पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

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गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

510......जिसने धन को सबकुछ माना वो एकदम निर्धन है  साहब


जय मां हाटेशवरी...

काफी दिनों बाद...
एक बार फिर....
मैं कुलदीप ठाकुर उपस्थित हूं...
...आनंद का एक और अंक लेकर...
पेश है मेरी पसंद...

कहीं हैं विश्राम गृह
रुक जाने का भी
 मन होता है
पर मन  असंतुष्ट
कुछ करने नहीं देता
उसकी कातरता देख
 दारुण दुःख होता
यही बड़ी समस्या है

कब तक हम भटका करें नाकारा बेकार
नैया कर दो पार अब जग के पालन हार !
बीत रहा जीवन फिसल ज्यों हाथों से रेत
संभल न जाते हम तभी जो आ जाती चेत !
इससे तो हम सीखते हाथों का कुछ काम
बेकारों’ की लिस्ट से हट तो जाता नाम !

 
ज़माना कभी भी बुरा तो नहीं है 
बुरा आदमी है, सुधरना पडेगा |
गुलों में जो खुशबु है, उसको भी जानो
क्रिया का ही खुशबू, बढ़ाना पडेगा |

ऐसा नहीं है कि सूत्रशैली कोई कृत्रिम तकनीक है। शब्दों की शक्ति अथाह है, एक एक शब्द जीवन बदलने में समर्थ है। इतिहास साक्षी है कि सत्य, अहिंसा, समानता, न्याय,
अपरिग्रह, धर्म आदि कितने ही शब्दों ने समाज, देश और संस्कृतियों की दिशा बदल दी है। पहले उन शब्दों को परिभाषित करना, संस्कृति में उनके अर्थ को पोषित करना,
उन्हें विचारपूर्ण, सिद्धान्तपूर्ण बनाना। कई कालों में और धीरे धीरे शब्द शक्ति ग्रहण करते हैं। उदाहरणस्वरूप योग कहने को तो एक शब्द है पर पूरा जीवन इस एक
शब्द से साधा जा सकता है। सत्य और अहिंसा जैसे दो शब्दों से गांधीजी ने देश के जनमानस की सोच बदल दी। ऐसे ही शब्दों ने राजनैतिक परिवर्तन भी कराये हैं और समाज
की चेतना में ऊर्जा संचारित की है। व्यक्तिगत जीवन में भी सूत्रशैली की उपयोगिता है। बचपन परीक्षा की तैयारी करते समय किसी विषय को पढ़ते समय हम संक्षिप्त रूप
में लिख लेते हैं ताकि परीक्षा के पहले कम समय में उन्हें दोहराया जा सके। यही नहीं, विज्ञान के बड़े बड़े सिद्धान्त भी गणितीय सूत्रों के रूप में व्यक्त किये
जाते हैं।

जिसने जैसा परचा लिक्खा।।
लाखों दस्तक पर भी तेरा
दरवाजा तो बंद रहा।
जाते जाते दर पे तेरे,
अपना नाम पता  लिक्खा।।
यूं रदीफो काफिया, मिसरे
हमें मालूम थे।
तुम न समझोगे कि क्यों
हर शेर को मक्ता लिक्खा??

गृहणी हूं
बीनना मांजना
सीना पिरोना
इतना ही भर आता है..
अच्छा लाओ तुम्हारा मन
उस पर आश्वस्ति के बटन टांक दूं
नेह के धागे में आंके बांके भाव पिरो दूं..
वहां क्षितिज पर
ख़्वाहिशों की हाट लगी है
मोल भाव करुं
सस्ती हो तो
कुछ आंचल में भर लूं..


जिसने धन को सबकुछ माना
वो एकदम निर्धन है  साहब
औरों का दुःख जिसको छूता
वो मन नील गगन है साहब
बाहर उजली उजली बातें
अंदर भरा व्यसन है साहब

ये सुब्ह से शाम तलक आज़माए जाते हैं
क्यूँकि हर तकरीरें से तस्वीरें बदलती नहीं
न हि हर खामोशियों की तकसीम लफ़्जों में होती
रफ़ाकते हैंं इनसे पर चुनूंगी हर तख़य्युल को
जब  खुशी से वस्ल होगी...




आज बस इतना ही...
फिर मिलेंगे.......
रविवार को...
अगर समय पर  नैट ने साथ दिया तो...
पर आनंद का सफर नहीं रुकेगा...

धन्यवाद।

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

509.....जमीन की सोच है फिर क्यों बार बार हवाबाजों में फंस जाता है

सादर अभिवादन...
दिसम्बर का सातवाँ दिन
तेईस दिन बाद
धमा-चौकड़ी भरते
सन दो हजार सत्रह का प्रवेश


सब की मेहनत के भरोसे आ गया इस मोड़ पर
नाम है साझा सभी के तुम शिखर पाने तो दो

पक चुकी है उम्र अब क्या दोस्ती क्या दुश्मनी
वक़्त कितना क्या पता रिश्तों को सुलझाने तो दो


एक रिश्ता दोस्ती का
फलसफा यह जिंदगी का,
खूबसूरत सा जहाँ  यह
एक नाता हो ख़ुशी का !

