पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

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सोमवार, 31 जुलाई 2017

745......''सोज़े वतन'' अब दिखाने हम चले !



 ''सोज़े वतन'' अब दिखाने हम चले !
भूत हो या भविष्य अथवा वर्तमान सदैव एक सच्चे लेखक की लेखनी स्वतंत्रता के नये आयाम गढ़ती है  उनमें यदि ''मुंशी'' जी की बात न हो तो साहित्य कुछ अधूरा सा प्रतीत होता है। इस 'कालजयी' लेखक के बारे में जितना भी लिखूँ कम होगा ,लेखनी की ऐसी धार ग़रीब किसान, मजदूरों व उपेक्षित महिलाओं के दर्द की आवाज़ बनी। 
यक्ष प्रश्न है ! इस लेखक के बाद साहित्य जगत में उनका उत्तराधिकारी कौन ? क्या वर्तमान लेखकों में यह गुण मौज़ूद है जो शोषितों का दर्द सुने ,उनकी आवाज़ बने ,निष्पक्ष लेखन ,समाज में व्याप्त सामंतवादी विचारों के विरोध में अपनी लेखनी को एक नई दिशा दे अथवा मिथ्या ही लोगों के महिमामंडन में व्यस्त ,बुलंदियों को छूने की लालसा में स्याह लिपटे विचारों को और स्याह करे 
भय विचारों को खंडित करता है एवं कायरता 
मिथ्या मार्ग को और प्रशस्त्र करता है 
यदि भय लेखनी पर विजय पा ले !
परिणाम 
'विध्वंसक' निश्चय है !
आवश्यक है यथार्थवादी लेखन, संभव है ! हमारी लेखनी की 'स्वतंत्रता', जिसका मूल हमारे विचारों की 'निर्मलता'  देगा भविष्य के साहित्य को एक नया आयाम  
जो जन्म देगी एक और कालजयी 'लेखक' 
''मुंशी प्रेमचंद्र'' 
के जन्म दिवस पर  
''पाँच लिंकों का आनंद'' 
परिवार इस कलम के 'सिपाही' को कोटि-कोटि नमन करता है 
( जन्म : ३१ जुलाई  १८८० वाराणसी 'लमही' ) 


सादर अभिवादन आप सभी पाठकों का 
आज का सफ़र कुछ ख़ास है फिर भी एक कमी रहेगी आदरणीय ''यशोदा'' दीदी की क्योंकि आज मेरी प्रस्तुति का अवलोकन अधूरा है 

सब यहाँ मेहमान रे
आदरणीय ''कंचन प्रिया'' जी की एक अनमोल 
कृति 

हँस रहा है दर्द पे तू है कहाँ इंसान रे 
चार दिन की जिंदगी पे मत करो अभिमान रे  

आईना- मेरा दस्तावेज
आदरणीय ''अपर्णा त्रिपाठी'' की रचना 
 उठ चुकी थी पत्नी
शायद बनाने गयी थी चाय।
तभी नजर गयी
उस आइने पर
जो इस कमरे में
एक अरसे से
सोता जागता था

मैं बीच की कड़ी हूँ ....

आदरणीय ''प्रतिभा स्वाति'' जी की हृदयस्पर्शी रचना 


     माँ  और  बेटी ...
बेटी  और माँ  !
बिछुड़ना  नियति ...
रो रहा  आसमां !.

मैं एक मामूली मिट्टी का दिया
पहली बार इस ब्लॉग पर 
आदरणीय ''नूपुरम'' जी की एक
 'कृति' 


मैं मनोबल हूँ ।
जो अंतर में, 
अलख जगाये,
आस बँधाये ।

 ****आओ जीवन के किरदार में सुन्दर रंग भरे*** 
जीवन का महत्व बताती 
आदरणीय ''ऋतु आसूजा'' जी की एक 
कृति  

 एक अनसुलझी पहेली
जीवन सत्य है
पर सत्य भी नहीं
पर जीवन क्या है
एक अनसुलझी पहेली ।।

 तुम्हारे दूर जाने से ---------- कविता 

आदरणीय ''रेणु बाला'' जी की एक अनुपम 
कृति 

  तुमसे  कोई अनुबंध नहीं  साथी -
जीवन  भर साथ  निभाने  का  .
.फिर  भी भय व्याप्त  है  मनमे  -
तुमको  पाकर  खो  जाने  का  ;  
समझ ना  पाया  दीवाना मन –
 क्यों  कोई अपरिचित  इतना ख़ास  हुआ ?

