पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

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गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

587...वो मेरी गलतियां भूल जाते है... और मै उनकी मेहरबानियों को.."

जय मां हाटेशवरी...
"मैं और मेरे भोलेनाथ...
हम तो दोनों ही भुलक्कड़  है...
वो मेरी गलतियां भूल जाते है...
 और मै उनकी मेहरबानियों को.."
आप सभी को...
पावन शिवरात्री की अग्रिम शुभकामनाएं...
अब देखिये...मेरी पसंद...

इस बार गधों का लीडर था रामप्यारे जो कि महाराज धृतराष्ट्र की संगत में रहकर आरपार हो चुका था. रामप्यारे ने घोडों के लीडर से कहा - घोडों के लीडर जी.. ये सही
है कि हम गधे कभी घोडे नही बन सकते पर क्या तुममें से कोई एक भी गधा बन कर दिखा सकता है?
अब तो घोडों के अस्तबल में खामोशी पसर गई...सब हैरान परेशान...ऐसे घोडे क्या काम के? जो कभी वापस गधे  ही नही बन सकें? घोडों ने गधा बनने के लिये तुरंत अपनी
इमरजेंसी मीटिंग आहुत कर ली है जो शीघ्र ही होने वाली है.
इधर गधों के लीडर रामप्यारे की जय जय कार होने लगी....और इस जीत के शुभ अवसर पर गधों ने भी एक प्रीतिभोज का आयोजन कर डाला जिसमे खूब गुलाब जामुन, रसमलाई और
समोसे  खाये गये.
वो मेरी समुन्दर पी जाने की चाह थी 
जो ज़ख्म भरने का इंतज़ार भी न कर सकी
रेत को मुट्ठी में रख लेने का वहशीपन
जो समय को भी अपने साथ न रख सका 
भूल गया था की पंखों का नैसर्गिक विकास
लंबे समय तक की उड़ान का आत्म-विश्वास है
क्या समय लौटेगा मेरे पास ...

चूम लूं अंति‍म बार
अपने प्रि‍य का गरदन
और कह जाऊं
जी न पाएंगे तुम बि‍न
कि‍ वजूद सारा
डूबा है प्रेम में
और कुछ बचा नहीं मेरे अख्‍़ति‍यार में
अब तुम हो...चंद सांसे हैं
अधरों पर अंकि‍त है
एक सुहाना अहसास
मोगरे के फूलों सा महकता
मन का आंगन
बस तेरी याद....तेरी याद
फिर कुछ भी
कहने लिखने
के लिये नहीं सूझा

बेवकूफ
आक्टोपस
आठ हाथ पैरों
को लेकर तैरता
रहा जिंदगी
भर अपनी

क्या फायदा
जब बिना
कुछ लपेटे
इधर से उधर
और
उधर से इधर
कूदता रहा
यह औरत ही है जो अपने गर्भ मैं ९ महीने अपने बच्चे को रखती है और जन्म होने पे उस बच्चे को दूध पिलाना होता है| ऐसे मैं बच्चा अपनी माँ से लगा रहता है और वो
जैसी  परवरिश करती है वैसा बनता चला जाता है. यह दोनों काम किसी मर्द के लिए करना संभव नहीं यह सभी जानते हैं.ऐसे मैं इस बात कि जिद करना कि हम घर को नहीं संभालेंगे
,बस बाहर जा के धन कमायेंगे कहाँ तक उचित है?

मर्द को ना गर्भ मैं बच्चे रखने हैं, ना दूध पिलाना है|  मर्द शारीरिक रूप से भी अधिक मज़बूत है तो यदि वो बाहर के काम करे, मजदूरी करे, नौकरी करे ,व्यापार करे
तो इसे  ना इंसाफी तो नहीं कहा जा सकता? यहाँ ना तो किसी गुलामी की बात है और ना ही किसी ज़ुल्म कि बात है. यह बात   है पति और पत्नी के समझोते की जिसके नतीजे
मैं दोनों पारिवारिक सुख का अनुभव करते हुई सुखी जीवन व्यतीत करते हैं |
अब अंत में...
भूले-बिसरे पल
 ------


धन्यवाद।


बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

586...ताकि नौ दिन तक तो उसका बेटा  भरपेट खा सकें...!!

