पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद एक और निवेदन आप सभी से आदरपूर्वक अनुरोध है कि 'पांच लिंकों का आनंद' के अगले विशेषांक हेतु अपनी अथवा अपने पसंद के किसी भी रचनाकार की रचनाओं का लिंक हमें आगामी रविवार तक प्रेषित करें। आप हमें ई -मेल इस पते पर करें dhruvsinghvns@gmail.com तो आइये एक कारवां बनायें। एक मंच,सशक्त मंच ! सादर

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सोमवार, 11 दिसंबर 2017

878..विचार मानव के मूलभूत स्तम्भ हैं

इस धरा पर 
हर प्राणी अपने अस्तित्व के साथ 
अपने जीवन का निर्वहन करता है। 
फलतः अस्तित्व है तो विचार होना स्वाभाविक है 
और बिना विचार के अस्तित्व की कल्पना बेईमानी सी प्रतीत होती है। ये विचार मानव के वे मूलभूत स्तम्भ हैं 
जो उसके जीवित होने का संकेत देते हैं। 
विचार विहीन मानव अपने अस्तित्व की तलाश में 
प्रतिक्षण दूसरे के बताये मार्ग पर गलत है या सही 
बिना विचारे एक भ्रमित रूपी मृग के समान विचरण करता है 
अंततः एक गहरे अंधकार का 
प्रारम्भ !
वर्तमान में ये परिस्थितियाँ 
आपको प्रत्येक क्षेत्र में देखने को मिल जायेंगी। 
अतः अपने अस्तित्व की तलाश समाप्त और विचारों पर अमल करें। 
तभी अपने अस्तित्व को स्थापित करने में हम मानव प्रजाति सफल होंगे। 
तो चलिए आज के कुछ विचारों की ओर 

आप सभी का स्वागत है। 










➤ आज के रचनाकार हैं।

  • आदरणीय शिवनाथ कुमार 
  • आदरणीया मीना भारद्वाज 
  • आदरणीय रविकर जी 
  • आदरणीया किरण मिश्रा 
  • आदरणीया वीणा सेठी 
  • आदरणीय अजीत जी 
  • आदरणीया कविता भट्ट 
  • आदरणीय दिलबाग सिंह विर्क 
  • आदरणीय मदन मोहन सक्सेना 
  • आदरणीया शशि पुरवार 
  • आदरणीया सविता मिश्रा 
  • आदरणीया अपर्णा त्रिपाठी 
  • आदरणीया रेणु बाला 
  • आदरणीया सुषमा वर्मा 










चलो दो चार किस्से बतियाता चलूँ
जिंदगी को गुनगुनाता चलूँ 
 नश्वरता की प्रकृति  प्रकृति‎ को भी कहाँ भाती है ।।  












 दरमाह दे दरबान को जितनी रकम होटल बड़ा।
परिवार सह इक लंच में उतनी रकम दूँ मैं उड़ा।









चरखे से बनाती है सभ्यताओं के विकास के धागे
जिन का छोर पकड़










मुट्ठी में भरी रेत 
धीरे से फिसली 



दो बिंदुओं के संधिस्थल 
जैसा सूक्ष्म होता है 













 रात्रि-प्रहर की इस स्वप्न सभा में प्रिय तुम आना
सतरंगी विश्राम- भवन से कभी नहीं जाना









 परहेज़ ही काम करता है इस इश्क़ में यारो 
इस मर्ज़ के मरीज़ का इलाज नहीं होता। 









इधर तन्हा  मैं था उधर तुम अकेले
किस्मत ,समय ने क्या खेल खेले








जीवनभर करते रहे 
सुख की ख़ातिर काम 






  मुंह  मोड़ के   चल दिए साथी -
  तुम तो  नयी मंजिल -   नयी राहों पे  ; 






 चोट खाए दिल तभी लिखे यह जरुरी तो नहीं
मन का गुबार निकल जाये यह बात जरुरी है










देखा है
वक्त को
सावन सा बरसते
कभी बूँद बूँद रिसते हुये
देखा है



 तारीखे कहाँ बदलती है,
ये तो बदलते वक़्त के बार-बार,
खुद दोहराती है...