 आसक्ति ......... 
हमारे युवा कवि आदरणीय ''पुरुषोत्तम'' जी की हृदय को स्पर्श करती एक 
रचना 

विशाल भुजपाश में जकड़ी,
व्याकुल मन सी दौड़ती वो हिरणी,
कभी ब्रम्हांड में हुंकार भरती,
वेदनाओं मे क्रंदन करती वो दामिणी,
कभी आँसूओं में करती क्रंदन,
या कभी सन्नाटों के क्षण, आँसुओं के मौन...

तो क्या…?..... कुमार शर्मा ‘अनिल’
आदरणीय ''दिग्विजय अग्रवाल'' द्वारा संकलित  एवं कुमार शर्मा 'अनिल' द्वारा  लिखित  समाज को दर्पण दिखाती एक 'लघु कथा' 


 उसने बहुत बार  सोचा था  कि यह वाकई में   प्रेम  है   
या मात्रा  शारीरिक आकर्षण अथवा  पत्नी से नीरस बन चुके   
 सम्बन्धों से उकता जाकर कुछ नया  तलाशने  की  पुरुष की  आदिम   प्रवृत्ति। 
प्रेम  और  शारीरिक   आकर्षण में    
अंतर की  बहुत  ही महीन  सी रेखा  होती  है  और  इन्हें  एकदम से अलग कर नहीं देखा  जा सकता।  
  फोटोग्राफी : पक्षी 19 (Photography : Bird 19 )

आज की प्रस्तुति के अंत में पंक्षी प्रेमियों के लिये 
आदरणीय राकेश श्रीवास्तव ''राही'' द्वारा संकलित एक विशेष प्रजाति के पक्षी के संदर्भ में अतिमहत्वपूर्ण जानकारी   

कबूतर (फाख्ता) पक्षी कोलंबिया परिवार का सदस्य है। 
इस पक्षी को अक्सर "कबूतर" के रूप में जाना जाता है। 
इसके चोंच के शीर्ष पर  सफ़ेद रंग का विशिष्ट ठोस उभार होता है। 

आपकी प्रतीक्षा में ''मेरी भावनायें''

'सोज़े वतन'
अब बताने हम चले 
लेखनी का मूल क्या ?
तुझको जताने हम चले 
भौंकती है भूख नंगी 
मरने लगे फुटपाथ पे 
नाचती निर्वस्त्र द्रौपदी 
पाण्डवों की आड़ में 
हाथ में चक्र है सुदर्शन 
लज्ज़ा बचाने हम चले  
'सोज़े वतन'
अब बताने हम चले 

( प्रस्तुत अंश मेरी नवीन 'कृति' से उदधृत हैं। )

''एकलव्य'' 

रविवार, 30 जुलाई 2017

744..दो कबाड़ी, एक ऊपर और एक नीचे

बाद नमस्कार के हाल ये है कि रायपुर में कड़क धूप पसरी हुई है.. और दिन का तापमान 33 डिग्री सेंटीग्रेड है बारिश का नामो-निशान दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रहा है...राजस्थान व गुजरात से इल्तिज़ा है कि सारा बारिश वे ही न हासिल करें कुछ से कुछ अधिक बारिश हमारे छत्तीसगढ़ के लिए रवाना कर दें.. हम यहां सूखी सुनामी का सामना कर रहे हैं...

अब चलें कि बकबक ही पढ़ते रहेंगे.......


एक बार उन्हें दशहरे के जुलूस में पंडित बनकर आरती की थाली लेकर चलते हुए भी देखा गया. पंडितजी की थाली में पैसे चढ़ाती और आशीर्वाद लेती महिलाओं को अक्कू मियां के ही मोहल्ले-बिरादरी के लड़के मियां को चिढ़ाने की गरज से सावधान कर रहे थे- चाची, त मुसई छ मुसई, अकबर अली ने उन लड़को को एक आंख से घूरकर कहा- चुब्बे हां, बता रिया हूँ भांची मत मार ....


हरी-भरी डालियां नील गगन छुअन को मचल उठी
पवन वेग गुंजित-कंपित वृक्षावली सिर उठाने लगी
घर-बाहर की किचकिच-पिटपिट किसके मन भायी?
पर बरसाती किचकिच भली लगे बरखा बहार आयी!


