पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

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रविवार, 19 नवंबर 2017

856..बिल्ली जब जाती है दिल्ली, चूहा बन जाता है सरदार...

सादर अभिवादन..
19 नवेम्बर..
कई मुआमले में खास है
इतिहास के पन्‍नों में दर्ज है आज के दिन की कई घटनाएं, 
जिनमें ये प्रमुख हैं...आज ही..
2017..आज पाँच लिंकों का आनन्द के 856 वें अंक का प्रकाशन
जिसमें  उलूक, कारोबार, चूहा, दिल्ली, बिल्ली का भी जिक्र है
1975. देश की पहली मिस यूनिवर्स सुष्मिता सेन का जन्‍म हुआ था.
1917..पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का जन्‍म हुआ था.
1835. बहादुरी की मिसाल महारानी लक्ष्‍मीबाई जन्‍म हुआ था.

रक्खें ख्याल ..
अधखुली खिड़की का 
 और समाजवाद का
सन्नाटे में कभी..
सृष्टि का सार नहीं न है

आखिर आज क्यूँ...
मज़ाल है कोई हटे जेहन के पास से
छपवा देंगे..
उलूक के पन्ने में हम

याद कीजिएगा आप.. वो दिन..


ख्याल से खयाल रखिएगा..आज की रचनाओं की ओर..
जितना  झटकूँ
उलझती है
फिसलती है आकर
पलकों की राहदारी में
ख्याल बनकर।

दर्पण के सामने खड़ी हूँ
लेकिन नहीं जानती
मुझे अपना ही प्रतिबिम्ब
क्यों नहीं दिखाई देता ,


अधखुली खिड़की से.......अनु अन
अधखुली खिड़की से,
धुएं के बादल निकल आए,
संग साथ मे सोंधी रोटी 
की खुशबु भी ले आए,




सृष्टि का सार...अंशु जौहरी
रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार


आज क्यूँ ?.....पुरुषोत्तम सिन्हा
आज क्यूँ ?
कुछ अनचाही सी बेलें उग आई हैं,
मन की तरुणाई पर, कोई परछाई सा लगता है,
बिखरे हो टूट कर पतझड़ में जैसे ये पत्ते,
वैसा ही बेजार ये,
कुछ अनमना या बेपरवाह सा लगता है.......


मजाल है जो ज़ेहन से रुखसत हो.....पम्मी सिंह
ऐसी भी जहीनी क्या?
बेफिक्री वाली हंसी हंसना चाहती हूँ ..
इत्ता कि सामने वाले की हंसी या तो गायब हो 
(मानो कह  रहा लो मेरे हिस्से की भी ले लो)या हंसने लगे
और मन के किसी कोने में बैठा भय बस..सहम ही जाए..
मुसाफिर हूँ बस.. खुशनसीब शज़र की  


लंच बाक्स से झांकता है समाजवाद...अपर्णा वाजपेई
कुछ डिब्बों में रखी होती हैं करारी- कुप्पा तली हुयी पूरियां 
और कंही, 
चुपके से झांकती है तेल चुपड़ी तुड़ी-मुड़ी रोटी,
कुछ बच्चे खाते हैं चटखारे लेकर-लेकर 
बासी रोटी की कतरने, तो कुछ;
देशी घी में पगे हलवे को भी देखकर लेते हैं  

"वो दिन"....मीना भारद्वाज
बर्फ से ठण्डे हाथ और
सुन्न पड़ती अंगुलियाँ
जोर से रगड़ कर
गर्म‎ करने का हुनर
तुम्हें देख कर
तुम ही से सीखा है ।

पन्ना उलूक का

धोती है कुर्ता है 
झोला है लाठी है 
बापू की फोटो है 
मास्साब तबादले 
के लिये पीने 
पिलाने को खुशी
खुशी तैयार है 

