पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

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शुक्रवार, 24 मार्च 2017

616.........बेशरम होता है इसीलिये बेशर्मी से कह भी रहा होता है

सादर अभिवादन..
बस कुछेक दिन बचे हैं काम के
अगले वर्ष से जुलाई की महीना मार्च की तरह होगा
कानून में बदलाव के तहत ..आयकर की विवरणी
अब जुलाई में ही दाखिल करनी होगी
अरे.....ये मैं कौन सा विषय ले लिया  क्षमा..

चलिए चलें..फुरसत के पल में जो पढ़ा वो देखिए....

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अब नहीं मिलते डगर में
फूल वाले दिन 
आज खूँटी पर टंगे हैं 
शूल वाले दिन

प्रश्न अचानक
मन में आया 
राधा ने जानना चाहा 
है यह बांस की बनी
साधारण सी बांसुरी
पर अधिक ही प्यारी क्यूं है 

कितना प्यारा निर्मल जल है 
वर्तमान है ,इससे कल है ॥
घन का देखो मन  उदार  है 
खुद मिट जाता जल अपार  है ॥

22 मार्च पानी बचाने  का संकल्प, उसके महत्व को जानने  और संरक्षण के लिए सचेत होने का दिन है।   अनुसंधानों से पता चला है  कि विश्व के 1.5 अरब लोगों को पीने का शुद्ध पानी नही मिल रहा है। पानी के बिना मानव जीवन की कल्पना अधूरी है। इस विषय पर आज सबको गहन मंथन की आवश्यकता है कि 'जल की एक-एक बूँद कीमती है, 'जल बचाओ' , जंगल बचाओ' , जल ही जीवन है' बिन पानी सब सून' - ये उक्तियाँ अब मात्र नारे नहीं बल्कि जीवन की आवश्यकता बन गई हैं।

जोगीजी वाह .....कौशल लाल
योगी जी धीरे धीरे , ले लिये सी एम के फेरे
योगीजी वाह योगी जी वाह....।।
धनबली, बाहुबली बाले नेता तो सुने थे लेकिन ई योगबली बाले नेतवन सब भी बहुत हो गए है। आखिर कुछ तो बदल रहा है। और ऐसा तो नहीं की हिलाय के चक्कर एक दूँ ठो खूटवा उखड़ जाए।





बेशरम 
बस एक 
‘उलूक’ 
ही 
हो रहा 
होता है 

रात को 
उठ रहा 
होता है 
फटी आँखों 
से देख 
रहा होता है 
....
आज्ञा दें दिग्विजय को


गुरुवार, 23 मार्च 2017

615...ज़िन्दगी तो अपने दम पर ही जी जाती है … दूसरो के कन्धों पर तो सिर्फ जनाजे उठाये जाते हैं।

आज 23 मार्च है यानि शहीद दिवस.
आज ही के दिन वर्ष 1931 की मध्यरात्रि को अंग्रेजी हुकूमत ने भारत के तीन सपूतों भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी पर लटका दिया था.
शहीद दिवस के रुप में जाना जाने वाला यह दिन यूं तो भारतीय इतिहास के लिए काला दिन माना जाता है पर स्वतंत्रता की लड़ाई में खुद को देश की वेदी पर चढ़ाने वाले
यह नायक हमारे आदर्श हैं....
मैं पांच लिंकों का आनंद  परिवार की ओर से  भारत माता के इन  अमर सपूतों को कोटी कोटी नमन करता हूं...