बाकी अभी है और फ़ज़ीहत कहाँ कहाँ...नवीन मणि त्रिपाठी
बदलेंगे लोग ,सोच बदल दीजिये जनाब ।
रक्खेंगे आप इतनी  अदावत  कहाँ कहाँ ।।

ईमान   बेचता   है   यहाँ   आम   आदमी ।
करते   रहेंगे  आप   हुकूमत  कहाँ  कहाँ ।।



फूल ख़त्म हो गए पर अब खेल में मज़ा आने लगा ! अब एक दूसरे को सम्मानित करने में नहीं अपमानित करने में ! एक दूसरे को चोट पहुँचाने में ! अब खेल शुरू हुआ कंकड़ों से पत्थरों से ! अब जीतना परम ध्येय था ! येन केन प्रकारेण सामने वाले को धूल चटाना भी मकसद बन गया ! एक कंकड़ फेंकता तो दूसरा ढेला ! 
एक ढेला फेंकता तो दूसरा पत्थर ! बिना यह देखे कि सामने वाले को कितनी चोट लगी !


छेड़ने राग
बूँदों से बहकाने
आया सावन

खिली कलियाँ
खुशबू हवाओं की
बताने लगी


याद आने लगी, कई भूली-बिसरी बातें,
वक्त बेवक्त सताती हैं, गुजरी सी कई लम्हातें,
ढलते हुए पलों में कटती नहीं हैं रातें,
ये दहलीज उम्र की,  दे गई है सैकड़ों सौगातें।

पंखुड़ियाँ ...24 कहानियो का संग्रह
आम के आम..गुठलियों के दाम
कहानी लेखकों के लिए सुनहरा मौका..

आई ब्लॉगर का संचालन करने वाली फर्म प्राची डिजिटल पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित होने जा रही है, आमंत्रित है मात्र 2000 से 3000 शब्दों की मौलिक व अप्रकाशित कहानी





एक दिन किसी उस पल 
बिना प्रयास 
'तुम' चली आओगी
मेरे पास 
और बाँध दोगी 
श्वास में एक गाँठ ।


बहुत कुछ 
हो रहा है 
बहुत कुछ 
अभी होना ही 
होना है 
‘उलूक’ तू 
रोता कलपता 
ही अच्छा लगता है 
तेरे हँसने के 
दिन आने में 
अभी महीना है ।

आज्ञा दें दिग्विजय को..
अब तो मिलते रहेंगे...
सादर



शनिवार, 29 जुलाई 2017

743... धनी



सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष


हमारे लिए गर्व की बात
विस्तार से अगले पोस्ट में


चित्र में ये शामिल हो सकता है: 8 लोग, लोग खड़े हैं





कभी कल कल करती सरिता,
या कभी गगन चुम्बी इमारतों से ये पेड़
कभी सीली ठंडी हवा
तो कभी हरियाली चरती हुई भेड।
यहीं आकर मिलता है
अनुभव धरती के स्वर्ग का
आकर यहीं होता है आभास
ईश्वर के अस्तित्व का




रम्भाती थी  गैया
सहसा तभी
डूब गयी
तैरती नैया




रफू से ऐब-ऐ-पैरहन दुनियां की निगाहों से छुप जाते हैं,
रिश्ते मगर रफू होते नहीं, हो भी जाएं तो बड़े सताते हैं




यह हर साल ब्रिटेन में 40 हजार और अमेरिका में दो लाख लोगों की
असमय मौत का कारण बनता है। लेकिन ज्यादातर लोगों को इसका
अंदाजा नहीं है कि छोटे घर के भीतर की प्रदूषित वायु भी
स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। घरेलू उपकरणों का असर 
: उन्होंने कहा, आजकल ज्यादातर घरों में गैस-चूल्हों का इस्तेमाल 
किया जाता है। घरों की साफ-सफाई के लिए 
रासायनिक स्वच्छता उत्पादों का प्रयोग होता है।




परमेश्वर धन के विरुद्ध नहीं है, क्योंकि उसने स्वयं ही कुछ को
उस से आशीषित किया है; परन्तु निश्चय ही वह धन के अनुचित संचय
और दुरुप्योग के विरुद्ध है। परमेश्वर नहीं चाहता है कि
धन के लोभ में पड़कर मसीही विश्वासी उसके मार्गों से
भटक जाएं। वह अपने अनुयायियों से चाहता है कि वे सच्ची
भक्ति के साथ उसके प्रति विश्वास योग्य बने रहें, और
वह उनकी सभी आवश्यकताओं को पूरा करता रहेगा। - लॉरेंस दरमानी


<><>

फिर मिलेंगे


शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

742...और अब जाने की भी तैयारी! अकेले।

सादर अभिवादन.....
माह जुलाई का अंत निकट है
कोई भी ज्योतिषी इसे टाल नहीं सकता
अगस्त में कुछ अच्छे का उम्मीद बनती है
.....आमीन....
आज की पसंदीदा रचनाओं पर एक नज़र....