जय मां हाटेशवरी...

"एक बेबस माँ ने नवरात्रों के उपवास रखे थे.......!
ताकि नौ दिन तक तो उसका बेटा  भरपेट खा सकें...!!"
रविवार से मन बहुत उदास है...
हमारे पास के गांव में...
एक शराबी बेटे ने...
कुलाहड़ी के तेज वार से...
अपनी बूहड़ी   मां की हत्या...
इस लिये कर दी की...
...मां ने उसे शराब के लिये पैसे न दिये...
अजात्मृतमूर्खेभ्यो मृताजातौ सुतौ वरम् ।
यतः तौ स्वल्प दुखाय, जावज्जीवं जडो दहेत् ॥
( अजात् ( जो पैदा ही नहीं हुआ ) , मृत और मूर्ख – इन तीन तरह के पुत्रों मे से अजात और मृत पुत्र अधिक श्रेष्ठ हैं , क्योंकि अजात और मृत पुत्र अल्प दुख ही
देते हैं । किन्तु मूर्ख पुत्र जब तक जीवन है तब तक जलाता रहता है । )
अब पेश है...आज के लिये...मेरी पसंद...


पौराणिक दृष्टि से लिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और ऊपर प्रणवाख्य महादेव स्थित हैं । केवल लिंग की पूजा करने मात्र से समस्त देवी देवताओं की पूजा
हो जाती है । लिंग पूजन परमात्मा के प्रमाण स्वरूप सूक्ष्म शरीर का पूजन है । शिव और शक्ति का पूर्ण स्वरूप है शिवलिंग ।शिव के निराकार स्वरूप में ध्यान-मग्न
आत्मा सद्गति को प्राप्त होती है, उसे परब्रह्म की प्राप्ति होती है तात्पर्य यह है कि हमारी आत्मा का मिलन परमात्मा के साथ कराने का माध्यम-स्वरूप है,शिवलिंग
। शिवलिंग साकार एवं निराकार ईश्वर का ‘प्रतीक’ मात्र है, जो परमात्मा- आत्म-लिंग का द्योतक है । शिवलिंग का अर्थ है शिव का आदि-अनादी स्वरूप । शून्य, आकाश,
अनन्त, ब्रह्माण्ड व निराकार परमपुरुष का प्रतीक । स्कन्दपुराण अनुसार आकाश स्वयं लिंग है । धरती उसका आधार है व सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने
के कारण इसे लिंग कहा है । शिवलिंग हमें बताता है कि संसार मात्र पौरुष व प्रकृति का वर्चस्व है तथा दोनों एक दूसरे के पूरक हैं । शिव पुराण अनुसार शिवलिंग
की पूजा करके जो भक्त भगवान शिव को प्रसन्न करना चाहते हैं उन्हें प्रातः काल से लेकर दोपहर से पहले ही इनकी पूजा कर लेनी चाहिए । इसकी पूजा से मनुष्य को भोग
और मोक्ष की प्राप्ति होती है ।
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प्रवीण गुप्ता - PRAVEEN GUPTA
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 बस फिर क्या था जो शुरू हुआ लेखन का दूसरा दौर तो लगभग रोज लिखने लगी ।डायरियां भरने लगी जो पढा और जिया था सब धीरे धीरे व्यक्त होने लगा ।
अब मदर्स डे पर डायरी पेन नही देते मेरे बच्चे
आज बिटिया का जन्मदिन है । सुबह से उसे याद ही कर रही हूँ । मेरे भीतर जो भी रचनात्मकता बची रह गयी या पुनसृजित हुई सब तुम्हारे नाम बिट्टो । खूब खुश रहो ।
प्रसन्नता के सातों आसमान तुम दोनों के नाम ।
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मृदुला शुक्ला