जब मैं पढ़ाई कर रहा था तो अक्‍सर ऐसे टीचर और नेताओं से मुलाकात होती, जो हमें तो भगत सिंह के विचारों से प्रेरित होने और उनके रास्‍ते पर चलने की सलाह देते।
लेकिन अपने बेटे- बेटियों से हमेशा यह राह छिपा कर रखा करते। अगर किसी का बेटा या बेटी भटकता हुआ उधर गुजरने की कोशिश करता तो उसे यह समझाकर वापस लौटा लाते
कि अभी हालात ऐसे नहीं हैं। (भौतिक परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं हुई हैं।) ‘यानी भगत सिंह बहुत महान। बहुत अच्‍छे। लेकिन भगत सिंह मेरे घर में नहीं बल्कि पड़ोसी
के घर पैदा लें।‘  यही आज के मध्‍यवर्ग का मानस भी है। आज इसी मानस का फैलाव दूर-दूर तक है। इसलिए भगत‍ सिंह की वीरता के गान हम भले ही आज जितना गा लें। उनके
विचार से दो चार होने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाते क्‍योंकि विचार बड़े बदलाव की ओर ले जाते हैं। बदलाव की राह कभी आसान नहीं होती।
 ज़िन्दगी तो अपने दम पर ही जी जाती है … दूसरो के कन्धों पर तो सिर्फ जनाजे उठाये जाते हैं।
भगत सिंह जब पांच-सात साल के थे तब वे एक खेल खेला करते थे,  जिसमे अपने सभी दोस्तों को सो टुकड़ियों में बाट देते थे और एक दूसरे पर आक्रमण करते थे।
जब अंग्रेजो द्वारा पंजाब के अमृतसर में 13 अप्रैल, 1919 में जलियावाला बाग हत्याकांड हुआ, उस वक्त भगत सिंह अपनी स्कूल में पढ़ रहे थे और जैसे ही उसे यह पता
चला तब वो स्कूल से 12 किलोमीटर पैदल चलकर जलियावाला बाग आ पहुचे और इस हत्याकांड को देखकर भगत सिंह की सोच पर गहरा असर पड़ा।
समय रहते एक तरफ गांधीजी का असहयोग आंदोलन शुरू हुआ तो दूसरी ओर क्रांतिकारियों के हिंचक आंदोलन शुरू हुए, जिनमे भगत सिंह को अपने लिए रास्ता चुनना था कि वे
किस आंदोलन का हिस्सा बने। कुछ समय बाद गांधीजी का असहयोग आंदोलन को बंध कर दिया गया और भगत सिंह ने देश की आजादी के लिए क्रांति के रास्ते पर चलना ठीक समझा,
उसके बाद वें क्रन्तिकारी दलो के सदस्य बनने लगे।
अब आज की चुनी हुई रचनाएं...
एक बार फिर...ब्लौगों के दबे खजाने से ही...






जीवन
तेरा मेरा सबका जीवन पल दो पल का लेखा है
गिन कर सबकी साँसे, चोला पञ्च-तत्त्व का पहना है
सागर की लहरों सा जीवन तट की और है दौड़ रहा
किस को मालुम तट को छू कर लहरों को तो ढहना है
लिंगदोह कौन है ? पता करवाओ
आओ मिल
बाँट कर चाय
समोसे खाओ
बिल थानेदार
के नाम
कटवाओ
शासन के
जासूसों के
आँख में
घोड़ों के
आँख की
पट्टियाँ
दोनो ओर
से लगवाओ
जब तक सांस चल रही है जीवन है। सांस गई जीवन गया। दिल का काम तमाम हुआ। ऑक्सीजन उठानी बंद ,खून का संचरण बंद। यही मृत्यु है चिकित्सा विज्ञान की शब्दावली में
मौत का मतलब है देहांत बोले तो देह का अंत। सब कुछ खत्म नहीं होता है ,देह मरती है। देही नहीं। शरीर
मरता है शरीरी नहीं।
जब तक सांस चल रही है जीवन है। सांस गई जीवन गया। दिल का काम तमाम हुआ। ऑक्सीजन उठानी बंद
,खून का संचरण बंद। यही मृत्यु है चिकित्सा विज्ञान की शब्दावली में इसे नैदानिक मृत्यु (Clinical death )कह
लो। क्या फर्क पड़ता है।दिल धड़कना बंद  हुआ ,दिमाग भी चंद मिंटो बाद ठंडा हो जाता है।ऑक्सीजन दिमाग
को भी चाहिए दिल को भी। दौरा दिल का भी पड़ता है दिमाग का भी दोनों काम करना भी बंद करते हैं पूर्णतया।
साइंसदान दिमागी मृत्यु को आखिरी मृत्यु , मानते बूझते हैं।  
पांच मकान मालिक थे इस देह के वायु -अग्नि -आकाश -पृथ्वी -जल.
 मौत के बाद पाँचों अपना हिस्सा ले लेते
हैं।
विचारों की श्रंखला
 अब कोई बच्ची  नहीं
जो भय मन में पालूँ
कर्तव्य से मुंह मोड़ कर
पलायन करूं  |
चाहती हूँ रखूँ
अस्तित्व अक्षून्य अपना
ना हो बाधित
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
अवाध गति से बढ़ती जाए
विचारों की श्रंखला |
मौत क्यूँ ........ ? जीवन अनमोल है ......! "
जिन्दगी पथ है ,मंजिल की तरफ जाने  का ,
  मौत गीत है , सदा मस्ती में गाने का .
 जिन्दगी नाम है ,तूफान से टकराने का ,
 मौत  नाम  है  आराम  से  सो  जाने  का ."
किसी  शायर  की  ये  चंद  लाइन  कुछ  न  कहते  हुए  भी  बहुत  कुछ  कह  जाती  है . जिन्दगी  के   प्रति हिम्मत  दिलाती  हुई  इन  चंद   पंक्तियो  ने   जिन्दगी 
और  मौत  के  अंतर  को  आसानी  से  व्यक्त  कर  दिया है  .  पर  लगता  है  यह  सिर्फ  किताबो  के  बंद  पन्नो  में  ही  उलझ  कर  रह  गयी  है  और  जिन्दगी
धन्यवाद।















