पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

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रविवार, 25 जून 2017

709....हिन्दी के ठेकेदारों की हिन्दी सबसे अलग होती है ये बहुत ही साफ बात है

शत शत प्रणाम
भगवान श्री जगन्नाथ को

रविवार, 19 जुलाई 2015 को
याद करती हूँ..... आज का दिन
आज  के दिन ही प्रसव हुआ
नन्हे शिशु "पांच लिंकों का आनन्द" का
साथ जुड़े भाई कुलदीप जी
इस शीर्षक के साथ
स्वाभाविक है..जीवन साथी ने भी साथ दिया...
पहले ही अंक से मेरा हौसला बढ़ाते हुए 
मेरे अग्रज भाई डॉ. सुशील जी जोशी ने
अब तक मुझे दुलारते,पुचकारते व ललकारते हुए
आगे बढ़ने की प्रेरणा देते रहे..
यहाँ तक की यात्रा जारी रही निर्बाध, निरंतर
चलते-चलते तीन साथी और मिले....
पम्मी सिंह जी, ध्रुव सिंह जी एवं रवीन्द्र सिंह जी

आभार उन सभी को हम सफर बनने के लिए
हिन्दी तिथि के अनुसार आज का ये अंक 
वर्षगाँठ अंक है....बधाइयों की हकदार है ये
"पांच लिंकों का आनन्द"
मैं भूली नहीं हूँ अपने अतिथियों को
उन्होंने यहां आकर मेरा मान बढ़ाया
अब चलिए चलते हैं आज के नियमित अंक की ओर..
आज रथ यात्रा भी है...बड़ा ही शुभ दिवस
और सोने में सोहागा कि कल ईद-उल-फितर भी है
अद्भुत संगम है दोनों उत्सव का

बरसों से सोंचे शब्द भी उस वक्त तो बोले नहीं 
जब सामने खुद श्याम थे तब रंग ही घोले नहीं !

कुछ अनछुए से शब्द थे, कह न सके संकोच में,
जानेंगे क्या छूकर भी,हों जब राख में शोले नहीं !

इश्क पर ज्यों ज्यों कड़ा पहरा हुआ| 
रंग इसका और भी गहरा हुआ| 

कह रहे थे तुम कि गुनती जाती मैं| 
यूँ अचानक आज इक मिसरा हुआ| 

क्षितिज की रक्तिम लावण्य में,
निश्छल स्नेह लिए मन में,
दिग्भ्रमित हो प्रेमवन में,
हर क्षण जला हूँ मैं अगन में...
ज्यूँ छाँव की चाह में, भटकता हो चातक सघन वन में।


इस से पहले कि बेवफा हो जाएँ ---अहमद फ़राज़
इस से पहले कि बेवफा हो जाएँ
क्यूँ न ए दोस्त हम जुदा हो जाएँ

तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ


एक दिन.....श्वेता सिन्हा
खुद को दिल में तेरे छोड़ के चले जायेगे एक दिन
तुम न चाहो तो भी  बेसबब याद आयेगे एक दिन

जब भी कोई तेरे खुशियों की दुआ माँगेगा रब से
फूल मन्नत के हो तेरे दामन में मुसकायेगे एक दिन



कुछ तेरे ही हैं 
आस पास हैं 
और बाकी 
बचे कुछ 
क्या हुआ 
अगर बस
आठ पास हैं 
हिन्दी को 
बचा सकते हैं 
जो लोग वो 
बहुत खास हैं
खास खास  हैं।
....

काफी कुछ लिख गई
पर भाई कुलदीप जी हमारे ब्लॉग
"पांच लिंकों का आनन्द"
का वर्षगाँठ 19 जुलाई को ही मनाते हैं
कुछ विशेष यादगार होता है
वर्षगाँठ अंक..प्रतीक्षा करें
सादर






शनिवार, 24 जून 2017

708 ... मानसून



सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष


तेज़ रफ्तार से
यादें संग होते हैं 




मैं देखता हूँ कि रेडियो, टेलीविज़न और फेसबुक पे 
लाशों ने टहलना शुरू कर दिया है | लोगों ने बेचना शुरू कर दिया है 
लाशों की जलावन, कुछ दफ्तरों में बैठे लोगों ने 
ख़रीद कर जलाना शुरू कर दिया है और नेताओं ने 
पकाना शुरू कर दिया है रोटी | अब बंटेगी रोटियाँ .
 मेरे सामने भी पड़ी है, क्या उठा लूँ  . . . . . 
खा लूँ  . . .नहीं  . . . .  हाँ  . .  . नहींहींहीं





‘खुषबू मेरे देष की’ मई 2017 (बरेली) के लघुकथा विषेषांक अंक
,वर्ष-5 में पृष्ट- 13 पर प्रकाशित
मेरी एक लघुकथा
आपकी नज़र कर रहा हूँ-






