पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

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रविवार, 23 अप्रैल 2017

646...भजन और अजान से गूंजता है जो शहर उस लखनपुर को दिल मे बसा के जियो

सादर अभिवादन..
आज रविवार को मै फिर हाजिर हूँ...
इन पंक्तियों को लिखते तक भाई विरम सिंह जी दिखाई नहीं पड़े

एक समाचार है कि बी एस एन एल नें 333 रु. में 270 जी बी डाटा
व फ्री कॉलिंग देने की घोषणा की है..
चलें रचनाओं की ओर कुछ नई और कुछ जूनी.....




लाल बत्ती और वीवीआईपी पर उसके प्रभाव.....ताऊ रामपुरिया
हमारी बात सुनते ही वो नार्थ कोरिया वाले मोटू तानाशाह “किम जोन उंग” की तरह फ़टते हुये बोली – कुछ तो शर्म करो, सारा दिन इधर से उधर नेतागिरी करते फ़िरते हो, आज तक तुम कुछ भी नही बन पाये और एक ये देखो गुप्ता जी को आज सीएम ने खाद निगम का अध्यक्ष बना दिया और उनको लाल बत्ती देकर वीवीआईपी भी बना दिया. गुप्ताईन ऐसे बन ठनकर मेम साहिब की तरह इतराते हुये लाल बत्ती की गाडी में बैठकर गई है जैसे पैदा ही लाल बत्ती में हुई हो….



रेत से खिरने लगे है
आज तिनके भी हमारे
नित पिघलती धूप में,ये
पॉँव जलते है हमारे


अवध के शाम का गवाह बन के जियो
नवाबों के शहर में नवाब बन के जियो
          
भूलभुलैया में  तुम ढूँढ लो ये ज़िन्दगी
या तो 'पहले आप' के रिवाज़ में ही जियो

यह मानव जाति का दुर्भाग्य ही है कि एक ओर जहाँ लगभग आधी शताब्दी पूर्व मानव चरण चाँद पर पड़े थे , मंगल गृह पर यान उतर चुके हैं और अंतरिक्ष में भी मनुष्य तैरकर , चलकर , उड़कर वापस धरती पर सफलतापूर्वक उतर चुका है , वहीँ दूसरी ओर आज भी हमारे देश में विवाहित महिलाओं पर न सिर्फ दहेज़ के नाम पर अत्याचार किये जा रहे हैं , बल्कि उन्हें आग में झोंक दिया जाता है। यह मानवीय व्यवहार किसी भी तरह क्षमा के योग्य नहीं है। इन कुकृत्यों के अपराधियों की  सज़ा कारावास से बढाकर फांसी कर देना चाहिए। शायद तभी ये शैतान रुपी लालची मनुष्य इंसान बन पाएंगे। 

गर्मी आई गर्मी आई 
छुप गया कम्बल 
छुपा दी गयी रजाई 
रसभरी लीची, हरे - काले अंगूर,
और रसभरा तरबूज खाओ 

जी करता है,
फिर से संकरी पगडंडियों पर चलूँ,
लहलहाते धान के खेतों को देखूं,
फूलों पर पड़ी ओस की बूंदों को छूऊँ,
ताज़ी ठंडी हवा जी भर के पीऊँ.

सात फेरों से 
शुरू हुआ 
जीवन का ये सफर , 
सात फेरे 
सात जनम के 
लिए सात वचनों से गढ़े 
सात गांठों मे बंधे , 
हम दोनों ने पूरी की 
ये सारी रस्में , 

इज़ाज़त दे दिग्विजय को
सादर

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

645 The first Earth Day – April 22, 1970





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सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

भाषण देते सुनते मेरी पीढ़ी गुजर रही
सहना ना पड़े पीड़ा नई पीढ़ी सुधर रही






पृथ्वी संरक्षण पर बच्चों ने लिया संकल्प; 
स्वर्ण स्कूल ने मनाया विश्व पृथ्वी दिवस; 
जागरूकता रैली व प्रतियोगिताओं द्वारा किया जागरूक; 
पृथ्वी विषय कविताएं भी सुनाई छात्रों ने






आप कभी यह नहीं सोचते, 
‘इस छोटी उंगली को काटकर फेंक दो’। 
अगर आप वाकई हर चीज को 
खुद में शामिल करना चाहते हैं, तो
 आपको सीखना चाहिए कि सभी चीजों को 
एक नजर से कैसे देखें। आपको इस बात के 
प्रति जागरूक होना चाहिए। यह बहुत अहम है।






महानगरेषु वाहनानां निर्बाध-प्रचलनेन
ध्वनि-प्रसारयन्त्र-विज्ञापनेन नूतनयन्त्राणां 
निनादेन कर्णस्फोटकध्वनिः रात्रिदिवं 
समुत्पद्यते तेन मानवस्य मनःशान्ति-विलुप्ता 
जनाः अनिद्रारोगेण विक्षिप्ताः इव सन्ति ।





हूँ उगा मैं मिट्टी से, फिर भी नभ को चूमता,
वर्षा की झंकार सुन, मदमस्त हो के झूमता,
वन के पृष्ठ पर हरे रत्न-सा मैं हूँ जड़ा,
क्या महान कर रहा तू वहाँ पड़ा-पड़ा?









