुति में देखने को मिली.....
शायद वे कोई नया साफ्टवेयर भी लाए हैं
पहले वे चित्र नहीं लगाते थे...

अब चित्र भी दिखाई पड़ने लगे हैं...
जो हो रहा है..अच्छा ही हो रहा है..
आगे और अच्छा होगा....पूर्ण विश्वास है


चलिए चलते हैं आज की पसंद की ओर.....
पहली बार भाई दिलबाग जी विर्क 

बातचीत बहाल कर...दिलबागसिंह विर्क 
मैं पश्चाताप करूँगा बीते दिनों के लिए
अपनी ग़लतियों का तू भी मलाल कर।

मैं कोशिश करूँगा ‘विर्क’ तेरा साथ देने की
तोड़ नफ़रत की दीवार, आ ये कमाल कर।

भाई खुशदीप जी सहगल भी पहली बार लाए गए हैं

द साइड इफैक्ट्स ऑफ ‘सुबह की सैर’…खुशदीप
जिस पार्क में मैं जाता हूं, वहां सुबह एक कोने में पांच छह बेंचों पर बुजुर्ग पुरुषों का जमावड़ा रहता है...रोज उनके वैसे ही हंसी ठहाके गूंजते रहते हैं जैसे कि स्कूल-कॉलेजों के छात्र साथ बैठने पर होता है...हमउम्र होने की वजह से इनमें ज़रूर कुछ नॉटी बातें भी होती होंगी...अच्छा इनका एक रूटीन और भी है...इनके लिए वहीं बेंच पर हर दिन केतली में चाय आती है...प्लास्टिक के कपों में इनका चाय पीना तो ठीक है लेकिन ये साथ में ब्रेड पकौड़े भी साफ करते दिखते हैं...अब ये इनकी सेहत के लिए कितना बेहतर है यही बता सकते हैं....



भाई की व्यथा.....विभा ठाकुर
बहना मेरी न पूछो तुम
बड़ा बुरा है हाल
भाभी तेरी बांध रही है
राखी अपने भाई को
कहि खलल ना पड़ जाए
मुझे बाहर है दिया निकाल 


शोर मचाती आँखें...पुरुषोत्तम सिन्हा
खामोशियों में कहकहे लगाती है तेरी ये दो आँखें!
कभी चुपचाप यूँ ही मचाती है शोर ये,
जलजला सा लेकर ये आती कभी हृदय में,
कभी मुक्त धार लिए बहती है चुपचाप ये दो आँखें....


"छोटू"......श्वेता सिन्हा
कंधे पर फटकर झूलती
मटमैली धूसर कमीज
चीकट हो चुके धब्बेदार
नीली हाफ पैंट पहने
जूठी प्यालियों को नन्ही
मुट्ठियों में कसकर पकड़े
इस मेज से उस मेज दौड़ता

विकल हृदय.....शशि पुरवार
घन घन घन, घनघोर घटाएँ 
गाएँ मेघ - राग मल्हार 
झूमे पादप, सर्द हवाएँ 
खुशियों का करें इजहार।



छिः ! ...रश्मि प्रभा
कभी अपने मायने तलाशती हूँ
कभी अपने बेमानीपन से जूझती हूँ
होती जाती हूँ क्रमशः निर्विकार
गुनगुनाती हूँ कोई पुराना गीत
खुद को देती हूँ विश्वास
कि ज़िंदा हूँ !


और अंत में एक गेम, विभिन्न समाचार पत्रों से...
जिसका नाम है ब्ल्यू व्हेल..

गेम खेलकर लोग क्यों कर रहे हैं सुसाइड?.... अमर उजाला
भारत में यह गेम हाल ही चर्चा में आया है, लेकिन रूस से लेकर अर्जेंटीना, ब्राजील, चिली, कोलंबिया, चीन, जॉर्जिया, इटली, केन्या, पराग्वे, पुर्तगाल, सऊदी अरब, स्पेन, अमेरिका, उरुग्वे जैसे देशों में कम उम्र के कई बच्चों ने इस चैलेंज की वजह से अपनी जान गंवाई है.
लोग हैरत में हैं है कि कोई ऑनलाइन गेम किसी के दिमाग पर इस तरह कब्ज़ा कैसे कर सकता है कि ख़ुदकुशी पर मजबूर कर दे.
हैरानी की बात यह है कि फिलिप ने रूसी प्रेस से कहा था कि उसके पीड़ित 'जैविक कूड़े' की तरह हैं और इस तरह वह 'समाज को साफ़' कर रहा है. उसे सेंट पीटर्सबर्ग की जेल में रखा गया है.

आज्ञा दें यशोदा को.....












Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...