कोई ऐसी रात नहीं गुज़रती जिसमें तेरा सपना ना हो
कोई दिन नहीं गुज़रता जब तेरा एहसास अपना ना हो
इस मुस्कान के पीछे ज़ख्म जो अभी हरे से हैं
सुर्ख रखने को खुद को मेरा लहू पी रहे हैं
मरते दम तक तेरी राहों में पलकें बिछाए






जब चन्द्रमा अपनी रश्मियाँ बिखेर रहा होगा ।
जब जुगनु टिमटिमा रहे होंगे ।
जब रात का धुंधलका छाया होगा ;
जब दूर सन्नाटे में किसी के रोने की आवाज़ होगी ;
या कहीं पास पायल की झंकार  होगी ?
या चूड़ियों की कसमसाहट ?





लिखना सीखना शुरू की थी तब
आया तो अब तक नहीं
पाठक रहना ज्यादा आसान है

><><

फिर मिलेंगे

विभा रानी श्रीवास्तव





शुक्रवार, 23 जून 2017

707....दिशा है अगर तो, है दिशाहीन

कहीं पर भी होती अगर एक मंज़िल,
तो गर्दिश में कोई सितारा न होता !
ये सारे का सारा जहां अपना होता,
अगर यह हमारा तुम्हारा न होता..!

चलिए चलें आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर..

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एक कारोबारी ने कार का नाम अपनी बेटी के नाम पर रख दिया और यहीं से मर्सिडीज नाम की शुरूआत हुई. कंपनी का नाम तो डाइम्लर मोटोरेन गेजेलशाफ्ट है.

चूम धरा का प्यासा आँचल
माटी के कण कण महकाये है
उदास सरित के प्रांगण में
बूँदों की गूँजें किलकारी
मौसम ने ली अंगड़ाई अब तो
मनमोहक बरखा ऋतु आयी है।

मायका मतलब
माँ बाबा का लाड़ ,
मायका मतलब
भाई का प्यार ,
मायका मतलब
भाभी की मनुहार ,


दर्द कोई बोलता हुआ....लोकेश नदीश
है मेरा अपना हौसला परवाज़ भी मेरी
मैं एक परिन्दा हूँ मगर पर कटा हुआ

मजबूरियों ने मेरी न छोड़ा मुझे कहीं
मत पूछना ये तुझसे मैं कैसे जुदा हुआ


नकारत्मकता से सकारात्मकता की ओर.......ऋतु आसूजा
बुराई को अच्छाई में बदलने की मेरी सोच बन आयी
नकारात्मक से सकारात्मक दृष्टि मैंने पायी
नकरात्मक सोच से करके विदाई
अब सकारत्मकता के बीज मैं बोता हूँ


समय तू पंख लगा के उड़ जा.......सुधा देवरानी
तब ना थी कोई टेंशन-वेंशन ना था कोई लफड़ा
ना आगे की फिकर थी हमको ना पीछे का मसला।
घर पर सब थे मौज मनाते खाते-पीते तगड़ा...
खेल-खेल में हँसते गाते या फिर करते झगड़ा ।


देश में पल पल 
जो हो रहा होता है
वही सब मेरे घर में
घट रहा होता है
कोई गांधी और 
कोई गोडसे
की दुहाई दे 
रहा होता है
कोई पटेल 
के नाम का
लोहा ले 
रहा होता है

आज्ञा दें यशोदा को


गुरुवार, 22 जून 2017

706...''सेर पर खुद को सवा सेर ''

सादर अभिवादन !
कल विश्व योग दिवस की हलचल से हम गदगद रहे।
आज आपके लिए  पेश है पाँच  लिंकों की हलचल।
पावस ऋतु  ने अपनी दस्तक दे दी है।
छुट्टियों से लौटकर विद्यार्थी
नए शिक्षण -सत्र की चुनौती स्वीकारने को संवर रहे हैं।
उधर पुरी  (उड़ीसा ) में आगामी  रविवार 25 जून
को विश्व प्रसिद्द भगवान  जगन्नाथ की
रथयात्रा  की तैयारियां युद्धस्तर
पर उमंग और उल्लास से ज़ारी हैं तो रमज़ान का पवित्र महीना ख़त्म होने को है और ईद -अल -फ़ित्र की तैयारियां ज़ोरों पर हैं। 

आइये आज के आकर्षणों  से रूबरू होते हैं-
जीवन के अर्थ समझाती अरुण  रॉय जी की एक गंभीर  रचना -

जीवन शून्य है        अरुण रॉय


जितनी बार दुहराते हैं शून्य 
शून्य का  धागा  
मनोकामना के धागे की तरह 
मजबूती से लिपट जाता है 
हमारे चारो ओर 
कुछ  आशाओं के संग 

नवोदित रचनाकारों को प्रोत्साहन और संरक्षण की ज़रूरत होती  है। 

शीरीं "तस्कीन "जी की यह रचना भले ही संक्षिप्त है किन्तु भाव व्यापक हैं -

 