Image result for अर्थ डे पर कविता

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फिर मिलेंगे

विभा रानी श्रीवास्तव





शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

644.....विश्वविध्यालय बोले तो ? तेरे को क्या पड़ी है रे ‘उलूक’

सादर अभिवादन
नियम और कानून तोड़कर
आज फिर मैं ही आपके समक्ष...
क्या भी करें, आने वाले हर्ष के अतिरेक को रोक भी नहीं सकते...

ये जो दौर है उसके अपने कायदे
अपने कानून हैं,
हवाओं में तैराती हर बात,
शब्दश: सही होगी,
ये मुमकिन भी है, और नामुमकिन भी,

यूँ ही तुम्हारे साथ इक सफर याद आ गया...
मेरी गोद में तुम सर रख सो रहे थे,
और मैं तुम्हे निहार रही थी...
और रेलगाड़ी की खिड़की से चाँद,
हम दोनों के साथ-साथ चल रहा था...

सर्वोच्च स्थान
आदि शक्ति माता का
शाश्वत सत्य

गुज़रेंगे   लम्हात -ए -ज़िन्दगी  
अपनी   रफ़्तार   लिए ,
तराने  गुनगुनायेगी  ज़ुबां  
बजेंगे  धड़कनों  के  साज़   वहाँ। 
मुंतज़िर  है   कोई  
सुनने   को  मेरे  अल्फ़ाज़   वहाँ।


औकात की बात मत करना...ऋतु आसूजा 'ऋिषिकेश'
बूडा फ़क़ीर मुस्कराया और बोला सेठ जी जरूर आपने पिछले जन्म में अच्छे कर्म किये होंगे जो भगवान ने आपको इतना सब कुछ दिया , 
आप बहुत अच्छा करते हैं जो अपने धन के भंडार में से 
कुछ गरीबों की सेवा मे लगा देते हैं।
जहाँ तक बात औकात की है। औकात आपकी भी वही है ,जो मेरी है ,बस आपके बस जीवन जीने के साधनों के लिये धन-दौलत अधिक है ,सारी दौलत यहीं रह जायेगी सेठ जी आपके साथ नही जायेगी । आप को भी एक दिन मिट्टी हो जाना है, और मुझे भी एक दिन मिट्टी हो जाना है, 
फिर किस की क्या औकात।।



अभी एक 
नया आया है 
तीन साल 
के लिये 

उसे भी 
कुछ बनाना है 
वो भी तो 
कुछ बनायेगा 
या कौवे की 
आवाज वाले 
किसी उल्लू 
की तरफ 
देखता 
चला जायेगा? 

आज अब बस...
आज्ञा दें दिग्विजय को
सादर












गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

643.....चुटकी बजा पर्यावरण पढ़ा

सादर अभिवादन
भाई कुलदीप जी अपनी भतीजी की शादी में व्यस्त हैं
सो वे परसों मुखातिब होंगे आपसे..
तब तक आप टाईमपास कीजिए...

post-feature-image
पोहे के कुरकुरे बनाने के लिए न ही पोहे को पिसना पडता है और न हीं इन्हें गैस पर पकाना पडता है। तो आइए...आज हम बनाते है... बिल्कुल कम मेहनत में बनने वाले...पोहे के कुरकुरे..

तुम चाँद तारों की अब कोई,बात नहीं हो करते ,
ये दिन बोरियत भरे अब तो,मुझसे नहीं हैं कटते ,
सो ! आज तो प्रिय मेरा तुमसे,रूठने का मन है ,
बस अपना वजूद ढूंढना है,और नहीं कोई गम है।

तपा अम्बर
झुलस रही क्यारी
प्यासी है दूब।

आसान कहाँ हटा देना
तस्वीर दीवार से
पुराने कैलेंडर की तरह,
टांग देते नयी तस्वीर
पुरानी ज़गह पर,
लेकिन रह जाती
खाली जगह तस्वीर के पीछे
दिलाने याद उम्र भर।