घर आंगन छोड के जाना, कब अच्छा लगता है
आँखों से आँसू छलकाना, कब अच्छा लगता है

रोटी की मजबूरी, अक्सर छुडवा देती अपना देश
पराये देश में व्यापार फैलाना कब अच्छा लगता है

नापाक पाक से बात नहीं
बर्दाश्त कोई और घात नहीं
नक्शे में अब ये पाक नहीं
चाहे मरमिटे अपने लाख सही



दूर के ढोल सुहाने.....मालती मिश्रा
वैसे तो मानव के पास
गुणों का खजाना है 
पर समय निकल जाने के
उपरांत ही सदा 
इसने उनको पहचाना है




आज का शीर्षक..
की बात 
करने वाला 
सोचते सोचते 
एक दिन 
खुद ही 
जमींदोज 
हो जाता है ।

आज्ञा दें यशोदा को
सादर





मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

508...बाबरी मस्ज़िद विध्वंस की 24 वीं बरसी

06 दिसम्बर सन् 1992
ये इमारत आज मौजूद नहीँ है
क्यों हुआ..कैसे हुआ..
ये कुछ अमुक लोगों का ही विदित है
.......
सादर अभिवादन स्वीकार करें
आज की पसंदीदा रचनाएँ संक्षिप्त में.....
..अनुकरणीय..







फूल और काँटे


आज का शीर्षक...
आज से चौबीस वर्ष पहले
धार्मिक उन्माद के चलते
ऐतिहासिक इमारत गिरा दी गई
अब उस जगह पर सिर्फ मैदान है
जहाँ लोग पूजा भी करते हैं
और कतिपय लोग 
पूजन स्थल से दूर
बगल के मैदान मे नमाज़ भी पढ़ते हैं.
....
बात साल 1949 की है. आजाद भारत की उम्र कुल मिलाकर दो साल ही हुई थी. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अभी भी भारत के विचार को साकार करने में लगे हुए थे, और उनके सहयोगी सरदार वल्लभभाई पटेल देश की सीमाओं को परिभाषित कर रहे थे. 1949 में देश भले ही आजाद हो गया था लेकिन विभाजित भारत के लोग अभी भी विभाजन की त्रासदी में तार-तार हुए सामाजिक तानेबाने के चीथड़े को समेटने की कोशिश कर रहे थे. इन्हीं सबके बीच उत्तर प्रदेश में जमीन तैयार की जा रही थी 22 दिसंबर की रात को अयोध्या घेरने की.
सुबह करीब 3 बजे अचानक से बिजली चमकी और श्री राम बाबरी मस्जिद में प्रकट हो गए. चमत्कार मानकर विश्वास कर लिया गया यह वाकया “राम जन्मभूमि को आजाद करवाने” की दिशा में हिंदुओं के “सदियों लंबे” संघर्ष में पहला महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ. 
दावा किया जाता है कि 
बाबरी मस्जिद को बाबर के सिपहसालार मीर बाकी ने साल 1528 में श्रीराम जन्मभूमि पर बने मंदिर को तोड़कर बनवाया था.

और आगे पढ़िए......

आज्ञा देँ दिग्विजय को
सादर..


















सोमवार, 5 दिसंबर 2016

507....हर तरफ फकीर हैं फकीर ही फकीर

सादर अभिवादन
दो रोज से परेशान थी
उँगलियाँ तवे को छू गई थी
आज ठीक है...

आज की पसंद........

किसी की प्रस्तुति नहीं पर डिज़िटल भारत की शुरुआत



काँपती उँगलियों से,
थरथराते शब्दो को लिख रही हूँ....
धुंध में तुम्हे ढूंढती अपनी आँखों की बेचैनियां,
इस बार राजाई में छुप कर,
तुम्हारी पढूंगी,और तुम्हे लिखूंगी,
मैं भी तुम्हे सर्दी की चिठ्ठियां...


अकेलापन........अनीता 
उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक
धरा के इस छोर से उस छोर तक
कोई दस्तक सुनाई नहीं देती


अपना बचपन.......जीतेन्द्र पाराशर
बेचैनी से ढूढ़ रहा था वो
अपना बचपन
अरसे बाद आया अपने गाँव
भाग चला पकड़ने
पीपल को
जो करते करते इन्तजार
मर चुका था



ये लोग पागल हो गए हैं..... नासिर काज़मी
उन्हें सदियों न भूलेगा ज़माना
यहां जो हादिसे कल हो गए हैं, 

जिन्हें हम देख कर जीते थे 'नासिर' 
वो लोग आँखों से ओझल हो गए हैं



४० पार..... रेवा टिबड़ेवाल
आईने के सामने खड़े हो 
आज खुद से 
बात करने की कोशिश करी ....... 
जब गौर से देखा तो 
समझ ही नहीं आया की 
ये मैं हूँ !!



आज के शीर्षक में ताजी खबर..