बुधवार, 22 मार्च 2017

614.....सब बिकाउ है जमीर ही बेच डाल

सादर अभिवादन
काफी से अधिक फेर-बदल महसूस कर रही है भारत की जनता
और अच्छा भी लग रहा है...दिन अच्छाइयों के जो आ रहे हैं
हरदम की तरह नकारात्मक सोंच वालों की कलम तेजी से चल रही है
पढ़ रही हूँ जो..यदि वो नकारात्मक है तो...उसमें भी कहीं न कहीं
सकारात्मकता छिपी ही होती है....

आज की पसंद कुछ ऐसी ही है...

रचनी हैं अब साजिशें 
स्वप्न तो बहुत देख दिखा चुके 
ये वक्त का बदला लहजा है 
जिस पर इंसानियत तलवों का उपालम्भ है 
और साजिश एक आदतन शिकारी 


प्रयास....शुभा मेहता
मैंने कुछ सीखा आज
एक मकड़ी से
निरन्तर प्रयास करते रहना
जुट जाना जी जान से
चाहे , कोई कितनी ही बार


विकास की राह चलने से बदलेगी छवि....राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सबका साथ, सबका विकास की नीति और सर्वहितकारी राजनीति के चलते अनुमान लगाना कठिन था कि योगी जैसे कट्टर हिंदुत्व छवि और विवादित बयान देने वाले व्यक्ति को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी जाएगी. ऐसे समय में जबकि ठीक दो वर्ष बाद केंद्र सरकार को या कहें कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सम्पूर्ण देश के सामने लोकसभा चुनाव की परीक्षा से गुजरना है, उत्तर प्रदेश में कट्टर हिंदुत्व छवि का मुख्यमंत्री बनाया जाना अपने आपमें एक चुनौती ही कहा जायेगा


योग, रोग, भोग....सखाजी
ऐसा बना योग
हर योगी को लगा रोग
गद्दियां मल रहे हैं
ख्वाब यूं पल रहे हैं




परीक्षा...साधना वैद
पास या फेल
मेहनत का फल
मिल जाएगा

पास हो जाते
खूब मन लगा के
जो पढ़ लेते

बात पते  की....डॉ. सुशील जोशी

बस एक
मेरी 
परेशानी
का तोड़ 
निकाल

बैचेनी है 
बेचनी
कोई तो 
खरीददार
ढूँढ निकाल।
...