हमेशा की तरह, है किसी दिवास्वप्न सा उभरता,
ख्यालों मे फिर वही, नूर सा इक रुमानी चेहरा,
कुछ रंग हल्का, कुछ वो नूर गहरा-गहरा.......
हमेशा की तरह, फिर दिखते कुछ ख्वाब सुनहरे,

बरसों से जमे हिमखंड
शब्दों की आँच में पिघलकर,
हृदय की सूखी नदी की जलधारा बन
किनारों पर फैलै बंजर धरा पर
बूँद बूँद बिखरकर नवप्राण से भर देती है,

बात हवा-पानी की..........डॉ. सुशील जोशी

एक छोटी सी 
आपदा आने 
से कुछ नहीं 
होता है इतना 
सब कुछ जब 
पर्यावरण पर
पर्यावरणविद
रोज का रोज
कुछ ना कुछ 
चुटकियों में 
कह देता है ।
आज्ञा दें यशोदा को
सादर












बुधवार, 19 अप्रैल 2017

642.....सोच, कपडे़ और खुश्बू नहीं बताते

सादर अभिवादन...
आज मै आपके समक्ष हूँ...
बिना किसी लाग-लपेट के सीधे चलें पसंदीदा रचनाओं की ओर...

वो देखो मदारी आया
बच्चों को बहुत भाया
तरह तरह के खेल दिखाता
कभी बन्दर को दुल्हन बनाता
कभी खुद बन्दर बन हँसता


ख़िताबत......राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"
मेरे दर्द को तुम ना समझ पाओगे उम्र भर,
मेरी जगह पर तुम ख़ुद को रखो  तब तो बात हो।

ना देख हिक़ारत की नज़रों से मुझे ऐ “राही”
मुझ में बसे ख़ुदा को देखो तब तो बात हो ।

एक घर तलाशते ग़ैरों की नीड़ में... डॉ. जेन्नी शबनम
रूबरू होने से कतराता है मन  
जंग देख न ले जग मुझमें औ ज़मीर में!  

पहचान भी मिटी सब अपने भी रूठे  
पर ज़िन्दगी रुकी रही कफ़स के नजीर में!  


गुज़रे क़दम-क़दम पे किसी इम्तिहां से हम....हरदीप बिरदी
माँगा जो उसने हमने वो वादा तो कर दिया
सोचा नहीं निभायेंगे इसको कहाँ से हम 

ईमां भी बेच दूँ मैं मगर यह तो सोचिये 
जायेंगे खाली हाथ ही इक दिन जहाँ से हम 

बातें खुशबू की...डॉ. सुशील कुमार जोशी


मेरे काम में दखलंदाजी
लगती है आप को 
हमेशा ही बेमतलब
इसलिये मुझे हमेशा
कोई ना कोई 
पुरुस्कार जरूर
कुछ पाना है 
समय नहीं है 
ज्यादा कुछ 
बताने के लिये
कल की मीटिंग 
के लिये अभी
मुझे नाई की 
दुकान पर 
फेशियल करवाने
के लिये जाना है ।

आज्ञा दें दिग्विजय को..
फिर मिलेंगे










मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

641....ख़ामोशी ... एक एहसास-

जय मां हाटेशवरी...

आज के आनंद के सफऱ का आगाज
ममता का जिसकी नहीं, होता कोई अन्त।
उस माँ के दिल में बसा, करुणा-प्यार अनन्त।।
मतलब का संसार है, मतलब के उपहार।
लेकिन दुनिया में नहीं, माँ के जैसा प्यार।।
लालन-पालन में दिया, ममता और दुलार।
बोली-भाषा को सिखा, माता ने उपकार।।
होता है सन्तान का,  माता से सम्वाद।
माता को करते सभी, दुख आने पर याद।।
अब पेश है...आज के पांच लिंक...

ख़ामोशी ... एक एहसास-
लड़ते रहना होता है अपने आप से निरंतर
दबानी पड़ती है दिल की कशमकश
रोकना होता है आँखों का आइना
बोलता रहता है जो निरंतर
तब कहीं जा कर ख़ामोशी बनाती है अपनी जगह
पाती है नया आकार
बन पाती है खुद अपनी ज़ुबान
हाँ ... तब ही पहुँच पाती है अपने मुकाम पर