‘हद है यार! तुम इतने नासमझ तो लगते नहीं! अरे भई! तुम लिखने-पढ़नेवाले आदमी हो। अखबारवालों से तुम्हारी यारी-दोस्ती है। अखबारों के जरिए देश के ज्योतिषियों तक यह बात पहुँचाओ और खुद भी युद्ध के डर से मुक्त होओ और पूरे देश को भी भय मुक्त करो।’
मैं अवाक् हो गया। मुझे इसी दशा में छोड़ वे निश्चिन्त भाव से चले गए। लगभग चौबीस घण्टे हो रहे हैं इस सम्वाद को। मैं अब तक न तो समझ पा रहा हूँ और न ही तय नहीं कर पा रहा हूँ-क्या करूँ? 


दो लघुकथाएँ ...कविता वर्मा
"ये क्या कह रही हैं मम्मी ?" आपकी देखभाल करना मेरा फ़र्ज़ है। अगर आप घर के कामों में मदद की बात सोच कर चिंता कर रही हैं तो निश्चिंत रहिये। यह उस समय की बात है जब आप स्वस्थ थीं एकदम सारे काम छोड़ कर निष्क्रिय हो जाना आपके स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा नहीं था और बिना अनुभव के गृहस्थी संभालना मेरे लिये भी मुश्किल । लेकिन अब आपके सिखाये तौर तरीके से मैं सब ठीक से संभाल सकती हूँ। आप बस आराम कीजिये अब वर्तमान के आखेट की जिम्मेदारी मेरी। 


ये एहतियात भी रहे ऊचाईयों के साथ ...... सचिन अग्रवाल
राज़ी नहीं था सिर्फ मैं हिस्सों की बात पर
क्या दुश्मनी थी वरना मेरी भाइयों के साथ 

क्या बेवफाई , कैसी नमी , कैसा रंज ओ गम
रिश्ता ही ख़त्म कीजिये हरजाइयों के साथ 


एकोअहं,द्वितीयोनास्ति ...विश्वमोहन
आया अकेला,
चला अकेला,
चल भी रहा हूँ
अकेला,और अब
जाने की भी तैयारी!
अकेले।
अपर्णा बहन का ब्लॉग पहली बार यहां पर
बूढ़ा नहीं होता समय..... अपर्णा बाजपेई
शाम को ले आते हैं बच्चे ;
माँ बाप के लिए रोटी ,
भाई बहन क लिए टॉफी :
और अपने लिए !
एक और आने वाला दिन।
हर आने वाले दिन में
वो छुपाकर रखते हैं ,
माँ के सपने , बाप की उम्मीद ,

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गुलाबी खत ....शशि पुरवार
डाकिया आता नहीं अब, 
ना महकतें खत जबाबी। 
दिल अभी यह चाहता है 
खत लिखूँ मैं इक गुलाबी। 



मौसम दिखाई देता है....लोकेश नदीश
दिल को आदत सी हो गई है ख़लिश की जैसे
अब तो हर खार भी मरहम दिखाई देता है

तमाम रात रो रहा था चाँद भी तन्हा
ज़मीं का पैरहन ये नम दिखाई देता है


क्षणिकाएँ.... श्वेता सिन्हा
रतजगे करते है
सीले बिस्तर में दुबके
जब भी नींद से पलकें झपकती है
रोटी के निवाले मुँह तक
आने के पहले
अक्सर भोर हो  जाती है।

....... अरे....परसों इस्तीफा..
और परसों ही फिर से शपथ ग्रहण

वाह रे राजनीति..तेरे खेल निराले
बिहार के अच्छे दिन लौट रहे हैं

...... आज अति हो गई मुझसे...
सहन कर लीजिए..
सादर...
यशोदा
आपने बैंकों में नोट गिनने की मशीनें देखी होंगी
पर यहां उससे भी तेज नोट गिनने वाले हैं
देखिए..




गुरुवार, 27 जुलाई 2017

741..... क्योंकि वो ताजमहल नहीं था.