पांच लिंकों का आनंद ब्लॉग पर 
अपनी अंतिम प्रस्तुति के साथ आप सब से विदा लेता हूँ। 
आपके स्नेह व सहयोग का कृतज्ञ रहूँगा !

धन्यवाद। 

"एकलव्य" 

रविवार, 10 दिसंबर 2017

877....असली सब छिपा कर रोज कुछ नकली हाथ में थमा जाता है

सादर अभिवादन स्वीकारें
आज हम आए हैं....बुखार आया है
आज आने वाले को...

शायद  उन्होंने मच्छर को काट लिया है....
का़टने वाले को मच्छरों नें बारह घण्टे के
लिए मच्छरदानी में कैद कर दिया है.....
आज हमारी पसंद....


उपांतसाक्षी...पुरुषोत्तम सिन्हा
आच्छादित है...
ये पल घन बनकर मुझ पर,
आवृत है....
ये मेरे मन पर,
परिहित हूँ हर पल,
जीवन के उपांत तक,
दस्तावेजों के हाशिये पर...



हाँ, मैं ख़्वाब लिखती हूँ....... श्वेता सिन्हा
चटख कलियों की पलकों की
लुभावनी मुस्कान 
वादियों के सीने से लिपटी 
पर्वतशिख के हिमशिला में दबी
धड़कते सीने के शरारे से
पिघलती निर्मल निर्झरी
हर दिल का पैगाम सुनती हूँ
हाँ,मैं ख्वाब लिखती हूँ।





तापस....अनीता लागुरी
मेरी डायरियों के पन्नों में,
रिक्तता शेष नहीं अब,
हर सू  तेरी बातों का
सहरा है..!
कहाँ  डालूं इन शब्दों की पाबंदियाँ 
हर पन्ने में अक्स तुम्हारा
गहरा है...!



तुम्हारे हहराते प्यार की हलकार में...विश्वमोहन
मेरा क्या?
बिंदु था,
न लंबाई
न चौड़ाई
न मोटाई
न गहराई
भौतिकीय शून्य!
पर नापने से थोड़ा 'कुछ'!



ज़िंदगी-मौत.............नीतू ठाकुर
मौत की ही बंदगी
ज़िंदगी तो ख्वाब है
एक दिन मिट जाएगी
मौत है असली हकीकत
एक दिन टकराएगी
मौत से बढ़कर कोई भी
चाहने वाला नहीं




मैं....मीना भारद्वाज
समाया है समूचे
संसार में और
गीता के सार में
“अहम् ब्रह्मास्मि”
सब कुछ ईश्वर‎मय
कर्म भी , फल भी ।

स्टेशन...ओंकार केडिया
मैं चुपचाप जा रहा था ट्रेन से,
न जाने तुम कहाँ से चढ़ी 
मेरे ही डिब्बे में
और आकर बैठ गई 
मेरे ही बराबरवाली सीट पर.

उलूक के पन्ने से

हिसाब 
लगाते लगाते 
लिखने वाला 
लेखक तो नहीं 
बन पाता है 
बस थोड़ा सा 
कुछ शब्दों को 
तोलने वाली मशीन 
हाथ में लिये एक 
बनिया जरूर 
हो जाता है 

कुछ नहीं किया 
जा सकता है ‘उलूक’ 

आज बस इतना ही
सादर
दिग्विजय











शनिवार, 9 दिसंबर 2017

876.... आकांक्षा

आप सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

लेख्य-मंजूषा
पुस्तक मेला के मंच पर
कल (10-12-2017)
दोपहर 2 बजे से
आप दें शुभकामनाओं की लड़ी
मेरी आकांक्षा


ईमानदारी की तिनकों से बनाऊं अपनी एक सुंदर आसियाँ
चरित्र की पूँजी से धनी कर दूं मैं अपनी वादियाँ
मातृभूमि को भी मेरे जन्म पर हो अभिमान
यही आकांक्षा है मेरी मैं छू लूं आसमान