---और याद आ रही है
माँ की बातें
हर रिश्ता विश्वास का नहीं
जड़ काट देता है
अब सूख गयी है जड़
लाल हुयी धरती के साथ
लाल हुयी हूँ मैं भी।
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 दीप्ति शर्मा
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कभी-कभी ऐसा होता है कि किसी की कही बात फौरन समझ में नहीं आती। जब समझानेवाला ही समझाने में मुश्किल अनुभव करे तो भला समझनेवाला कैसे समझे? स्थिति तब और तनिक
कठिन हो जाती है जब, समझनेवाला लिहाज के मारे दूसरी बार पूछ भी न सके। तब, वह पल टल तो जाता है किन्तु दोनों ही उलझन में बने रह जाते हैं।
ऐसा ही एक बार हम दोनों भाइयों के बीच हो गया। न मैं समझ सका, न वे समझा पाए। लेकिन उस पल को टालने के लिए उन्होंने जो कहा था वह अब, लगभग सैंतालीस बरस बाद
मुझ पर हकीकत बन कर गुजर गया।
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विष्णु बैरागी
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मधु की समझ में नहीं आ रहा था कि सब मम्मियॉं झूठ क्यों बोलती हैं । कल मम्मी सेल में दोसौ रूपये की ड्रैस लेकर आई और बारह सौ की बता रही थीं । अनू तो कह रही
थी हम बड़े होटलों में शाउी ही में जाते हैं पर उसकी मम्म्ी कभी किसी होटल का कभी किसी होटल का नाम लेकर कहती हैं कि  डिनर वहॉं किया । पर जब कि खाली चाट खाकर
वापस आ जाते हैं ।ऊपर से यह फर्स्ट आने की बात खूब रही ।यहॉं तो सबके बच्चे फर्स्ट आते हैं । अपने गाल को सहलाती हुई भी वह हंस पड़ी । तभी चलने के लिये नेहा
की मम्मी ने आवाज लगाई तो झूला छोड़ सब अंदर आ गईं
   तभी एक महिला बोली, ‘मधु रिजल्ट दिखाना अपना।’
 ‘रिजल्ट ’भरे हुए गले से मधु जोर से बोली, ‘मैं नहीं दिखाऊँगी अपना रिजल्ट। मैं नेहा क्षिप्रा कोई भी फर्स्ट नहीं आता। मैं तो अर्थमेटिक में फेल हो गई हूँ।
फर्स्ट तो हर साल दीपा आती है। ओर बताऊँ छुट्टियों में मम्मी कहीं पहाड़ वहाड़ नहीं जाती बस नानी घर रहकर आ जाती है।’
 ‘नहीं मैं सब बताऊँगी। सब मम्मियाँ झूठ बोली है ? झूठ क्यों बोलती है यह मेरी फ्राक ़़़़’  ‘ मधु ज्यादा बड़ों के बीच नहीं बोलते ’ मम्मी चकी तीखी आवाज से रोती
हुई मधु अपने कमरे में जाकर चादर ओढ़ कर लेट गई। मन ही मन डर से कि आज अभी और पिटाई होगी। लेकिन फिर भी उसे बहुत अच्छा लग रहा था कि वह सब कह आई।  
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shashi goyal
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ब्‍लॉग बनानें के बाद आपको उस पर अच्‍छे अच्‍छे आर्टिकल्‍स लिखनें होगें और अपने ब्‍लाॅॅग का सोशल मीडिया में प्रमोशन करना होगा। आप का ब्‍लॅाग पर जब अच्‍छे
खासे पाठक आनें लगें तो आप गूगल एडसेन्‍स के लिये अप्‍लाई कर सकते हैं। यदि गूगल आपको अप्रूवल नही देता है तो आप किसी अन्‍य एडवर्डटाइजिंग कम्‍पनी से कॉन्‍टेक्‍ट
