पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

समर्थक

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

797......अपने आईने में चिपकी तस्वीर किसी दिन हटाया करो....


सादर अभिवादन। 
नवरात्रि-पर्व की हार्दिक शुभकामनाऐं। 
"पाँच  लिंकों का आनन्द" 800 वीं सीढ़ी से बस तीन क़दम दूर .... 
मन उल्लसित है एक मनोवैज्ञानिक दहलीज़ को छू लेने के लिए। आदरणीया  यशोदा बहन जी जुटी हैं 800 वें अंक को विशेषांक के तौर पर पेश करने हेतु। आप सभी सादर आमंत्रित हैं सार्थक चर्चा के लिए।  हम सदैव आपके स्नेह ,समर्थन ,मार्गदर्शन के आकांक्षी हैं। आपके अपार सहयोग ने ही आज हमें आल्हादित होने का अवसर दिया है। 

चलिए अब आज की पसंदीदा रचनाओं का रसास्वादन करते हैं -
स्त्री-विमर्श से जुड़ा एक बिषय पढ़िए 
आदरणीया  शबनम शर्मा जी की विचारणीय रचना में - 

मंगलसूत्र [कविता]........... शबनम शर्मा

 सिर्फ एक सोच,
मज़बूर करती मुझे 
काष कि उस दिन पहनाया होता 
किसी ने बाहों का मंगलसूत्र 
जो मुझे हर वक्त देता इक सकून
इस घर को अपना कहने के लिये।
                                      

"उलूक टाइम्स" ने हमारे बीच उल्लेखनीय उपलब्धि के तौर पर स्थान अर्जित किया है। पेश है एक ताज़ा रचना 
आदरणीय  प्रोफ़ेसर सुशील कुमार जोशी  द्वारा रचित -  

इतना दिखा कर उसको ना पकाया करो कभी खुद को भी अपने साथ लाया करो........ 


खूबसूरत हैं आप
आप की बातें भी
अपने आईने में
चिपकी तस्वीर
किसी दिन
हटाया करो


आधुनिक हिंदी कविता / नई  कविता को स्थापित करने वाले प्रखर चिंतक और कवि गजानन माधव मुक्तिबोध का हम जन्म शताब्दी वर्ष  मना रहे हैं।  उनसे जुड़ीं यादें पेश  की हैं  आदरणीय बसंत त्रिपाठी जी ने - 


तो क्या इसे मुक्तिबोध की जीत नहीं माना जाएगा? 
मैं तो इसे मुक्तिबोध की रचनात्मकता की जीत ही मानता हूँ. क्योंकि वे ऐसे रचनाकार हैं जो अपने पाठकों - जिनमें उनके मुरीद और विरोधी दोनों ही शामिल हैं - को चुनौती देते हैं. कारण यह है कि मनुष्य का जो सभ्यतागत स्वभाव होता है, श्रेष्ठता का प्रदर्शन और निम्नता का गोपन, मुक्तिबोध उसे नहीं मानते. 
वे अपनी हर साँस को दर्ज करने को व्याकुल रहते थे. याद करो कला के तीन क्षण की संकल्पना. क्या उनके अलावा कोई दूसरा तुम्हें दिखाई पड़ता है जो पहले क्षण के हर अनुभूत सत्य को जिद के साथ, निर्ममता के साथ, डाँट-डपट कर या जबर्दस्ती तीसरे क्षण के पाले में घसीट कर ले जाने की कोशिश करे? मुझे तो नहीं दिखता. तुम्हें दिखे तो बताना. इसलिए शुरू में ही मैंने कहा कि मुझे मुक्तिबोध बेचैन करते हैं.

आदरणीया  अनीता जी के सृजन का अपना अनूठापन उनकी रचनाओं में खुलकर झलकता है।  पेश है उनकी एक ताज़ातरीन अभिव्यक्ति - 
 

 एक कलश मस्ती का जैसे...... अनीता जी 


टूट गयी जब नींद हृदय की
गाठें खुल-खुल कर बिखरी हैं,
एक अजाने सुर को भर कर
चहूँ दिशाएं भी निखरी हैं !