होसलों और उम्मीदों   शीरीं “तस्कीन”

और तुम हमेशा की तरह
मेरे होसलों और उम्मीदों से बने घर को
हर बार की तरह तोड़ कर चले जाते हो

संजय भास्कर जी की एक बारिश पर आधारित रचना जिसमें शब्द भले ही कम  हैं लेकिन भावों से आपको तर -बतर करने में सक्षम होगी -


बारिश की वह बूँद

जो मेरे कमरे की खिड़की के

शीशे पर

फिसल रही थी


एक और युवा  रचनाकार दीप्ति शर्मा जी की इस रचना में स्त्री जीवन से जुड़ीं वर्जनाओं का ख़ूबसूरती से ज़िक्र हुआ है जिसमें आक्रोश का स्वर भी मुखर हो उठा है -



कहा जाता है

मर्यादा में रहो

समाज की सुनो

प्रेम ना करो

किया तो मार दी जाओगी
बस आँख बंद कर
इस सो कोल्ड समाज की
मर्यादा का पालन करो

आज के जलते सवाल पर प्रकाश डालता शालिनी जी का यह आलेख विचारणीय है जोकि गंभीर सवाल खड़े करता है -

कानून पर कामुकता हावी     शालिनी कौशिक

ये घटनाएं स्पष्ट तौर पर यह सन्देश दे रही हैं कि अपराधी अब बेख़ौफ़ हैं उनपर भारतीय कानून का कोई असर अब नहीं है .उनकी साफ तौर पर यह चेतावनी हम सबको दिखाई दे रही है जो कानून के ''सेर पर खुद को सवा सेर '' मान भी रही है और साबित भी कर रही है .ये बात जब सबको दिखाई दे रही है तो कानून के नुमाइंदो को क्यों नज़र नहीं रही हैं . 



हमेशा की तरह आपकी प्रतिक्रियाओं 
और सक्रिय सहयोग की अपेक्षा रहेगी। 
अब आज्ञा दें....  सादर।
फिर मिलेंगे 
रवीन्द्र सिंह यादव  

बुधवार, 21 जून 2017

705...उठो, पहचानो सच को...

।।सर्वेभ्यो नमो नमः सुप्रभातम्।।

आदरणीय पाठकगण,

अथ श्री योग से,

योगः कर्मसु कौशलम्

आज साल का सबसे लंबा दिन 21 जून, यानी अंतराष्ट्रीय योग दिवस है। आज के दिन योग दिवस

 मनाने का तात्पर्य हमारी लंबी आयु और स्वास्थ्य से हैं। योग शब्द की उत्पति  संस्कृत शब्द 

युज से हुई है। अर्थानुसार योग शब्द दु अर्थी है, एक जोड़, दूसरा समाधी। योग पदध्ति वर्तमान की 

बहुमूल्य विरासत है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य के लिए उत्तम है।


शायद ये ही कुछ तरीके....जो हमारी जिंदगी को ज़हीन बनातें हैं।


चलिए, आज़ आप सभी के लिए मैं रचनाओं के सागर में से जो पंच रत्न लाई हूँ,

उसे लिंक के माध्यम से पढे....

दिल के जज़्बात से खूबसूरत गज़ल की लुत्फ़ ले...
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ऐ  ख़ुदा  बोल ,मेरी आँख में  पानी  क्यूँ है 
खूबसूरत  तेरी  दुनियाँ  है तो फ़ानी क्यूँ है 

क्यूँ  सवालों के जवाबात न हो तो  भी सही 
उसकी हर बात में हर बात का मानी क्यूँ है 



  ' सुन रही हो पुष्पा ' एक   लघु कथा...
" डैड प्लीज़ अब फिर से शुरू मत हो जाना। आप अपने समय से आगे क्यों नहीं बढ़ते कभी ? कुछ कदम ? वो पास्ट था... गया... अब प्रेजेंट की बात करिए डैड डिअर । "

तीर-ए-नजर से हास्य और व्यंग्य की कला टॉपर उसको कहते हैं ....

  रुपयों-पैसों का भरा बाजार है,
 जो मुद्रा की खनक दिखाए 
टॉपर उसको कहते हैं ।



 विश्वमोहन उवाच से सत्य का दर्पण दिखाती रचना मेरा भारत महान’,

और अद्यतन प्रवहमान निर्झरिणी मे
जड़ता के जगह जगह थक्के जम गये हैं. 



आवाहन  कराती सुंदर संवेदशील कविता.... 

सब पर अब 


उठो, पहचानो सच को,

महसूसो बदली हुई फ़िज़ां,
समेटो अपनी चौधराहट




अन्वीक्षा कर 
नवोद्भावनाओं को जरूर प्रकट करें, 
" विचारों की लौ मदिध्म न होने पाए '
।।इति श्री।।
धन्यवाद।

पम्मी सिंह  






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