आकांक्षा

ठीक उसी मंहगार्इ की तरह
एक दिन मेरी 'आकांक्षा,
पूरी हो गयी,
तब,फिर एक नयी
'आकांक्षा ने जन्म लिया।
यदि नहीं होती,
मेरी यह 'आकांक्षा।
तो,मेरा जीवन कैसे कटना,
नीरस लगता,
मुझको ये संसार।
कैसे पाता, मैं,
जीवन का यह प्यार।।

आकांक्षा

रेखाएं
सीमान्त की धुरी पर
सीधी समझ से परे झुककर
उलझ कर बन जायें
वक्र

कैद
मन के रूपक
में व्यक्त होती विषयी
सूक्ष्म लौ में जलती
उन्मुक्त

आकांक्षा




फिर मिलेंगे....





शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

875...समय ही इश्क हो लेता है समय से जब इश्क होता है

सादर अभिवादन।
बाल पत्रिकाएँ दम तोड़ रही है, कुछ गिने चुने अखबारों में 
साप्ताहिक कॉलम बचे है बाल साहित्य के नाम पर।
कार्टून कैरेक्टरों ने पंचतंत्र और अन्य प्रेरक कथाओं को विस्थापित 
कर दिया है, जादू-टोने, परी कथाएँ सब बीते ज़माने की बात हो गयी है। जबकि ये सच है कि बच्चों को कोर्स की किताबों के अलावा भी भरपूर मानसिक खुराक की आवश्यकता है,क्योंकि बाल साहित्य न सिर्फ बालमन का मनोरंजन करता है बल्कि बच्चों का 
मानसिक तनाव दूर करने में भी सहायक है।

चलिये अब आज की रचनाओं की ओर.........

उलूक टाइम्स से आदरणीय सुशील सर

समय ही इश्क हो लेता है समय से जब इश्क होता है


कब किस समय
पहाड़ी पगडंडियों
से अचानक उतर कर
बियाबान भीड़ में
अपने जैसे कई
मुखौटों से खेलते
चेहरों के बीच 

धरोहर से आदरणीया यशोदा दी की कलम से
बयां करेगी किस्से

ऐ कविता
एक तलब सी 
बन गई हो 
इस जिंदगी में तुम....
जो बिन तुम्हारे 
अधूरी सी 
हो चली है....

शब्दों की मुस्कुराहट से आदरणीय संजय जी की कलम से

पापा आप हो सबसे ख़ास -2 दिसम्बर जन्मदिन पर विशेष


चिड़िया से आदरणीया मीना जी लेखनी से
अपना देकर के चैन-औ-सुकूँ सब,
खुशियाँ जिनके लिए थीं खरीदी,
दर पे जब भी गए हम खुदा के,
माँगी जिनके लिए बस दुआ ही !


आकांक्षा से आदरणीया आशा जी की कलम से
स्वप्न मेरे

खुली आँखों से देखे गए सपनों की 
बात है सबसे अलग  !
होते हैं वे सत्यपरक 
अनोखा अंदाज़ लिए ,
नवीन विचारों का सौरभ है उनमें  !

पलाश से आदरणीया डॉ. अपर्णा त्रिपाठी जी की कलम से
उफ ये बड़े आदमी


बडे लोग ही देख सकते हैं
बडे भव्य सपने
छोटे लोगो के हिस्से तो
सिर्फ आते हैं
सपने

कल की रोटी के

और अंत में फ़िज़ूल टाइम से 
आदरणीय डॉ. राजीव जी की कलम से
कौन सी डोर है जो दिल को हमारे बांधे
क्यों ये बरबस ही' तेरी ओर खिंची जाती है।

आप सभी के बहुमूल्य सुझावों की प्रतीक्षा में

श्वेता

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

874....जब मिलता है तुम्हें वनवास.....