‘उलूक’ के पास 
काम नहीं कुछ 
अड़ोस पड़ोस 
की चुगली का 
बना लिया 
व्यापार है ।

आज बस इतना ही..
गालियाँ नहीं न खानी है

यशोदा














शनिवार, 18 नवंबर 2017

855.... संवेदना


चित्र में ये शामिल हो सकता है: 14 लोग, मुस्कुराते लोग, लोग खड़े हैं

रेनबो में हम
समझते अपनी
संवेदना






सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
बाल दिवस बीत गया .... बालिका दिवस की प्रतीक्षा है
आजमा ही लेते हैं कितनी बची है हम में

संवेदना

जगे को सुलाती है
और सोय़े को जगाती है !
तू बस वही है न ..!
जो जीवन में जीवन का प्रमाण है
सर्द गर्म का कठोर नर्म का
मधुर का तीखे का आभाष कराती है !
तू है तो ग्यानेंद्रियां सक्रीय है
तुम्हारे नही होने का अर्थ
नि:संदेह मृत्यु ही है….||

संवेदना

डालियों में होती है बेचैनी
शायद चीर कर टहनियों के बाजुओं को
कोई निकालना चाहता है बाहर
एक नए सृजन के लिए।


संवेदना

वास्तव में यह आज की शहरीकरण की देन है।
शहर में वायु प्रदूषण, मागों पर पेट्रोल-डीजल से चलने वाले
 वाहनों की बढ़ती संख्या के कारण उसके धुएं भी बढ़ रहे हैं।
इन धुओं में कार्बन डायऑक्साइड के कण शामिल होते हैँ।
जो सांस नली में चले जाते हैं, वहां जाकर सूजन पैदा करते हैं।


संवेदना




><><

31 जुलाई 2017 में रिटायर्ड होने के बाद
जहां अध्ययन किये इंजीनियरिंग का
उस कॉलेज में जुटे हैं
मेरे पति अपने साथ पढ़ने वालों से मिलने
18-19 नवम्बर बहुत मस्ती होने वाली है
याद करेंगे अपने किये शैतानियाँ उधम बाजी
आती हूँ यादें बटोर .....फिर मिलेंगे




शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

854....जीवन का स्वभाव चलते जाने की पुष्टि है

सादर अभिवादन।
आधुनिक तकनीक की उपयोगिता और संचार माध्यम के क्रांति के इस दौर में इलेक्ट्रॉनिक बुक (ई-बुक) के प्रति लोगों का रूझान बढ़ा है, परंतु छपाई के पुस्तकों की प्रासंगिकता भी कम नहीं हुई है।  ई-बुक की पहुँच आभिजात्य वर्ग तक ही सीमित है जबकि पुस्तक आम जनमानस के सभी वर्ग की पहुँच में है। 

डर इस बात का है कि 
ई-बुक के बढ़ते प्रचलन से कहीं  पुस्तकों की परंपरा और उत्कृष्ट साहित्य की संस्कृति खत्म न हो जाए। इलेक्ट्रॉनिक किताबें छपी हुई किताबों को नजरअंदाज कर देंगी क्या?
चिंता की बात है कि देश के बड़े हिस्से में बच्चों के लिए किताब का अर्थ पाठ्यपुस्तक से अधिक नहीं है। 
कुछ सवालों का जवाब आप पर छोड़कर चलिए पढ़ते है 
आज की रचनाएँ......

कल मशहूर श़ाय़र अकबर इलाहाबादी का जन्म दिन था
उनकी दो रचनाएँ पढ़िए...