कम  समय में  अपनी पहचान कायम करने में सक्षम हुए 
सांध्य दैनिक "विविधा" पर आदरणीया यशोदा अग्रवाल  जी द्वारा प्रस्तुत शायर  राज़िक़ अंसारी जी की एक शानदार कृति - 

क़लन्दर तो ज़मीं पर बैठते हैं.....राज़िक़ अंसारी

बताओ किस लिये हैं नर्म सोफ़े 

क़लन्दर तो ज़मीं पर बैठते हैं

तुम्हारी बे हिसी बतला रही है

हमारे साथ पत्थर बैठते हैं 




आज बस इतना ही। 

आपकी मोहक प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा में। 

फिर मिलेंगे। 


बुधवार, 20 सितंबर 2017

796..कौन हो तुम... कौन है हम..


।। ऊँ  सत्यम् ।।
शुभ भोर  महालया
(महालय का पर्व नवरात्र के प्रारंभ और पितृपक्ष के अंत का प्रतीक है. )

कौन हो तुम...
कौन है हम..
क्या फर्क पड़ता है..
हाँ.. कैसे हो तुम
किस हाल में है हम
इन विचारों, विवादों और विमर्शो से
 कहानियों,कविताओं में जरूर रंग भरता है..

ज्यादा समय नहीं लूंगी..इसलिए तो फिर बढ़तें है लिंकों की ओर मिलीजुली है
कुछ ज़ज्बातों,एतबारों की तनिक हास्य-व्यंग्य की थोड़ी थोड़ी सज़दे की
( यानी कि छोटा पैकट और बड़ा धमाल...)

रचनाकार अनिता जी की जाने कब वह घड़ी मिलेगी



खुला हुआ अविरल मन उपवन,
जब जी चाहे चरण धरो तुम
सदा गूंजती मृदु धुन अर्चन !

न अधैर्य से कंपतीं श्वासें
शुभ्र गगन से छाओ भीतर,

आदरणीय शशांक द्विवेदी जी की समसामयिक बिषय पर प्रस्तुति


न कौशल न विकास :क्या करें इस डिग्री-डिप्लोमा का
इसीलिए देश में इंजीनियरिंग का करियर तेजी सेआकर्षण खो रहा है
 देश के राष्ट्रीय कौशल विकास निगम के अनुसार सिविल, मैकेनिकल और इलेक्ट्रिक
 इंजीनियरिंग जैसे कोर सेक्टर के 92 प्रतिशत इंजीनियर और डिप्लोमाधारी रोजगार के लिए
 प्रशिक्षित नहीं हैं. इस सर्वे ने भारत में उच्च शिक्षा की शर्मनाक तस्वीर पेश की है ।
 यह आंकड़ा चिंता बढ़ाने वाला भी है, क्योंकि स्थिति साल दर साल खराब
 ही होती जा रही है ।देश में इंजीनियरिंग को नई सोच और दिशा देने वाले
 महान इंजीनियर भारत रत्न मोक्षगुण्डम् विश्वेश्वरैया 
की जयंती 15 सितम्बर को देश में इंजीनियरस डे 
या अभियंता दिवस के रूप में मनाया जाता है ।
 मैसूर राज्य(वर्तमान कर्नाटक )के निर्माण
 में अहम भूमिका निभाने वाले मोक्षगुंडम..


पटना से सूरत, दिल्ली, पंजाब , मुंबई एक्सप्रेस का स्लीप
 डिब्बा खचाखच भरा हुआ। एक दूसरे से देह रगड़ा रहा है। दरबाजे पे भी
 हेंडल पकड़ कई लटके हुए है। बगल में पोस्टर सटा हुआ है। लटकला बेटा त गेला बेटा!
 वहीं किसी ने लिख दिया पूरा देश आज लटका हुआ है। देख लीजिए फेसबुक, ट्वीटर!!
उसी में किसी तरह मघ्घड़ चा भी लोड हो गए। उनका झोला तो बाहर ही रह गया। 
गनीमत की पॉकेट में टिकट रख लिए थे। अंदर देह से देह रगड़ खा रहा है। एक
 सूत जगह खाली नहीं। खैर बेटा सीरियस है एम्स में। कहीं और इलाज ही नहीं 
हो सका। जाना तो होगा ही।
छुकछुक छुकछुक, छुकछुक छुकछुक रेलगाड़ी चलती जा रही थी।