कर सकते हो। एक बार अप्रूवल मिलनें के बाद आप अपनें ब्‍लॉग पर विज्ञापन लगा सकते हो। आपको पास जितनें ज्‍यादा पाठक होंंगे आपकी उतनी इनकम होगी। आप सीधे किसी
कम्‍पनी से विज्ञापन ले सकते हो।
आप एडवर्डटाइजिंग के अलावा किसी खास कम्‍पनी के प्रोडक्‍ट का रिव्‍यू के बदले पैसे ले सकते हैं। इसके अलावा किसी भी कम्‍पनी के एफिलियेट प्रोग्राम से जुुड कर
लाखों रूपये महीना कमा सकते हैैं। अगर आप एक अच्‍छे ब्‍लॉगर हैं तो आप पैसे के साथ साथ नाम भी कमा सकते हो।
ब्‍लॉगर बननें के लिये आपके पास 3 चीजें होना जरूरी हैं
1- कम्‍प्‍यूटर
2- इण्‍टरनेट कनेक्‍शन
3- किसी विषय में कौशलता
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farruq Abbas farruq Abbas
मातॄभाषा हो तो विषय को आसानी समझा जा सकता है किन्तु आज हमारे देश में मातृभाषा को किस तरह जबान से, चलन से, गायब कर अंग्रेजी को मातृभाषा बना दिये जाने की
पूरी कोशिश की जा रही है।
आज यह सिध्द हो चुका है कि मातृभाषा में शिक्षा बालक के विकास में ज्यादा सहयोगी है। अलग-अलग आर्थिक और सामाजिक परिवेश से आये विघार्थियों में किसी भी विषय
को समझने की क्षमता समान नहीं होती। अंग्रेजी में पढ़ाए जाने पर उनके लिये यह एक अतिरिक्त समस्या बन जाती है – विषय ज्ञान के साथ भाषा का ज्ञान। भाषा सीखना
अच्छी बात है और लाभदायक भी है। भाषा हमें नये समाज और संसार से जोडती है। लेकिन मातृभाषा की उपेक्षा कर शिक्षा के माध्यम से बलपूर्वक हटा कर अन्य भाषाओं को
विशेष स्थान देना निश्चित ही उचित नही।
जापान, रूस जर्मनी जैसे देश आज हम सबके लिये उदाहरण है जिन्होने भाषा की शक्ति से ही स्वयं को विश्व पटल पर स्थापित किया। अक्सर देखा जा सकता है छात्र छत्तीस
नहीं समझते मगर थर्टीसिक्स बोलो तो समझ जाते हैं। नवासी और उन्यासी में तो बडे बडे लोग अक्सर सोच में पड जाते हैं। किसी भी भाषा से शब्दों का लेन देन कोई गलत
नही। हिन्दी में उर्दू, फारसी, संस्कृत सहित कई लोकभाषाओं के बहुत सारे शब्द हैं जिनका बहुत से जानकार भी आज विभेद नही कर पाते उदाहरण के लिये – आवाज, शुरुआत,
दौरा इत्यादि। अंग्रेजी के भी ढेरों शब्द हैं। डेली, रेलगाड़ी, रोड, टाईम शब्द हिन्दी के हो गए हैं। ई-मेल, इंटरनेट, कम्प्यूटर, लैपटॉप, फेसबुक आदि शब्द हिन्दी
में चल निकले।  धन अर्जन के लिये यदि हम दूसरे प्रान्त या देश जाते हैं तो वहाँ के लोगो के साथ सम्बन्ध पूर्वक जीने के लिये उनकी भाषा को सीखना हमारी प्राथमिकता
होनी चाहिये। लेकिन उसके लिये अपनी मातृभाषा को छोड देना किसी भी परिस्थिति में सम्मान जनक नही।
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अपर्णा त्रिपाठी
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आज बस इतना ही...
धन्यवाद।












मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

585...आसान नहीं लिख लेना चंद लफ्जों में उनकी शर्म और खुद की बेशर्मी को

सादर अभिवादन
आज के मौसम का हाल
उत्तराखण्ड में कल शाम से भारी बारिश हो रही है 
जन-जीवन अस्त-व्यस्त है

पर अंक को तो आना ही है.....

पहली बार पदार्पण
जहां 
मृत्युभोज में 
परोसे जाते है 
हिन्दू खिचड़ी 
और 
मुस्लिम रायता 

हर काबिल 
हर कातिल तक 
अपनी महक 
अपना हरापन 
फैलाते वसंत 
स्वागत है तुम्हारा....
मधुमास लिखी 
धरती पर देख रही हूँ 
एक कवि बो रहा है 
सपनों के बीज । 
किसके सपने है 
महाकवि मैं पूछती हूं 



फोन रखने वाले दो लोग अपने-अपने कार्यक्षेत्र के अधि‍कारी नहीं, बल्‍ि‍क वो दो छोटे स्‍कूली बच्‍चे थे जो हर शाम खेल कर घर जाने से पहले बि‍छड़ते वक्‍त एक दूसरे से पूछते थे। कल खेलने आओगी न गुड़ि‍या। हां पार्थ...आऊंगी। तुम देर न करना।

गाये बहुत है गीत मिलकर  प्यार में चहके सजन 
आओ चलें दोनों सफर यह प्यार का महके  सजन 

हसरत  रही  है  प्यार  में  हम  तुम  रहें साथी सदा 
मुश्किल बहुत है यह डगर इस पर रहें मिलके सजन 

मुझे ताज़्ज़ुब होता है 
कि बात क्या थी
हालात क्या थे 
फ़िक्र क्या थी 
हौसले क्या थे 
उम्र क्या थी 
ज़ज़्बात क्या थे 
बहरहाल जो भी था 
बालपन की सुबह थी 


करना है तो कर्म करना
घमंड ना करना
आया है मुट्ठी बाँधकर
खुले हाथ ही जाना

बहुत दिन हो गये 
कलम भी कब तक 
बेशर्मी को छान कर 
शर्माती हुई बस 
शर्म ही लिखे 
अच्छा है उनकी
बेशर्मी बनी रहे 
जवान रहे 
पर्दे में रहे जहाँ रहे 








सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

584....रात का गंजा दिन का अंधा ‘उलूक’ बस रायता फैला रखा है

सादर अभिवादन
आज से ठीक सोलहवें दिन
यानि कि छः सौवीं प्रस्तुति
आपको आश्चर्यचकित कर देगी
राज़ को राज़ ही रहने देती हूँ अभी

फिलहाल चलिए चलते हैं आज के अंक की ओर..



मेरी छत की छोटी सी मुंडेर पर.....अर्चना
हर सुबह
महफ़िल है 
जुड़ जाती 
दाने खाने की
खातिर परिंदों
की जब टोलियाँ  
हैं आती
चिड़ियाँ आातीं 
दाना खातीं
फुदक -फुदक 
फिर गाना भी
गातीं लगती हैं 



क्वांरेपन से शेर है, रविकर अति खूंखार ।
किन्तु हुआ अब पालतू, दुर्गा हुई सवार।।

जब मैं काफी दिमाग लगाकर खुद से यह उत्तर पाने की कोशिश करती हूं कि आखिर नए कपड़ों को पुराने करने की जुर्रत मैं क्यों करती हूं तो एक ही जवाब मिलता है –ताकि मैं चिकोटी काटने वालों या-अच्छा जी आज नए कपड़े क्या बात है-कहकर बगल से गुजर जाने वालों को पेट दर्द जैसा अपना चेहरा बनाकर कह सकूं-नए कहां हैं, पुराने ही तो हैं। जाने क्यों बड़ी लाज आती है जी नए कपड़ो में।



माँ मुझको तुम अंक में ले लो
स्नेह फुहार से मुझे भिंगो दो
जब भी मुझको भूख लगे माँ
सीने से मुझको लगा लो

मेरा खून धरती से मिल गया है
और सफेद रंग 
गर्भ में ठहर गया है,
शोषण के गर्भ में
उभार आते
मैं धँसती जा रही हूँ
भींगी जमीन में,
और याद आ रही है
माँ की बातें

लेकिन
अज़ल से अबद तक
यही रिवायत है-
ज़िन्दगी की हथेली पर 
मौत की लकीरें हैं...
और 
सतरंगी ख़्वाबों की
स्याह ताबीरें हैं