सादर अभिवादन।
बीते कल और परसों ख़ासे चर्चा में रहे क्योंकि माननीय सर्वोच्च न्यायालय में "राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद" पर सुनवाई को लेकर जनमानस में भारी कौतूहल मौजूद था। अब यह सुनवाई 8 फरवरी 2018 तक स्थगित कर दी गयी है। सुनवाई टालने का कारण 19590 पेज़ का अनुवाद जिसमें से सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड की ओर से 3260 पेज़ परसों तक नहीं जमा कराये जा सके। सात भाषाओँ में अनुवाद का मुद्दा बड़ा पेचीदा है। 

आइये आज चर्चा करते हैं पाँच रचनाओं की जोकि ऊपर वर्णित मुद्दे पर अपना-अपना नज़रिया आपके समक्ष रखती हैं ( चार रचनाऐं- राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी , कुलदीप ठाकुर जी, आशुतोष नाथ त्रिपाठी जी, विजय राज बली माथुर जी ) एक रचना ("शोषित" - ध्रुव सिंह "एकलव्य" जी ) सदियों से समाज में व्याप्त रही शोषण की प्रथा और स्वयं के लिए FEEL GOOD  की पृष्ठभूमि बनाये रखने की सामंती सोच पर 
प्रहार करती है। आज भी भारतीय समाज इस सोच का 
किसी न किसी रूप में शिकार है।  
लीजिये अब रचनाओं से रूबरू होइये -

कितनी विडम्बना है इस देश के सांस्कृतिक प्रतीक चिन्हों की कि 
उन्हें अपने होने का सबूत देना पड़ता है. भगवान श्रीराम की जन्मभूमि उनकी अपनी होकर भी उनकी अपनी नहीं हो पा रही थी. सबूतों, 
गवाहों, बयानों, अदालतों के मानव-निर्मित सत्य वास्तविक सत्य को झुठलाने का कार्य करने में लगे थे. देश में रहकर, देश का दाना-पानी 
अपने उदर में प्रविष्ट करने वाले ही देश की सांस्कृतिक विरासत 
को नकारने का काम करने में लगे हैं

कुलदीप ठाकुर...
जब मिलता है तुम्हे वनवास
प्रसन्न होते हैं देवगण
क्योंकि वे जानते हैं
वनवास के दिनों में ही तुम,
धरा को असुरों से मुक्त करते हो....
न शक्ति थी किसी में
मंदिर का एक  पत्थर भी हिला सके,
धर्म की रक्षा के लिये ही
  
हे राम तुम्हारी सृष्टी में 
हैं कोटि कोटि गृह बसे हुए..
इस गर्भ गृह की रक्षा में,
आखिर अब कितनी बलि चढ़े...
इन लाशों के अम्बारों पर 
बाबर और बाबरी बसतें हैं...
यहाँ हनुमान हैं कई खड़े...
जो राम ह्रदय में रखतें हैं...


आस्था और विश्वास के नाम पर गुमराह करके  भव्य राम मंदिर निर्माण के नाम पर डॉ भीमराव अंबेडकर के परिनिर्वाड़ दिवस पर 25 वर्ष पूर्व 06 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा गिरा दिया गया था और आज भी वही राग अलापा जा रहा है उस पर नूपुर शर्मा जी का दृष्टिकोण है कि, ' भूखे भजन होय न गोपाला ' अतः  उन्होने  भव्य मंदिर के स्थान पर भव्य चिकित्सालय व विद्यालय के निर्माण की मांग रखी है  जो सर्वथा उचित है और उसका समर्थन प्रत्येक भारतीय को करना चाहिए । 


सुन 'बुधिया' ! कोई देख ले नाला 
ना मंदिर ना कोई 'शिवाला' 
देख नहर में शव जो पड़ा है 
नहीं कोई 'ज़ल्लाद' खड़ा है 
डाल दे अपने कलुषित मुख को 
पी ले नीर ,जो 'आत्मतृप्ति' हो

आपकी सेवा में फिर हाज़िर होंगे अगले गुरूवार।  आपकी मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रियाओं और उपयोगी सुझावों की प्रतीक्षा में। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


बुधवार, 6 दिसंबर 2017

873...बेवकूफ हैं, तो प्रश्न हैं.. उसी तरह जैसे गरीब है, तो गरीबी है...