पंडित जो कि अपनी आजीविका मंदिरों में पूजा 
पाठ कर मिलने वाली दान दक्षिणा से ही चलाते रहे थे, उनका आदर सत्कार कर
 विभिन्न अवसरों पर भोजन की व्यवस्था समाज करता रहा...
अभी भी बहुत से पंडित ऐसे हैं जो सिर्फ मंदिरों में साफ सफाई पूजा पाठ कर
 अथवा विभिन्न #यजमानों के यहाँ पूजादि कर अपनी आजीविका चलाते हैं.
 क्या सिर्फ भोजन की व्यवस्था हो जाने से व्यक्ति की सभी  जरुरतें पूरी हो 
जाती हैं...शिक्षा, चिकित्सा, मनोरंजन , मकान आदि के लिए धन की 
आवश्यकता उन पंडितों को भी तो होती होगी कि नहीं...जिनके लिए
यह उनका कार्य है /#रोजगार है... हम इनकी बुराई तो खूब कर
 लेते हैं मगर यह नहीं सोचते कि हर व्यक्ति अपने 
रोजगार में ज्यादा से ज्यादा कमाना चाहता है....

आदरणीय पुष्पेन्द्र सिंह जी की चुनौती या मंजिलें

हिफाज़त में हमको उतरना भले हो
भले हम हो पंछी या इंसां कोई हम
अभी तक उड़ा हूँ उड़ा जाऊंगा मैं॥
अँधेरा अगर है तो है गलती किसकी
नहीं राह कोई खता बोलो किसकी
💭
आज की प्रस्तुति यहीं तक
ये बड़ा धमाल है या नहीं ये आप सभी पर छोड़ती हूँ,,
इति
धन्यवाद
पम्मी सिंह



मंगलवार, 19 सितंबर 2017

795....उन पूर्वजों की कीर्ति का वर्णन अतीव अपार है,


जय मां हाटेशवरी....
अपने पूर्वजों के प्रति स्नेह, विनम्रता, आदर व श्रद्धा भाव से किया जाने वाला कर्म ही श्राद्ध है...
 श्राद्ध का पावन समय चल रहा है....
बहुत अच्छा लगता है....हम अपने पूर्वजों को याद करते हैं....
उनके नाम पर कुछ उत्तम कर्म करते हैं....
कितने महान थे हमारे पूर्वज....

उन पूर्वजों की कीर्ति का वर्णन अतीव अपार है,
गाते नहीं उनके हमीं गुण गा रहा संसार है ।
वे धर्म पर करते निछावर तृण-समान शरीर थे,
उनसे वही गम्भीर थे, वरवीर थे, ध्रुव धीर थे ।। १९।।
उनके अलौकिक दर्शनों से दूर होता पाप था,
अति पुण्य मिलता था तथा मिटता हृदय का ताप था ।
उपदेश उनके शान्तिकारक थे निवारक शोक के,
सब लोक उनका भक्त था, वे थे हितैषी लोक के ।। २० ।।
लखते न अघ की ओर थे वे, अघ न लखता था उन्हें,
वे धर्म्म को रखते सदा थे, धर्म्म रखता था उन्हें !
वे कर्म्म से ही कर्म्म का थे नाश करना जानते,
करते वही थे वे जिसे कर्त्तव्य थे वे मानते ।।२१।।
वे सजग रहते थे सदा दुख-पूर्ण तृष्णा-भ्रान्ति से ।
जीवन बिताते थे सदा सन्तोष-पूर्वक शान्ति से ।
इस लोक में उस लोक से वे अल्प सुख पाते न थे,
हँसते हुए आते न थे, रोते हुए जाते न थे ।।२२।।
जिनकी अपूर्व सुगन्धि से इन्द्रिय-मधुपगण थे हिले,
सद्भाव सरसिज वर जहाँ पर नित्य रहते थे खिले ।
लहरें उठाने में जहाँ व्यवहार-मारुत लग्न था,
उन्मत्त आत्मा-हंस उनके मानसों में मग्न था ।।२३।।
वे ईश-नियमों की कभी अवहेलना करते न थे,
सन्मार्ग में चलते हुए वे विघ्न से डरते न थे ।
अपने लिए वे दूसरों का हित कभी हरते न थे,
चिन्ता-प्रपूर्ण अशान्तिपूर्वक वे कभी मरते न थे ।।२४।।
वे मोह-बन्धन-मुक्त थे, स्वच्छन्द थे, स्वाधीन थे;
सम्पूर्ण सुख-संयुक्त थे, वे शान्ति-शिखरासीन थे ।
मन से, वचन से, कर्म्म से वे प्रभु-भजन में लीन थे,
विख्यात ब्रह्मानन्द - नद के वे मनोहर मीन थे ।। २५ ।।
उनके चतुर्दिक-कीर्ति-पट को है असम्भव नापना,
की दूर देशों में उन्होंने उपनिवेश-स्थापना ।
पहुँचे जहाँ वे अज्ञता का द्वार जानो रुक गया,
वे झुक गये जिस ओर को संसार मानो झुक गया ।। २६ ।।
वर्णन उन्होंने जिस विषय का है किया, पूरा किया;
मानो प्रकृति ने ही स्वयं साहित्य उनका रच दिया ।
चाहे समय की गति कभी अनुकूल उनके हो नहीं,
हैं किन्तु निश्चल एक-से सिद्धान्त उनके सब कहीं ।। २७ ।।
वे मेदिनी-तल में सुकृत के बीज बोते थे सदा,
परदुःख देख दयालुता से द्रवित होते थे सदा ।
वे सत्वगुण-शुभ्रांशु से तम-ताप खोते थे सदा,
निश्चिन्त विघ्न-विहीन सुख की नींद सोते थे सदा ।। २८ ।।
वे आर्य ही थे जो कभी अपने लिए जीते न थे;
वे स्वार्थ-रत हो मोह की मदिरा कभी पीते न थे ।
संसार के उपकार-हित जब जन्म लेते थे सभी,
निश्चेष्ट होकर किस तरह वे बैठ सकते थे कभी? ।। २९ ।।
पेश है....आज की प्रस्तुति....