जोर से 
खींचना 
ठीक नहीं 
गालियाँ 
खायेंगे 
गालियाँ 
खाने वाले 
कह कर 
दिन की 
अंधी एक 
रात की 
चिड़िया को 
सरे आम 
गंजा बना 
रखा है। 









रविवार, 19 फ़रवरी 2017

583.....ले रही हूँ विदा

सुप्रभात  दोस्तो 

नमस्कार दोस्तो  स्वामी  विवेकानन्द  ने कहा था कि
"सफलता का रहस्य है दृढ़ संकल्प, मेहनत और साहस." इसलिए  यदि आप सफलता चाहते है तो दृढ संकल्प के साथ साथ मेहनत और साहस का होना बहुत जरूरी है ।
आइए अब चलते है आज की पाँच बेहतरीन लिंको की  ओर. . . 

शादी पर अनमोल वचन

ऐसे इन्सान से शादी न करें जिसके साथ आप जिंदगीभर रह सकें; बल्कि सिर्फ उस इन्सान से शादी करें जिसके बिना आप एक पल भी नहीं रह न सकते।

ले रही हूँ विदा

हां!!
ले रही हूँ विदा
अपनों से सपनों से
सच से झूठ से
आज से अतीत से
रस्मों से रीत से
नफरत से प्यार से
झगडे से प्रहार से
शक से यकीन से
रात से दिन से
अपेक्षा से उपेक्षा से

मौसम की वर्दी

*

तुम बार-बार क्यों लौट  रही हो सर्दी ,
कोहरा तो भाग गया , दे अपनी अर्जी.
*
गद्दे रजाइयाँ सभी खा चुके धूपें ,
बक्से में जाने से बस थोड़ा चूके
हमने भी अपनी जाकेट धो कर धर दी,
तुमने यों आकर कैसी मुश्किल कर दी.
*

कविता : रे सिपाही मत चिल्ला


(मेरी यह कविता उन सभी पुलिसवाले भाइयों को समर्पित है जो आए दिन अफसरों के जुल्म का शिकार होते रहते हैं।)
थप्पड़ खा, घूँसे खा
रे सिपाही मत चिल्ला
जूते खा, डंडे खा
रे सिपाही मत चिल्ला
गाली खाके रोता जा
रे सिपाही मत चिल्ला...

अच्छी पत्नी

अच्छी पत्नियाँ वे होती हैं,
जो अपने पतियों के 
पीछे-पीछे चलती हैं,
जैसा वे कहें, वैसा करती हैं,
उनकी पसंद का पकाती हैं,
घर में सब खा लेते हैं,
तब खाती हैं.

अब दीजिए आज्ञा 
धन्यवाद 
विरम सिंह
ज्ञान द्रष्टा 

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

582 ..... सफर



सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष


शान्ति पुरोहित को गये एक साल हो गया


कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन



विकास की प्रक्रिया में तो ऐसी
कितनी ही बातों को छोड़ना पड़ता है
और जब हम विकसित हो जाते हैं
तब पाते हैं कि हमने विकास के मोहजाल में
मूल तत्व ही खो दिया, जिसके बिना सारा
विकास खोखला है, वह तत्व है "प्रेम"।



सफर




उसके चेहरे में थी एक मासूमियत,

याद है उसकी मासूमियत का सफर,

वो आज फिर मिली उसी सफर में,

उसी मासूमियत के साथ,

तब वो अकेली थी सफर में,



वैलेंटाइन- कहानी



बिनको  नाम रहो बाबा भैलनतेन शाह .... पहुंचे हुए औलिया थे....
बिझड़े जोड़े मिलावत रहे वो सब लोगन क.... जो कोई किसी से प्यार -फ्यार करता
उनके नाम का एकठो गुलाब बस चढ़ा देता अपने जोड़ा को  और बोल दे "
हुप्पी भैलनतेन ढे"  उसका जोड़े के साथ जिंदगी भर का प्यार रहता है
बस बाकी तो   बाबा भैलनतेन शाह की कृपा" इतना समझा
लल्लन ने दोनों हाथ ऐसे जोड़े की
जैसे वह बाबा भैलनतेन शाह का आशीर्वाद ले रहा हो।