सादर अभिवादन
पम्मी सखी आज प्रवास पर  हैं
अगले बुध से उन्हें आप फिर पाएँगे यहीं पर
इसी जगह...इसी दिन
हाँ ..याद आया... आज तो छः दिसंबर है
आज ही जागा था भारत रात भर
तोड़ी गई थी इमारतें...
जिसे संज्ञा दी जाती  है
धर्म-स्थानों की....
बकवास बंद...चलिए आनन्द लीजिए......

     आज पहली बार गूगल प्लस से सीधे     
योगी योगेन्द्र
आज है वो छः दिसम्बर
जब मैंने पहली लाश देखा
लाव लश्कर अयोध्या में
बाबरी के पास देखा

कार सेवक नाद देखा
अहिंसक उन्माद देखा
रामभक्तों के नगाड़ो में
मगन आकाश देखा

     नव प्रवेश     
आप कुमायू विश्वविद्यालय में भौतिक शास्त्र के विद्यार्थी रहे हैं
फ़िज़ूल ग़ज़ल....डॉ. राजीव जोशी
बच्चे घरों के' जब बड़े जवान हो गए
तब से बुजुर्ग अपने बेजुबान हो गए

कुदरत को छेड़ कर हमें यूँ क्या मिले भला
खुद ही तबाह होने का सामान हो गए


किस का कसूर.....दिनेशराय द्विवेदी 
कसूर होता है अस्पताल का
जिसमें कारपोरेट प्रबंधन होता है
बैंकों से उधार ली गई 
वित्तीय पूंजी लगी होती है,और
न्यूनतम संभव वेतन पर 
टेक्नीशियन काम कर रहे होते हैं 



बाल मजदूर...विक्रम कुमार
बचपन के खिलौनों की जगह,
जिंदगी से लड़ना सिखा दिया | 
पेन ,किताब और कॉपी की जगह, 
कम का बोझ इन पर लाद दिया |
वो इक बिंदास सी लड़की.......आलोक यादव
वो इक बिंदास सी लड़की 
अधर पे हास सी लड़की

कोई सब हार दे जिस पर 
विजय की आस सी लड़की


न काटो हमको ..... प्रियंका श्री
न काटो हमको,
काट कर तुम क्या पाओगे।
अपने ही जीवन के अंत 
की कहानी,
तुम खुद लिख जाओगे।


मन्नत का धागा......श्वेता सिन्हा
फिर से स्पंदनहीन,भावहीन
बनकर तुम्हारे लिए
बस तुम्हारी खातिर,
दुआएँ, प्रार्थनाएं एक पवित्र
मन्नत के धागे के सिवा और
क्या हो सकती हूँ मैं
तुम्हारे तृप्त जीवन में।


एक नाज़ुक-सा फूल गुलाब का ... रवीन्द्र सिंह यादव
कोई तोड़ता पुष्पासन से 
कोई तोड़ता बस पंखुड़ी 
पुष्पवृंत से तोड़ता कोई 
कोई मारता बेरहम छड़ी
आज सारे गुबार दिल के...सुषमा वर्मा
यही पर थम जाए...
ये मौन ये चुप्पी इक दिन,
सब बिखेर कर रख देगी..
क्यों ना लिख दूँ...
आज सारे ज्वार दिल के....!!!

एक साल पुराने अखबार की कतरन

बेवकूफ 
‘उलूक’ 
की आदत है 
जुगाली करना 
बैठ कर 
कहीं ठूंठ पर 
उजड़े चमन की 
जहाँ हर तरफ 
उत्तर देने वाले 
होशियार 
होशियारों 
की टीम 
बना कर 
होशियारों 
के लिये 
खेतों में 
हरे हरे 
उत्तर 
उगाते हैं 

....................
आज बस यहीं तक
यशोदा













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