फ़ॉन्ट और कीबोर्ड लेआउट में अंतर - Differences in Font And Keyboard Layout
Font अक्षरों की बनावट को कहते हैं लेकिन टाइपिंग टेस्‍ट में Font से ज्‍यादा आपको गौर करना है Keyboard Layout पर क्‍योंकि परीक्षा कीबोर्ड लेआउट के आधार पर हाेती है, चलिये थोडा और जानते हैं Font तो हजारों और लाखों तरह के हो सकते हैं लेकिन Hindi Keyboard Layout मुख्‍य रूप से जो परीक्षाओं में आतेे हैं चार प्रकार के होते हैं -

किस्से बयाँ न हो पाता...
पुराने जख्मों से मिल गयी वाहवाही इतनी
कि अब उसे नये जख्मों की तलाश है
मेरी चाहत है मैं रातों को  रोया न करूं
या रब मेरी इस चाहत को तो पूरा कर दे

मिलते हैं मेरे जैसे, किरदार कथाओं में ...
हे राम चले आओ, उद्धार करो सब का
कितनी हैं अहिल्याएं, कल-युग की शिलाओं में
जीना तो तेरे दम पर, मरना तो तेरी खातिर
मिलते हैं मेरे जैसे, किरदार कथाओं में

प्यारी सी है सिमरन...
जाहिर है हिंदी फिल्मों में भी एक लम्बे समय तक अमीरी गरीबी, जातीय वर्गीय भेद, सामंती पारिवारिक दुश्मनियों के बीच प्यार के लिए जगह बनाने की जद्दोजहद में लगा हिंदी सिनेमा अंत में मंगलसूत्रीय महिमा के आगे नतमस्त होता रहा. फिर समय आया कि अगर एक साथी बर्बर है, हिंसक है, बेवफा है तो कैसे सहा जाए और किस तरह उस साथी को वापस परिवार संस्था में लौटा लाया जाए, लेकिन इधर हिंदी सिनेमा ने नयी तरह की अंगड़ाई ली है.
शादी, प्यार, बेवफाई के अलावा भी है जिन्दगी यही सिमरन की कहानी है. कंगना पहले भी एक बार 'क्वीन' फिल्म में अपने सपने पूरे करने अकेले ही निकलती है. शादी टूटने को वो सपने टूटने की वजह बनने से बचाती है लेकिन सिमरन की जिंदगी ही एकदम अलग है. वो प्यार या शादी की तमाम बंदिशों से पार निकल चुकी है. शादी के बाद तलाक ले चुकने के बाद अपनी जिंदगी को अपनी तरह से जीना चाहती है. उसके किरदार को देखते हुए महसूस होता है कि किस तरह नस-नस में उसकी जिंदगी जीने की ख्वाहिश हिलोरे मारती है. जंगल के बीच अपनी फेवरेट जगह पर तितली की तरह उड़ती प्रफुल्ल यानि कंगना  बेहद दिलकश लगती है. उसका प्रेमी उसे कहता है, 'कोई इतना सम्पूर्ण कैसे हो सकता है, तुम्हें सांस लेते देखना ही बहुत अच्छा लगता है'. सचमुच जिंदगी छलकती है सिमरन यानि प्रफुल्ल में.