दें इज़ाज़त यशोदा को
सादर









मंगलवार, 21 मार्च 2017

613...बावजूद तकलीफों के लोग कहाँ पहुँच गए 

जय मां हाटेशवरी...

क्या खूब लिखा है...

ऐसे भी लोग थे जो रास्ते पर बैठ के पहुँच गए
वरना सड़कों पर दौड़ते तो रहे बहुत से लोग
तारीख जब भी करवट ले रही थी इतिहास में
इंकलाबियों को कोसते तो रहे बहुत से लोग
बावजूद तकलीफों के लोग कहाँ पहुँच गए
परेशानियों को सोचते तो रहे बहुत से लोग
...आज की प्रस्तुति में...
ब्लॉगों के दबे खजाने से कुछ रचनाएं...

शिवम् सुन्दरम् गाती है
मासों में मधुमास अकेला अनुराग मिलन के रंग भरे
भरता मधुर विरह पीड़ा जो सहज ह्रदय उग आती है
शिशिर गयी, पतझड़ बीता, तरु किसलय जब लाते "श्री"
फूली सरसों देख, कृषक जन मन में मस्ती छाती है

दुख
कुछ दुख हमसे बात भी करते हैं
उनकी पनीली आंखें
हमारे कातर चेहरों पर टिकी होती हैं
उनके भुरभुरे हाथ हमारे अनमने कंधों पर पड़े होते हैं।
वे बंधाते हैं धीरज,
भरोसा दिलाते हुए कि वे देर तक नहीं रहेंगे
चले जाएंगे जल्दी।
कुछ दुख हो जाते हैं इतने आत्मीय
कि उनके बिना अपना भी वजूद लगता है आधा-अधूरा।

स्वप्न न बुनूँ ....तो क्या करूँ ....??
गुनगुनी सी धूप और ये कोमल शब्द-
सुरभित अंतर
कल्पना दिगंतर
भाव  झरते निरंतर
स्वप्न न बुनूँ ....तो क्या करूँ ....??

फ़िलवक़्त .......!
जिस दिन ये।
खो जाऊँगी जंगल में …
फ़िलवक़्त
बस, बह रहे हो
नदी में
समंदर से ……… !!

मैं यहाँ तू वहाँ [ गजल ]
सुलगती रोज है, आग दिल में पिया
यादें मिटती नहीं ,चाहे जाओ यहाँ |
अश्कों में रात दिन,बहते जज्बात हैं
ख्यालों में तुम मिले, मिट गई दूरियाँ |
आ गए पास तुम, जी उठी धड़कनें
कन्धे तेरे पे सर,रख करूँ मैं बयाँ |

अहिल्‍या - ना शबरी..
तुम्‍हारी आधी सांस में पूरी आस हूं
आधा तुम्‍हारे मन का पूरा संकल्‍प हूं,
संकल्‍प हूं जीवन का - स्‍व को सहेजने का
तुम्‍हारे कर्तव्‍य पर आधा अधिकार हूं
सपनों का समय नहीं बचा अब,
संग चलकर साथ कुछ बोना है,
बोनी हैं अस्‍तित्‍व की माटी में,
अपनी हकीकतें भी मुझको...

आज बस इतना ही...
चलते-चलते ये रचना भी अवश्य पढ़े...
अज्ञान तिमिर
धन्यवाद।





















सोमवार, 20 मार्च 2017

612....निगल और निकल यही रास्ता सबसे आसान नजर आता है

सादर अभिवादन....
निगल लिया मार्च को भी
2018 ने.... तनिक से थोड़ा जियादा समय
बचा है.....मताधिकार पाने के लिए


आज की पसंदीदा रचनाएं.....