बेपर्दा नज़र आईं जो चन्द बीवियाँ
कोई हँस रहा है कोई रो रहा है
कोई पा रहा है कोई खो रहा है

कोई ताक में है किसी को है गफ़लत

कोई जागता है कोई सो रहा है

अंतर्मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती
आदरणीया यशोदा दी की
सुंदर रचना
देखो पलट कर
वो साया है
तुम्हारा ही..
तलाशो उसे
अपने भीतर
भूलकर अंधेरे को
जला लो फिर से
एक बाती 

१९ नवंबर को रानी लक्ष्मी बाई की १८२वीं जयंती है। पढ़िये 
आदरणीय अमित जी की
प्रखर लेखनी से एक ओजमयी रचना
विस्मृति की धुंध हटाकर के, स्मृति के दीप जला लेना
झांसी की रानी को अपने, अश्कों के अर्घ चढ़ा देना।
आज़ादी की बलिबेदी पर, हँसतें हँसते कुर्बान हुई
उस शूर वीर मर्दानी को, श्रद्धा से शीश झुका देना।

बेटी के आगमन पर पीहर का हाल बयान करती
आदरणीया नीतू जी की
हृदयस्पर्शी भावपूर्ण कविता
मायके में बिटिया रानी

पलकों को आँचल से पोछा,
चेहरे पर मुस्कान सजाई,
जब देखी आंगन में मैंने,
अपने बाबुल की परछाई,
बार बार घड़ी को देखे,
जैसे समय को नाप रहे थे,

नये साल की सुगबुगाहट शुरु हो गयी है
बदलते वक्त को खूबसूरत शब्दों में पिरोती
 आदरणीय पुरुषोत्तम जी की
भावपूर्ण रचना

नव ऊर्जा बाहुओं में भरकर,
कीर्तिमान नए रचने को कहकर,
लक्ष्य महान राहों में रखकर,
आँखों में नए सपने देकर,
विकास पुरोधा बनकर, बदल रहा ये साल...

जीवन का सच बयान करती 
आदरणीया अनुपमा जी की
दार्शनिक भाव लिए बहुत सुंदर रचना
विराट दुख के साँचों में 

ढल कर भी
ज़िन्दगी
ज़िन्दगी ही रहेगी 

और अंत में अद्भुत शब्दों के मनमोहक डंक में उलझाते 
आदरणीय विश्वमोहन जी की
डेंगू के कहर से त्रस्त मार्मिक अभिव्यक्ति

प्लेटलेट्स की पतवार फंसी 'डेंगी' में।





तुमसे श्वेत तो वो ' एडिस'
काल-दंश-धारी!
चाहे हो राजा या रंक
बिना भेद के मारता डंक।

आज के लिए बस इतना ही
आपके बहुमूल्य सुझावों की
प्रतीक्षा में

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

853...मेरा हृदय छालों से भर जाता है...

सादर अभिवादन। 
जैसे-जैसे मौसम में बदलाव होता जा रहा है हमें धूप उतनी ही प्रिय लगने लगती है। डॉक्टर शीत ऋतु को हेल्दी सीजन कहते हैं।  बच्चों और वृद्ध जनों को यह ऋतु अधिक प्रभावित करती है।  साँस सम्बन्धी तकलीफ़ें बढ़ जाती हैं हवा में नमी के कारण वहीँ वृद्ध जनों को हार्ट अटैक का ख़तरा बढ़ जाता है। अतः सावधानी बरतना उत्तम उपाय है। मुझे ग्वालियर के वरिष्ठ साहित्यकार गीतकार और मेरे मार्गदर्शक आदरणीय जानकी प्रसाद "विवश" जी की दो पंक्तियाँ याद हो आयीं हैं -
"सर्दियों में धूप हमको इस तरह प्यारी लगी ,
आपकी छवि व्यथित मन को बेहद सुखकारी लगी।"

चलिए अब आपको अपनी पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलते हैं -  
पेश है आदरणीया ऋता शेखर 'मधु' जी की एक ख़ूबसूरत रचना- 

ऋता शेखर 'मधु' 