वंशवाद का बजे नगाड़ा - व्यंग रचना
गहरी जड़ें हैं वंशवाद की
नजर जहां तक जाए देखो
वंशवाद की सीढ़ी चढ़ चढ़
गद्दी पाए कितने देखो
प्रतिभाएं ठोकर खाती हैं
ऐसों ने ही किया कबाड़ा

Social boycott, A Social Evil - सामाजिक बहिष्कार, एक सामाजिक बुराई
ऐसी अमानवीय रीतियों के ख़िलाफ़ धार्मिक और दक्षिणपंथी राजनीतिक संस्थाओं ने कभी आंदोलन किया हो याद नहीं पड़ता. इन्हें परंपरा को ढोने वाली संस्थाओं के रूप में अधिक जाना जाता है. इनकी रुचि समाज सुधार में कम और अपने व्यवसाय को चलाए रखने में अधिक होती है. सामंतवाद इसी परंपरा का वाहक है और जनक भी. यह सामाजिक बहिष्कार जैसे मारक हथियार का प्रयोग अपने हित में करने के लिए सभी हथकंडे अपनाता है. सामाजिक बहिष्कार के शिकार अधिकतर ग़रीब, दलित और महिलाएँ होती हैं. वे अपनी रोज़ी-रोटी के लिए किसी पर निर्भर होते हैं. यदि वे अपने सामान्य से अधिकार के लिए मांग उठाते हैं तो सामाजिक बहिष्कार का सांप उनकी आँखों के सामने कर दिया जाता है. उसे डराया जाता है कि उसके अपने ही उसे ख़ुद से दूर कर देंगे. ग़रीब के ख़िलाफ़ ग़रीब, दलित के ख़िलाफ़ दलित और महिला के ख़िलाफ़ महिला को खड़ा होने के लिए मजबूर कर दिया जाता है. ऐसे में आर्थिक और सामाजिक रूप से ‘अपनों’ पर निर्भर व्यक्ति अपने आप अपने अंतर में मरने लगता है. सामंतों और उनके गुंडों के प्रभाव में जीने वाले लोग काफी मजबूर होते हैं.

श्राद्ध का महत्व
'श्रद्धया दीयते यत्‌ तत्‌ श्राद्धम्‌' पितरों की तृप्ति के लिए जो सनातन विधि से जो कर्म किया जाता है उसे श्राद्ध कहते हैं। किसी भी कर्म को यदि श्रद्धा और विश्वास से नहीं किया जाता तो वह निष्फल होता है। महर्षि पाराशर का मत है कि देश-काल के अनुसार यज्ञ पात्र में हवन आदि के द्वारा, तिल, जौ, कुशा तथा मंत्रों से परिपूर्ण कर्म श्राद्ध होता है। इस प्रकार किया जाने वाला यह पितृ यज्ञ कर्ता के सांसारिक जीवन को सुखमय बनाने के साथ परलोक भी सुधारता है। साथ ही जिस दिव्य आत्मा का श्राद्ध किया जाता है उसे तृप्ति एवं कर्म बंधनों से मुक्ति भी मिल जाती है।


धन्यवाद।



सोमवार, 18 सितंबर 2017

794..''प्राणी अनुभूति का तरल प्रवाह''