लीक से हटकर
जैसे किसी आत्मा ने पटेल बा पर अपनी सवारी उतार दी हो इस तरह 
पटेल बा ने जोर-जोर से चिल्लाना, आवाजें लगाना शुरु कर दिया - 
‘डरना मत रे! घबराना मत रे! ये डाकू नहीं हैं। ये तो अपने पुलिसवाले हैं।’ छोटा सा गाँव और कवेलू की छतें। पटेल बा की आवाज गाँव के 
हर घर में गूँज उठी। जिनकी अफीम थी वे तो पहले से ही अधजगे थे। वे तो पूरे जागे ही जागे, बाकी गाँव भी जाग गया और पटेल बा का मकान मानो पंचायत घर में बदल गया। जिनका ‘माल’ था, वे चीतों की तरह झपटे। अपना-अपना ‘माल’ कब्जे किया। ठिकाने लगा कर वापस 
पटेल बा के घर पहुँच, भीड़ में शामिल हो गए।


पहली बार
प्रकृति हैरान थी
बहुत कोशिश की गयी
बदलाव को रोकने की
परंपरा -संस्कृति की दुहाई दी गयी
धर्म -ग्रंथों का हवाला दिया गया
पर ..... स्थितियां बदल चुकी थीं

ये निगाहें इक अजीब सा ही गुनाह किये जाती हैं,
इधर-उधर भटकती सी तुम पे ही ठहर जाती हैं।
ये ज़ुबाँ है कि लफ़्ज़ों संग खेलना शौक है इसका,
पर क्यों ये तुम्हारे सामने बेज़ुबान सी बन जाती है।

पथ भ्रष्ट नही कर पाओगे............डॉ. अपर्णा त्रिपाठी
पग डगमग कितने कर लो
पथ भ्रष्ट नही कर पाओगे
भले बिछा लो शूल मार्ग में
पर अनिष्ट नही कर पाओगे


यूँ ही....विभारानी श्रीवास्तव
वय आहुति पकी वंश फसल गांठ में ज्ञान
जीवन संध्या स्नेह की प्रतिमूर्ति चाहे सम्मान
एक जगह रोपी गई दूजे जगह गई उगाई
बिजड़े जैसी बेटियाँ आई छोड़ पल्लू माई

ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर........जां निसार अख्तर
जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में 
शरमाए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो 
संदल से महकती हुई पुर-कैफ़ हवा का 

झोंका कोई टकराए तो लगता है कि तुम हो 


अभी तो बस चलना  सीखा
चढ़ा दिया मेहनत की सीढ़ी
बचपन इनका छीन लिया 
चेहरे से मुस्कान भी छीनी


पचता 
नहीं भी है 
फिर भी 
निगलना 
जरूरी 
हो जाता है 

‘उलूक’ 
चूहों की दौड़ 
देखते देखते 
कब चूहा हो 
लिया जाता है 
.......
आज्ञा दें
यशोदा को
सादर



रविवार, 19 मार्च 2017

मेघ की बेचैनी. .....611

नमस्कार दोस्तो 

सुप्रभात  
उत्तरप्रदेश मे तो योगी राज आ गया  । 
  दोस्तों  जीवन मे सुख -दुख और हानि - लाभ रात-दिन की तरह है जिस प्रकार रात के बाद दिन होता है  उसी प्रकार दुख के बाद सुख जरूर आता है, इसलिए दुख से नही घबराना चाहिए ।

        आइए अब चलते है आज की पाँच लिंको की ओर. . . . . .  

मेघ की बेचैनी

          इस यक्ष को अब मेघ से ईर्ष्या हो गई थी । मेघ को अब दूत बनाने के ख्याल से वह शंदेह के बादलो से घिर गया था।
              वह प्रेयसी का सौंदर्य वर्णन नहीं करना चाहता था।उसे डर था उन तालों में कितनी नवयौवना के झांघो पर दृष्टि से नजर फिसले कही वो उसी से मोहित न हो  जाए। आखिर कुछ भी है ,है तो इंद्र का दास ही। उसकी लोलुपता और गौतम के श्राप को कौन नहीं जानता।

छड़ी कबूतर



कबूतर तो वही कर रहे थे जो वे न जाने कब से करते आ रहे हैं. लेकिन अनुज और अजय क्यों उलझ गए! इस उलझन से निकलना आसान नहीं था.और फिर ऐसा क्या हुआ. ..
             