सादर अभिवादन!
नागपंचमी पर्व की शुभकामनाऐं ! 
भारतीय संस्कृति का परंपरागत त्यौहार है 
नागपंचमी जो कि श्रावण मास की पंचमी तिथि 
(शुक्ल पक्ष) को  मनाया जाता है।  
स्त्रियाँ अपने परिवार में ख़ुशियों के लिए 
नाग देवता से प्रार्थना करती हैं,पूजा करती हैं तथा नाग 
को दूध पिलाये जाने का चलन आम है। 
इस दिन सपेरे नाग के साथ बस्तियों में देखे जाते हैं।   



आदरणीय दिग्विजय जी के आग्रह पर 

आज का यह अंक तैयार किया है।  मेरी रचना 
"ख़त" पढ़कर उन्होंने इच्छा ज़ाहिर की थी कि 
आज का अंक वियोग आधारित रचनाओं को 
समर्पित हो तो मैंने कोशिश की है .....
जो कि संयोगवश महिला रचनाकारों की प्रस्तुति बन गया है। 


वियोग या विछोह हमारे जीवन में रचा-बसा है। कभी न कभी वियोग को जीना होता है।  सामान्यतः वियोग को श्रृंगार रस के एक रूप (दूसरा रूप संयोग श्रृंगार ) में जाना जाता है किन्तु वियोग करुण रस में भी अपनी उतनी ही प्रधानता रखता है। वियोग श्रृंगार में जहाँ आशिक-माशूक़ा  के  मिलन की आश का तंतु प्रेम की व्यापक संभावनाओं को जीवित रखता है वहीँ करुण रस में यह नाज़ुक धागा टूटकर बिखर चुका होता है और वियोग भावविह्वल करता हुआ 
शोक का अथाह सागर बन जाता है। 


आइये अब आपको ले चलते हैं आज की वियोग से लबरेज़ रचनाओं की ओर -    
                   
 लावण्या शाह

नैन में असुवन झड़ी!

है मौनओंठों पर प्रकम्पित,
नाचतीज्वाला खड़ी!
बहा दो अंतिम निशानी, 
जल के अंधेरे पाट पे,
'स्मृतिदीपबन कर बहेगी,
यातनाबिछुड़े स्वजन की!
एक दीप गंगा पे बहेगा,
रोयेंगीआँखें तुम्हारी।
                             

हल्के-हल्के हाथों से फिर, 

अपनी आँखों को पोंछा भी होगा 
देख उँगली पर अटकी बूँद-
एक हल्की सी मुस्कुराती लकीर,
उसके होंठो को छूकर गुज़री होगी
                      
है मेरा भी लाल कोई

जैसे तुम थे माँ के अपनी...

बस उसी के अक्स को
तेरी जगह रखा था मैंने !
हाँउसी पल से...तभी से...
रुह मेरी सुन्न है और काँपते हैं हाथ मेरे !
शब्द मेरे रो पड़े और रुक गई मेरी कलम भी !
वीर मेरे ! अश्रुधारा बह चली...
                                 
सफ़र   का  सिलसिला बिन  मंज़िलों  का  हो गया

तुम नहीं हो ज़िन्दगी  जिसमें  वास्ता ढूँढ़ने चले हैं 

चीखती हैं  ख़ामोशियाँ  तन्हाई में तेरी सदाएँ हैं 
जाने  कब  ख़त्म हो दर्द की इंतिहा ढूँढ़ने चले हैं 
            
किसी जीवित घर का मिटाया जाना विधि का विधान नहीं  नियति का क्रूर मज़ाक है बल्कि मनुष्य के असंवेदनशील होने का प्रमाण है  उस घर का बाशिंदा कितना तड़पा होगा जब उससे वो घर छीन लिया गया होगा जिसमें उसकी प्रियतमा की हर निशानी मौज़ूद है और ये सब 
अतीत की कथा नहीं बल्कि उसका वर्तमान जीवन है  कितना रोया होगा वो  कितना पुकारा होगा वो अपनी प्रियतमा को जिसने अकेला छोड़ दिया 
यादों के सहारे जीने के लिएपर उसने सदैव उसे अपने साथ महसूस 
किया हैउसे सोचा नहीं  बल्कि उसके साथ जी रहा है ।कितनी बेबस हुई होगी उस औरत की आत्मा जब उसके सपनों का 
घर टूट रहा होगा और उसका हमसफ़र उसकी निशानियों को 
चुन-चुन कर समेट रहा होगा  तोड़ दिया गया प्रेम का मंदिर फफक पड़ी होंगी दीवार की एक-एक ईंटें चूर हो गया किसी औरत की ख्वाहिशों का संसार 
......... 

वियोग की चंद झलकियाँ 

आपको प्रभावित करने में 
कितनी सफल रहीं, 
बताइयेगा ज़रूर। 
आपके  मनमोहक, ऊर्जावान सुझावों की प्रतीक्षा के साथ 
अब आपसे आज्ञा लेता हूँ। 
फिर मिलेंगे। 



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