''संवेदना'' 
प्राणी का अनुभव दूसरे प्राणी के कष्टों का अथवा कह सकते हैं प्राणी अनुभूति का तरल प्रवाह बिना किसी दबाव के दूसरे  प्राणी के अनुभव हेतु 
परन्तु वर्तमान काल में यह दृष्टिकोण परिवर्तित हो चुका है। 'संवेदना' मात्र एक शब्द बनकर रह गया है जिसका प्रयोग आज उच्चकोटि का मानव निम्न समझे जाने वाले प्राणी हेतु अथवा यह कहना उचित होगा अभावग्रस्त ,तुच्छ, अक्षम एवं पीड़ा से ग्रसित व्यक्ति का अपनी स्वार्थ सिद्धि को अंतिम गंतव्य तक पहुँचाने के लिए  
'पर' ईंधन के द्वारा चलने वाले जलविमान 
की भांति उपयोग करता है और हरी झंडी दिखाकर जलबाधा पार करने को प्रोत्साहित करता है। 
यदि विमान बीच जल में डूब जाए तो उस उच्चकोटि के प्राणी की कोई अधिक क्षति नहीं परन्तु विमान जलबाधा पार कर ले तो फिर बात ही क्या अर्थात दोनों दिशाओं से एक ही दिशा में लाभ 
परिणाम 
मानव विश्वास की क्षति जिसकी कोई पूर्ति संभव नहीं 
शून्य 'अंतस'
'संवेदनाओं' का विचरण  
जो हमें वर्तमान काल में देखने को मिल रहा है। 
:दार्शनिक भाव :
ईश्वर ने हमें निशंदेह 'त्रिकालदर्शी' नहीं बनाया परन्तु बनने हेतु ज्ञानेन्द्रियाँ अवश्य प्रदान की हैं। 
यह हम पर निर्भर करता है हम दृश्य किस प्रकार देखना चाहते हैं। 
मनोरंजन से भरपूर मिथ्या के 'ऐनक' से 
अथवा 
साधारण ,सादा ,श्याम -श्वेत सत्य चलचित्र !
निर्णय आपका 
( क्योंकि ये मेरे 'मौलिक' विचार हैं )

सादर अभिवादन 

आज का अंक कुछ विशेष,नवीन रचनाकारों का आगमन आवश्यक है। 
                          कविताएँ : आदरणीय ''राकेश तेता''
 चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 

 अक्सर मैंने देखा है तुम्हे
तुम्हारे मजारों गिरजों मस्जिदों और मंदिरों में 
अरदाशों के तले ईश्वरों से सौदा करते हूये  
और तुम्हारे ईश्वर भी तुम्हारी सौदेबाजी से खुश हैं


 'खाता नम्बर' ......आदरणीय ''रविंद्र सिंह यादव''  


बिना अनुमति के खाते में 
न कुछ जोड़ा जाए 
अब जाकर राज़दार का पता 
बैंक से की इल्तिजा में बताया है।   

  कूड़ा 'औ' कचरा .. आदरणीया "दिव्या अग्रवाल" 

 लिखती थी मैं 
कूड़ा 'औ' कचरा 
आती थी बदबू 
दिखाई पड़ती थी 
दिव्या के कूड़ेदान पर,
गलियों के मुक्कड़ में 
भनभनाती थी 
मक्खियाँ 'औ' कुत्तों के झुण्ड 
मंडराते थे कौंवे..

जाली मुस्कान - - - आदरणीय "शांतनु सान्याल" 


 हम गुज़रे, शाम ढलने से पहले, - -
वो लगे महफ़िल सजाने।
वादी ए तारीख़ पे, 
वीरानगी के 
सिवा 
कुछ भी नहीं, यहाँ अब कोई नहीं 
आता रस्मो रिवाज निभाने।



 पर सब अस्त व्यस्त उजड़ा और अधूरा - अधूरा सा 
तुम मेरी हिम्मत का आधा टुकड़ा संभाल कर रखना 
जब तक मैं उस बाकी आधे टुकड़े को ढूंढ  न लाऊं |

तुम्हें लिख दूँ ..   आदरणीया "शिवानी मौर्या'' 


  मैं ग़र गर्मी की तपिश,तो तुम्हें सावन की फुहार लिख दूँ ..
मैं ग़र धरा,तो तुम्हें नीला आकाश लिख दूँ..
मैं ग़र आगाज़ नया ,तो तुम्हें खूबसूरत अंजाम लिख दूँ..
मैं ग़र पंख बेबाक ,तो तुम्हें ऊँचा परवाज़ लिख दूँ..
मैं ग़र नदी इठलाती ,तो तुम्हें गहरा सागर लिख दूँ..