अनुज दोपहर में दो बजे स्कूल से लौटता है. आते ही माँ गरम भोजन परोस कर कहती हैं –खाकर कुछ देर आराम कर ले,फिर..’ फिर उसे ट्यूशन पर जाना होता है- ठीक चार बजे. इस दिनचर्या से रविवार को ही छुटकारा मिलता है. भोजन के बाद अनुज जैसे जबरदस्ती लेट जाता है. कभी नींद लग जाती है तो कभी इसी सोच में समय बीत जाता है कि रविवार के दिन दोस्तों के साथ कैसे मस्ती करेगा.       

दर्द ...

अपना अपना अनुभव है जीवन ... कभी कठोर कभी कोमल, कभी ख़ुशी तो कभी दर्द ... हालांकि हर पहलू अपना निशान छोड़ता है जीवन में ... पर कई लम्हे गहरा घाव दे जाते हैं ... बातें करना आसान होता है बस ...

लोग झूठ कहते हैं दर्द ताकत देता है
आंसू निकल आएं तो मन हल्का होता है
पत्थर सा जमा
कुछ टूट कर पिघल जाता है

उलझन

आजकल मैं उलझन में हूँ.


देख नहीं पाता खुद को

आईने में,
सुन नहीं पाता
अपनी ही आवाज़,
रोक नहीं पाता खुद को 
चलने से.

फेस बुकिया कैसे कैसे


कई लोग फेस बुक पर इस तरह लाईक करते नजर आते हैं मानो कोई नेता रोड़ शो में सबका हाथ हिला हिला कर अभिवादन कर रहा होदेखा पहचाना किसी को नहींहाथ हिलाया सबको.इनका संघर्ष मात्र इतना सा है कि आप देख लो कि यह सक्रिय हैं और आपको पसंद करते हैं.

   अब दीजिए आज्ञा 
विरम सिंह 

शनिवार, 18 मार्च 2017

610 .... बधाई



सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

चलिए होली का हो हो समाप्त हुआ
समय निकलेगा पढ़ने के लिए






यह  है  हमारी   नाज़ुक  कली,
संभालना  होगा बड़ी नजाकत से.
लग न जाए इसे किसी की नज़र ,
बचाकर  रखना  होगा नफासत से. 
हमारे प्यार व्  ममता ने हमसे कहा 






माँ भारती की सेवा और रक्षा हेतु आपको और अधिक साहस,सामर्थ, 
इच्छाशक्ति प्रदान करें, आप प्रगति पथ पर निरंतर उन्नति प्राप्त करें, 
आपकी यश कीर्ति इस संसार के समस्त कोनों में सूर्य के प्रकाश की तरह ऊर्जा 
और चन्द्रमा के प्रकाश की भांति शीतलता प्रदान करें, दुःख,
 शोक, भय आपको छूकर भी ना निकले.उस सर्वशक्तिमान परमपिता परमेश्वर से 
यह प्रार्थना है कि मेरी हर प्रार्थना को जो मैंने आपके लिए की है,वो पूर्ण हो."






यह बहुत ही महत्वपूर्ण उम्र होती है
जहाँ सबसे ज़रूरी होता है एक अनुभवी प्रेमी का अनुभव
पर अफ़सोस अपने अनुभव को सबसे श्रेष्ठ और सबसे पवित्र बताते हुए
हम ठगे जाते हैं
कभी-कभी हम जीत जाते हैं और जश्न मनाते हुए
रंगे हाथों पकड़ लिए जाते हैं अपने अन्दर ही









जो हारकर , छोड़ जाने की बात करते हैं.
हम तो बस उन्हें होश में आने की दुआ करते हैं.

वो खुद के घर को रोशनी से भर रहे बेशक,
मगर, औरों के घरों में तो धुंआ भरते हैं.








जीने दो मुझे मिट्टी बन कर,
नहीं चाहती मैं ऊँचे आसन.
उड़ने दो अब पाखी बनकर,
रहने दो अब झूठे चंदन.


<><>


फिर मिलेंगे

विभा रानी श्रीवास्तव




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