कटते रहे शजर और बनते रहे मकाँ 
हर ही तरफ धुआँ है कहाँ आदमी रह

आकाश में बची हुई बूँदें धनक बनीं
हमदर्द जो हों लफ़्ज़ तो यह ज़िन्दगी रहे

यथा नाम तथा गुण को चरितार्थ करतीं 
आदरणीया रश्मि प्रभा जी हाज़िर हैं 
अपनी एक गंभीर उत्कृष्ट कोटि की रचना के साथ -
मैं तुमसे कभी नहीं मिलना चाहूँगी
फिर भी,
गर मिल गए
तो मेरी खामोश नफरत को कुरेदना मत
क्योंकि उससे जो आग धधकती है
उस चिता में
तुम्हारे संग 
कुछ आत्मीय चेहरे भी 
झुलसने लगते हैं 
उन चेहरों को निकालते हुए 
मेरा हृदय छालों से भर जाता है 
फिर ...



हिंदी साहित्य की  दो महान विभूतियों आचार्य रामचंद्र शुक्ल और डॉक्टर रामविलास शर्मा  ने हिंदी गद्य के विकास में जो अतुलनीय योगदान समर्पित किया है उस पर एक शोधपरक आलेख के साथ आदरणीय  
अश्विनी कुमार लाल-  




डॉ. रामविलास शर्मा हिंदी-उर्दू को एक ही भाषा की दो शैलियां मानते थे। इनके तमाम साहित्‍य को एक ही जाति का साहित्‍य कहा है। अंग्रेजों ने हिंदी-उर्दू के बीच विभाजक रेखा खींच कर, उनका संबंध मजहब से जोड़ दिया है जो हमारे जातीय एकता में बाधक सिद्ध हुई है। डॉ. रामविलास शर्मा इस संदर्भ में लिखते हैं- “हिंदी-उर्दू विवाद को इतना जहरीला बना दिया गया है कि बहुत से लोग भूल गए हैं कि वे एक ही बोलचाल की भाषा के दो रूप हैं, इनका तमाम साहित्‍य भला-बुरा जो कुछ है, एक ही जाति का साहित्‍य है। जैसे-जैसे लोग यह समझेंगे कि हिंदी-उर्दू वाले एक ही प्रदेश के रहने वाले हैं, एक ही कौम हैं, उनकी बोलचाल की भाषा एक है और इसलिए उनके साहित्‍य की भाषा को भी एक होना पड़ेगा, वैसे-वैसे यह अलगाव कम होगा।”15 इस प्रकार डॉ. रामविलास शर्मा ने हिंदी-उर्दू को एक ही भाषा की दो शैलियों के रूप में देखा, जो ठीक भी है।

आपको आश्चर्यचकित कर देने वाली चित्रावली 
ब्लॉग "नई विधा" पर पेश कर रही हैं 
आदरणीया दिव्या अग्रवाल जी -

Car Graveyard in Chatillon Belgian Forest

और अंत में पेश है आदरणीया दीदी विभा रानी श्रीवास्तव जी की एक 

प्रभावशाली अर्थपूर्ण लघुकथा -

 "मसक गया"…..  विभा रानी श्रीवास्तव 

Profile photo

तभी एक का फोन घनघनाया

हैलो!"

"इतनी रात तक कहाँ
बौउआ रही हो?"
"बैठ गए हैं ऑटो में बस पहुंचने वाले ही हैं"
"बहुत पंख निकल गया है ... बहुत हो
गई मटरगश्ती...
कल से बाहर निकलना एकदम बन्द तुम्हारा..."
पूछ! नहीं लौटूँ जेल, चली जाऊँ दीदी के घर..."

आज बस इतना ही। 
आपके उपयोगी फीड बैक की प्रतीक्षा में। 
फिर मिलेंगे।

बुधवार, 15 नवंबर 2017

852..पत्थर की तरह बेहिस-ओ-बेजान सा क्यों है..