क्या है ब्रह्मास्त्र और इसकी वास्तिवक शक्ति
 ब्रह्मास्त्र प्रचीन भारत का सबसे शक्तिशाली अस्त्र था जो बहुत दुर्लभ और बहुत कम ही लोगों के पास था। माना जाता है कि ब्रह्मास्त्र सिर्फ उन्हीं लोगों को दिया जाता था जो कठोर तप करके भगवान को खुश करते थे, और भगवान उन्हें खुश होकर यह शस्त्र दिया करते थे। शास्त्र बताते हैं कि जब भी इसका या इसके समान दूसरे किसी भी अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग हुआ है हमेशा पृथ्वी औऱ अनेक लोकों में जीवन का नाश हुआ है।
ब्रह्मास्त्र का ज्ञान हमारे ही ग्रंथों में आदिकाल से छिपा हुआ है और विड़बना देखिए हम उन्हीं शास्त्रों को मिथिक मानकर रख देते हैं, औऱ इंतजार करते हैं कि कोई पश्चिमी वैज्ञानिक जब कुछ बतायेगा वही सही होगा, भले वही क्यों ना शस्त्रों से सीखी हुआ हो।


गायो को बचाइए न, प्लीज।
ठीक है। यह सियासत की भाषा है। यह ऐसी ही रहेगी। गाय हिन्दुओं के लिए पवित्र पशु और माता समान है। लेकिन खेतिहर भारत के लिए गाय उससे भी ज्यादा ज़रूरी है और इसीलिए गोवंश को बचाना बेहद ज़रूरी है। यह भी बेहद जरूरी है कि जब दुनिया ऑर्गेनिक खेती की तरफ बढ़ रही है तो गो-आधारित खेती, यानी खेती में गोबर और गोमूत्र का प्रयोग करके ही उपज को बढ़ाया जा सकता है।

दिन बैसाख के
धूपीली दोपहरिया में
आँखे लगी देहरिया में
खबर आज भी कोई नहीं
दग्ध तप्त बैसाख में
मन सूना है आकाश का ।

डोर, कब कच्ची हुई,
कब धागे अलग-अलग हो गये,
खिसक गई हमारे
पाँव के नीचे की ज़मीन,
चूर-चूर हो गया हमारा
अस्तित्व और मिल गये
हम मिट्टी में।

आज बस इतना ही...
धन्यवाद.







सोमवार, 17 अप्रैल 2017

640....बिना डोर की पतंग होता है सच हर कोई लपेटता है अपनी डोर अपने हिसाब से

सादर अभिवादन
मेरी डायरी के पन्ने से दो पंक्तियाँ....
झूझती रही बिखरती रही टूटती रही 
कुछ इसी तरह ये ज़िन्दगी निखरती रही !

प्रस्तुत है मेरी पसंद की ये रचनाएँ...

सही में औरतें 
बहुत ही बेवकूफ होती है 
हजारों ताने उल्हाने, 
मार पीट सहकर भी 
उम्मीद का दामन 
जो नहीं छोड़ पाती 
यह औरतें न जाने 
कितनी बार टूट -टूटकर 
बिखर जाने के बाद भी 
खुद को समेट जो लेती हैं

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तारे...श्वेता सिन्हा
भोर की किरणों में बिखर गये तारे
जाने किस झील में उतर गये तारे

रातभर मेरे दामन में चमकते रहे
आँख लगी कहीं निकल गये तारे



इसमें तुम्हारा क़सूर नहीं,
मेरी ही ग़लती थी 
कि मुझे ऐसा लगा,
पर जब लग ही गया,
तो मुसाफ़िर,
बस इतना कर देना 
कि जब मेरी गली से गुज़रो,
तो मेरी ओर देख लेना.

द्रौपदी का दर्द......साधना वैद
कब तक तुम उसे 
इसी तरह छलते रहोगे !
कभी प्यार जता के, 
कभी अधिकार जता के,
कभी कातर होकर याचना करके,


दही को एक कपड़े में बाँध कर 3-4 घंटे के लिए टांग दें 
जिससे कि उसका सारा पानी निकल जाए.
अब थोड़े से ब्रेड क्रम्बस निकाल कर बाकी सारी चीजें मिला लें.
अब इसे कबाब के आकार का बनाकर, ब्रेड क्रंब्स में लपेटें और गर्म तेल में शैलो फ्राई कर लें.

वक़्त... ऐसा लगता है कि दुनिया में बस यही एक चीज है जिसका चलते रहना निश्चित है... देखो न वक़्त के पहिये ने देखते ही देखते 5 साल का सफ़र तय भी कर लिया और हमें खबर तक नहीं हुयी... वैसे हम जिस जन्मों-जन्मों के सफ़र पर निकल चुके हैं, 


सच पर 
शक करना 
ठीक नहीं 
होता है 

‘उलूक’ 

कोई कुछ 
नहीं कर 
सकता है 
तेरी फटी 
हुई 
छलनी का 

सादर



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