शायरी - २



जी भर गया है तो बता दो
हमें इनकार पसंद है इंतजार नहीं…!
मुझको पढ़ पाना हर किसी के लिए मुमकिन नहीं,
मै वो किताब हूँ जिसमे शब्दों की जगह जज्बात लिखे है….!!
खुद ही दे जाओगे तो बेहतर है..!
वरना हम दिल चुरा भी लेते हैं..!
इतना भी गुमान न कर आपनी जीत पर ऐ बेखबर,
शहर में तेरे जीत से ज्यादा चर्चे तो मेरी हार के हैं..!!



कायनात ये सिर्फ



ये प्रेम कितना गहरा है कि एक 28 साल के लड़के को
जो जवानी के आखरी पड़ाव में है रोने पर मजबूर कर देता है,
बच्चा बना देता है, जिद्दी बना देता है रोते हुए हंसा देता है
 हँसते हुए रुला देता है जिसे तमाम परेशानियों से घिरे होने पर भी
आपके आ जाने से बाकि सब भूल जाता है ।
 यह प्रेम ही तो है एक दम गहरा प्रेम ।



<><>
फिर मिलेंगे .... तब तक के लिए

आखरी सलाम


विभा रानी श्रीवास्तव


शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

581...लाली फागुन माह की बढ़े साल दर साल।


जय मां हाटेशवरी...
ऐसी दौड़ी फगुनाहट ढाणी चौक फलांग
फागुन आया खेत में गये पड़ोसी जान।
मन के आँगन रच गए कुंकुम अबीर गुलाल
लाली फागुन माह की बढ़े साल दर साल।
आम बौराया आंगना कोयल चढ़ी अटार
चंग द्वार दे दादर मौसम हुआ बहार।
वर गेहूं बाली सजा खड़ी फ़सल बारात
सुग्गा छेड़े पी कहाँ सरसों पीली गात।--- पूर्णिमा वर्मन
अब पेश है...आज के लिये...
मेरे द्वारा पढ़ी गयी....रचनाओं के कुछ अंश...