१ ५ नवम्बर २ ० १ ७ 
।।प्रातः वन्दन।।

सीने में जलन, आँखों में तूफ़ान सा क्यों है
इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है

दिल है तो, धड़कने का बहाना कोई ढूंढें
पत्थर की तरह बेहिस-ओ-बेजान सा क्यों है

क्यूँ हैरान है ? आप सभी इन बोल से 

पर यहीं सच्चाई है आजकल,
प्रदूषण के संबंध में पिछले साल भी और इस साल भी
 खूब बैठकों का दौर चला ..तमाम 
योजनाओं के बावजूद हम मौजूद महासंकट से हार रहें हैं
 तभी तो स्माँग चेम्बर में रहने को विवश है..वातावरण में शामिल
 जहरीले तत्व सेहत के लिए निहायत ही जानलेवा साबित हो रही है।
 इस दुर्दशा के जिम्मेदार सरकार, दिल्लीवासी और पड़ोसी राज्य सभी है...
त्वरित समाधान की आवश्यकता है क्योंकि जिस अवस्था में हम सभी  है रुका नहीं 
जा सकता समस्या से पार आगे  भी जाना जरूरी है।

कहीं.. इस बार भी समाधान तेज हवाओं के रुख और बारिश पर तो नहीं...

फिर सबबब.. ठीक हो जाएगा।

चलिए अब नज़र डालते है आज की लिकों पर..✍

ज्योति खरे जी की रचना..

बहुत खास होते हैं
अपनों से भी अधिक
जैसे
पुरुष के लिए प्रेमिका
स्त्री के लिए प्रेमी

मनमोहन भाटिया जी की कथा..
कृष्ण गोपाल को बिस्कुट खाते देख कंचन ने पूछा "नाश्ता बना दूं,क्या लोगे?"
"हां भूख लग रही है। कुछ भी बना दे। क्या बनाओगी?"
"आलू का पराठा बना दूं?"
"बना दे।"
कंचन ने पराठे के साथ अदरक वाली चाय भी बना दी।

ध्रुव जी की  बहुत गहरे भाव और आध्यात्मिक रचना ..


सम्भालो नित् नये आवेग
रखकर रक़्त में 'संवेग' 
सम्मुख देखकर 'पर्वत'
बदल ना ! बाँवरे फ़ितरत
अभी तो दूर है जाना
तुझे है लक्ष्य को पाना
उड़ा दे धूल ओ ! पगले

ब्लॉग कबाड़खाना से..


जब भी विभाजन का राउंड फिगर आता है- जैसे, 40, 50, 60, 70 तो हमारे 
अंदर का इतिहासकार जाग उठता है.
सबसे पहले उन बूढ़ों की खोज लगाने की होड़ शुरू हो जाती है
 जिन्होंने विभाजन ख़ुद देखा या भोगा हो ताकि उनकी यादें रिकॉर्ड
 करके ताज़े हरे या गेरुए गिफ़्ट पैक में बांध के नई खोज़
 की सुनहरी फीते लपेट के पेश किया जा सके.

मीना शर्मा जी की अभिव्यक्ति का आनंद ले..


पलकों के अब तोड़ किनारे,
पीड़ा की सरिता बहने दो,
विचलित मन है, घायल अंतर,
एकाकी मुझको रहने दो।।
शांत दिखे ऊपर से सागर,
गहराई में कितनी हलचल !

अशोक जी  की रचना..

 उसका नाशुक्रा होना, सख्त नापसंद है
मुझे बस... अपनी ज़मीनी हकीक़त पसंद है... 

आज़ की बातें वातें यहीं तक ..✍

।।इति शम।।
धन्यवाद।

मंगलवार, 14 नवंबर 2017

851...बच्चों के लिये स्वस्थ्य सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण में बड़ा होने की अनुमति और अवसर प्रदान करें....