फकीरों 
के देश में 
खुश 
रह कर 
हमेशा 
की तरह 
बैठ कर 
पीटता 
चला चल 
अपनी 
लकीर 
दर 
लकीर । 

इसी के साथ आज्ञा दें यशोदा को
चलते-चलते एक छोटा सा पंच और




रविवार, 4 दिसंबर 2016

506....शताब्दी वर्ष में 12 वां हाइकु दिवस

सादर अभिवादन
अभी फोन मिला
........
साथ 
कुलदीप जी का
नेट ने 
छोड़ दिया..

आज हाइकु दिवस है ..... 
शताब्दी वर्ष में 12 वां हाइकु दिवस .... 
पटना में आयोजित किया जा रहा है...

आज पढ़िए हाईकूनुमा प्रस्तुति....





















आज्ञा दें दिग्विजय को
मैं आज कल अकस्मात ही आ जाता हूँ
सादर









शनिवार, 3 दिसंबर 2016

505 .... हाइकु दिवस






कल हाइकु दिवस है ..... शताब्दी वर्ष में 12 वां हाइकु दिवस .... पटना में आयोजन है .... कैसी अनुभूति हो रही है ,यहाँ शब्दों में नहीं बता सकती हूँ ... लोग पूछ रहे हैं , तैयारी कैसी है  ... तैयारी कैसी रही ये तो परिणाम बताते समय लोगों के आँखों से झलकता है .... 

सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष




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फिर मिलेंगे .... तब तक के लिए 
आखरी सलाम


विभा रानी श्रीवास्तव 



शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

504..कुछ व्यक्त करने के लिये कोई है जो चल रहा हो साथ में लेकर शब्दकोष शब्दों को गिनने के लिये

सादर अभिवादन..
सोलह की पूँछ ही बाकी है
निगल लिया सत्रह ने उसे
गिनता के ही दिन बचे हैं....

पसंदीदा रचनाओं की ओर चला जाए....

सराहनीय...
Lawyer से बनी Successful चायवाली : उपमा विरदी की उपलब्धि
लोगों को चाय इतना पसंद आ रहा है कि लोग इसे बनाने का तरीका भी सीख रहें है | इसके लिए उपमा अलग – अलग शहरों में जाकर ‘The Art of Making Chai’ वर्कशॉप यानि चाय बनाने की कला के बारे में class लेती है जिसमे उपमा विरदी लोगों को स्वादिष्ट मसाला चाय बनाना सिखाती है| चायवाली (Chaiwaali) के नाम से आज उपमा ने बिजनेस में जो मुकाम हासिल किया है उसके लिए बस यही कहना चाहूंगी


जब से मिले तुम मुझको 
मेरे ख्याल बदल गए 
जीने से बेजार था दिल 
तुम बहार बन के आ गए 

कभी कभी अपने से बडों की, अपने मार्गदर्शकों (Trainer) की बातें हमें भी अजीब लगती होंगी. ध्यान रहे, कहीं झल्लाहट मैं शागिर्द वाली गलती हमसे भी न हो जाये. यदि ऐसा हुआ तो वो हमारे सीखने की सीमा होगी, उसके आगे हम कुछ नहीं सीख पाएंगे. याद रखिये की सीखने की कोई सीमा नहीं है.



तुम हो...अर्चना तिवारी
तुम रंग नहीं
जिसे सिर्फ़ तीन रंगों में रंगा जाय
और तुम कोई आदेश भी नहीं
जिसे थोपा जाय
तुम असीमित हो, तुम अपरिभाषित हो
तुम अकथनीय हो, तुम बेरंग हो
तुम देश हो
कोई सामान नहीं हो...

मुल्क भी हैरान है ऐसा मदारी देखकर.....अतुल कन्नौजवी
जिनके चेहरे साफ दिखते हैं मगर दामन नहीं
शक उन्हें भी है तेरी ईमानदारी देखकर,

उम्रभर जो भी कमाया मिल गया सब खाक में
चढ गया फांसी के फंदे पर उधारी देखकर,


उलटफेर भरी दुनिया......कश्मीर ठाकुर
सारी की सारी दुनिया
जीना चाहता हूँ
मगर
मरना आता नहीं!



ओ कचनार.....रश्मि शर्मा
चेहरा मेरा था...
नि‍गाहें उसकी...
वो देखता जाता...
लगातार नहीं टि‍कती थी
उसकी नि‍गाहें...
कभी आकाश तकता तो कभी रास्‍ता।
मगर मुड़कर नि‍गाहें अटकती मेरे ही चेहरे पर।


अंत में शीर्षक कथा..

शब्दों के बीच में 
गिरते लुड़कते शब्दों
को जोड़ते तोड़ते
मरोड़ते शब्द
कोशिश में
समझाने की
बताने की
कुछ व्यक्त
कुछ अव्यक्त
व्यर्थ में
असमर्थ
समर्थ शब्द ।
........

आज्ञा दीजिए दिग्विजय को
फिर मिलेंगे जब भी आदेश मिलेगा











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