 'अपने मन की भी कहना' ....... 
आदरणीया "नूपुरम" जी


 पहाड़ों पर जमी बर्फ़
खेतों में खिली सरसों
बच्चों से भरी स्कूल बस
पुल पर से गुज़रती रेल
कच्चे पक्के घरों
शतरंज के मोहरों

 ग़ज़ल(ये रिश्तें काँच से नाजुक) .... 
आदरणीय 
"मदन मोहन सक्सेना'' 



 जिसे देखो बही मुँह पर ,क्यों मीठी बात करता है
सच्चा क्या खरा क्या है जरा इसको खँगालों तुम

हर कोई मिला करता बिछड़ने को ही जीबन में
मिले, जीबन के सफ़र में जो उन्हें अपना बना लो तुम

 ग़ज़ल....... आदरणीय कालीपद 'प्रसाद' 



बुझे रिश्तों का दिया अब तो जला भी न सकूँ 
प्रेम की आग की ये ज्योत बुझा भी न सकूँ 

 गीत "देवपूजन के लिए सजने लगी हैं थालियाँ" 
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
 सुमन-कलियों की चमन में,
डोलियाँ सजने लगीं,
भ्रमर गुंजन कर रहे,
शहनाइयाँ बजने लगीं,
प्रणय-मण्डप में मधुर,
बजने लगीं हैं तालियाँ।

 फोटोग्राफी : पक्षी 24 (Photography : Bird 24 )
आदरणीय  राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"
 क्रेस्टेड बाज़-ईगल या चेंजेबल बाज़-ईगल, 
एसिप्रिट्रिडे (शिकार प्रजाति) परिवार  की  का एक पक्षी है।
भारतीय उपमहाद्वीप में मुख्य रूप से भारत और श्रीलंका में, और दक्षिण पूर्व एशिया से इंडोनेशिया और फिलीपींस के दक्षिण-पूर्व हिमालय के  किनारे  ये  नस्ल पाए जाते हैं। यह खुली जंगलों में अकेले उड़ने वाला पक्षी है। यह एक पेड़ में एक छड़ी के आकर वाले घोंसले बनाता है 
और एक अंडा देता है।
वैज्ञानिक नाम: निसातिस सिर्रहातुस

फोटोग्राफर: राकेश कुमार श्रीवास्तव

आज्ञा दें 

"एकलव्य" 

रविवार, 17 सितंबर 2017

793....शानों-शौक़त सब धरे रह जायेंगे

सादर अभिवादन..
आनन्द आ गया कल की प्रस्तुति में
विभी दीदी वैसे भूलने वाली नही न है..
हाँ ...अव्यवस्था के चलते..
बहुत कुछ हो जाता है..
ये दूसरी बार है कि एक ही दिन में 
डबल प्रस्तुति प्रकाशित हुई........
जो हुआ..अच्छा ही हुआ..
आगे और इससे अच्छा ही होगा...

आज जो मैं पढ़ रही हूँ..चुन रही हूँ .......

image not displayed
तुम अब भी मुझे पढ़ते हो हर रोज़......
मेरा कुछ हिस्सा तुम अपनी जेबों में भी रखते हो;
और कुछ अपने दोस्तों के कानों में.
तुम्हारे बैंक बैलेंस में.......
बढ़ते हुए शून्यों की जगह मै ही तो हूँ;

जिस दिन धरा या गगन 
अभिमान कर लेंगे 
तुम्हें सर छिपाने के लिए 
एक कण नसीब नहीं होगा 
शानों-शौक़त सब धरे रह जायेंगे !!

ढलती  सांझ  और नीड़ में लौटते परिन्दे
सूरज संग मन भी डूबता जाता है ।
ईंट पत्थरों से बने हो वर्ना हिचकी जरूर आती ।।


नई विधा पर...सोचा इक रोज़ तुझे कह दूं
एक अरसे से मेरे अंदर इक समंदर है
आज न रोक मुझे, टूट के बह जाने दे

गम न कर यार मेरे मैंने, दुआ मांगी है
चाँद होगा तेरे दामन में, असर आने दे


विविधा पर.....कुछ खबर ही नहीं लापता कौन है
दीजिये मत खुदा की कसम बेसबब ।
अब खुदा को यहां मानता कौन है ।।

है जरूरी तो घर तक चले आइये ।
आप क्या हैं इसे जानता कौन है ।।

कविता मंच पर....जिओ और जीने दो
कितना नाज़ां / स्वार्थी  
और वहशी है तू ,
तेरे रिश्ते 
रिश्ते हैं 
औरों के फ़ालतू।
चलो अब फिर 
समझदार,
नेक हो जायें,
अपनी ज़ात 
फ़ना होने तक

 आज्ञा दें
फिर मिलेंगे..
यशोदा ..












Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...