जय मां हाटेशवरी.......
सोच रहा हूं....
आज बाल-दिवस पर आयोजित होने वाले किसी सामारोह में....
सड़क पर भीख मांगते हुए बच्चों के लिये भी कोई घोषणा होगी?...
जिन मासूमों को ढाबों या कारखानों में काम करते हम अक्सर देखते हैं, 
क्या उनके पुनर्वास के  बारे में भी कुछ सोचा जाएगा ?....
बच्चों तक नशीले पदार्थ पहुंचाने वाले तस्करों  की सूचना देने वालों को 
प्रोत्साहित करने के लिये भी कोई योजना बनेगी क्या ?.....
एक मासूम बालक, अपराधी क्यों बनता है,  कहीं इस पर भी मंथन होगा क्या ?....
जो माता-पिता नशे में या अन्य किसी कारण से अपने बच्चों  की अनदेखी करते हैं. 
अर्थात उनकी देख-भाल नहीं करते, ऐसे माता-पिता को कड़ी से 
कड़ी सजा देने वाला कोई कानून बनेगा क्या?...
आज बाल दिवस के अवसर पर 
कुछ मजदूरों के बच्चे तो साहित्यकार बनने की और अग्रसर हैँ
तो कुछ सड़क का कचरा बीन कर नशे की दौड़ मे शामिल हैं...
प्रस्तुत है दोनों प्रकार की झलकियाँ.....
 चाह है मेरी की दुनियां घूमूँ ,
हर जगह मस्ती में झूमूँ | 
देखूं मैं नई किरणों का शहर,
जंहा न हो दुश्मनों का कहर | 
पद यात्रा से  हवाई यात्रा करूँ ,
आसमान में जाकर नई साँस भरूँ | 

When a little bird try to fly,
fall down many times but not shy.
till it rise up and then try. 
but its little unique,
not help him to fly.  
अनपढ़ों को पढ़ाता है तू, 
सबके दिल को छू जाता है तू | 
इस देश के वासियों को, 
अच्छी बातें है बताता तू | 


 महान व्यक्ति के साथ ही राष्ट्रीय सम्पत्ति भी माना जाता है। वैयक्तिक रुप से, माता-पिता, अभिभावक और पूरे समाज के रुप में हमारा एक नैतिक कर्तव्य है कि हम बच्चों के लिये स्वस्थ्य सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण में बड़ा होने की अनुमति और अवसर प्रदान करें ताकि वो जिम्मेदार नागरिक, शारीरिक रुप से तंदरुस्त, मानसिक सतर्क और नैतिक रुप से स्वस्थ्य बन सकें। ये राज्य का कर्त्तव्य है कि वो 
सभी बच्चों को उनकी बढ़ती हुई आयु की समयावधि पर विकास के लिये समान अवसर प्रदान करे जो असमानता को कम करके और सामाजिक न्याय को सुनिश्चित कर सके। बच्चों से आज्ञाकारी, 
बड़ों का आदर करने वाला और अपने अंदर अच्छे गुणों को धारण करने वाले होने की अपेक्षा की जाती है। हालांकि, बहुत से कारणों के कारण बच्चों का एक निश्चित प्रतिशत पहले से कही हुई सामाजिक और वैध उक्तियों को नहीं मानते। इस तरह के बच्चे अधिकतर अपराधिक गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं 
जिसे बाल अपराध या किशोर अपराध के रुप में जाना जाता है।



आजकल उत्तर-प्रदेश में नगरपालिका चुनावों का दौर चल रहा है और ऐसे में गली गली घूमकर नेतागण प्रचार के कार्य में जुटे हैं चलिए ये सब तो सही है किन्तु अगर कुछ नागवार गुजर रहा है तो वह है बच्चों द्वारा चुनाव प्रचार .बच्चे अपनी साइकिलों पर घूमकर कहीं हाथी तो कहीं हवाई जहाज का प्रचार करने में जुटे हैं और
ये सब जानते हैं कि बच्चे कुछ भी बगैर लालच के नहीं करते और वह भी वह काम जिससे उनका कोई सरोकार नहीं कोई मतलब नहीं लेकिन वे पूरे जोश से जुटे हैं नेतागण की जिंदाबाद करने में क्योंकि उन्हें लालच दिया जा रहा है चॉकलेट का टॉफ़ी का और इनके लालच में वे वोट मांग रहे हैं जिसके बारे में उन्हें कुछ पता भी नहीं और पता होने की अभी कोई ज़रुरत भी नहीं क्योंकि अभी उन्हें जीवन में पढ़ना है ,बहुत कुछ सीखना है .