5- जिन लोगों के पैर के तलवों में अत्यधिक मात्रा में पसीना आता है उनको कुछ देर पानी में थोड़ी सी फिटकरी(Alum) डाल कर अपने पैरों को डुबा कर रखना चाहिए इससे
आपके कुछ दिन प्रयोग से पैरों का पसीना आना कम होने के साथ-साथ पैरों की दुर्गन्ध में भी लाभ होता है -
6- थोड़े से पानी में दो-तीन टी-बैग डाले और उसमे अपनी हथेलियों को कुछ समय के लिए डुबा कर रक्खे ये प्रयोग आपके हाथों का पसीना आने के लिए प्राकृतिक रूप से
लाभदायक है-
7- बाजार में बिकने वाला कच्चा बैंगन(Brinjal)भी आप के पसीने को रोकने का कारगर उपाय है आप इसका रस निकाल कर हथेली और पैरों के तलवे पर लगाए आपका पसीना निकलना
बंद हो जाएगा-
हौसले गर बुलंद हो दिल में
रास्ते कामयाब हो जाए ३
ज्ञान का दीप भी धरूँ मन में
जिंदगी फिर गुलाब हो  जाए
मन्नू को लड़की तो ठीक लगी. दिया जला के और सिर ढक कर के कुछ मन्त्र पढ़ रही थी. मन्नू ने सोचा अब बाकी बातें बाद में होंगी इसलिए निकलो यहाँ से. बाहर आकर देखा
तो ना जूते और ना जुराबें. इधर उधर भीतर बाहर कहीं नहीं. जहाँ जूते उतारे थे वहां दो पुराने मैले स्पोर्ट्स शूज़ मुस्करा रहे थे. कुछ देर दाएं बाएं देखने के
बाद निराश हो कर वही पुराने जूते पहन कर मन्नू भाई 72 नंबर मकान की ओर चल दिए. बड़ा नुक्सान हो गया लड़की के चक्कर में. पर वहां चाय पी कर और लड़की से बात करके
मन्नू को अच्छा लगा और अपने नए जूते की चोरी भी भूल गई. बाहर आकर घोषणा कर दी 'पसंद है'!
मन्नू के जाने के बाद लड़की ने चाय के बर्तन समेटने शुरू कर दिए और बड़बड़ाने लगी,
- मम्मी कहाँ से बुला लिया इस लड़के को? ज़रा ड्रेस सेंस तो देखो इस लड़के का ! गरम सूट के साथ बिना सॉक्स के स्पोर्ट्स शूज़ और वो भी फटीचर ! पता नहीं बैंक में
कैसे भरती हो गया? मेरी तरफ से मना कर दो.
लेकिन ‘एजूकेशन कैंप से गाँव के बच्चों का तात्कालिक भला हो सकता है और ‘मेडिकल कैंप’ से बूढों का। लेकिन पलायन की समस्या इनसे नहीं सुलझने वाली। बाहर निकल
चुके प्रत्येक युवक को ‘बीनू’ बनना पड़ेगा और गाँवों की ओर लौटना पड़ेगा, तभी बात बनेगी। सरकार को भी इसमें शामिल होना पड़ेगा। हिमाचल जाकर अध्ययन करना पड़ेगा कि
क्यों लाहौल-स्पीति और किन्नौर जैसे भयंकर इलाकों में भी पलायन नहीं है। अच्छी सड़कें और चौबीस घंटे बिजली देना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इस मामले में हिमाचल
के मुकाबले उत्तराखंड़ आगे है।
स्पर्श सिर्फ़ दोस्तों से ही नहीं, परिवार से भी अलग किया जा रहा था। कभी पापा का गले लगाना याद नहीं है मुझे। मम्मी का भी बहुत कम। छोटे भाई से लड़ाई में मार
पिटाई की याद है। चुट्टी काटना, हाथ मचोड़ देना जैसे कांड थे लेकिन प्यार से बैठ कर कभी उसका माथा सहलाया हो ऐसा मुझे याद नहीं।
लिखते हुए याद आ रहा है कि बचपन से कैशोर्य तक जाते हुए स्पर्श हमारी डिक्शनरी से मिटाया जा रहा था। ये शायद ज़िंदगी में पहली बार था कि मुझे लगा था कि मेरे
आसपास के लोग हैं वो इमैजिनरी हैं। मैं उन्हें छू कर उनके होने के ऐतबार को पुख़्ता करना चाहती थी। कभी कभी थप्पड़ मार कर भी।
लिखते हुए याद आ रहा है कि बचपन से कैशोर्य तक जाते हुए स्पर्श हमारी डिक्शनरी से मिटाया जा रहा था। ये शायद ज़िंदगी में पहली बार था कि मुझे लगा था कि मेरे
आसपास के लोग हैं वो इमैजिनरी हैं। मैं उन्हें छू कर उनके होने के ऐतबार को पुख़्ता करना चाहती थी। कभी कभी थप्पड़ मार कर भी। ये पहली बार था कि मैंने कुछ चाहा
था और उलझी थी कि सब इतने आराम से क्यूँ हैं। किसी और को तकलीफ़ क्यूँ नहीं होती। किसी और को प्यास नहीं लगती। अकेलापन नहीं लगता? सब के एक साथ गायब हो जाने
का डर क्यूँ नहीं लगता।
जब तक तुमसे नही मिली थी,
तब तक मैं इक स्त्री आजादी,
उसके स्वाभिमान,उसके आत्मसम्मान,
की बाते करती थी...
बाते आज भी वही है..
तुमसे मिल कर इन शब्द को अर्थ मिल गया,
मैंने जाना कि प्यार में,
इक स्त्री कमजोर नही होती,
समर्पित होती है....


धन्यवाद।



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