अन्य रचनाएँ.....


याद है घुँघरू का बजना रात के चोथे पहर
क्या चुड़ेलों की कहानी, है अभी तक गाँव में ?
लौट के आऊँ न आऊँ पर मुझे विश्वास है
जोश, मस्ती और जवानी, है अभी तक गाँव में

 मेरे विचार मेरी अनुभूति

है धर्म कर्म शील सभी व्यक्ति जागरूक
दिन रात परिक्रमा करे’ दिनकर कहे बग़ैर |
दुर्बल का’ क़र्ज़ मुक्ति सभी होनी’ चाहिए
क्यों ले ज़मीनदार सभी कर कहे बग़ैर |

रोज की बात
कुछ अलग
बात होती है
मान लेते हैं

छुट्टी के
दिन ही सही
एक दिन
का तो
पुण्य कर
लिया कर

आजाद जी आए और गप्‍प शप्‍प होने लगी । बातचीत में उन्‍होने कहा गुरूजी चाए तो बहाना है दरअसल मैं आपको कुछ दिखाना चाहता हूं। मैंने कहा, हां हां दिखाओ। आजाद जी ने एक परिचय कार्ड मेरे हाथों में दिया। गौर से देखा तो वह बार को‍ंसिल ठियोग का परिचय पत्र था। आजाद जी ने विधि स्‍नातक की 
उप‍ाधि प्राप्‍त कर ली थ्‍ाी और पंजीकरण भी करवा लिया था।
आजाद जी मुझे आभार देते हुए कह रहे थे आपने जो रास्‍ता दिखाया उससे ही ये सम्‍भव हो पाया। 
आभार तो आजाद जी का जिन्‍होने मुझे याद रखा मैं तो मात्र माध्‍यम बना

कौन सा बल है तुम मे,
जो धरा के मनुष्य मे नही
यदि होता तो मेरे लिए सरल होता
प्रतिदिन टूटते इन अश्रुओं के बांध को
एक स्थायित्व देना

कल पोते और बहू का सूरज पूजन भी था तो कुछ सामान लेने बाजार गये, वहाँ एक वृद्ध महिला ट्राली खेंच रही थी, कांपते हाथ से, अकेले सामान लेने आना मुझे जन्मदिन मनाने का कडुवा सच दिखा गया। स्वयं से खुश होते रहो, स्वयं ही जिन्दा रहो और स्वयं ही अपने लिये खुशी का माध्यम बनो। बस सब आपको इस दिन हैपी बर्थ-डे बोल देंगे लेकिन वृद्ध होते हुए आप समझ नहीं पाते कि अकेले ट्राली खेंचते हुए जीने का सुख क्या है? नवीन सोसायटी को देखकर लगता है कि हम एक दायरे में अलग-अलग बन्द हैं,
युवा अपने दायरे में हैं और बच्चे अपने। वृद्धों के लिये धीरे-धीरे जगह कम होती जाती है, या वे ही खुद को अलग कर लेते हैं, लेकिन पुराने जमाने में परिवार ही सभी का दायरा होता था, सब मिलकर ही ईकाई बनते थे। अमेरिका में परिवार का सच समझ आने लगा है, भारतीय लोग अब परिवार को साथ रखने में खुश दिख रहे हैं, लेकिन बड़े ही शायद आश्वस्त नहीं हो पा रहे हैं और हमें अकेली ट्राली खेंचती हुई भारतीय वृद्ध महिला जन्मदिन का महत्व दिखा रही है। हम परिवार के लिये उपयोगी बनें, सारा परिवार एक आत्मीय भाव से बंधा रहे और हम उस दिन कुछ देने की परम्परा को पुन: जीवित करें। मैंने अपना जन्मदिन आप लोगों की बधाई लेते हुए और पोते का सूरज पूजन कर, सूरज का आभार मानते हुए बिताया। आए हुए मेहमानों को हाथ से बनाकर भोजन खिलाया तब लगा कि हम अभी देने में सक्षम हैं। आप सभी का आभार, जो एक परिवार की भावना
प्रकट करती है, हम एक दूसरे को खुशियां देकर खुश होते हैं और यही भाव हमेशा बना रहे। मैं भी आप लोगों के लिये कुछ अच्छा करूं, अच्छे विचारों का आदान-प्रदान हो, बस यही कामना है।



वे शकुन्तला थीं
जिन्होंने भरत को
भरत बनाया था
आज की शकुन्तला
भरत को
भर्त्सना से भरती हैं।
कहानियाँ नहीं बदलीं
पात्र नहीं बदले
बस समय बदल गया है
चरित्र बदल गया है
पटकथा का रुख बदल गया है।।


धन्यवाद।

सोमवार, 13 नवंबर 2017

850...हक़ीक़त तो कुछ और है !

देर रात डेढ़ बज रहे थे कुछ क़दमों की आहट रात के अंधेरे को चीरती हुई लैब में दाख़िल हुई । मैं एकाएक दरवाज़े की तरफ भागा मेरे सम्मुख एक विकृत काली परछाई सामने आकर खड़ी हो गई। मैं दंग रह गया ! प्रोफेसर रमन ख़ून से लथपथ हाथ में कुछ पेपर्स लेकर मेरी ओर बढ़ रहे थे, और मैं एक ओर सहमा -सहमा खड़ा हो गया। उनकी भाव -भंगिमा रोज से बदली बदली नज़र आ रही थी। तभी वे मेरी ओर लपके, मैं चीख़ उठा ! 
मेरी नींद खुल गई। 

चलो छोड़ो ये सब तो बेकार की बातें हैं। ये तो एक सपना था 
हक़ीक़त तो कुछ और है, 
सपने सच नहीं होते। 
सच तो केवल हम , 
हमारा अस्तित्व 
और हमारा 
८५० वां अंक ! 

सादर अभिवादन। 

आदरणीय "पुरुषोत्तम सिन्हा"

 ख्यालों की जैसे कोई गहना,
पहनता हूँ हरबार जब भी ख्यालों को हो सँवरना,
सँवरते हैं ख्याल, सँवरती है ये कल्पना,
नव-श्रृंगार कर, जीवंत हो उठती है रचना......

आदरणीय "विश्वमोहन" जी 

 'अर्जुन' संज्ञाशून्य न होना
कुरुक्षेत्र की धरती पर
किंचित घुटने नहीं टेकना
जीवन की सुखी परती पर
सकने भर जम कर तुम लड़ना
चाहे हो किसी की जीत
अपने दम पर ताल ठोकना

गाना हरदम विजय का गीत !

आदरणीया "अनामिका घटक " 

 शून्य का मैं खोज हूँ 
शून्य का मैं ओज हूँ 
शून्य  के रथ पर सवार 
शून्य का मैं आज हूँ 

आदरणीया "रिंकी राउत" जी  

 धीमे-धीमे दहक रहे है
आँखों में गुजरे प्यार वाले पल
राख हो कर भी सपने
गर्म है
बुझे आंच की तरह


आदरणीया "सुधा सिंह" 

बात नहीं करती मैं
 तारों और सितारों की
न ही मैं बात करती हूँ
खूबसूरत नजारो की
मैं बात करती हूँ
इंसानियत के पहरेदारों की



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